ये प्रश्न रटकर हल नहीं होते। इनमें आपको किताब के स्रोत पढ़ना, प्रमाण से नतीजा निकालना, तुलना करना, पक्ष लेना और कारण देना है। पहले अपना उत्तर ख़ुद लिखिए, फिर नीचे दिया उत्तर खोलकर मिलाइए। अंक सिर्फ़ यह अंदाज़ा देते हैं कि उत्तर कितना लंबा हो।
तारों का मतलब: ★वाली पंक्ति उत्तर की मुख्य बात है; दोहराते समय पहले वही पढ़िए। ! वाली पंक्ति उस चूक की ओर इशारा करती है जो अक्सर हो जाती है।
भाग क — केस-आधारित प्रश्न
केस 1 — साँची: स्तूप जो अपनी जगह बचा रहा (पृष्ठ 82–83)
किताब का उदाहरण: किताब कहती है, “उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित है साँची का स्तूप।” उन्नीसवीं सदी में फ्रांसीसियों ने सबसे अच्छी हालत में बचा साँची का पूर्वी तोरणद्वार फ्रांस के संग्रहालय में दिखाने के लिए भोपाल की नवाब शाहजहाँ बेगम (शासनकाल 1868–1901) से ले जाने की इजाज़त माँगी। कुछ समय अंग्रेज़ों ने भी ऐसी कोशिश की। शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम ने स्थल के रख-रखाव के लिए धन दिया।
1साँची के पूर्वी तोरणद्वार को फ्रांस ले जाने की माँग का क्या हुआ? 2 अंक
उत्तर देखिए
तोरणद्वार भोपाल राज्य में अपनी जगह पर ही रहा। (पृष्ठ 83)
- फ्रांसीसियों ने इसे फ्रांस के संग्रहालय में दिखाने के लिए ले जाने की इजाज़त माँगी, और कुछ समय अंग्रेज़ों ने भी ऐसी कोशिश की।
- ★दोनों प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए, इसलिए मूल तोरणद्वार नहीं गया।
2साँची को बचाए रखने में भोपाल की बेगमों की क्या भूमिका थी? 3 अंक
उत्तर देखिए
बेगमों ने स्थल के रख-रखाव और साँची पर हुए काम के लिए धन दिया। (पृष्ठ 83)
- ★शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम ने स्थल के रख-रखाव के लिए धन दिया।
- सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ एक संग्रहालय और अतिथिशाला बनाने के लिए अनुदान दिया।
- जॉन मार्शल ने साँची पर अपने महत्वपूर्ण ग्रंथ वहीं रहकर लिखे और उन्हें सुल्तानजहाँ को समर्पित किया; उन पुस्तकों के खंडों के प्रकाशन में भी सुल्तानजहाँ बेगम ने अनुदान दिया।
3किताब “शायद सौभाग्य” किस बात को कहती है? साँची आज किस हाल में है? 3 अंक
उत्तर देखिए
किताब कहती है कि शायद हम इस मामले में भी भाग्यशाली रहे कि इस स्तूप पर किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी। (पृष्ठ 83)
- ★किताब यहाँ “शायद” कहती है: यह संभावित कारण है, पक्का कारण नहीं। उत्तर में भी “शायद” रखिए।
- आज साँची भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के सफल मरम्मत और संरक्षण का “जीता जागता उदाहरण” है।
स्तूप समूह में एक विशाल गोलार्ध ढाँचा और कई दूसरी इमारतें हैं, जिनमें पाँचवीं सदी में बना एक मंदिर भी है (चित्र 4.3)।
केस 2 — यज्ञ से उपनिषद तक: स्रोत 1 और स्रोत 2 (पृष्ठ 84–85)
किताब का उदाहरण: ऋग्वेद 1500 से 1000 ईसा पूर्व में संकलित हुआ; यह अग्नि, इंद्र, सोम आदि कई देवताओं की स्तुतियों का संग्रह है। यज्ञों के समय ये स्तुतियाँ पढ़ी जाती थीं, और लोग मवेशी, बेटे, स्वास्थ्य, लंबी आयु आदि के लिए प्रार्थना करते थे। शुरू-शुरू में यज्ञ सामूहिक रूप से होते थे। बाद में (लगभग 1000 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व) कुछ यज्ञ घरों के मालिक करते थे, और राजसूय व अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा करते थे। स्रोत 2 में लगभग छठी सदी ईसा पूर्व के छांदोग्य उपनिषद के दो श्लोक हैं।
1यज्ञ करने वाले कैसे बदले? जटिल यज्ञों के लिए किन पर निर्भर रहना पड़ता था? 2 अंक
उत्तर देखिए
शुरू के यज्ञ सामूहिक थे; बाद में करने वाले बदल गए। (पृष्ठ 84)
- बाद में (लगभग 1000 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व) कुछ यज्ञ घरों के मालिक करते थे।
- राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा करते थे।
- ★इन यज्ञों के लिए उन्हें ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भर रहना पड़ता था।
2स्रोत 1 और स्रोत 2 में “यज्ञ” के बारे में क्या अलग बात दिखती है? 3 अंक
उत्तर देखिए
स्रोत 1 में यज्ञ की प्रार्थना है, स्रोत 2 में यज्ञ का अर्थ ही नए ढंग से सोचा गया है। (पृष्ठ 84–85)
- स्रोत 1 (ऋग्वेद के दो छंद): अग्निदेव से आहुति देवताओं तक ले जाने, और खाद्य पदार्थ, प्रचुर धन, गाय और वंश आगे बढ़ाने वाला पुत्र देने की प्रार्थना है।
- ★स्रोत 2 (छांदोग्य उपनिषद): बहता हुआ पवन “निश्चय ही एक यज्ञ है”, क्योंकि बहते-बहते वह सबको पवित्र करता है।
यानी यज्ञ का अर्थ ही नए ढंग से सोचा जा रहा था।
3उपनिषदों में लोग कौन-से सवाल पूछ रहे थे? स्रोत 2 आत्मा के बारे में क्या कहता है? 3 अंक
उत्तर देखिए
उपनिषदों (छठी सदी ई.पू. से) की विचारधाराएँ दिखाती हैं कि लोग जीवन का अर्थ जानना चाहते थे। (पृष्ठ 84)
- लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म के बारे में जानना चाहते थे।
- ★प्रश्न था: क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मों के कारण होता है?
