कुल 62 प्रश्न
तारों का मतलब: ★ज़रूरी · ★★बहुत ज़रूरी; समय कम हो तो पहले ये प्रश्न और ये बातें दोहराइए।
खंड क — वस्तुनिष्ठ प्रश्न (1 अंक) — 20 प्रश्न
पृष्ठ संख्याएँ NCERT की किताब “भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I” (कक्षा 12) के 2026-27 में छपे संस्करण की हैं।
1महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण तैयार करने की परियोजना संस्कृत विद्वान वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में किस वर्ष शुरू हुई?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (अ) 1919
व्याख्या: परियोजना 1919 में शुरू हुई और इसे पूरा करने में सैंतालीस वर्ष लगे; किताब की कालरेखा 2 में संस्करण की परिकल्पना और प्रकाशन का समय 1919-66 दिया है, इसलिए 1966 शुरुआत का साल नहीं है। 1951-52 में बी.बी. लाल ने हस्तिनापुर में उत्खनन किया, और 1973 में जे.ए.बी. वैन बियुटेनेन ने समालोचनात्मक संस्करण का अंग्रेज़ी अनुवाद आरंभ किया।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 54, 75, 79
2महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण के 13,000 पृष्ठों में से आधे से भी अधिक पृष्ठ किसका ब्योरा देते हैं?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (द) क्षेत्रीय प्रभेदों का
व्याख्या: कुछ शताब्दियों के दौरान हुए महाभारत के प्रेषण में अनेक क्षेत्रीय प्रभेद उभरे; इनका संकलन मुख्य पाठ की पादटिप्पणियों और परिशिष्टों के रूप में हुआ, और 13,000 पृष्ठों में से आधे से भी अधिक इन्हीं का ब्योरा देते हैं। मुख्य पाठ के लिए वे श्लोक चुने गए जो लगभग सभी पांडुलिपियों में पाए गए थे। पांडुलिपियाँ विभिन्न लिपियों में थीं, पर संस्करण के पृष्ठ लिपियों की सूची नहीं हैं। महाभारत का फारसी अनुवाद (लगभग 1740-50) एक अलग ग्रंथ है, जिससे किताब का चित्र 3.9 लिया गया है।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 54, 74
3किताब के अनुसार पितृवंशिकता का अर्थ क्या है?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (ब) वह वंश परंपरा जो पिता के पुत्र, फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि से चलती है
व्याख्या: पितृवंशिकता में वंश पिता से पुत्र और आगे पौत्र, प्रपौत्र तक चलता है, और पुत्र पिता की मृत्यु के बाद उनके संसाधनों पर (राजाओं के संदर्भ में सिंहासन पर भी) अधिकार जमा सकते थे। माँ से जुड़ी वंश परंपरा मातृवंशिकता है, अपने गोत्र से बाहर विवाह बहिर्विवाह है, और एक स्त्री के अनेक पति होना बहुपति प्रथा है।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 55, 57
4जब वैवाहिक संबंध किसी समूह के भीतर ही होते हैं (यह समूह एक गोत्र, कुल, जाति या एक ही स्थान पर बसने वालों का हो सकता है), तो इसे क्या कहते हैं?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (स) अंतर्विवाह
व्याख्या: समूह के भीतर विवाह अंतर्विवाह है; सातवाहन रानियों के उदाहरण में बंधुओं के बीच विवाह इसी पद्धति को दर्शाता है, जिसका प्रचलन दक्षिण भारत के कई समुदायों में (भी) है। बहिर्विवाह अपने गोत्र से बाहर विवाह है, बहुपत्नी प्रथा एक पुरुष की एक से अधिक पत्नियाँ होने की प्रथा है, और कन्यादान विवाह में कन्या की भेंट है, जिसे पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 57, 60
5धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र नामक संस्कृत ग्रंथों में से मनुस्मृति का संकलन कब हुआ?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (द) लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच
