Chapter 3बंधुत्व, जाति तथा वर्ग

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NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3

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ये प्रश्न रटकर हल नहीं होते। इनमें आपको किताब के स्रोत पढ़ना, प्रमाण से नतीजा निकालना, तुलना करना, पक्ष लेना और कारण देना है। पहले अपना उत्तर ख़ुद लिखिए, फिर नीचे दिया उत्तर खोलकर मिलाइए। अंक सिर्फ़ यह अंदाज़ा देते हैं कि उत्तर कितना लंबा हो।

तारों का मतलब: ★वाली पंक्ति उत्तर की मुख्य बात है; दोहराते समय पहले वही पढ़िए। ! वाली पंक्ति उस चूक की ओर इशारा करती है जो अक्सर हो जाती है।


भाग क — केस-आधारित प्रश्न

केस 1 — महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण (पृष्ठ 54)

किताब का उदाहरण: 1919 में प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में अनेक विद्वानों ने महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण तैयार करने का ज़िम्मा उठाया। देश के अलग-अलग भागों से अलग-अलग लिपियों में लिखी संस्कृत पांडुलिपियाँ इकट्ठी की गईं, उनके श्लोकों की तुलना की गई, और वे श्लोक चुने गए जो लगभग सभी पांडुलिपियों में मिले। परियोजना पूरी होने में सैंतालीस वर्ष लगे। नतीजा 13,000 पृष्ठों में फैले अनेक ग्रंथ खंड थे, और इनमें से आधे से भी अधिक पृष्ठ क्षेत्रीय प्रभेदों (अलग-अलग पाठों) का ब्योरा देते हैं।

1समालोचनात्मक संस्करण बनाने के तीन कदम लिखिए। किताब के अनुसार इस काम में सबसे पहले कौन-सी बात उभरकर आई? 3 अंक

उत्तर देखिए

समालोचनात्मक संस्करण पांडुलिपियों को इकट्ठा करके और उनके श्लोकों को मिलाकर बना। (पृष्ठ 54)

  • पहला कदम: देश के विभिन्न भागों से विभिन्न लिपियों में लिखी महाभारत की संस्कृत पांडुलिपियाँ इकट्ठी की गईं।
  • दूसरा कदम: सभी पांडुलिपियों के श्लोकों की तुलना की गई।
  • तीसरा कदम: वे श्लोक चुने गए जो लगभग सभी पांडुलिपियों में मिले।
  • ★सबसे पहले यह बात उभरी कि उत्तर में कश्मीर और नेपाल से दक्षिण में केरल और तमिलनाडु तक की सभी पांडुलिपियों के अनेक अंशों में समानता थी।

213,000 पृष्ठों में से आधे से भी अधिक पृष्ठ क्षेत्रीय प्रभेदों के ब्योरे में गए। ये प्रभेद कैसे बने, मुख्य पाठ में कहाँ रखे गए, और इनका क्या अर्थ निकलता है? 3 अंक

उत्तर देखिए

प्रभेद इसलिए बने कि कुछ शताब्दियों में महाभारत के प्रेषण (पाठ के आगे पहुँचाए जाने) में अनेक क्षेत्रीय पाठ उभर आए। (पृष्ठ 54)

  • इन्हें मुख्य पाठ की पादटिप्पणियों और परिशिष्टों में रखा गया।
  • ★किताब के अनुसार ये प्रभावशाली परंपराओं और लचीले स्थानीय विचार और आचरण के बीच संवाद दिखाते हैं, जिसमें “द्वंद्व और मतैक्य” दोनों हैं।

3उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों ने संस्कृत ब्राह्मणीय ग्रंथों के बारे में पहले क्या मान लिया था? बाद में किन ग्रंथों के अध्ययन से क्या पता चला? 3 अंक

उत्तर देखिए

इतिहासकारों ने पहले मान लिया कि ग्रंथों में जो लिखा है, व्यवहार में भी वैसा ही होता होगा। (पृष्ठ 54)

  • हमारी समझ मुख्यत: उन ग्रंथों पर टिकी है जो संस्कृत में ब्राह्मणों द्वारा उन्हीं के लिए लिखे गए थे।
  • ★बाद में पालि, प्राकृत और तमिल ग्रंथों के अध्ययन से पता चला कि इन आदर्शों पर प्रश्न भी उठते थे और “यदा-कदा इनकी अवहेलना भी की जाती थी”।

यानी ग्रंथ बताते हैं कि क्या होना चाहिए था; यह जानने के लिए कि असल में क्या होता था, दूसरे साक्ष्य भी देखने पड़ते हैं।


केस 2 — पितृवंश, ऋग्वेद का मंत्र और दुर्योधन की बात (पृष्ठ 55–57)

किताब का उदाहरण: महाभारत में कुरु वंश के बांधवों के दो दल, कौरव और पांडव, भूमि और सत्ता के लिए लड़े। युद्ध में पांडव जीते, और उसके बाद पितृवंशिक उत्तराधिकार उद्घोषित किया गया। स्रोत 1 ऋग्वेद का वह मंत्र है (संभवत: लगभग 1000 ई.पू. में जोड़ा गया) जो विवाह संस्कार में पुरोहित पढ़ता था; इसमें कामना है कि इंद्र के अनुग्रह से वधू के “उत्तम पुत्र हों”। स्रोत 2 महाभारत के आदिपर्वन् का अंश है, जिसमें दुर्योधन अपने पिता धृतराष्ट्र से कहता है कि यदि पांडव पांडु से विरासत पाते हैं तो “उनके बाद उनके पुत्र, पौत्र और फिर प्रपौत्र इस पैतृक संपत्ति के अधिकारी हो जाएँगे”।

1पितृवंशिकता का क्या मतलब है? महाभारत की मुख्य कथा ने इस आदर्श को कैसे मज़बूत किया? 3 अंक

उत्तर देखिए

पितृवंशिकता वह वंश परंपरा है जो पिता से पुत्र, फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि से चलती है। (पृष्ठ 55)

  • पितृवंशिकता महाकाव्य की रचना से पहले भी थी।
  • ★महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इस आदर्श को और सुदृढ़ किया। इसमें पुत्र पिता की मृत्यु के बाद उनके संसाधनों पर, और राजाओं के मामले में सिंहासन पर भी, अधिकार जमा सकते थे।
  • कौरवों और पांडवों के युद्ध में पांडव जीते, और उसके बाद पितृवंशिक उत्तराधिकार उद्घोषित किया गया।

2क्या छठी शताब्दी ई.पू. के बाद सभी राजवंशों में सिंहासन पिता से पुत्र को ही जाता था? किताब के अनुसार क्या विभिन्नता थी? 3 अंक

उत्तर देखिए

नहीं; अधिकतर राजवंश (लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से) पितृवंशिकता का अनुसरण करते थे, पर सबमें ऐसा नहीं था। (पृष्ठ 55–56)

  • पुत्र न होने पर कभी एक भाई दूसरे का उत्तराधिकारी बनता था।
  • कभी बंधु-बांधव सिंहासन पर अधिकार जमा लेते थे।
  • ★कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियाँ सत्ता का उपभोग करती थीं।

3स्रोत 1 और स्रोत 2 एक ही झुकाव कैसे दिखाते हैं? और स्रोत 2 जैसे उद्धरणों के बारे में किताब क्या सावधानी देती है? 2 अंक

उत्तर देखिए

दोनों स्रोत पुत्र को वंश आगे बढ़ाने वाला मानते हैं। (पृष्ठ 56–57)

  • स्रोत 1 में विवाह के मंत्र में कामना है कि वधू के “उत्तम पुत्र हों”।
  • स्रोत 2 में दुर्योधन पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र की विरासत की बात करता है।
  • ★सावधानी: किताब कहती है कि ऐसे उद्धरण अक्षरश: सत्य न भी हों, तो भी बताते हैं कि ग्रंथ लिखने वाले क्या सोचते थे; और कभी-कभी इनमें परस्पर विरोधी विचार भी मिलते हैं।

यह झुकाव सिर्फ़ शासक परिवारों का नहीं था। ऋग्वेद जैसे कर्मकांडीय ग्रंथ के मंत्रों में भी यह दिखता है, और संभव है कि धनी वर्ग के पुरुष भी यही दृष्टिकोण रखते थे।


केस 3 — विवाह के प्रकार, गोत्र के नियम और सातवाहन रानियाँ (पृष्ठ 57–60)