- स्रोत 2: मन के अंदर छुपी आत्मा धान, यव, सरसों या बाजरे के बीज की गिरी से भी छोटी है, और पृथ्वी, क्षितिज, स्वर्ग और सभी लोकों से भी बड़ी है।
केस 3 — बहसों का ज़माना: स्रोत 3 (पृष्ठ 85–87)
किताब का उदाहरण: समकालीन बौद्ध ग्रंथों में 64 संप्रदायों या चिंतन परंपराओं का उल्लेख है। शिक्षक जगह-जगह घूमकर एक-दूसरे से और आम लोगों से तर्क-वितर्क करते थे; ये चर्चाएँ कुटागारशालाओं (नुकीली छत वाली झोपड़ी) में या उन उपवनों में होती थीं जहाँ घुमक्कड़ मनीषी ठहरते थे। स्रोत 3 (सुत्त पिटक) में दो विचारकों के उपदेश हैं: मगध के राजा अजातसत्तु बुद्ध को मक्खलि गोसाल (आजीविक परंपरा, जिन्हें अक्सर नियतिवादी कहा जाता है) की बातें बताते हैं, और फिर अजीत केसकंबलिन् (लोकायत परंपरा, जिन्हें सामान्यतः भौतिकवादी कहा जाता है) का उपदेश आता है।
1स्रोत 3 में मक्खलि गोसाल और अजीत केसकंबलिन् ने क्या कहा? दोनों की बात में क्या फ़र्क़ है? 3 अंक
उत्तर देखिए
दोनों शिक्षक जीवन और मृत्यु पर अलग-अलग बात कहते हैं। (पृष्ठ 87)
- मक्खलि गोसाल: बुद्धिमान और मूर्ख, कोई कुछ नहीं बदल सकता; “सुख और दुख मानो पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं।” जैसे फेंका गया धागे का गोला अपनी पूरी लंबाई तक खुलता जाता है, वैसे ही मूर्ख और विद्वान दोनों पहले से तय रास्ते से होकर ही दुखों का अंत करेंगे।
- अजीत केसकंबलिन्: दान, यज्ञ या चढ़ावा जैसी कोई चीज़ नहीं होती; “मनुष्य चार तत्वों से बना होता है।” मरने पर हर अंश अपने तत्व में मिल जाता है: “मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता।”
- ★फ़र्क़: गोसाल का ज़ोर इस पर है कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है; अजीत का ज़ोर इस पर कि मनुष्य चार तत्वों से बना है और मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता।
2आजीविक और लोकायत परंपराओं के अपने ग्रंथ बचे हैं या नहीं? हम उनके बारे में कैसे जानते हैं? 2 अंक
उत्तर देखिए
इन दोनों परंपराओं के अपने ग्रंथ नष्ट हो गए हैं। (पृष्ठ 87)
- ★इसलिए उनके बारे में हमें दूसरी परंपराओं के ग्रंथों से ही पता चलता है; स्रोत 3 भी सुत्त पिटक का अंश है।
ऐसे में ध्यान रखना होगा कि इन विचारों की जानकारी दूसरी परंपरा के ग्रंथ से आ रही है।
3उस समय की बहसें कहाँ और कैसे होती थीं? एक शिक्षक का समर्थन कैसे बढ़-घट जाता था? 3 अंक
उत्तर देखिए
बहसें कुटागारशालाओं या उपवनों में होती थीं। (पृष्ठ 85)
- शिक्षक जगह-जगह घूमकर एक-दूसरे से और आम लोगों से तर्क-वितर्क करते थे।
- ★जो शिक्षक अपने प्रतिद्वंद्वी को तर्कों से समझा लेता, वह प्रतिद्वंद्वी अपने अनुयायियों के साथ उसका शिष्य बन जाता था।
इसीलिए किसी भी संप्रदाय का समर्थन समय के साथ बढ़ता-घटता रहता था।
केस 4 — महावीर का संदेश: स्रोत 4 (पृष्ठ 88–89)
किताब का उदाहरण: जैनों के मूल सिद्धांत छठी सदी ईसा पूर्व में वर्धमान महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे। जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक हो चुके थे, जिन्हें तीर्थंकर कहा जाता है। जैन दर्शन के अनुसार “संपूर्ण विश्व प्राणवान है”। स्रोत 4 (उत्तराध्ययन सूत्र) में महारानी कमलावती अपने पति को संन्यास लेने के लिए समझाती हैं।
1तीर्थंकर किन्हें कहा जाता है? महावीर से पहले जैन सिद्धांत थे या नहीं? 2 अंक
उत्तर देखिए
किताब के शब्दों में तीर्थंकर वे महापुरुष हैं “जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं।” (पृष्ठ 88)
- जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक हो चुके थे।
- ★जैनों के मूल सिद्धांत छठी सदी ईसा पूर्व में महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे।
2जैन दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा क्या है? साधु और साध्वी कौन-से पाँच व्रत लेते थे? 3 अंक
उत्तर देखिए
जैन दर्शन के अनुसार “संपूर्ण विश्व प्राणवान है”; अहिंसा उसका केंद्र बिंदु है। (पृष्ठ 88)
- पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन माना जाता है।
- अहिंसा यानी जीवों को, ख़ासकर इनसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को, न मारना।
- ★पाँच व्रत: हत्या न करना, चोरी न करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य का पालन करना और धन संग्रह न करना।
कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या ज़रूरी है, जो संसार के त्याग से ही संभव है।
3स्रोत 4 में महारानी कमलावती अपने पति से क्या कहती हैं? 3 अंक
उत्तर देखिए
कमलावती धन और राज्य की सीमा बताकर पति को संन्यास लेने के लिए समझाती हैं। (पृष्ठ 88)
- संपूर्ण विश्व के खज़ाने मिल जाएँ तब भी संतोष नहीं होगा, न वे बचा पाएँगे।
- ★मृत्यु पर सारा धन पीछे छूट जाएगा, तब सिर्फ़ धर्म ही रक्षा करेगा।
- जैसे चिड़िया पिंजरे से नफ़रत करती है, वैसे ही वे संसार से नफ़रत करती हैं; राज्य और इंद्रिय सुख छोड़कर तपस्या करने को कहती हैं।
किताब बताती है कि महावीर के शिष्यों ने उनके उपदेश अक्सर कहानियों के रूप में संकलित किए, जो आम लोगों को आकर्षित करती थीं।
4जैन ग्रंथ किन भाषाओं में लिखे गए और उनकी पांडुलिपियाँ कहाँ सुरक्षित रहीं? 2 अंक
उत्तर देखिए
जैन विद्वानों ने प्राकृत, संस्कृत, तमिल जैसी कई भाषाओं में बहुत साहित्य रचा। (पृष्ठ 89)
- ★इन ग्रंथों की पांडुलिपियाँ सैकड़ों वर्षों से मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में सुरक्षित हैं।
- चित्र 4.6 में चौदहवीं सदी के एक जैन ग्रंथ की पांडुलिपि का पन्ना है।
केस 5 — बुद्ध की सीख: संतचरित्र और स्रोत 5 (पृष्ठ 89–92)
किताब का उदाहरण: बुद्ध की शिक्षाएँ सुत्त पिटक की कहानियों के आधार पर फिर से जोड़ी गई हैं। उनके जीवन की जानकारी चरित लेखन से मिली; इनमें से कई ग्रंथ बुद्ध के जीवन काल से लगभग सौ वर्षों के बाद लिखे गए। स्रोत 5 में बुद्ध सिगल नाम के एक अमीर गृहपति को सलाह देते हैं कि मालिक नौकरों और कर्मचारियों की पाँच तरह से देखभाल करे: क्षमता के अनुसार काम देकर, भोजन और मज़दूरी देकर, बीमारी में परिचर्या करके, सुस्वादु भोजन बाँटकर और समय-समय पर छुट्टी देकर।
1संतचरित्र क्या होता है? इतिहासकार उसे पढ़ते समय क्या ध्यान रखते हैं? 3 अंक
उत्तर देखिए
संतचरित्र किसी संत या धार्मिक नेता की जीवनी है। (पृष्ठ 89)
- ये संत की उपलब्धियों का गुणगान करते हैं, जो तथ्य के रूप में पूरी तरह सही नहीं होतीं।