व्याख्या: मनुस्मृति का संकलन लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच हुआ। लगभग 500 ई.पू. से सामाजिक मानदंडों का संकलन धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र में होने लगा; लगभग 1000 ई.पू. के बाद लोगों को गोत्रों में वर्गीकृत करने की ब्राह्मणीय पद्धति प्रचलन में आई; और लगभग 200-400 ईसवी के बीच मनुस्मृति से मिलते-जुलते बृहत उपदेशात्मक प्रकरण महाभारत में जोड़े गए।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 58, 75
6धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र विवाह के कितने प्रकारों को स्वीकृति देते हैं, और उनमें से कौन-से ‘उत्तम’ माने जाते थे?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (अ) आठ प्रकार; पहले चार ‘उत्तम’
व्याख्या: धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र विवाह के आठ प्रकारों को स्वीकृति देते हैं; इनमें से पहले चार ‘उत्तम’ माने जाते थे और बाकियों को निंदित माना गया। सात और छ: की संख्या मनुस्मृति में धन अर्जित करने के तरीकों की है: पुरुषों के लिए सात, स्त्रियों के लिए छ:।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 58, 69
7लगभग 1000 ई.पू. के बाद प्रचलन में आई गोत्र पद्धति के नियमों के अनुसार विवाह के बाद स्त्री किसके गोत्र की मानी जाती थी?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (ब) पति के गोत्र की
व्याख्या: गोत्रों के दो नियम महत्वपूर्ण थे: विवाह के बाद स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति के गोत्र का माना जाता था, और एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नहीं रख सकते थे। पिता का गोत्र बनाए रखना नियम नहीं था; सातवाहन रानियों का उदाहरण इस नियम से हटकर था। (स) और (द) इन दोनों नियमों से मेल नहीं खाते।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 58, 60
8सातवाहन राजाओं (लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ईसवी तक पश्चिमी भारत और दक्कन के कुछ भागों के शासक) से विवाह करने वाली रानियों के नामों के विश्लेषण से क्या पता चलता है?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (स) उन्होंने विवाह के बाद भी पिता का गोत्र नाम ही कायम रखा
व्याख्या: रानियों के नाम गौतम तथा वसिष्ठ गोत्रों से उद्भूत थे, जो उनके पिता के गोत्र थे; यानी उन्होंने ब्राह्मणीय व्यवस्था की अपेक्षा के अनुसार पति के कुल का गोत्र ग्रहण नहीं किया। कुछ रानियाँ एक ही गोत्र से भी थीं, इसलिए (ब) ग़लत है; यह बात बहिर्विवाह पद्धति के नियमों के विरुद्ध थी। (द) उलटा है: राजाओं को उनके मातृनाम (माता के नाम से उद्भूत) से चिह्नित किया जाता था।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 58, 60
9धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों के अनुसार कृषि, पशुपालन और व्यापार किस वर्ण की जीविका थी?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (स) वैश्य
व्याख्या: वैश्य कृषि, पशुपालन और व्यापार में संलग्न रहते थे, और साथ ही वेदों और अन्य शास्त्रों का अध्ययन करते थे, यज्ञ करते और कराते थे तथा दान देते थे। ब्राह्मणों का मुख्य कर्तव्य वेदों तथा अन्य शास्त्रों का अध्ययन और अध्यापन, यज्ञ करना और कराना तथा दान देना और ग्रहण करना था; क्षत्रियों का प्रमुख कार्य युद्ध करना, लोगों की रक्षा करना और न्याय संचालन था; और शूद्रों से अपेक्षा थी कि वे समाज के सुचारु संचालन में अन्य तीन वर्णों की सहायता करें।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 61