किताब का उदाहरण: धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र (संस्कृत ग्रंथ, लगभग 500 ई.पू. से संकलित) विवाह के आठ प्रकारों को स्वीकृति देते हैं। पहले चार ‘उत्तम’ माने गए और बाकी निंदित। स्रोत 3 में मनुस्मृति की चार पद्धतियाँ हैं: पहली, चौथी, पाँचवीं और छठी। गोत्र की पद्धति लगभग 1000 ई.पू. के बाद से चली; हर गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर था और उसके सदस्य उस ऋषि के वंशज माने जाते थे। सातवाहन पश्चिमी भारत और दक्कन के कुछ भागों के शासक थे (लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ईसवी तक); उनके अभिलेखों से इतिहासकारों ने पारिवारिक और वैवाहिक रिश्तों का खाका बनाया है।

1स्रोत 3 की चारों पद्धतियों में विवाह का निर्णय किसके हाथ में दिखता है? इनमें से कौन-सी पद्धतियाँ ‘उत्तम’ श्रेणी में हैं? 3 अंक

उत्तर देखिए

चार पद्धतियों में निर्णय अलग-अलग लोगों का है। (पृष्ठ 58)

  • पहली: वधू का पिता; वह स्वयं वेदज्ञ वर को बुलाकर, सजी हुई कन्या का दान करता है।
  • चौथी: वधू का पिता; वह वर-वधू को साथ मिलकर दायित्व निभाने को कहकर कन्या का दान करता है।
  • पाँचवीं: वर; वह वधू के बांधवों को और वधू को यथेष्ट धन देकर वधू पाता है।
  • छठी: वधू और वर दोनों; स्त्री और पुरुष अपनी इच्छा से मिलते हैं।
  • ★पहली और चौथी पद्धति पहले चार (‘उत्तम’) में हैं; पाँचवीं और छठी निंदित मानी गई पद्धतियों में हैं।

किताब के अनुसार संभव है कि निंदित पद्धतियाँ उन लोगों में चलती थीं जो ब्राह्मणीय नियमों को नहीं मानते थे।

2गोत्र के दो नियम लिखिए। सातवाहन रानियों के नाम और विवाह इन नियमों से कैसे अलग थे? 3 अंक

उत्तर देखिए

ब्राह्मणीय पद्धति के दो नियम थे, और सातवाहन रानियाँ दोनों से अलग दिखती हैं। (पृष्ठ 58–60)

  • पहला नियम: विवाह के बाद स्त्री पिता के नहीं, पति के गोत्र की मानी जाती थी।
  • दूसरा नियम: एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं कर सकते थे।
  • ★सातवाहन रानियों के नाम गौतम और वसिष्ठ गोत्रों से बने थे, जो उनके पिता के गोत्र थे। यानी विवाह के बाद उन्होंने पति कुल का गोत्र अपनाने के बजाय पिता का गोत्र नाम ही रखा।
  • कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं, जो बहिर्विवाह के नियम के विरुद्ध था। यह अंतर्विवाह (बंधुओं में विवाह) का उदाहरण है।

किताब के अनुसार ममेरे, चचेरे भाई-बहनों से विवाह के कारण एक सुगठित समुदाय उभर पाता था।

3स्रोत 4 (पृष्ठ 59) की सूची में गोतमी–पुत्त कितने हैं और वसिथि (वसथि)–पुत्त कितने? ये नाम किसके नाम से बने हैं? 3 अंक

उत्तर देखिए

किताब के किनारे के प्रश्न का उत्तर है: गोतमी–पुत्त 3 और वसिथि (वसथि)–पुत्त 2। (पृष्ठ 59)

  • गोतमी–पुत्त: पहली, तीसरी और सातवीं पंक्ति।
  • वसिथि (वसथि)–पुत्त: दूसरी और पाँचवीं पंक्ति।
  • ★ये नाम माता के नाम से बने हैं। गोतमी–पुत्त का अर्थ है ‘गोतमी का पुत्र’। गोतमी और वसिथि, गौतम और वशिष्ठ के स्त्रीवाची नाम हैं; ये दोनों वैदिक ऋषि थे जिनके नाम से गोत्र हैं।

छपी हिंदी किताब की सूची की पाँचवीं पंक्ति में ‘हरिति–पुत्त’ छपा है; किताब के अंग्रेज़ी संस्करण में यह राजा वसथि–पुत्त चत्तरपन–सातकनि है। हिंदी सूची से गिनें तो वसिथि–पुत्त एक ही आता है।

4सातवाहन राजा माता के नाम से पहचाने जाते थे। क्या इससे मान लेना ठीक है कि सिंहासन माता की ओर से चलता था? गांधारी की सलाह (स्रोत 5) से माँ की जगह के बारे में क्या सोचा जा सकता है? 3 अंक

उत्तर देखिए

नहीं; मातृनाम से माताओं का महत्व लगता है, पर सातवाहन राजाओं में सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक होता था। (पृष्ठ 59–60)

  • स्रोत 5 में युद्ध अवश्यंभावी होने पर गांधारी ने अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन से युद्ध न करने की विनती की और कहा, “युद्ध में कुछ भी शुभ नहीं होता”।
  • दुर्योधन ने माँ की सलाह नहीं मानी, वह युद्ध में लड़ा और हार गया।
  • ★इससे माँ की बात का आदर दिखता है, पर अंतिम निर्णय पुत्र का रहा। एक ही उद्धरण से निष्कर्ष सावधानी से निकालना चाहिए।

केस 4 — ‘उचित’ जीविका और अक्षत्रिय राजा (पृष्ठ 61–63)

किताब का उदाहरण: धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में चार वर्णों की व्यवस्था बताई गई है: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। हर वर्ग के लिए ‘उचित’ जीविका भी गिनाई गई। शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे, पर किताब दिखाती है कि अनेक महत्वपूर्ण राजवंश दूसरे वर्णों से निकले। सातवाहन कुल के सबसे प्रसिद्ध शासक गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को “अनूठा ब्राह्मण” और क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया।

1धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों के अनुसार चारों वर्णों की ‘जीविका’ क्या थी? किताब के अनुसार इस व्यवस्था में वर्णों को किस आधार पर निर्धारित किया गया था? 3 अंक

उत्तर देखिए

चारों वर्णों के लिए अलग-अलग जीविकाएँ बताई गई थीं। (पृष्ठ 61)

  • ब्राह्मण: वेदों और अन्य शास्त्रों का अध्ययन और अध्यापन, यज्ञ करना और कराना, दान देना और ग्रहण करना।
  • क्षत्रिय: युद्ध करना, लोगों की रक्षा, न्याय संचालन; साथ ही वेदों और शास्त्रों का अध्ययन, यज्ञ कराना, दान देना और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना।
  • वैश्य: कृषि, पशुपालन और व्यापार; साथ ही वेदों और शास्त्रों का अध्ययन, यज्ञ करना और कराना, दान देना।
  • शूद्र: समाज के सुचारु संचालन में बाकी तीन वर्णों की सहायता।
  • ★किताब के अनुसार इस व्यवस्था में वर्णों को लोगों की योग्यता, कार्य और व्यवसाय, क्षमताओं और रुचियों के आधार पर निर्धारित किया गया था। श्रीमद्भगवद् गीता जैसे ग्रंथ भी संकेत करते हैं कि चार वर्णों की व्यवस्था “गुण अथवा विशेषताएँ और कर्म अथवा कार्य” पर आधारित थी, जन्म से तय कोई कठोर व्यवस्था नहीं।

ऐसे उल्लेख बौद्ध परंपराओं में भी मिलते हैं।

समय के साथ बदलाव ऋग्वेद में चारों वर्णों के नाम एक साथ केवल पुरुषसूक्त में आते हैं, और यह सूक्त ऋग्वेद के सबसे बाद में रचे गए हिस्सों में से एक, दसवें मंडल, में है। उत्तर वैदिक काल में ब्राह्मण माने जाने के लिए जन्म ज़रूरी माना जाने लगा, पर ऐसा लगता है कि अकेला जन्म काफ़ी नहीं था: वैदिक कर्मकांड की परंपरा (श्रुति) का ज्ञान भी चाहिए था (IGNOU, इकाई 4)। ब्राह्मण स्वयं को “ब्रह्मा के मुख से जन्मे” और सबसे श्रेष्ठ बताते थे (स्रोत 13, पृष्ठ 70); लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से बौद्धों ने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया (पृष्ठ 69)।

2शास्त्रों के अनुसार “केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे”। किताब के कौन-से उदाहरण दिखाते हैं कि राजवंश दूसरे वर्णों से भी निकले? इससे राजत्व के बारे में किताब क्या निष्कर्ष निकालती है? 3 अंक

उत्तर देखिए

किताब के अनुसार अनेक महत्वपूर्ण राजवंश दूसरे वर्णों से निकले। (पृष्ठ 62–63)