- ★फिर भी ये उस परंपरा के अनुयायियों के विश्वास बताते हैं, इसलिए महत्वपूर्ण हैं।
बुद्ध की जीवनी वाले कई ग्रंथ उनके जीवन काल से लगभग सौ वर्षों के बाद लिखे गए।
2किताब के अनुसार बौद्ध दर्शन के मूल विचार क्या हैं? 3 अंक
उत्तर देखिए
किताब बौद्ध दर्शन के मूल विचार ये बताती है। (पृष्ठ 91)
- विश्व अनित्य है और लगातार बदल रहा है।
- विश्व आत्माविहीन है, क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं है।
- इस क्षणभंगुर दुनिया में दुख मनुष्य के जीवन का अंतर्निहित तत्व है।
- ★घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच मध्यम मार्ग अपनाकर मनुष्य दुनिया के दुखों से मुक्ति पा सकता है।
- बौद्ध धर्म की प्रारंभिक परंपराओं में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था।
3स्रोत 5 में बुद्ध सिगल को किन-किन के साथ व्यवहार की सलाह देते हैं? 3 अंक
उत्तर देखिए
सलाह सिर्फ़ नौकरों तक नहीं, घर और आसपास के कई रिश्तों तक जाती है। (पृष्ठ 91)
- मालिक नौकरों और कर्मचारियों की पाँच तरह से देखभाल करे।
- कुल के लोग श्रमणों (जिन्होंने सांसारिक जीवन त्याग दिया है) और ब्राह्मणों की भी पाँच तरह से देखभाल करें, जैसे कर्म, वचन और मन से अनुराग, उनके स्वागत के लिए घर हमेशा खुले रखना और उनकी दिन-प्रतिदिन की ज़रूरतें पूरी करना।
- ★सिगल को माता-पिता, शिक्षक और पत्नी के साथ व्यवहार के लिए भी ऐसे ही उपदेश दिए गए।
4बौद्ध परंपरा के अनुसार शिष्यों के लिए बुद्ध का अंतिम निर्देश क्या था? निर्वाण का मतलब किताब ने क्या बताया है? 2 अंक
उत्तर देखिए
बुद्ध का अंतिम निर्देश: “तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें खुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढ़ना है।” (पृष्ठ 92)
- निर्वाण का मतलब था “अहं और इच्छा का खत्म हो जाना”।
- ★बुद्ध ने निर्वाण के लिए व्यक्ति-केंद्रित हस्तक्षेप और सम्यक कर्म की बात की।
केस 6 — संघ, पुन्ना और विनय पिटक के नियम: स्रोत 6 और 7 (पृष्ठ 92–94)
किताब का उदाहरण: शिष्यों का दल बढ़ा तो बुद्ध ने संघ की स्थापना की, यानी ऐसे भिक्खुओं की संस्था जो धम्म के शिक्षक बन गए। शुरू-शुरू में सिर्फ़ पुरुष संघ में आ सकते थे, बाद में महिलाओं को भी अनुमति मिली। स्रोत 6 (थेरीगाथा) में पुन्ना नाम की एक दासी रोज़ सुबह मालिक के घर के लिए नदी का पानी लाने जाती थी और वहाँ एक ब्राह्मण को स्नान कर्म करते देखती थी। स्रोत 7 में विनय पिटक के कुछ नियम दिए हैं, जैसे नया कंबल या गलीचा कम से कम छह वर्षों तक इस्तेमाल करना।
1संघ में किन-किन लोगों को जगह मिली, और वहाँ सब बराबर क्यों माने जाते थे? 3 अंक
उत्तर देखिए
राजा से लेकर दास तक हर वर्ग से लोग बुद्ध के अनुयायी बने, और संघ में आने पर सब बराबर माने जाते थे। (पृष्ठ 92)
- राजा, धनवान, गृहपति और सामान्य जन, जैसे कर्मकार, दास, शिल्पी, सभी बुद्ध के अनुयायी बने।
- ★भिक्खु और भिक्खुनी बनने पर अपनी पुरानी पहचान छोड़नी पड़ती थी, इसलिए सब बराबर माने जाते थे।
- संघ में लोग बातचीत से एकमत होने की कोशिश करते थे; ऐसा न हो पाता तो मतदान से निर्णय होता था।
2महिलाएँ संघ में कैसे आईं? उनके बारे में किताब क्या बताती है? 3 अंक
उत्तर देखिए
शुरू में सिर्फ़ पुरुष संघ में आ सकते थे, बाद में महिलाओं को भी अनुमति मिली। (पृष्ठ 92)
- बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद ने बुद्ध को समझाकर यह अनुमति पाई।
- बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गोतमी संघ में आने वाली पहली भिक्खुनी बनीं।
- ★संघ में आई कई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ बनीं और आगे चलकर थेरी बनीं, यानी ऐसी महिलाएँ जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो।
3स्रोत 6 में पुन्ना ब्राह्मण से क्या कहती है, और उसकी बात में तर्क कहाँ है? 3 अंक
उत्तर देखिए
पुन्ना ब्राह्मण के स्नान के दावे को तर्क से परखती है। (पृष्ठ 93)
- पुन्ना कहती है कि वह सज़ा के डर से या ऊँचे घरानों की स्त्रियों के कटु वाक्यों के डर से ठंडे पानी में उतरती है, और ब्राह्मण से पूछती है कि उसे किसका डर है।
- ब्राह्मण कहता है कि जल में स्नान करके बुरा करने वाला मुक्त हो जाता है।
- ★पुन्ना का उत्तर: “वैसा हो तो सारे मेंढक और कछुए स्वर्ग जाएँगे”। यानी अगर पानी में नहाने से बुराई से मुक्ति मिलती, तो पानी में रहने वाले मेंढक, कछुए, साँप और मगरमच्छ भी स्वर्ग जाते।
इसलिए, वह कहती है, वे कर्म ही मत कीजिए जिनका डर पानी की ओर खींचता है।
4स्रोत 7 के किन्हीं दो नियमों को अपने शब्दों में लिखिए। वे संघ के भिक्खुओं के जीवन के बारे में क्या दिखाते हैं? 3 अंक
उत्तर देखिए
ये नियम भिक्खुओं के सादे और साझा जीवन की ओर इशारा करते हैं। (पृष्ठ 94)
- नया कंबल या गलीचा बनाने पर भिक्खु को उसका प्रयोग कम से कम छह वर्षों तक करना होगा; उससे पहले बिना भिक्खुओं की अनुमति के नया बनवाने पर वह ले लिया जाएगा और अपराध स्वीकार करना होगा।
- गृहस्थ के घर टिकिया या पके अनाज का भोजन मिले तो वह दो से तीन कटोरा भर ही ले सकता है, और उसे दूसरे भिक्खुओं के साथ बाँटना होगा: “यही सम्यक आचरण है।”
- विहार से जाने से पहले बिछाया हुआ बिस्तरा न समेटने पर, या बिना विदाई लिए चले जाने पर, अपराध स्वीकार करना होगा।
- ★पहले दो नियम सामान और भोजन की सीमा बाँधते हैं; किताब भी बताती है कि ये श्रमण सादा जीवन बिताते थे और दान पर निर्भर थे (पृष्ठ 92)।
केस 7 — स्तूप: क्यों बने और कैसे (पृष्ठ 95–97)
किताब का उदाहरण: बुद्ध के जीवन से जुड़े लुम्बिनी (जन्म), बोधगया (ज्ञान), सारनाथ (प्रथम उपदेश) और कुशीनगर (निब्बान) धीरे-धीरे पवित्र स्थल बन गए। कुछ पवित्र जगहों पर बुद्ध से जुड़े अवशेष, जैसे उनकी अस्थियाँ या उनका इस्तेमाल किया हुआ सामान, गाड़ दिए गए थे; इन टीलों को स्तूप कहते थे। स्रोत 8 (महापरिनिब्बान सुत्त) में आनंद पूछते हैं कि तथागत (बुद्ध का दूसरा नाम) के अवशेषों का क्या करें।
1पूरा स्तूप ही बुद्ध और बौद्ध धर्म का प्रतीक क्यों माना गया? 2 अंक
उत्तर देखिए
क्योंकि स्तूपों में ऐसे अवशेष रहते थे जिन्हें पवित्र समझा जाता था। (पृष्ठ 96)
- ★इसलिए समूचे स्तूप को ही बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठा मिली।
- ! यह मत लिखिए कि स्तूप बनाने की परंपरा बौद्ध धर्म ने शुरू की। किताब कहती है कि यह परंपरा बुद्ध से पहले की रही होगी, पर बौद्ध धर्म से जुड़ गई।