10मौर्यों के उत्तराधिकारी शुंग और कण्व किस वर्ण के थे?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (द) ब्राह्मण
व्याख्या: शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे, फिर भी शुंग और कण्व, जो मौर्यों के उत्तराधिकारी थे, ब्राह्मण थे। (अ) इसी शास्त्रीय नियम के कारण सही लगता है। मौर्यों के बारे में भी मत अलग हैं: बाद के बौद्ध ग्रंथ उन्हें क्षत्रिय बताते हैं, जबकि ब्राह्मणीय शास्त्र उन्हें ‘निम्न’ कुल का मानते हैं। किताब का निष्कर्ष है कि राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर शायद ही निर्भर करता था।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 62
11सुदर्शन सरोवर के जीर्णोद्धार का वर्णन संस्कृत के संभवत: आरंभिक अभिलेखों में से एक में मिलता है। यह जीर्णोद्धार किस शक राजा ने करवाया?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (अ) रुद्रदामन
व्याख्या: प्रसिद्ध शक राजा रुद्रदामन (लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी) के इस अभिलेख से पता चलता है कि शक्तिशाली मलेच्छ संस्कृतीय परिपाटी से अवगत थे; मध्य एशिया से भारत आए शकों को ब्राह्मण मलेच्छ, बर्बर अथवा अन्यदेशीय मानते थे। गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि सातवाहन कुल का शासक था, जिसने रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध स्थापित किए; अवन्तिपुत्र मज्झिमनिकाय की कहानी (स्रोत 13) के राजा हैं; द्रुपद महाभारत में पांचाल नरेश हैं।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 62, 63, 70, 76
12मंदसौर (मध्य प्रदेश) से मिले अभिलेख (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी) में किस श्रेणी का वर्णन है, जो लाट (गुजरात) से दशपुर आकर बसी थी?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (ब) रेशम के बुनकरों की
व्याख्या: अभिलेख में रेशम के बुनकरों की एक श्रेणी का वर्णन है, जो मूलतः लाट (गुजरात) प्रदेश के निवासी थे और मंदसौर चले गए, जिसे उस समय दशपुर कहा जाता था; उन्होंने वहाँ के राजा की महानता के बारे में सुना था। सामूहिक रूप से उन्होंने शिल्पकर्म से अर्जित धन सूर्य देवता के सम्मान में मंदिर बनवाने पर खर्च किया। वणिक व्यापारियों के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द है, और भाट सारथी (‘सूत’) संभवत: महाभारत की मूल कथा के रचयिता थे।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 63, 64, 74
13शूद्रक के नाटक मृच्छकटिकम् (लगभग चौथी शताब्दी ईसवी) में नायक चारुदत्त को क्या बताया गया है?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (स) ब्राह्मण–वणिक
व्याख्या: शास्त्र व्यापार को वैश्यों की जीविका बताते हैं, पर मृच्छकटिकम् में नायक चारुदत्त को ब्राह्मण–वणिक बताया गया है। क्षत्रिय–वणिक पाँचवीं शताब्दी ईसवी के एक अभिलेख में उन दो भाइयों को कहा गया है जिन्होंने एक मंदिर के निर्माण के लिए धन दिया; अनूठा ब्राह्मण सातवाहन शासक गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को बताया था; और निषाद वर्ग वन प्रांतर में बसने वाले लोगों का उदाहरण है, जिससे एकलव्य जुड़ा माना जाता था।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 63, 64