  • मौर्य: बाद के बौद्ध ग्रंथ उन्हें क्षत्रिय बताते हैं, जबकि ब्राह्मणीय शास्त्र उन्हें ‘निम्न’ कुल का मानते हैं; उनके उद्भव पर बहस होती रही है।
  • शुंग और कण्व: मौर्यों के उत्तराधिकारी, जो ब्राह्मण थे।
  • शक: मध्य एशिया से आए शकों को ब्राह्मण मलेच्छ, बर्बर या अन्यदेशीय मानते थे। फिर भी संस्कृत के संभवत: आरंभिक अभिलेखों में से एक में शक राजा रुद्रदामन (लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी) द्वारा सुदर्शन सरोवर के जीर्णोद्धार का वर्णन है।
  • ★राजनीतिक सत्ता हर वह व्यक्ति पा सकता था जो समर्थन और संसाधन जुटा सके। किताब के शब्दों में राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर “शायद ही निर्भर करता था”।

3गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने अपने बारे में क्या दावा किया, और उसका व्यवहार उस दावे से कहाँ अलग दिखता है? 3 अंक

उत्तर देखिए

दावे और व्यवहार में अंतर दिखता है। (पृष्ठ 63)

  • दावा: उसने स्वयं को “अनूठा ब्राह्मण” और क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया, और कहा कि उसने चार वर्णों के बीच विवाह संबंधों पर रोक लगाई।
  • ★व्यवहार: फिर भी उसने शक राजा रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध बनाए।
  • शास्त्र के अनुसार राजा को क्षत्रिय होना चाहिए, जबकि सातवाहन स्वयं को ब्राह्मण बताते थे; वे वर्ण व्यवस्था की मर्यादा का दावा करते थे, पर उससे बाहर के लोगों से विवाह करते थे और अंतर्विवाह का पालन करते थे।

किताब के शब्दों में जाति प्रथा के भीतर आत्मसात होना “बहुधा एक जटिल सामाजिक प्रक्रिया थी”।


केस 5 — जाति, श्रेणी और बदलती जीविका (पृष्ठ 63–64)

किताब का उदाहरण: वर्ण केवल चार थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी। नए सामाजिक समूहों और नए व्यवसायों से संपर्क के साथ जातियों की संख्या बढ़ती रही। एक ही जीविका वाली जातियाँ कभी-कभी श्रेणियों में संगठित होती थीं। लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी का मंदसौर (मध्य प्रदेश) का अभिलेख रेशम के बुनकरों की एक श्रेणी का वर्णन करता है, जो मूलतः लाट (गुजरात) की निवासी थी और अपने बच्चों और बांधवों के साथ मंदसौर गई, जिसे उस समय दशपुर कहा जाता था।

1वर्ण और जाति में क्या फ़र्क़ है? जातियों की संख्या के बारे में किताब क्या कहती है? 2 अंक

उत्तर देखिए

वर्ण चार ही थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी। (पृष्ठ 63)

  • ★नए सामाजिक समूहों और नए व्यवसायों से संपर्क के साथ जातियों की संख्या बढ़ती रही।
  • एक ही जीविका या व्यवसाय वाली जातियों को कभी-कभी श्रेणियों में भी संगठित किया जाता था।

2मंदसौर का अभिलेख रेशम बुनकरों की श्रेणी के बारे में क्या बताता है? उनके काम और जीविका के बारे में किताब क्या कहती है? 3 अंक

उत्तर देखिए

अभिलेख बुनकरों की श्रेणी के एक जगह से दूसरी जगह जाने और वहाँ मंदिर बनवाने की कहानी कहता है। (पृष्ठ 63–64)

  • श्रेणी मूलतः लाट (गुजरात) की निवासी थी। उसने वहाँ के राजा की महानता के बारे में सुना था, इसलिए वह अपने बच्चों और बांधवों के साथ मंदसौर गई।
  • श्रेणी की सदस्यता शिल्प की विशेषज्ञता पर निर्भर थी, पर कुछ सदस्य दूसरी जीविका भी अपना लेते थे।
  • स्रोत 8 के संस्कृत अंश में लोगों के अलग-अलग काम गिनाए गए हैं: संगीत, जीवनियाँ और कथाएँ, धार्मिक व्याख्यान, धार्मिक अनुष्ठान, (वैदिक) खगोल शास्त्र और युद्ध।
  • ★सबने मिलकर शिल्प से कमाया धन सूर्य देवता के सम्मान में मंदिर बनवाने पर खर्च किया।

3शास्त्र व्यापार को किस वर्ण की जीविका बताते हैं? ब्राह्मण–वणिक और क्षत्रिय–वणिक नाम किताब में कहाँ आए हैं, और ये क्या दिखाते हैं? 2 अंक

उत्तर देखिए

शास्त्र व्यापार को वैश्यों की जीविका बताते हैं, पर दूसरे स्रोत अधिक जटिल तस्वीर दिखाते हैं। (पृष्ठ 64)

  • शूद्रक के नाटक मृच्छकटिकम् (लगभग चौथी शताब्दी ईसवी) में नायक चारुदत्त को ब्राह्मण–वणिक बताया गया है।
  • ★पाँचवीं शताब्दी ईसवी के एक अभिलेख में मंदिर के निर्माण के लिए धन देने वाले दो भाइयों को क्षत्रिय–वणिक कहा गया है।

यानी वणिक यानी व्यापारी का काम करने वालों के नामों में दूसरे वर्णों के शब्द भी जुड़े मिलते हैं, जो शास्त्र की सीधी बात से अलग है।


केस 6 — एकलव्य, हिडिम्बा और मातंग (पृष्ठ 62, 65–67)

किताब का उदाहरण: किताब का प्रश्न 3 महाभारत की दो कथाओं और एक बौद्ध कथा की तुलना करवाता है। स्रोत 7 (आदिपर्वन्) में ब्राह्मण द्रोण, जो कुरु राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाते थे, वनवासी निषाद एकलव्य को शिष्य बनाने से मना कर देते हैं; बाद में वे गुरु दक्षिणा में उसके दाहिने हाथ का अँगूठा माँग लेते हैं। स्रोत 9 में नरभक्षी राक्षस की बहन हिडिम्बा भीम से विवाह का प्रस्ताव रखती है। स्रोत 10 (पालि की मातंग जातक) में चाण्डाल के पुत्र के रूप में जन्मे बोधिसत्त मातंग अपने पुत्र माण्डव्य से भोजन माँगते हैं।

1स्रोत 7 में द्रोण ने एकलव्य के साथ क्या किया? किताब के किनारे के प्रश्न के अनुसार इस कथा से निषादों और क्षत्रियों को क्या संदेश मिलता दिखता है? 3 अंक

उत्तर देखिए

द्रोण ने एकलव्य को पहले शिष्य बनाने से मना किया और बाद में गुरु दक्षिणा में उसका अँगूठा माँग लिया। (पृष्ठ 62)

  • एकलव्य ने मिट्टी से द्रोण की प्रतिमा बनाई, उसे गुरु मानकर खुद अभ्यास किया और तीर चलाने में सिद्धहस्त हो गया।
  • अर्जुन को दिया वचन निभाने के लिए द्रोण ने उसके दाहिने हाथ का अँगूठा माँगा, और एकलव्य ने वह दे दिया।
  • ★निषादों के लिए संदेश यह निकलता दिखता है: राजकुमारों वाली विद्या निषादों के लिए नहीं है, और अपने अभ्यास से महारत पा लेने पर भी वह छीनी जा सकती है।
  • क्षत्रियों के लिए संदेश: उनका स्थान सुरक्षित रखा जाएगा। द्रोण ने अर्जुन को दिया वचन निभाया, और “कोई भी अर्जुन से बेहतर धनुर्धारी नहीं रहा।”

यहाँ मानदंड पूरी सख़्ती से लागू हुआ।

2क्या एक ब्राह्मण के रूप में धनुर्विद्या सिखाते समय द्रोण धर्मसूत्र का पालन कर रहे थे? केस 4 में पढ़ी जीविकाओं से मिलाकर बताइए। 3 अंक

उत्तर देखिए

धर्मसूत्रों की जीविकाओं से मिलाएँ तो द्रोण उस नियम से बाहर जाते दिखते हैं। (पृष्ठ 61–62)

  • धर्मसूत्रों में ब्राह्मण का मुख्य कर्तव्य वेदों और शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ करना-कराना और दान देना-लेना बताया गया है।
  • ★युद्ध करना क्षत्रियों का कार्य था; फिर भी ब्राह्मण द्रोण कुरु राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखा रहे थे।
  • यही द्रोण एकलव्य पर मानदंड पूरी सख़्ती से लागू करते हैं।