2स्रोत 8 में बुद्ध ने आनंद को अवशेषों के बारे में क्या कहा? 3 अंक
उत्तर देखिए
बुद्ध ने पहले अवशेषों को आदर देने में उलझने से मना किया, फिर विशेष आग्रह पर थूप (स्तूप का पालि रूप) बनाने को कहा। (पृष्ठ 96)
- पहले उन्होंने कहा कि अवशेषों को विशेष आदर देने में मत उलझो।
- ★विशेष आग्रह पर कहा कि तथागत के लिए चार महापथों के चौक पर थूप बनाना चाहिए।
- जो वहाँ धूप या माला चढ़ाएगा, सिर नवाएगा या हृदय में शांति लाएगा, उसके लिए वह स्तूप चिर काल तक सुख और आनंद का कारण बनेगा।
3स्तूप बनवाने के लिए दान किन-किन ने दिया? यह हमें कैसे पता चलता है? 3 अंक
उत्तर देखिए
स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों पर मिले अभिलेख बताते हैं कि इन्हें बनाने और सजाने के लिए दान किसने दिया। (पृष्ठ 96)
- कुछ दान राजाओं ने दिए, जैसे सातवाहन वंश के राजा।
- कुछ दान शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियों ने दिए; साँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथी दाँत का काम करने वाले शिल्पकारों के दान से बना।
- ★सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों ने दान के अभिलेखों में अपना नाम लिखवाया, कभी गाँव या शहर का नाम, कभी अपना पेशा और रिश्तेदारों के नाम भी।
- भिक्खुओं और भिक्खुनियों ने भी दान दिया।
चित्र 4.9 साँची का ऐसा ही एक दानात्मक अभिलेख है; किताब के शब्दों में, “ऐसे सैकड़ों अभिलेख भरहुत और अमरावती में भी मिले हैं।”
4स्तूप के अंड, हर्मिका, यष्टि और वेदिका क्या हैं? उपासक स्तूप की परिक्रमा कैसे करते थे? 3 अंक
उत्तर देखिए
स्तूप गोलार्ध मिट्टी के टीले (अंड) से शुरू हुआ, और धीरे-धीरे उसकी संरचना जटिल होती गई। (पृष्ठ 96–97)
- अंड के ऊपर हर्मिका होती थी, छज्जे जैसा ढाँचा जो देवताओं के घर का प्रतीक था।
- हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था, यष्टि, जिस पर अक्सर छत्री लगी होती थी।
- टीले के चारों ओर वेदिका पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी।
- ★उपासक पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश करके, टीले को दाईं तरफ़ रखते हुए, दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे।
किताब के शब्दों में, “मानो वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे हों।”
केस 8 — अमरावती और साँची: खोज के बाद दो अलग हाल (पृष्ठ 98–99)
किताब का उदाहरण: 1796 में एक स्थानीय राजा, जो मंदिर बनाना चाहते थे, को अचानक अमरावती के स्तूप के अवशेष मिल गए। उन्होंने उसके पत्थर इस्तेमाल करने का निश्चय किया; उन्हें लगा कि इस छोटी-सी पहाड़ी में शायद कोई खज़ाना छुपा हो। 1854 में गुंटूर (आंध्र प्रदेश) के कमिश्नर कई मूर्तियाँ और उत्कीर्ण पत्थर मद्रास ले गए; इन्हें एलियट संगमरमर कहा जाता है। साँची की खोज 1818 में हुई।
11796 में स्थानीय राजा ने अमरावती के स्तूप के पत्थर क्यों लेने चाहे? 2 अंक
उत्तर देखिए
राजा मंदिर बनाना चाहते थे; उन्होंने स्तूप के पत्थर इस्तेमाल करने का निश्चय किया। (पृष्ठ 98)
- ★उन्हें लगा कि इस छोटी-सी पहाड़ी में शायद कोई खज़ाना छुपा हो।
21850 के दशक में अमरावती के उत्कीर्ण पत्थर कहाँ-कहाँ पहुँचे? उसका नतीजा क्या रहा? 3 अंक
उत्तर देखिए
अमरावती के उत्कीर्ण पत्थर अलग-अलग जगहों पर ले जाए जा रहे थे। (पृष्ठ 98)
- कुछ पत्थर कलकत्ता में एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल पहुँचे, कुछ मद्रास में इंडिया ऑफिस, और कुछ लंदन तक।
- कई अंग्रेज़ अधिकारियों के बाग़ों में अमरावती की मूर्तियाँ पाना कोई असामान्य बात नहीं थी।
- ★इलाके का हर नया अधिकारी यह कहकर कुछ मूर्तियाँ उठा ले जाता था कि उसके पहले के अधिकारियों ने भी ऐसा किया।
आज अमरावती का महाचैत्य “अब सिर्फ एक छोटा सा टीला है जिसका सारा गौरव नष्ट हो चुका है।” (पृष्ठ 99)
3पुरातत्ववेत्ता एच.एच. कोल क्या चाहते थे? उनकी बात का क्या हुआ? 3 अंक
उत्तर देखिए
कोल उन मुट्ठी भर लोगों में थे जो अलग सोचते थे। (पृष्ठ 98–99)
- उन्होंने लिखा, “इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।”
- ★वे चाहते थे कि संग्रहालयों में मूर्तियों की प्लास्टर प्रतिकृतियाँ रखी जाएँ और असली कृतियाँ खोज की जगह पर ही रहें।
- दुर्भाग्य से वे अधिकारियों को अमरावती पर इसके लिए राज़ी नहीं कर पाए।
लेकिन खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात को साँची के लिए मान लिया गया।
4साँची क्यों बच गया जबकि अमरावती नष्ट हो गया? किताब का तर्क समझाइए। 3 अंक
उत्तर देखिए
किताब इसका एक संभावित कारण “शायद” कहकर देती है। (पृष्ठ 99)
- ★शायद अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी, जब तक विद्वान इस बात का महत्त्व नहीं समझ पाए थे कि पुरातात्विक अवशेष को उठाकर ले जाने की बजाय खोज की जगह पर ही संरक्षित करना ज़रूरी है।
- 1818 में साँची की खोज के समय इसके तीन तोरणद्वार खड़े थे, चौथा वहीं गिरा हुआ था और टीला अच्छी हालत में था।
- तब यह सुझाव भी आया कि तोरणद्वार पेरिस या लंदन भेज दिए जाएँ, पर अंततः कई कारणों से साँची का स्तूप वहीं बना रहा।
- ! किताब का “शायद” उत्तर में भी रखिए; इसे पक्का कारण मत बताइए।
इसमें केस 1 की बातें भी जोड़ी जा सकती हैं: प्लास्टर प्रतिकृतियाँ, बेगमों का अनुदान और रेल ठेकेदार की नज़र न पड़ना।
केस 9 — मूर्तियाँ पढ़ना (पृष्ठ 99–103)
किताब का उदाहरण: चित्र 4.13 (साँची के उत्तरी तोरणद्वार का एक दृश्य) पहली नज़र में फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाला ग्रामीण दृश्य लगता है। कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक का दृश्य बताते हैं, यानी उस दानी राजकुमार की कथा, जो सब कुछ एक ब्राह्मण को देकर पत्नी और बच्चों के साथ जंगल चला गया।
1इतिहासकार किसी मूर्ति का अर्थ कैसे निकालते हैं? चित्र 4.13 से उदाहरण दीजिए। 2 अंक
उत्तर देखिए
इतिहासकार अक्सर मूर्ति की तुलना लिखित साक्ष्यों से करके उसका अर्थ निकालते हैं। (पृष्ठ 100)
- ★चित्र 4.13 सिर्फ़ देखने पर ग्रामीण दृश्य लगता है, पर कला इतिहासकार उसे वेसान्तर जातक के दृश्य के रूप में पहचानते हैं।
2शुरू के मूर्तिकारों ने बुद्ध को कैसे दिखाया? चार प्रतीक बताइए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर प्रतीकों से दिखाया। (पृष्ठ 100)