14शवों की अंत्येष्टि करने वालों और मृत पशुओं को छूने वालों को क्या कहा जाता था?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (अ) चाण्डाल
व्याख्या: ये कार्य खासतौर से ‘दूषित’ माने जाते थे, और इन्हें करने वाले चाण्डालों को वर्ण व्यवस्था वाले समाज में सबसे निम्न कोटि में रखा जाता था। निषाद वन प्रांतर में बसने वाले लोगों का उदाहरण है, जिनके लिए शिकार और कंद-मूल संग्रह जीवन-निर्वाह का महत्वपूर्ण साधन था; असंस्कृत भाषाएँ बोलने वाले लोगों को कभी-कभी मलेच्छ कहकर हेय दृष्टि से देखा जाता था; और सूत भाट सारथी थे।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 64, 65, 66, 74
15चीन से आए किस बौद्ध भिक्षु (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी) का कहना है कि अस्पृश्यों को सड़क पर चलते हुए करताल बजाकर अपने होने की सूचना देनी पड़ती थी?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (द) फा-शिएन
व्याख्या: यह बात फा-शिएन (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी) ने कही, ताकि अन्य जन उन्हें देखने के दोष से बच जाएँ। श्वैन-त्सांग (लगभग सातवीं शताब्दी ईसवी) एक और चीनी तीर्थयात्री था, जिसने कहा कि वधिक और सफ़ाई करने वालों को नगर से बाहर रहना पड़ता था। कच्चन मज्झिमनिकाय की कहानी में बुद्ध के अनुयायी हैं, और मातंग मातंग जातक में चाण्डाल के पुत्र के रूप में जन्मे बोधिसत्त हैं।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 66, 67, 70
16विवाह के समय मिले उपहारों पर स्त्रियों का स्वामित्व माना जाता था। इस संपत्ति को क्या कहा जाता था?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (ब) स्त्रीधन
व्याख्या: इसे स्त्रीधन (अर्थात् स्त्री का धन) कहा जाता था; इसे उनकी संतान विरासत में पा सकती थी, और इस पर उनके पति का कोई अधिकार नहीं होता था। कन्यादान विवाह में कन्या की भेंट है; एकलव्य की कहानी में द्रोण ने गुरु दक्षिणा के रूप में उसके दाहिने हाथ का अँगूठा माँगा; और पैतृक संपत्ति माता-पिता की मृत्यु के बाद संतानों में बँटती थी, जिसमें ज्येष्ठ पुत्र विशेष भाग का अधिकारी था।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 57, 62, 68
17सुत्तपिटक के मिथक के अनुसार सब लोगों द्वारा चुने गए मनुष्य को कौन-सी उपाधि मिलनी थी?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (अ) महासम्मत्त
व्याख्या: मिथक में लोग तय करते हैं कि वे एक ऐसे मनुष्य का चयन करें जो उचित बात पर क्रोधित हो और जिसे प्रताड़ित या निष्कासित किया जाना चाहिए उसे प्रताड़ित या निष्कासित करे; बदले में वे उसे चावल का अंश देंगे: “सब लोगों द्वारा चुने जाने के कारण उसे महासम्मत्त की उपाधि प्राप्त होगी।” बोधिसत्त का अर्थ है पूर्वजन्म में बुद्ध (मातंग जातक), सूत भाट सारथी थे, और अनूठा ब्राह्मण गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को बताया था।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 63, 67, 72, 74
18आरंभिक संस्कृत परंपरा में महाभारत को किस श्रेणी में रखा गया है, जिसका अर्थ है ‘ऐसा ही था’?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (स) इतिहास
व्याख्या: महाभारत को ‘इतिहास’ की श्रेणी में रखा गया है, जिसका अर्थ है ‘ऐसा ही था।’ फिर भी किताब कहती है कि महाभारत में सचमुच हुए किसी युद्ध का स्मरण किया जा रहा था या नहीं, इस बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। ‘मंत्र’ ऐसे ग्रंथ थे जो अनुष्ठानकर्ताओं द्वारा पढ़े और उच्चरित किए जाते थे; उपदेशात्मक महाभारत की विषयवस्तु का एक भाग है; और मातंग जातक पालि में लिखी एक कहानी है।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 67, 72, 73, 74