पृष्ठ 67 के चर्चा-प्रश्न के हिसाब से स्रोतों को ‘नियम मानने के संकेत’ और ‘अलग संभावनाएँ’ के खानों में रखें, तो ब्राह्मण द्रोण का धनुर्विद्या सिखाना ‘अलग संभावनाएँ’ वाले खाने में जाता है।

3द्रोण, हिडिम्बा और मातंग की कथाओं में धर्म के मानदंडों की तुलना कीजिए और उनके अंतर को स्पष्ट कीजिए। 4 अंक

उत्तर देखिए

तीनों कथाएँ वर्ण और जन्म के मानदंडों से जुड़ी हैं, पर तीनों में उनका निभाव अलग है। (पृष्ठ 62, 65, 67)

  • द्रोण और एकलव्य (स्रोत 7): मानदंड सख़्ती से लागू हुआ। एकलव्य ने अभ्यास से महारत पाई, फिर भी द्रोण ने उसका अँगूठा माँग लिया।
  • हिडिम्बा (स्रोत 9): मानदंड से बाहर का रिश्ता शर्त के साथ स्वीकार हुआ। हिडिम्बा ने स्वयं विवाह का प्रस्ताव रखा; युधिष्ठिर इस शर्त पर माने कि भीम दिन भर हिडिम्बा के साथ रहें और रात को लौट आएँ।
  • ★मातंग (स्रोत 10): यह कथा वर्ण और जन्म के मानदंडों को नकारती है। चाण्डाल के रूप में जन्मे बोधिसत्त मातंग ने कहा, “जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं वे भेंट के पात्र नहीं हैं।”

अंतर: द्रोण की कथा मानदंड को लागू करती है, हिडिम्बा की कथा उसमें समझौता दिखाती है, और मातंग की कथा उसे नकारती है। पहली दो कथाएँ संस्कृत महाभारत से हैं; तीसरी बौद्ध परंपरा के पालि ग्रंथ से है और चाण्डाल के नज़रिए से कही गई है।


केस 7 — संपत्ति और प्रतिष्ठा (पृष्ठ 68–72)

किताब का उदाहरण: किताब के अनुसार दास से लेकर राजा तक सबका सामाजिक स्थान इस पर निर्भर करता था कि आर्थिक संसाधनों पर उनका कितना नियंत्रण है। स्रोत 12 में मनुस्मृति पुरुषों के लिए धन अर्जित करने के सात और स्त्रियों के लिए छ: तरीके गिनाती है। स्रोत 13 (पालि ग्रंथ मज्झिमनिकाय) में राजा अवन्तिपुत्र और बुद्ध के अनुयायी कच्चन की बातचीत है; वहाँ ब्राह्मणों का दावा है कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं और “ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं”। प्रश्नावली का प्रश्न 4 ब्राह्मणीय दृष्टिकोण को ‘पुरुषसूक्त’ पर आधारित बताता है। स्रोत 14 में तमिल संगम साहित्य की पद्यावली पुरनानूरु का एक चारण एक निर्धन पर दानी सरदार की बात करता है। पृष्ठ 72 पर बौद्ध सुत्तपिटक का एक मिथक है, जिसमें लोग अपने बीच से एक मनुष्य को चुनते हैं।

1मनुस्मृति (स्रोत 12) के अनुसार स्त्री और पुरुष किन तरीकों से धन प्राप्त कर सकते थे? दोनों की तुलना कीजिए। किताब के अनुसार असल स्थिति क्या थी? 4 अंक

उत्तर देखिए

मनुस्मृति ने पुरुषों के लिए सात और स्त्रियों के लिए छ: तरीके गिनाए हैं। (पृष्ठ 68–69)

  • पुरुष (सात): विरासत, खोज, खरीद, विजित करके, निवेश, कार्य द्वारा, और सज्जनों की दी गई भेंट स्वीकार करके।
  • स्त्री (छ:): वैवाहिक अग्नि के सामने और वधूगमन के समय मिली भेंट; स्नेह के प्रतीक के रूप में मिली भेंट; भ्राता, माता और पिता के उपहार; परवर्ती काल की भेंट; और “अनुरागी” पति से मिला सब कुछ।
  • ★अंतर: पुरुष विरासत और अपनी मेहनत, खरीद, निवेश या विजय से धन पा सकते थे; स्त्रियों के सारे तरीके भेंट और उपहार हैं।
  • स्त्रीधन: विवाह के समय मिले उपहारों पर स्त्री का स्वामित्व माना जाता था। उसकी संतान उसे विरासत में पा सकती थी और पति का उस पर कोई अधिकार नहीं था। फिर भी मनुस्मृति स्त्रियों को पति की आज्ञा के विरुद्ध पारिवारिक संपत्ति अथवा अपने बहुमूल्य धन के गुप्त संचय के विरुद्ध चेतावनी देती है।
  • असल स्थिति: वाकाटक महिषी प्रभावती गुप्त धनाढ्य थीं और उच्च वर्ग की महिलाएँ संसाधनों पर पैठ रखती थीं; पर अधिकतर अभिलेखीय और साहित्यिक साक्ष्य बताते हैं कि सामान्यत: भूमि, पशु और धन पर पुरुषों का ही नियंत्रण था।

इसी कारण स्त्री और पुरुष के बीच सामाजिक हैसियत की भिन्नता “अधिक प्रखर हुई”।

2बौद्धों ने वर्ण व्यवस्था की आलोचना किस तरह की? स्रोत 13 में अवन्तिपुत्र ने कच्चन के प्रश्नों पर क्या माना? 3 अंक

उत्तर देखिए

बौद्धों ने माना कि समाज में विषमता थी, पर उसे न नैसर्गिक माना और न स्थायी। (पृष्ठ 69–70)

  • वर्ण व्यवस्था की सबसे जानी-मानी आलोचनाएँ प्रारंभिक बौद्ध धर्म (लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से) में विकसित हुईं।
  • ★किताब के शब्दों में ये भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”; बौद्धों ने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया।
  • स्रोत 13 में अवन्तिपुत्र ने माना कि धनी शूद्र दूसरे शूद्र को, और क्षत्रिय, ब्राह्मण या वैश्य को भी, अपना सेवक बना सकता था।
  • कच्चन ने पूछा, “यदि ऐसा है, तो क्या फिर यह चारों वर्ण एकदम समान नहीं हैं?” अवन्तिपुत्र ने स्वीकार किया कि इस आधार पर चारों वर्णों में कोई भेद नहीं है।

किताब कहती है कि यह कहानी अक्षरश: सत्य नहीं थी, पर बौद्धों के वर्ण संबंधी रवैये को दिखाती है।

3स्रोत 14 में चारण अपने आश्रयदाता सरदार के बारे में क्या कहता है? तमिल संगम साहित्य के समाज में धन के उपयोग के बारे में किताब क्या बताती है? 3 अंक

उत्तर देखिए

चारण एक ऐसे सरदार की प्रशंसा करता है जिसके पास रोज़ दूसरों पर खर्च करने को धन नहीं है, फिर भी जो दान देने से मना नहीं करता। (पृष्ठ 70–71)

  • सरदार इरंतई में रहता है और “वह चारणों की क्षुधा का शत्रु है।”
  • चारण कहता है कि यदि वे सरदार से प्रार्थना करें और भूख से क्षीण पसलियाँ दिखाएँ, तो वह अपने गाँव के लोहार से कहेगा: “मुझे युद्ध के लिए एक लंबा भाला तैयार कर दो, एक ऐसा भाला जिसका सीधा फलक हो!”
  • ★प्राचीन तमिलकम् में दानशील आदमी का सम्मान होता था, और कंजूस या अपने लिए संपत्ति जमा करने वाला घृणा का पात्र था। धनी और निर्धन में विषमता थी, पर संसाधनों पर नियंत्रण रखने वालों से अपेक्षा थी कि वे उन्हें मिल-बाँटकर इस्तेमाल करेंगे।

किताब में इस संग्रह का नाम ‘पुरुनारुरू’ छपा है; सही नाम पुरनानूरु है।

4सुत्तपिटक के मिथक के अनुसार राजा कैसे बना? सामाजिक अनुबंध की यह बौद्ध अवधारणा ‘पुरुषसूक्त’ पर आधारित ब्राह्मणीय दृष्टिकोण से किन मायनों में भिन्न थी? 4 अंक

उत्तर देखिए

बौद्ध मिथक में राजा को लोगों ने चुना, जबकि पुरुषसूक्त में वर्णों का ऊँचा-नीचा क्रम सृष्टि की कथा का हिस्सा है। (पृष्ठ 70, 72; प्रश्नावली का प्रश्न 4)