- रिक्त स्थान ध्यान का प्रतीक है (चित्र 4.14)।
- स्तूप महापरिनिब्बान का प्रतीक है (चित्र 4.15)।
- चक्र सारनाथ में दिए पहले उपदेश का प्रतीक है (चित्र 4.16)।
- पेड़ उनके जीवन की एक घटना का प्रतीक है।
- ★किताब के शब्दों में, “ऐसी मूर्तिकला को अक्षरश: नहीं समझा जा सकता है।” इन्हें समझने के लिए इतिहासकारों को कलाकृतियाँ बनाने वालों की परंपराएँ जाननी पड़ती हैं।
3तोरणद्वार पर पेड़ पकड़कर झूलती स्त्री (शालभंजिका, चित्र 4.17) बौद्ध धर्म के बारे में क्या दिखाती है? 3 अंक
उत्तर देखिए
शालभंजिका त्याग और तपस्या से जुड़ी नहीं दिखती, पर साँची में उसकी जगह है। (पृष्ठ 101)
- संस्कृत साहित्य की परंपराओं से पता चला कि यह स्त्री शालभंजिका है।
- लोक परंपरा में माना जाता था कि उसके छूने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे और फल लगने लगते थे।
- लगता है यह शुभ प्रतीक माना जाता था, इसलिए स्तूप के अलंकरण में आई।
- ★इससे पता चलता है कि बौद्ध धर्म में आए लोगों ने बुद्ध से पहले के और बौद्ध धर्म से इतर विश्वासों, प्रथाओं और धारणाओं से बौद्ध धर्म को समृद्ध किया।
4चित्र 4.19 में कमल और हाथियों के बीच की महिला कौन है? 3 अंक
उत्तर देखिए
इतिहासकार इस पर एकमत नहीं हैं। (पृष्ठ 102–103)
- चित्र 4.19 में हाथी उस पर जल छिड़क रहे हैं, जैसे अभिषेक कर रहे हों।
- कुछ इतिहासकार उसे बुद्ध की माँ माया से जोड़ते हैं।
- दूसरे उसे लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी मानते हैं, जो सौभाग्य लाने वाली देवी थीं और प्रायः हाथियों के साथ जोड़ी जाती हैं।
- ★यह भी संभव है कि इन मूर्तियों को देखने वाले उपासक उसे माया और गजलक्ष्मी दोनों से जोड़ते थे।
- ! “निश्चित रूप से माया” लिख देना ग़लत होगा।
5जेम्स फर्गुसन ने साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र क्यों कहा? 3 अंक
उत्तर देखिए
फर्गुसन बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे। (पृष्ठ 103)
- तब तक ज़्यादातर बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद नहीं हुआ था।
- ★इसलिए उन्होंने सिर्फ़ मूर्तियाँ देखकर निष्कर्ष निकाल लिया।
- कई स्तंभों पर दिखाए गए सर्प (चित्र 4.21) भी शायद उन लोक परंपराओं से आए, जिनका ग्रंथों में हमेशा ज़िक्र नहीं होता था।
किताब के अनुसार मूर्ति का महत्त्व और संदर्भ समझने के लिए कला इतिहासकार अक्सर लिखित ग्रंथों से जानकारी इकट्ठी करते हैं (पृष्ठ 108)।
केस 10 — नयी परंपराएँ और मंदिर (पृष्ठ 103–107)
किताब का उदाहरण: किताब कहती है, “ईसा की प्रथम सदी के बाद बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव नज़र आते हैं।” वैष्णव परंपरा में विष्णु को सबसे महत्वपूर्ण देवता माना जाता है और शैव परंपरा में शिव को परमेश्वर। देवगढ़ (उत्तर प्रदेश) का पाँचवीं सदी का मंदिर (चित्र 4.25) और एलोरा (महाराष्ट्र) का आठवीं सदी का कैलाशनाथ मंदिर (चित्र 4.28) मंदिरों के उदाहरण हैं।
1महायान क्या है? “हीनयान” नाम किसने दिया? 3 अंक
उत्तर देखिए
महायान में बौद्ध धर्म की सोच बदली: एक मुक्तिदाता की कल्पना उभरी। (पृष्ठ 103)
- शुरू के बौद्ध धर्म में व्यक्ति के अपने प्रयास पर ज़ोर था; अब बोधिसत्त परम करुणामय जीव माने गए, जो अपने पुण्य से दूसरों की सहायता करते थे।
- बुद्ध और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा इस परंपरा का महत्वपूर्ण अंग बन गई।
- ★महायान के अनुयायी दूसरी बौद्ध परंपराओं के समर्थकों को हीनयान के अनुयायी कहते थे; पुरानी परंपरा के अनुयायी ख़ुद को थेरवादी कहते थे, यानी पुराने, प्रतिष्ठित शिक्षकों (थेर) के बताए रास्ते पर चलने वाले।
कालरेखा 1 (पृष्ठ 110) की एक पंक्ति में महायान बौद्ध मत का विकास, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ साथ रखी गई हैं: “लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे”। उत्तर में मुख्य पाठ की बात (पृष्ठ 103) और कालरेखा की यह पंक्ति दोनों अलग-अलग लिखिए।
2भक्ति, अवतार और आयुध से क्या समझते हैं? मूर्ति में देवता की पहचान कैसे होती थी? 3 अंक
उत्तर देखिए
भक्ति भक्त और ईश्वर के बीच प्रेम और समर्पण का रिश्ता है। (पृष्ठ 104)
- वैष्णववाद में दस अवतारों की कल्पना है: माना जाता था कि पापियों के बढ़ते प्रभाव से जब दुनिया में अव्यवस्था और नाश की स्थिति आती, तब विश्व की रक्षा के लिए भगवान अलग-अलग रूपों में अवतार लेते।
- शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था, पर कई बार मनुष्य के रूप में भी।
- ★देवताओं की खूबियाँ शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुध (हथियार और हाथ के शुभ अस्त्र) और बैठने की शैली से दिखाई जाती थीं।
- उदाहरण: चित्र 4.23 में एहोल (कर्नाटक) का वराह अवतार पृथ्वी देवी को बचा रहा है (लगभग छठी सदी); चित्र 4.24 में महाबलीपुरम् की दुर्गा (छठी सदी)।
3पुराण किसने रचे? इन्हें कौन सुन सकता था? 3 अंक
उत्तर देखिए
पुराण ब्राह्मणों के रचे हैं, और सामान्यतः संस्कृत श्लोकों में लिखे गए थे। (पृष्ठ 104–105)
- पुराण ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते थे, ताकि कोई भी सुन सके।
- ★महिलाएँ और शूद्र, जिन्हें वैदिक साहित्य पढ़ने-सुनने की अनुमति नहीं थी, पुराण सुन सकते थे।
- ! “पुराण सिर्फ़ ब्राह्मण सुन सकते थे” ग़लत है।
मूर्तियों का अर्थ समझने के लिए इतिहासकारों को उनकी कहानियाँ जाननी पड़ती हैं, और कई कहानियाँ पुराणों में मिलती हैं।
4शुरू के मंदिर कैसे थे? बाद में उनमें क्या जुड़ा? सबसे पुरानी कृत्रिम गुफाएँ किनके लिए बनीं? 3 अंक
उत्तर देखिए
शुरू के मंदिर एक चौकोर कमरे के रूप में थे, और धीरे-धीरे उनमें नए हिस्से जुड़ते गए। (पृष्ठ 105–107)
- सबसे पुराने मंदिर में एक चौकोर कमरा, गर्भगृह, होता था, जिसमें एक दरवाज़ा होता था।
- बाद में गर्भगृह के ऊपर ऊँचा ढाँचा, शिखर, बनने लगा (चित्र 4.25, देवगढ़, पाँचवीं सदी)।
- और बाद में विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें, तोरण और जल आपूर्ति का इंतज़ाम जुड़ा।
- ★“सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनाई गई थीं।”
चट्टान काटकर बनाने की परंपरा का सबसे विकसित रूप आठवीं सदी का कैलाशनाथ मंदिर है, जिसमें पूरी पहाड़ी काटकर मंदिर बना दिया गया। एक ताम्रपत्र अभिलेख में एलोरा का प्रमुख तक्षक काम पूरा होने पर अपना आश्चर्य इन शब्दों में कहता है: “हे भगवान यह मैंने कैसे बनाया!”