191951-52 में पुरातत्ववेत्ता बी.बी. लाल ने मेरठ ज़िले (उ.प्र.) के किस गाँव में उत्खनन किया, जिसका नाम महाभारत के एक नगर से मिलता है?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (द) हस्तिनापुर
व्याख्या: बी.बी. लाल ने हस्तिनापुर नामक गाँव में उत्खनन किया। यह पुरास्थल गंगा के ऊपरी दोआब वाले क्षेत्र में है, जहाँ कुरु राज्य भी स्थित था, इसलिए यह कुरुओं की राजधानी हस्तिनापुर हो सकती थी; पर नामों की समानता मात्र एक संयोग भी हो सकता है। अहिच्छत्र (उत्तर प्रदेश) के एक मंदिर की दीवार पर महाभारत के एक युद्ध के दृश्य वाली मिट्टी की मूर्ति (चित्र 3.4) उत्कीर्ण है; इंद्रप्रस्थ और मथुरा पृष्ठ 56 के मानचित्र में दिखाए गए नगर हैं।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 56, 60, 75
20समसामयिक बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी की लघु कथा “कुंती ओ निषादी” महाभारत के किस प्रसंग के अंत से शुरू होती है?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (ब) लाक्षागृह का प्रसंग
व्याख्या: संस्कृत पाठ में दुर्योधन पांडवों को छल से लाक्षागृह में जलाकर मार देना चाहता है; पांडव सुरंग खोदकर भाग निकलते हैं, और कुंती के भोज में आई एक निषादी और उसके पाँच पुत्र पांडवों द्वारा लगाई गई आग में उसी लाक्षागृह में भस्म हो जाते हैं। महाश्वेता देवी ने कथानक का प्रारंभ वहाँ से किया जहाँ यह प्रसंग खत्म होता है: युद्ध के बाद वनप्रांतर में रह रही कुंती को एक निषादी, जिसकी सास उस आग में मरी थी, याद दिलाती है कि उन्हें उन छ: निर्दोष लोगों की याद एक बार भी नहीं आई। द्रौपदी का स्वयंवर (स्रोत 16), द्यूत क्रीड़ा और एकलव्य की कहानी (स्रोत 7) इस अध्याय के अलग प्रसंग हैं।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 77, 78
खंड ख — रिक्त स्थान (1 अंक) — 10 प्रश्न
1संस्कृत ग्रंथों में परिवार के लिए ______ शब्द का प्रयोग होता है; पीढ़ी-दर-पीढ़ी किसी भी कुल के पूर्वज इकट्ठे रूप में एक ही वंश के माने जाते हैं। (पृष्ठ 55)
उत्तर देखिए
संस्कृत ग्रंथों में परिवार के लिए कुल शब्द का प्रयोग होता है; पीढ़ी-दर-पीढ़ी किसी भी कुल के पूर्वज इकट्ठे रूप में एक ही वंश के माने जाते हैं। (पृष्ठ 55)
2महाभारत में भूमि और सत्ता के लिए लड़ने वाले बांधवों के दोनों दल, कौरव और पांडव, ______ वंश से संबंधित थे। (पृष्ठ 55)
उत्तर देखिए
महाभारत में भूमि और सत्ता के लिए लड़ने वाले बांधवों के दोनों दल, कौरव और पांडव, कुरु वंश से संबंधित थे। (पृष्ठ 55)
3बहिर्विवाह पद्धति का एक प्रभाव यह हुआ कि ______, अर्थात् विवाह में कन्या की भेंट, को पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया। (पृष्ठ 57)
उत्तर देखिए
बहिर्विवाह पद्धति का एक प्रभाव यह हुआ कि कन्यादान, अर्थात् विवाह में कन्या की भेंट, को पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया। (पृष्ठ 57)
4लगभग 1000 ई.पू. के बाद प्रचलन में आई ब्राह्मणीय गोत्र पद्धति में प्रत्येक गोत्र एक ______ के नाम पर होता था। (पृष्ठ 58)
उत्तर देखिए
लगभग 1000 ई.पू. के बाद प्रचलन में आई ब्राह्मणीय गोत्र पद्धति में प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था। (पृष्ठ 58)