  • मिथक की शुरुआत: सभी जीव शांति से रहते थे और प्रकृति से उतना ही लेते थे जितना एक समय के भोजन के लिए चाहिए। फिर मनुष्य अधिकाधिक लालची, प्रतिहिंसक और कपटी हो गए।
  • चयन: तब लोगों ने एक ऐसे मनुष्य को चुनने की बात सोची जो उचित बात पर क्रोधित हो और जिसे प्रताड़ित या निष्कासित किया जाना हो उसे प्रताड़ित या निष्कासित करे। बदले में उसे चावल का अंश मिलेगा, और सब लोगों द्वारा चुने जाने के कारण उसे महासम्मत्त की उपाधि प्राप्त होगी।
  • ★अर्थ: राजा का पद लोगों द्वारा चुने जाने पर निर्भर था, और ‘कर’ वह मूल्य था जो लोग राजा की इस सेवा के बदले देते थे।
  • पुरुषसूक्त (ऋग्वेद, मंडल 10, सूक्त 90): ब्राह्मण आदि-पुरुष का मुख था, राजन्य (क्षत्रिय) उसकी भुजाएँ बनाए गए, वैश्य उसकी जंघाएँ थे और पैरों से शूद्र जन्मा (मूल पाठ, मंत्र 12)।
  • अंतर: ब्राह्मणों के दावे (स्रोत 13) में उनका ऊँचा स्थान ब्रह्मा से उत्पत्ति पर टिका है; बौद्ध मिथक में व्यवस्था मनुष्यों के अपने कर्म से बनी।

यदि मनुष्य स्वयं व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार थे, तो भविष्य में वे उसमें परिवर्तन भी ला सकते थे।


केस 8 — महाभारत को कैसे पढ़ें (पृष्ठ 73–78)

किताब का उदाहरण: किताब महाभारत का जो पाठ इस्तेमाल करती है वह संस्कृत में है, पर उसकी संस्कृत वेदों या प्रशस्तियों की संस्कृत से कहीं अधिक सरल है। इतिहासकार उसकी विषयवस्तु को दो भागों में रखते हैं: आख्यान (कहानियों का संग्रह) और उपदेशात्मक (सामाजिक आचार-विचार के मानदंड)। साहित्यिक परंपरा इसका रचयिता ऋषि व्यास को मानती है। 1951-52 में बी.बी. लाल ने मेरठ ज़िले (उ.प्र.) के हस्तिनापुर नामक गाँव में उत्खनन किया।

1क्या यह संभव है कि महाभारत का एक ही रचयिता था? चर्चा कीजिए। 4 अंक

उत्तर देखिए

साहित्यिक परंपरा ऋषि व्यास को रचयिता मानती है, पर किताब के बताए चरण एक अकेले रचयिता की बात से मेल नहीं खाते। (पृष्ठ 74–75)

  • सूत: संभवत: मूल कथा भाट सारथियों, यानी ‘सूतों’, ने रची, जो क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्धक्षेत्र में जाते थे। ये रचनाएँ मौखिक रूप में आगे बढ़ीं।
  • ब्राह्मण: पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इस कथा परंपरा पर अधिकार कर लिया और इसे लिखा।
  • लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी: विष्णु की आराधना प्रभावी हो रही थी, और श्रीकृष्ण को विष्णु का रूप बताया जा रहा था।
  • लगभग 200-400 ईसवी: मनुस्मृति से मिलते-जुलते बड़े उपदेशात्मक प्रकरण जोड़े गए।
  • ★नतीजा: ग्रंथ संभवत: 10,000 श्लोकों से भी कम का था, और बढ़कर एक लाख श्लोकों वाला हो गया।

परंपरा के अनुसार व्यास ने श्रीगणेश को ग्रंथ लिखवाया (चित्र 3.9); पर इतने चरणों में बढ़े ग्रंथ का एक ही रचयिता होना संभव नहीं लगता।

2स्रोत 15 में महाकाव्य के हस्तिनापुर के वर्णन की तुलना बी.बी. लाल की खोज से कीजिए। क्या दोनों में समानता है? 3 अंक

उत्तर देखिए

दोनों में बहुत कम समानता दिखती है; पर उत्खनन सीमित क्षेत्र में ही हुआ था। (पृष्ठ 75–76)

  • महाकाव्य (स्रोत 15): हस्तिनापुर समुद्र की भाँति भरा हुआ, सैकड़ों प्रासादों वाला और इंद्र की नगरी के समान नगर है।
  • बी.बी. लाल की खोज: दूसरे स्तर (लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ई.पू.) पर घरों की कोई निश्चित योजना नहीं मिली, पर मिट्टी की दीवारें और कच्ची मिट्टी की ईंटें मिलीं। तीसरे स्तर (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू.) पर कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के घर, ईंटों के नाले और वलय-कूप मिले।
  • लाल के विवरण में मिट्टी और ईंटों के घर, नाले और वलय-कूप हैं, सैकड़ों प्रासादों वाला नगर नहीं।
  • ★किताब पूछती है: क्या नगर का यह चित्रण बाद में (ईसा पूर्व छठी शताब्दी के पश्चात) जोड़ा गया, जब इस क्षेत्र में नगर बने, या यह कवियों की कल्पना थी?

किताब के अनुसार यह पुरास्थल कुरुओं की राजधानी हस्तिनापुर हो सकती थी; नामों की समानता संयोग भी हो सकती है।

3स्रोत 16 में द्रौपदी के विवाह के कौन-से तीन स्पष्टीकरण दिए गए हैं? आपको क्यों लगता है कि लेखक(कों) ने एक ही प्रकरण के लिए तीन स्पष्टीकरण दिए? 3 अंक

उत्तर देखिए

द्रौपदी का पाँचों पांडवों से विवाह बहुपति विवाह का उदाहरण है, और स्रोत 16 उसके तीन स्पष्टीकरण देता है। (पृष्ठ 76–77)

  • कुंती की आज्ञा: अर्जुन ने पांचाल नरेश द्रुपद के स्वयंवर में द्रौपदी को जीता। कुंती ने बिना देखे कहा कि लाई गई वस्तु आपस में बाँट लो; उनकी आज्ञा टाली नहीं जा सकती थी, इसलिए युधिष्ठिर ने निर्णय लिया कि द्रौपदी पाँचों की पत्नी होगी।
  • व्यास का पहला कथन: पांडव इंद्र के अवतार थे और उनकी पत्नी ने ही द्रौपदी के रूप में जन्म लिया था।
  • व्यास का दूसरा कथन: एक युवा स्त्री ने शिव की आराधना में एक के बजाय पाँच बार पति का वर माँग लिया था, और उसी स्त्री ने द्रौपदी के रूप में जन्म लिया।
  • ★इतिहासकारों की व्याख्या: संभवत: यह प्रथा शासकों के विशिष्ट वर्ग में मौजूद थी; पर अलग-अलग स्पष्टीकरण बताते हैं कि समय के साथ बहुपति प्रथा लोगों में अमान्य होती गई।

इसलिए लगता है कि लेखकों को इसे उचित ठहराने के लिए एक से अधिक कारण देने पड़े। किताब याद दिलाती है: “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं।”

4महाश्वेता देवी की कहानी “कुंती ओ निषादी” महाभारत के कौन-से प्रसंग के बाद से शुरू होती है? उसमें कौन-सा प्रश्न उठता है? 3 अंक

उत्तर देखिए

यह कहानी वहाँ से शुरू होती है जहाँ लाक्षागृह वाला प्रसंग खत्म होता है। (पृष्ठ 77–78)

  • संस्कृत पाठ में दुर्योधन पांडवों को लाक्षागृह में जलाकर मारना चाहता है; पांडव सुरंग खोदकर निकल जाते हैं। कुंती के भोज में आई एक निषादी अपने पाँच पुत्रों के साथ वहीं सो जाती है और पांडवों की लगाई आग में भस्म हो जाती है; लोग समझते हैं कि पांडव मर गए।
  • महाभारत के युद्ध के बाद कुंती एक वनप्रांतर में रहती हैं और पृथ्वी से बातें करते हुए अपनी त्रुटियाँ स्वीकार करती हैं।
  • ★एक निषादी, जिसकी सास उस आग में मरी थी, उनसे कहती है कि अपने अतीत पर सोचते समय उन्हें उन छ: निर्दोष लोगों की याद एक बार भी नहीं आई।