केस 11 — क्या हम सब कुछ देख-समझ सकते हैं? (पृष्ठ 107–109)
किताब का उदाहरण: उन्नीसवीं सदी में यूरोप के विद्वानों ने जब देवी-देवताओं की मूर्तियाँ देखीं तो वे उनकी पृष्ठभूमि और महत्त्व नहीं समझ पाए। कई सिरों, कई हाथों वाली या मनुष्य और जानवर के रूप मिलाकर बनी मूर्तियाँ उन्हें विकृत लगती थीं। महाबलीपुरम (तमिलनाडु) की विशाल चट्टान (चित्र 4.30) पर किसी कथा का सजीव चित्रण है, पर कौन-सी कथा, इस पर विद्वानों में मतभेद है।
1यूरोपीय विद्वानों ने इन मूर्तियों को समझने के लिए क्या तरीका अपनाया? बुद्ध और बोधिसत्त की मूर्तियों (जैसे चित्र 4.29) से वे क्यों उत्साहित हुए? 3 अंक
उत्तर देखिए
उन्होंने मूर्तियों की तुलना उस परंपरा से की जिससे वे परिचित थे: प्राचीन यूनान की कला। (पृष्ठ 108)
- वे प्रारंभिक भारतीय मूर्तिकला को यूनानी कला से निम्न मानते थे।
- बुद्ध और बोधिसत्त की ये मूर्तियाँ यूनानी प्रतिमानों से प्रभावित थीं और ज़्यादातर तक्षशिला और पेशावर जैसे उत्तर-पश्चिम के नगरों में मिलीं; वहाँ ईसा से दो सौ साल पहले भारतीय-यूनानी शासकों ने राज्य बनाए थे (चित्र 4.29, गांधार का बोधिसत्त)।
- ★ये मूर्तियाँ यूनानी मूर्तियों से बहुत मिलती-जुलती थीं, इसलिए उन विद्वानों ने इन्हें भारतीय मूर्ति कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना माना।
किताब इसे परिचित चीज़ों के आधार पर अपरिचित को समझने का तरीका बताती है, जो हम सब अक्सर करते हैं।
2महाबलीपुरम की चट्टान (चित्र 4.30) में क्या दिखाया गया है? इस पर इतिहासकार क्या कहते हैं? 3 अंक
उत्तर देखिए
इस पर इतिहासकार एकमत नहीं हैं। (पृष्ठ 109)
- कुछ मानते हैं कि इसमें गंगा नदी के स्वर्ग से अवतरण का चित्रण है; चट्टान की सतह के बीच की प्राकृतिक दरार शायद नदी दिखाती है।
- दूसरे विद्वान मानते हैं कि यहाँ महाभारत में वर्णित, दिव्यास्त्र पाने के लिए अर्जुन की तपस्या दिखाई गई है; वे मूर्तियों के बीच एक साधु के केंद्र में होने को महत्त्व देते हैं।
- ★उत्तर में दोनों मत लिखिए; किसी एक को पक्का मत बताइए।
किताब के अनुसार मूर्ति का संदर्भ समझने के लिए लिखित ग्रंथों से जानकारी लेना यूनानी मूर्तियों से तुलना करने से बेहतर तरीका है, पर यह बहुत आसान नहीं।
3किताब ने इस अध्याय के शानदार उदाहरणों को “ऊपरी परत” क्यों कहा? 2 अंक
उत्तर देखिए
क्योंकि बहुत-से रीति-रिवाज और विश्वास कभी इमारतों, मूर्तियों या चित्रों में दर्ज़ ही नहीं हुए। (पृष्ठ 109)
- रोज़ के और ख़ास अवसरों के रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और व्यवहार स्थायी रूप से दर्ज़ नहीं हुए।
- ★कई लोगों और समुदायों को चिरस्थायी विवरण रखने की ज़रूरत न लगी हो, फिर भी उनकी धार्मिक और दार्शनिक परंपरा सक्रिय रही हो।
किताब का निष्कर्ष है कि इस अध्याय के शानदार उदाहरण “एक विशाल ज्ञान राशि की मात्र ऊपरी परत हैं।”
भाग ख — तर्क और मूल्यांकन
1“आजीविक परंपरा के लोग भौतिकवादी कहलाते हैं, और उनके विचार उनके अपने ग्रंथों से पता चलते हैं।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। मक्खलि गोसाल की आजीविक परंपरा को अक्सर नियतिवादी कहा जाता है। (पृष्ठ 87)
- भौतिकवादी सामान्यतः अजीत केसकंबलिन् की लोकायत परंपरा को कहा जाता है।
- ★आजीविक और लोकायत, दोनों के अपने ग्रंथ नष्ट हो गए; इनके बारे में जानकारी दूसरी परंपराओं के ग्रंथों से मिलती है, जैसे सुत्त पिटक।
2“बुद्ध के प्रवचन उनके जीवन काल में ही लिख लिए गए थे।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार कोई भी संभाषण बुद्ध के जीवन काल में नहीं लिखा गया। (पृष्ठ 86)
- ★उनकी मृत्यु के बाद वेसली की सभा में उनकी शिक्षाओं का संकलन हुआ।
- त्रिपिटक के तीन हिस्से: विनय पिटक में संघ के नियम, सुत्त पिटक में शिक्षाएँ और अभिधम्म पिटक में दर्शन।
3“जैन धर्म वर्धमान महावीर से शुरू हुआ; उनसे पहले इसके सिद्धांत प्रचलित नहीं थे।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। जैनों के मूल सिद्धांत छठी सदी ईसा पूर्व में महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे। (पृष्ठ 88)
- ★जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक हो चुके थे, जिन्हें तीर्थंकर कहा जाता है।
4“स्तूप बनाने की परंपरा बौद्ध धर्म ने शुरू की।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार स्तूप बनाने की परंपरा शायद बुद्ध से पहले की रही होगी। (पृष्ठ 96)
- ★वह परंपरा बौद्ध धर्म से जुड़ गई, और अवशेषों के कारण पूरा स्तूप ही बुद्ध और बौद्ध धर्म का प्रतीक माना गया।
- हर्मिका और छत्री भी एक चीज़ नहीं हैं: हर्मिका अंड के ऊपर छज्जे जैसा ढाँचा है, छत्री यष्टि पर लगती है।
5“‘हीनयान’ नाम पुरानी बौद्ध परंपरा के अनुयायियों ने ख़ुद अपने लिए रखा था।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। यह नाम महायान के अनुयायियों ने दूसरी बौद्ध परंपराओं के समर्थकों के लिए इस्तेमाल किया। (पृष्ठ 103)
- ★पुरानी परंपरा के अनुयायी ख़ुद को थेरवादी कहते थे, यानी पुराने, प्रतिष्ठित शिक्षकों (थेर) के बताए रास्ते पर चलने वाले।
6“सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ बौद्ध भिक्खुओं के लिए बनाई गई थीं।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनाई गई थीं। (पृष्ठ 107)
- ★किताब का चित्र 4.27 बराबर (बिहार) की गुफाएँ दिखाता है, जो लगभग तीसरी सदी ईसा पूर्व की हैं।
7“महाबलीपुरम की चट्टान पर निश्चित रूप से गंगा का अवतरण दिखाया गया है, इसलिए इसमें कोई मतभेद नहीं।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। इस पर मतभेद है। (पृष्ठ 109)
- कुछ विद्वान गंगा के अवतरण का चित्रण मानते हैं; दूसरे अर्जुन की तपस्या का।
- ★कला इतिहासकारों ने पुराणों के साहित्य में बहुत खोजबीन की है, फिर भी कथा की पहचान पर सहमति नहीं बनी।
भाग ग — तुलना और वर्गीकरण
1इस अध्याय के स्रोतों की तालिका पूरी कीजिए: हर स्रोत से क्या पता चलता है, और किताब उसके बारे में कौन-सी बात याद दिलाती है? 4 अंक
| स्रोत | किताब का उदाहरण | इससे क्या पता चलता है | किताब की याद दिलाई बात | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| बौद्ध ग्रंथ | ||||
| जैन ग्रंथ | ||||
| संतचरित्र | ||||
| अभिलेख | ||||
| मूर्तिकला | ||||
| इमारतें और चित्र |
उत्तर देखिए
| स्रोत | किताब का उदाहरण | इससे क्या पता चलता है | किताब की याद दिलाई बात | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| बौद्ध ग्रंथ | सुत्त पिटक (स्रोत 3, 5, 6, 8), विनय पिटक (स्रोत 7) | शिक्षाएँ, संघ के नियम, दूसरे शिक्षकों के विचार | आजीविक और लोकायत के अपने ग्रंथ नष्ट हो गए; उनके विचार दूसरी परंपराओं के ग्रंथों से मिलते हैं | 86–87 |