इस तरह लेखिका ने उन प्रश्नों की ओर ध्यान खींचा है जिन पर संस्कृत पाठ मूक है।

भाग ख — तर्क और मूल्यांकन

1“ऋग्वेद के विवाह मंत्र में ‘उत्तम पुत्र’ की कामना है और महाभारत का दुर्योधन पैतृक संपत्ति की बात करता है, इसलिए पितृवंशिकता महाभारत की रचना से शुरू हुई।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक

उत्तर देखिए

कथन ग़लत है। किताब के अनुसार पितृवंशिकता महाकाव्य की रचना से पहले भी मौजूद थी। (पृष्ठ 55–56)

  • महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इस आदर्श को और सुदृढ़ किया: युद्ध में पांडव जीते, और उसके बाद पितृवंशिक उत्तराधिकार उद्घोषित किया गया।
  • ऋग्वेद जैसे कर्मकांडीय ग्रंथ के मंत्रों में भी यह झुकाव दिखता है। स्रोत 1 का मंत्र संभवत: लगभग 1000 ई.पू. में जोड़ा गया था।
  • ★अधिकतर राजवंश लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से पितृवंशिकता का अनुसरण करते थे। महाभारत ने इस आदर्श को मज़बूत किया, उसे शुरू नहीं किया।

2“धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में विवाह और गोत्र के नियम लिखे थे, इसलिए आरंभिक भारत में सब लोग उन्हीं के अनुसार चलते थे।” (यह कथन काल्पनिक है।) क्या यह ठीक है? 3 अंक

उत्तर देखिए

कथन ग़लत है। ब्राह्मण लेखक चाहते थे कि उनके नियमों का सब पालन करें, पर किताब के शब्दों में उनका प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”। (पृष्ठ 58–60)

  • क्षेत्रीय विभिन्नता और संचार की बाधाओं के कारण वास्तविक सामाजिक संबंध कहीं अधिक जटिल थे। (पृष्ठ 58)
  • धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र ख़ुद विवाह के आठ प्रकार मानते हैं; पहले चार ‘उत्तम’ और बाकी निंदित थे। संभव है कि निंदित पद्धतियाँ उन लोगों में चलती थीं जो ब्राह्मणीय नियमों को अस्वीकार करते थे। (पृष्ठ 58)
  • ★सातवाहन रानियों के नाम गौतम और वसिष्ठ गोत्रों से बने थे, जो उनके पिता के गोत्र थे; कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं, जो बहिर्विवाह के नियम के विरुद्ध था। (पृष्ठ 59–60)

3“शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे, इसलिए आरंभिक भारत के सारे राजवंश क्षत्रिय थे।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक

उत्तर देखिए

कथन ग़लत है। किताब के अनुसार अनेक महत्वपूर्ण राजवंशों की उत्पत्ति दूसरे वर्णों से भी हुई थी। (पृष्ठ 62–63)

  • शुंग और कण्व, जो मौर्यों के उत्तराधिकारी थे, ब्राह्मण थे।
  • मौर्यों को बाद के बौद्ध ग्रंथ क्षत्रिय बताते हैं, जबकि ब्राह्मणीय शास्त्र उन्हें ‘निम्न’ कुल का मानते हैं; उनके उद्भव पर गर्मजोशी से बहस होती रही है।
  • सातवाहन कुल के गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को “अनूठा ब्राह्मण” बताया।
  • ★राजनीतिक सत्ता हर वह व्यक्ति पा सकता था जो समर्थन और संसाधन जुटा सके। किताब के शब्दों में राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर “शायद ही निर्भर करता था”।

4“बौद्ध परंपरा ने वर्ण व्यवस्था की आलोचना की, इसलिए बौद्ध मानते थे कि समाज में कोई विषमता है ही नहीं।” (यह कथन काल्पनिक है।) क्या आप सहमत हैं? 3 अंक

उत्तर देखिए

कथन ग़लत है। किताब के अनुसार बौद्धों ने माना कि समाज में विषमता थी। (पृष्ठ 69)

  • उनके अनुसार यह भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”।
  • उन्होंने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया।
  • स्रोत 13 की कथा में धनी शूद्र दूसरे शूद्र को, और क्षत्रिय, ब्राह्मण या वैश्य को भी, अपना सेवक बना सकता था। किताब कहती है कि यह कहानी अक्षरश: सत्य नहीं थी, पर बौद्धों का वर्ण संबंधी रवैया दिखाती है। (पृष्ठ 70)
  • ★सुत्तपिटक के मिथक के अनुसार राजा का पद लोगों द्वारा चुने जाने पर निर्भर करता था; इसलिए मनुष्य जिस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार थे, भविष्य में उसे बदल भी सकते थे। (पृष्ठ 72)

5“बी.बी. लाल को मेरठ ज़िले के हस्तिनापुर नामक गाँव में खुदाई में आबादी के स्तर मिले, इसलिए पक्का हो गया कि यह वही हस्तिनापुर है जिसका वर्णन महाभारत में है।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक

उत्तर देखिए

कथन ग़लत है। किताब इसे पक्का नहीं मानती। (पृष्ठ 75–76)

  • नामों की समानता मात्र संयोग हो सकती है। पर गंगा के ऊपरी दोआब में, जहाँ कुरु राज्य था, इस पुरास्थल का होना बताता है कि यह कुरुओं की राजधानी हस्तिनापुर हो सकती थी। (पृष्ठ 75)
  • लाल को आबादी के पाँच स्तर मिले। दूसरे स्तर (लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ई.पू.) और तीसरे स्तर (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू.) के घर साधारण थे: मिट्टी की दीवारें, कच्ची ईंटें, और तीसरे स्तर में कच्ची और कुछ पक्की ईंटें, नाले और वलय-कूप। (पृष्ठ 75)
  • ★स्रोत 15 में हस्तिनापुर सैकड़ों प्रासादों वाला नगर है। किताब ख़ुद पूछती है कि यह चित्रण बाद में (ईसा पूर्व छठी शताब्दी के पश्चात) जोड़ा गया, या कवियों की कल्पना की उड़ान था। (पृष्ठ 76)

6“पांडवों ने द्रौपदी से विवाह किया, इसलिए आरंभिक भारत में बहुपति प्रथा सबसे प्रचलित विवाह पद्धति थी।” (यह कथन काल्पनिक है।) क्या यह नतीजा ठीक है? 3 अंक

उत्तर देखिए

नतीजा ग़लत है। किताब के अनुसार कुछ आरंभिक स्रोत बताते हैं कि बहुपति प्रथा न तो एकमात्र विवाह पद्धति थी और न ही सबसे अधिक प्रचलित। (पृष्ठ 77)

  • वर्तमान इतिहासकारों का सुझाव है कि संभवत: यह प्रथा शासकों के विशिष्ट वर्ग में मौजूद थी।
  • स्रोत 16 के तीन अलग स्पष्टीकरण यह भी संकेत देते हैं कि समय के साथ बहुपति प्रथा धीरे-धीरे लोगों के बीच अमान्य होती गई।
  • ★किताब याद दिलाती है: “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं।”

भाग ग — तुलना और वर्गीकरण

1पृष्ठ 61 से 67 के स्रोतों को दो खानों में रखिए: जिनसे लगता है कि लोग ब्राह्मणों की बताई जीविका और नियमों का पालन करते थे, और जिनसे अलग संभावनाओं का पता चलता है। 4 अंक

स्रोतक्या दिखता हैखाना
स्रोत 7, एकलव्य (पृष्ठ 62)
मनुस्मृति में चाण्डालों के ‘कर्तव्यों’ की सूची (पृष्ठ 66)
फा-शिएन और श्वैन-त्सांग के वृत्तांत (पृष्ठ 66)
स्रोत 6, ऋग्वेद का सूक्त (पृष्ठ 61)
अक्षत्रिय राजा (पृष्ठ 62–63)
द्रोण का धनुर्विद्या सिखाना (पृष्ठ 62)
स्रोत 8, मंदसौर का अभिलेख (पृष्ठ 64)
ब्राह्मण–वणिक और क्षत्रिय–वणिक (पृष्ठ 64)
स्रोत 9, हिडिम्बा (पृष्ठ 65)
स्रोत 10, मातंग जातक (पृष्ठ 67)
उत्तर देखिए
स्रोतक्या दिखता हैखाना
स्रोत 7, एकलव्य (पृष्ठ 62)द्रोण ने एकलव्य को शिष्य बनाने से मना किया और गुरु दक्षिणा में उसके दाहिने हाथ का अँगूठा माँग लिया; अर्जुन को दिया वचन निभाया गयानियम मानने का संकेत
मनुस्मृति में चाण्डालों के ‘कर्तव्यों’ की सूची (पृष्ठ 66)गाँव के बाहर रहना; फेंके हुए बर्तनों का इस्तेमाल; मरे हुए लोगों के वस्त्र और लोहे के आभूषण पहनना; रात में गाँव और नगरों में चल-फिर न सकना; संबंधियों से विहीन मृतकों की अंत्येष्टि और वधिक का कामनियम मानने का संकेत (यह ग्रंथ का निर्देश है; व्यवहार में इसका पालन फा-शिएन और श्वैन-त्सांग के वृत्तांत दिखाते हैं)
फा-शिएन और श्वैन-त्सांग के वृत्तांत (पृष्ठ 66)फा-शिएन (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी): अस्पृश्यों को सड़क पर करताल बजाकर अपने होने की सूचना देनी पड़ती थी। श्वैन-त्सांग (लगभग सातवीं शताब्दी ईसवी): वधिक और सफ़ाई करने वाले नगर से बाहर रहते थेनियम मानने का संकेत
स्रोत 6, ऋग्वेद का सूक्त (पृष्ठ 61)वक्ता कहता है कि वह कवि है, उसके पिता वैद्य हैं और माता अन्न पीसने का काम करती हैंअलग संभावना
अक्षत्रिय राजा (पृष्ठ 62–63)शुंग और कण्व ब्राह्मण थे; सातवाहन गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को “अनूठा ब्राह्मण” बतायाअलग संभावना
द्रोण का धनुर्विद्या सिखाना (पृष्ठ 62)ब्राह्मण द्रोण कुरु राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाते हैं, जबकि धर्मसूत्रों में युद्ध करना क्षत्रियों का कार्य बताया गया हैअलग संभावना
स्रोत 8, मंदसौर का अभिलेख (पृष्ठ 64)रेशम बुनकरों की श्रेणी के प्रसंग में संगीत, कथाओं, धार्मिक व्याख्यानों, अनुष्ठानों, (वैदिक) खगोल शास्त्र और युद्ध तक अलग-अलग काम गिनाए गए हैंअलग संभावना
ब्राह्मण–वणिक और क्षत्रिय–वणिक (पृष्ठ 64)चारुदत्त ब्राह्मण–वणिक कहा गया है; पाँचवीं शताब्दी ईसवी के अभिलेख में दो भाई क्षत्रिय–वणिक हैं, जबकि शास्त्र व्यापार को वैश्यों की जीविका बताते हैंअलग संभावना
स्रोत 9, हिडिम्बा (पृष्ठ 65)हिडिम्बा ने स्वयं भीम से विवाह का प्रस्ताव रखा; भीम दिन भर उसके साथ रहते और रात को लौट आतेअलग संभावना
स्रोत 10, मातंग जातक (पृष्ठ 67)चाण्डाल मातंग का पुत्र माण्डव्यकुमार तीन वेद पढ़ता है और रोज़ 16,000 ब्राह्मणों को भोजन कराता हैअलग संभावना

★कसौटी: दोनों खानों में स्रोत हैं, इसलिए किसी एक खाने को देखकर नतीजा मत निकालिए। यह भी देखिए कि स्रोत किसकी नज़र से लिखा गया है: मनुस्मृति ब्राह्मण लेखकों के धर्मशास्त्रों में सबसे महत्वपूर्ण थी, जबकि मातंग जातक पालि में है और चाण्डाल मातंग के नज़रिए से कही गई है (पृष्ठ 58, 66–67)।

2ब्राह्मणीय ग्रंथों, प्रारंभिक बौद्ध परंपरा और तमिल संगम साहित्य की तुलना कीजिए: सामाजिक प्रतिष्ठा और संपत्ति को हर एक ने किस तरह देखा? 3 अंक

उत्तर देखिए
परंपराप्रतिष्ठा और संपत्ति पर क्या दिखता हैकिताब का उदाहरण
ब्राह्मणीय ग्रंथ (धर्मसूत्र, धर्मशास्त्र)संपत्ति के अधिकार का एक आधार लिंग के अलावा वर्ण भी था। शूद्रों के लिए एकमात्र ‘जीविका’ सेवा थी; तीन उच्च वर्णों के पुरुषों के लिए कई जीविकाओं की संभावना थी (पृष्ठ 69)स्रोत 13 में राजा अवन्तिपुत्र, बुद्ध के अनुयायी कच्चन से, ब्राह्मणों के इस दावे पर राय पूछते हैं कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं और “ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं” (पृष्ठ 70)
प्रारंभिक बौद्ध परंपरा (लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से)विषमता को माना, पर भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”; जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया (पृष्ठ 69)स्रोत 13: धनी शूद्र दूसरे वर्णों के व्यक्ति को भी अपना सेवक बना सकता था; सुत्तपिटक का मिथक: राजा का पद लोगों द्वारा चुने जाने पर निर्भर (पृष्ठ 70, 72)
तमिल संगम साहित्य (प्राचीन तमिलकम्)धनी और निर्धन में विषमता थी, पर संसाधनों पर नियंत्रण रखने वालों से अपेक्षा थी कि वे उन्हें मिल-बाँटकर इस्तेमाल करेंगे; दानशील का सम्मान होता था, कंजूस घृणा का पात्र (पृष्ठ 70–71)स्रोत 14, पुरनानूरु: निर्धन होकर भी दान देने से मना न करने वाला सरदार; चारण उसके बारे में कहता है, “वह चारणों की क्षुधा का शत्रु है।” (पृष्ठ 71)

★कसौटी: हर परंपरा का अपना पैमाना दिखता है। ब्राह्मणीय ग्रंथों में संपत्ति के अधिकार का एक आधार वर्ण था; बौद्ध परंपरा ने जन्म के आधार पर प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया; तमिल संगम साहित्य में दानशील का सम्मान होता था और संसाधन मिल-बाँटकर इस्तेमाल करने की अपेक्षा थी (पृष्ठ 69–71)।

3अध्याय के इन स्रोतों से हम क्या जान पाते हैं, और हर एक को पढ़ते समय क्या सावधानी रखनी चाहिए? 4 अंक

उत्तर देखिए
स्रोतइनसे क्या पता चलता हैसावधानी
धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र, जैसे मनुस्मृति (पृष्ठ 58)ब्राह्मण लेखकों के बनाए नियम: विवाह के आठ प्रकार, गोत्र के दो नियम, चारों वर्णों की जीविकालेखक चाहते थे कि सब इनका पालन करें, पर वास्तविक सामाजिक संबंध कहीं अधिक जटिल थे; ब्राह्मणों का प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”
सातवाहन राजा का दावा (पृष्ठ 63)गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को “अनूठा ब्राह्मण” बताया और वर्णों के बीच विवाह रोकने का दावा कियादावे और व्यवहार में अंतर हो सकता है: उसने शक राजा रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध बनाए
बौद्ध कथा, जैसे स्रोत 13 (पृष्ठ 70)बौद्धों का वर्ण संबंधी रवैयाकिताब के अनुसार यह कहानी अक्षरश: सत्य नहीं थी
महाभारत के उद्धरण, जैसे स्रोत 2 और स्रोत 16 (पृष्ठ 57, 76–77)ग्रंथ लिखने वालों की सोच, जैसे पैतृक संपत्ति के बारे में और द्रौपदी के विवाह को उचित ठहराने के बारे मेंऐसे उद्धरण अक्षरश: सत्य न भी हों तो सोच बताते हैं; “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं”
हस्तिनापुर: स्रोत 15 और बी.बी. लाल की खुदाई (पृष्ठ 75–76)महाकाव्य का वर्णन सैकड़ों प्रासादों वाले नगर का है; लाल को साधारण घर और ईंटों के नाले मिलेनामों की समानता संयोग भी हो सकती है; और जिस सीमित क्षेत्र में खुदाई हुई, लाल का विवरण उसी का है

★कसौटी: हर स्रोत अपने रचयिता की नज़र से बोलता है, इसलिए दावा, आदर्श और कहानी को सीधे घटना मत मान लीजिए। दूसरे साक्ष्य से मिलाइए, जैसे हस्तिनापुर के वर्णन को खुदाई से (पृष्ठ 57, 63, 75–77)।

भाग घ — प्रोजेक्ट और गतिविधि

1. आज के नाम, सातवाहन नाम (किताब की चर्चा, पृष्ठ 60)

सातवाहन राजाओं के नामों में राजा की पदवी के बाद माता के नाम से बना शब्द आता है, जैसे गोतमी–पुत्त, यानी गोतमी का पुत्र (पृष्ठ 59)। सातवाहन रानियों के नाम गौतम और वसिष्ठ गोत्रों से बने थे, जो उनके पिता के गोत्र थे (पृष्ठ 59–60)। अब अपनी कक्षा या परिवार के आठ-दस नाम लिखिए। हर नाम के आगे सिर्फ़ यह लिखिए कि उसका आधार क्या है: पिता का नाम, माता का नाम या कोई और आधार। किसी से गोत्र या कुल का नाम पूछना ज़रूरी नहीं है। फिर इनकी तुलना सातवाहन नामों से कीजिए और लिखिए कि आज के नाम उनसे मिलते-जुलते हैं या भिन्न।