| जैन ग्रंथ | उत्तराध्ययन सूत्र (स्रोत 4) | महावीर के उपदेश, संन्यास के तर्क | उपदेश अक्सर कहानियों के रूप में संकलित हुए | 88–89 |
| संतचरित्र | बुद्ध के जीवन के ग्रंथ | अनुयायियों के विश्वास | उपलब्धियों का गुणगान है, जो तथ्य के रूप में पूरी तरह सही नहीं होती | 89 |
| अभिलेख | स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों पर दान के अभिलेख, चित्र 4.9 | दान किसने दिया: राजा, श्रेणियाँ, स्त्री-पुरुष, भिक्खु-भिक्खुनियाँ | ऐसे सैकड़ों अभिलेख भरहुत और अमरावती में भी मिले हैं | 96–97 |
| मूर्तिकला | वेसान्तर जातक का दृश्य, शालभंजिका | कथाएँ, प्रतीक और लोक परंपराएँ | ऐसी मूर्तिकला को अक्षरश: नहीं समझा जा सकता है | 99–101 |
| इमारतें और चित्र | साँची का स्तूप, कैलाशनाथ मंदिर | स्तूप की बनावट, मंदिर का विकास | बहुत-से रीति-रिवाज इमारतों, मूर्तियों या चित्रों में दर्ज़ नहीं हुए | 96–97, 107, 109 |
★कसौटी: हर स्रोत से नतीजा निकालने के साथ यह भी लिखिए कि उस स्रोत की क्या सीमा है। (पृष्ठ 87, 89, 100, 109)
2उपनिषद, नियतिवादी और भौतिकवादी विचारों की तुलना कीजिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
| बिंदु | उपनिषद | नियतिवादी (मक्खलि गोसाल) | भौतिकवादी (अजीत केसकंबलिन्) |
|---|---|---|---|
| मुख्य सवाल या बात | जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना, पुनर्जन्म | सुख और दुख पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं | मनुष्य चार तत्वों से बना है |
| कर्म और यज्ञ | क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मों से होता है? बहता पवन “निश्चय ही एक यज्ञ है” | बुद्धिमान और मूर्ख, कोई कुछ नहीं बदल सकता | दान, यज्ञ या चढ़ावा जैसी कोई चीज़ नहीं होती |
| मृत्यु के बाद | मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म को जानने की उत्सुकता | सब पहले से तय रास्ते से होकर ही दुखों का अंत करेंगे | मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता |
| हमें कैसे पता चला | छांदोग्य उपनिषद (लगभग छठी सदी ईसा पूर्व) के श्लोक | बौद्ध ग्रंथ सुत्त पिटक; उनके अपने ग्रंथ नष्ट हो गए | बौद्ध ग्रंथ सुत्त पिटक; उनके अपने ग्रंथ नष्ट हो गए |
| पृष्ठ | 84–85 | 87 | 87 |
★कसौटी: नियतिवादी मानते थे कि कोई कुछ नहीं बदल सकता, और भौतिकवादी मानते थे कि मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता; उपनिषदों के विचारक इन्हीं बातों पर प्रश्न पूछ रहे थे, जैसे “क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मों से होता है?” (पृष्ठ 84, 87)
3अमरावती और साँची की तुलना कीजिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
| बात | अमरावती | साँची |
|---|---|---|
| खोज | 1796 में एक स्थानीय राजा को अवशेष मिले | 1818 में खोज; तीन तोरणद्वार खड़े थे, चौथा गिरा था, टीला अच्छी हालत में था |
| खोज के बाद | उत्कीर्ण पत्थर 1850 के दशक में कलकत्ता, मद्रास और लंदन तक पहुँचे; अधिकारियों के बाग़ों में भी मूर्तियाँ मिलती थीं | तोरणद्वार पेरिस या लंदन भेजने का सुझाव आया, पर स्तूप वहीं बना रहा |
| संरक्षण | कोल अधिकारियों को राज़ी नहीं कर पाए | खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात मान ली गई |
| आज | महाचैत्य “अब सिर्फ एक छोटा सा टीला है” | भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के सफल मरम्मत और संरक्षण का “जीता जागता उदाहरण” |
| पृष्ठ | 98–99 | 83, 99 |
★कसौटी: अंतर खोज के समय और संरक्षण के फ़ैसले में लिखिए। किताब का कारण “शायद” वाला है, इसलिए उसे पक्का कारण मत बताइए। (पृष्ठ 99)
भाग घ — प्रोजेक्ट और गतिविधि
1. बेगम का वर्णन, योजना और तसवीर साथ-साथ (किताब का पृष्ठ 84 और 97, चित्र 4.3 और 4.10)
पृष्ठ 84 की चर्चा में किताब कहती है कि शाहजहाँ बेगम के वर्णन की तुलना “चित्र 3” से कीजिए; यहाँ चित्र 3 का मतलब इसी अध्याय का चित्र 4.3 है। बेगम ने अपनी आत्मकथा में साँची की इमारतों का वर्णन किया और वहाँ पत्थर की वस्तुओं, बुद्ध की मूर्तियों और एक प्राचीन तोरणद्वार का निरीक्षण किया। चित्र 4.3 साँची के महान स्तूप का छायाचित्र है। पृष्ठ 97 पर चित्र 4.10 में महास्तूप को दो तरह से दिखाया गया है: (क) इमारत की योजना, यानी समतलीय परिप्रेक्ष्य, और (ख) उसकी ऊँचाई, यानी ऊर्ध्वस्थ परिप्रेक्ष्य।
1बेगम के वर्णन और चित्र 4.3 में क्या समानताएँ और क्या असमानताएँ हैं? ध्यान रखिए कि बेगम का वर्णन उन्नीसवीं सदी का है।
2योजना (चित्र 4.10 क) और छायाचित्र (चित्र 4.3) की तुलना कीजिए। किताब के अनुसार चारों दिशाओं में तोरणद्वार खड़े थे; योजना में आप कितने गिन पाते हैं और छायाचित्र में कितने देख पाते हैं?
3ऊँचाई के चित्र (4.10 ख) में अंड, हर्मिका, यष्टि, छत्री और वेदिका कहाँ हैं?
4तीनों को मिलाकर एक पंक्ति में लिखिए कि साँची का स्तूप कैसा है।
चित्र 4.3, 4.10 (क) और 4.10 (ख) एक ही स्तूप को तीन तरह से दिखाते हैं। (पृष्ठ 83, 97)
- प्रश्न 1: बेगम ने पत्थर की वस्तुएँ, बुद्ध की मूर्तियाँ और एक प्राचीन तोरणद्वार देखा। चित्र 4.3 में गोल गुंबद, उसके नीचे की वेदिका, ऊपर हर्मिका और छत्री, और दाईं ओर एक तोरणद्वार का खंभा दिखता है; मूर्तियाँ इस तसवीर में अलग से नहीं दिखतीं।
- प्रश्न 2: योजना में चारों ओर चार तोरणद्वार बाहर निकले दिखते हैं। छायाचित्र एक ही ओर से लिया गया है, इसलिए उसमें दाईं ओर एक ही तोरणद्वार का खंभा दिखता है।
- प्रश्न 3: चित्र पर भागों के नाम नहीं छपे, इन्हें ख़ुद पहचानिए: बीच का गोल गुंबद अंड है; उसके ऊपर छज्जे जैसा चौकोर ढाँचा हर्मिका; हर्मिका से उठता मस्तूल यष्टि, जिस पर तीन परतों वाली छत्री लगी है; गुंबद के नीचे चारों ओर घेरती रेलिंग वेदिका।
एक पंक्ति, जैसे: “साँची का स्तूप पहाड़ी पर बना गोल अंड है, जिसके ऊपर हर्मिका, यष्टि और छत्री हैं, नीचे वेदिका है और चारों ओर तोरणद्वार हैं।”
2. दान का रिकॉर्ड बनाइए (किताब का पृष्ठ 96 और चित्र 4.9, पृष्ठ 97)
किताब के अनुसार स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों पर मिले अभिलेख बताते हैं कि दान किसने दिया। दानकर्ताओं में राजा (जैसे सातवाहन), शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियाँ, सैकड़ों स्त्री-पुरुष, और भिक्खु-भिक्खुनियाँ थे; कुछ अभिलेखों में गाँव या शहर का नाम, पेशा और रिश्तेदारों के नाम भी हैं।
1अपने गाँव या मोहल्ले की किसी साझा इमारत (धर्मशाला, स्कूल, कुआँ, मंदिर या कोई और) पर लगा दान-पट्ट पढ़िए।
2एक तालिका बनाइए: दानकर्ता का नाम, उसने क्या दिया, कब, और नाम के साथ गाँव, पेशा या रिश्तेदार का ज़िक्र है या नहीं।
3अपनी तालिका की तुलना स्तूप के दानकर्ताओं की किताब की सूची से कीजिए। क्या कोई समानता दिखती है?