2. कविता या खुदाई? हस्तिनापुर (किताब का किनारे का प्रश्न, पृष्ठ 76)

स्रोत 15 में महाकाव्य का हस्तिनापुर समुद्र की भाँति भरा हुआ, सैकड़ों प्रासादों वाला और इंद्र की नगरी के समान है (पृष्ठ 76)। बी.बी. लाल ने 1951-52 में हस्तिनापुर नामक गाँव में खुदाई की। दूसरे स्तर पर उन्हें मिट्टी की दीवारें, कच्ची ईंटें और सरकंडे की दीवारों पर मिट्टी का पलस्तर मिला; तीसरे स्तर पर कच्चे और कुछ पक्के ईंटों के घर, शोषक-घट, ईंटों के नाले और वलय-कूप (पृष्ठ 75)। अब दो स्तंभों की तालिका बनाइए: एक में स्रोत 15 क्या कहता है, दूसरे में लाल को क्या मिला। फिर किताब का प्रश्न हल कीजिए: क्या इन दोनों में समानता है? और किताब के दोनों विकल्पों में से, नगर का चित्रण बाद में जोड़ा गया या कवियों की कल्पना थी, आपको कौन-सा ज़्यादा ठीक लगता है, और क्यों? एक संकेत: लाल का विवरण उसी सीमित क्षेत्र का है जिसमें खुदाई हुई थी। अपना जवाब भाग ख के प्रश्न 5 से मिलाइए।

3. एकलव्य की कहानी, आपकी ज़ुबानी (किताब का प्रश्न 12, पृष्ठ 81)

स्रोत 7 की घटनाएँ यह हैं: ब्राह्मण द्रोण ने वनवासी निषाद एकलव्य को शिष्य के रूप में स्वीकार करने से मना कर दिया; एकलव्य ने वन में मिट्टी से द्रोण की प्रतिमा बनाई और उसे गुरु मानकर अभ्यास किया, तथा तीर चलाने में सिद्धहस्त हो गया; एक दिन कुरु राजकुमारों के कुत्ते ने उसे देखकर भौंकना शुरू किया और एकलव्य ने एक साथ सात तीर चलाकर उसका मुँह बंद कर दिया; अर्जुन ने द्रोण को उनका प्रण याद दिलाया; और द्रोण ने गुरु दक्षिणा में उसके दाहिने हाथ का अँगूठा माँग लिया। (किताब में प्रश्न 11 और 12 में से “कोई एक” परियोजना करनी है।) अब कल्पना कीजिए कि आप लेखक हैं। कथा कहने वाला चुनिए: एकलव्य, द्रोण, अर्जुन, एकलव्य की माँ, या वह कुत्ता भी। किताब की घटनाएँ बदले बिना उस पात्र के मन की बात, डर और प्रश्न लिखिए। किताब लंबाई तय नहीं करती। एक सुझाव: शीर्षक के साथ लगभग एक पन्ने की कहानी, और अंत में दो-तीन पंक्तियों में यह कि आपने यह नज़रिया क्यों चुना। केस 6 का प्रश्न 1 और 2 मदद करेंगे।

4. दूसरी भाषा में महाभारत (किताब का प्रश्न 11, पृष्ठ 81)

किताब बताती है कि महाभारत के अनेक पाठान्तर सदियों में भिन्न-भिन्न भाषाओं में लिखे गए, और मुख्य कथा की कई पुनर्व्याख्याएँ हुईं। एक उदाहरण महाश्वेता देवी की बांग्ला कहानी “कुंती ओ निषादी” है, जो वहाँ से शुरू होती है जहाँ लाक्षागृह का प्रसंग खत्म होता है (पृष्ठ 78)। अब अध्याय के दो प्रसंग चुनिए, जैसे एकलव्य, हिडिम्बा, द्यूत और द्रौपदी के प्रश्न, द्रौपदी का विवाह या लाक्षागृह। अपनी भाषा या किसी और भारतीय भाषा में इन प्रसंगों का कोई पाठ, लोककथा, नाटक या कहानी ढूँढ़िए। तुलना में ये चार बातें देखिए: कथा कौन कह रहा है, किसका नज़रिया सामने है, क्या जोड़ा या छोड़ा गया, और अंत कैसा है। किताब प्रस्तुति का रूप तय नहीं करती। एक सुझाव: एक तालिका (प्रसंग, संस्कृत पाठ में, दूसरी भाषा के पाठ में, समानता, अंतर) और नीचे 200 से 300 शब्दों का सार। हर पाठ का नाम, भाषा और लेखक साफ़ लिखिए।

5. दो मानचित्र, एक इलाका (मानचित्र 1, पृष्ठ 56; किताब का प्रश्न 10)

इस अध्याय का मानचित्र 1, “कुरु पांचाल क्षेत्र और निकटवर्ती स्थान”, पृष्ठ 56 पर है। उस पर कुरु, शूरसेन, मत्स्य, अवन्ति जैसे क्षेत्रों के नाम और हस्तिनापुर, इंद्रप्रस्थ, मथुरा, विराट, उज्जयिनी जैसे नगरों के नाम छपे हैं। अब इसे अध्याय 2 के मानचित्र 1 (महाजनपद) के साथ रखकर देखिए। कुरु–पांचाल के ठीक आसपास जो महाजनपद और नगर दिखें, उनकी सूची बनाइए, और हर नाम के आगे लिखिए कि वह किस मानचित्र पर मिला। एक संकेत: कुरु–पांचाल के आसपास के नामों में कुरु, शूरसेन, मत्स्य, अवन्ति, इंद्रप्रस्थ, मथुरा और उज्जयिनी दोनों मानचित्रों पर हैं, जबकि हस्तिनापुर, विराट और अयोध्या सिर्फ़ इस अध्याय के मानचित्र पर हैं। पांचाल अध्याय 2 के मानचित्र पर अलग से छपा है; इस अध्याय के मानचित्र पर वह सिर्फ़ शीर्षक में है।

अपना उत्तर ख़ुद जाँचिए

आपके उत्तर मेंतो
स्रोत या आँकड़ा किताब से सही उठाया, उससे नतीजा निकाला और अपना कारण लिखाउत्तर पूरा है।
किताब का हवाला दिया, पर यह नहीं लिखा कि उससे क्या पता चलता हैहर हवाले के बाद एक पंक्ति जोड़िए कि उससे अध्याय की कौन-सी बात सिद्ध होती है।
लिख दिया कि महाभारत को एक ही लेखक ने एक ही समय में लिखामहाभारत कई चरणों में बना: सूत, फिर पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मण, फिर लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी और 200-400 ईसवी के जोड़ (पृष्ठ 74–75)। केस 8 का प्रश्न 1 फिर से कीजिए।
लिख दिया कि राजा हमेशा क्षत्रिय होते थेशुंग और कण्व ब्राह्मण थे, मौर्यों के उद्भव पर बहस है, और गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को “अनूठा ब्राह्मण” बताया (पृष्ठ 62–63)। केस 4 का प्रश्न 2 और भाग ख का प्रश्न 3 फिर से कीजिए।
वर्ण और जाति को एक मान लिया, या जातियाँ भी चार लिख दींवर्ण चार थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी (पृष्ठ 63)। केस 5 का प्रश्न 1 फिर से कीजिए।
लिख दिया कि सातवाहन राजाओं के मातृनाम का मतलब मातृवंशिक उत्तराधिकार हैसातवाहन राजाओं में सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक होता था (पृष्ठ 60)। केस 3 का प्रश्न 4 फिर से कीजिए।
लिख दिया कि हस्तिनापुर का वह गाँव निश्चित रूप से महाभारत वाला हस्तिनापुर हैवह कुरुओं की राजधानी हो सकती थी; नामों की समानता संयोग भी हो सकती है (पृष्ठ 75)। भाग ख का प्रश्न 5 फिर से देखिए।
! लिख दिया कि स्त्रीधन पर पति का अधिकार थास्त्रीधन, यानी विवाह के समय मिले उपहार, पर स्त्री का स्वामित्व माना जाता था; उसकी संतान उसे विरासत में पा सकती थी और पति का उस पर कोई अधिकार नहीं था (पृष्ठ 68)। केस 7 का प्रश्न 1 फिर से कीजिए।