3. पड़ोस की परंपरा: ग्रंथ, मूर्ति और इमारत (किताब का प्रश्न 11, पृष्ठ 113)
किताब के अनुसार जैन ग्रंथों की पांडुलिपियाँ सैकड़ों वर्षों से मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में सुरक्षित हैं; बौद्ध शिक्षाएँ पहले मौखिक रहीं; और मूर्तियों में देवताओं की पहचान शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुध और बैठने की शैली से होती थी। शुरू के मंदिर में चौकोर गर्भगृह और एक दरवाज़ा होता था; स्तूप में अंड, वेदिका, तोरणद्वार और दक्षिणावर्त परिक्रमा।
1अध्याय की परंपराओं (जैन, बौद्ध, वैष्णव, शैव या देवी पूजा) में से जो आपके आसपास मानी जाती है, उसका एक पूजा स्थल चुनिए। वहाँ के लोगों से अनुमति लेकर विनम्रता से बात कीजिए।
2पूछिए कि कौन-से ग्रंथ पढ़े जाते हैं, किस भाषा में हैं, छपी किताब हैं या हाथ की लिखी, और कैसे सुरक्षित रखे या आगे सुनाए जाते हैं।
3इमारत का सरल रेखाचित्र बनाइए और उसकी तुलना साँची के स्तूप और शुरू के मंदिरों से एक तालिका में कीजिए।
4आपको किसी की मान्यता को सही या ग़लत नहीं कहना है; सिर्फ़ ग्रंथ, मूर्ति और इमारत की तुलना करनी है, और जो आपने देखा-सुना, उसी को लिखना है।
4. पाँच तसवीरें, दो लोग (किताब का प्रश्न 12, पृष्ठ 113)
इतिहासकार परिचित चीज़ों के आधार पर अपरिचित को समझते हैं। किताब ने बताया है कि जेम्स फर्गुसन बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे और उन्होंने सिर्फ़ मूर्तियाँ देखकर साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र मान लिया।
1अध्याय की परंपराओं से जुड़ी अलग-अलग काल और इलाकों की कम से कम पाँच मूर्तियों या चित्रों की तसवीरें इकट्ठी कीजिए। हर तसवीर का असली शीर्षक, जगह और काल अलग पन्ने पर लिख लीजिए।
2शीर्षक हटाकर हर तसवीर दो लोगों को दिखाइए और एक जैसे प्रश्न पूछिए: इसमें क्या दिखता है, यह कौन हो सकता है, कहाँ और कब की लगती है? उनके शब्द जैसे के तैसे लिखिए।
3एक तालिका बनाइए: तसवीर, व्यक्ति 1 का वर्णन, व्यक्ति 2 का वर्णन, असली जानकारी। फिर लिखिए कि लोग किन बातों से पहचान पाए और कहाँ चूके।
5. एक प्रतीक चुनिए और उसकी कहानी ढूँढ़िए (किताब का पृष्ठ 100)
किताब के अनुसार शुरू के मूर्तिकारों ने बुद्ध को प्रतीकों से दिखाया: रिक्त स्थान (ध्यान), स्तूप (महापरिनिब्बान), चक्र (सारनाथ का पहला उपदेश) और पेड़ (उनके जीवन की एक घटना)।
1चित्र 4.14, 4.15 और 4.16 में से एक चुनिए और देखिए कि उसमें प्रतीक कहाँ है।
2बिना कहानी जाने उसे देखकर अपनी पहली समझ एक पंक्ति में लिखिए।
3अब किताब के पृष्ठ 100 पर पढ़िए कि उस प्रतीक का क्या अर्थ है। आपकी पहली समझ और असली अर्थ में क्या फ़र्क़ रहा, और इससे बुद्ध के चरित को जानने के बारे में क्या सीख मिलती है?
किताब के अनुसार शुरू के कई मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर प्रतीकों से दिखाया। (पृष्ठ 100)
- चित्र 4.14 (बोधि वृक्ष की पूजा): रिक्त स्थान बुद्ध के ध्यान की दशा का प्रतीक है; बौद्धचरित लेखन के अनुसार एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति हुई।
- चित्र 4.15 (स्तूप की पूजा): स्तूप महापरिनिब्बान का प्रतीक है।
- चित्र 4.16 (धर्मचक्र प्रवर्तन): चक्र बुद्ध द्वारा सारनाथ में दिए गए पहले उपदेश का प्रतीक है।
सीख: किताब कहती है कि ऐसी मूर्तिकला को अक्षरश: नहीं समझा जा सकता; इसे समझने के लिए कला इतिहासकारों को बुद्ध के चरित लेखन के बारे में समझ बनानी पड़ी।
6. बौद्ध धर्म के फैलाव का नक्शा (किताब का प्रश्न 10, पृष्ठ 113; तथ्य पृष्ठ 86, 89)
किताब के अनुसार बुद्ध के संदेश पहले पूरे उपमहाद्वीप में फैले, फिर मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान तक, और श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक। किताब यह भी बताती है कि फा-शिएन और श्वैन त्सांग जैसे तीर्थयात्री बौद्ध ग्रंथों की खोज में चीन से भारत आए।
1दुनिया के रेखांकित मानचित्र पर सिर्फ़ वे इलाके चिह्नित कीजिए जिनके नाम ऊपर किताब ने लिए हैं।
2स्थल मार्ग के लिए ठोस रेखा और जल मार्ग के लिए बिंदुदार रेखा रखिए, और नक्शे के कोने में संकेत सूची लिखिए।
3जो रास्ता किताब ने साफ़ नहीं बताया, उसे अपनी ओर से मत गढ़िए; एटलस देखकर या शिक्षक से पूछकर ही जोड़िए।
अपना उत्तर ख़ुद जाँचिए
| आपके उत्तर में | तो |
|---|---|
| स्रोत या आँकड़ा किताब से सही उठाया, उससे नतीजा निकाला और अपना कारण लिखा | उत्तर पूरा है। |
| किताब का हवाला दिया, पर यह नहीं लिखा कि उससे क्या पता चलता है | हर हवाले के बाद एक पंक्ति जोड़िए कि उससे अध्याय की कौन-सी बात सिद्ध होती है। |
| आजीविकों को भौतिकवादी लिखा | आजीविक (गोसाल) नियतिवादी कहे जाते हैं, लोकायत (अजीत) भौतिकवादी (पृष्ठ 87)। केस 3 का प्रश्न 1 फिर से कीजिए। |
| बुद्ध के प्रवचन उनके जीवन काल में लिखे गए | कोई संभाषण जीवन काल में नहीं लिखा गया (पृष्ठ 86)। भाग ख का प्रश्न 2 फिर से कीजिए। |
| जैन धर्म को महावीर से शुरू लिखा | मूल सिद्धांत उनके जन्म से पहले प्रचलित थे और 23 शिक्षक हो चुके थे (पृष्ठ 88)। केस 4 का प्रश्न 1 फिर से कीजिए। |
| गोतमी को बुद्ध की माँ लिखा | महाप्रजापति गोतमी बुद्ध की उपमाता और पहली भिक्खुनी थीं (पृष्ठ 92)। केस 6 का प्रश्न 2 फिर से कीजिए। |
| स्तूप की परंपरा को बौद्ध धर्म की शुरुआत बताया | यह परंपरा शायद बुद्ध से पहले की थी (पृष्ठ 96)। केस 7 का प्रश्न 1 फिर से कीजिए। |
| चित्र 4.19 को निश्चित रूप से माया लिखा | कुछ इतिहासकार माया, दूसरे गजलक्ष्मी मानते हैं (पृष्ठ 102–103)। केस 9 का प्रश्न 4 फिर से कीजिए। |
| साँची के बचने का कारण पक्का लिख दिया | किताब “शायद” कहती है (पृष्ठ 99)। केस 8 का प्रश्न 4 फिर से कीजिए। |
| महाबलीपुरम में गंगा अवतरण को पक्का बताया | मतभेद है, दोनों मत लिखिए (पृष्ठ 109)। केस 11 का प्रश्न 2 फिर से कीजिए। |
इनमें से जिस पंक्ति में आपका उत्तर बैठता है, उसमें बताया प्रश्न फिर से हल कीजिए और अपना उत्तर नीचे दिए उत्तर से मिलाइए।