5सातवाहन राजाओं को उनके ______ (माता के नाम से उद्भूत) से चिह्नित किया जाता था, फिर भी उनके सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक होता था। (पृष्ठ 60)
उत्तर देखिए
सातवाहन राजाओं को उनके मातृनाम (माता के नाम से उद्भूत) से चिह्नित किया जाता था, फिर भी उनके सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक होता था। (पृष्ठ 60)
6शास्त्रों के अनुसार वर्ण मात्र चार थे, पर ______ की कोई निश्चित संख्या नहीं थी। (पृष्ठ 63)
उत्तर देखिए
शास्त्रों के अनुसार वर्ण मात्र चार थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी। (पृष्ठ 63)
7असंस्कृत भाषाएँ बोलने वाले लोगों को कभी-कभी ______ कहकर हेय दृष्टि से देखा जाता था। (पृष्ठ 64, 65)
उत्तर देखिए
असंस्कृत भाषाएँ बोलने वाले लोगों को कभी-कभी मलेच्छ कहकर हेय दृष्टि से देखा जाता था। (पृष्ठ 64, 65)
8मातंग जातक, जिसमें बोधिसत्त (पूर्वजन्म में बुद्ध) एक चाण्डाल के रूप में चित्रित हैं, ______ में लिखी कहानी है। (पृष्ठ 67)
उत्तर देखिए
मातंग जातक, जिसमें बोधिसत्त (पूर्वजन्म में बुद्ध) एक चाण्डाल के रूप में चित्रित हैं, पालि में लिखी कहानी है। (पृष्ठ 67)
9इतिहासकार महाभारत की विषयवस्तु को दो मुख्य शीर्षकों, आख्यान और ______, के अंतर्गत रखते हैं; दूसरे भाग में सामाजिक आचार-विचार के मानदंडों का चित्रण है। (पृष्ठ 73)
उत्तर देखिए
इतिहासकार महाभारत की विषयवस्तु को दो मुख्य शीर्षकों, आख्यान और उपदेशात्मक, के अंतर्गत रखते हैं; दूसरे भाग में सामाजिक आचार-विचार के मानदंडों का चित्रण है। (पृष्ठ 73)
10महाभारत की मूल कथा के रचयिता संभवत: भाट सारथी थे, जिन्हें ______ कहा जाता था। (पृष्ठ 74)
उत्तर देखिए
महाभारत की मूल कथा के रचयिता संभवत: भाट सारथी थे, जिन्हें सूत कहा जाता था। (पृष्ठ 74)
खंड ग — सही/ग़लत (1 अंक) — 8 प्रश्न
1महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण के लिए उन श्लोकों का चयन किया गया जो लगभग सभी पांडुलिपियों में पाए गए थे।
उत्तर देखिए
सही (पृष्ठ 54)
2धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र लिखने वाले ब्राह्मणों का प्रभाव पूरे उपमहाद्वीप में सार्वभौमिक था।
उत्तर देखिए
ग़लत
(लेखक अपने दृष्टिकोण को सार्वभौमिक मानते थे, पर क्षेत्रीय विभिन्नता और संचार की बाधाओं की वजह से ब्राह्मणों का प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”; पृष्ठ 58)
3व्यवहार में सभी महत्वपूर्ण राजवंश क्षत्रिय वर्ण के ही थे।
उत्तर देखिए
ग़लत
(शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे, पर मौर्यों के उत्तराधिकारी शुंग और कण्व ब्राह्मण थे; राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर “शायद ही निर्भर करता था”; पृष्ठ 62)
4सातवाहन शासक गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को अनूठा ब्राह्मण बताया और चार वर्णों के बीच विवाह संबंध पर रोक लगाने का दावा किया, फिर भी रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध स्थापित किए।
उत्तर देखिए
सही (पृष्ठ 63)
5स्त्रीधन, यानी विवाह के समय स्त्री को मिले उपहारों पर, उसके पति का पूरा अधिकार होता था।
उत्तर देखिए
ग़लत
(स्त्रीधन को स्त्री की संतान विरासत में पा सकती थी और इस पर उसके पति का कोई अधिकार नहीं होता था; पृष्ठ 68)
6प्रारंभिक बौद्ध धर्म ने माना कि समाज में विषमता मौजूद थी, पर यह भेद न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी।
उत्तर देखिए
सही (पृष्ठ 69)
7प्राचीन तमिलकम् में धनी और निर्धन के बीच विषमताएँ थीं, फिर भी जिन लोगों का संसाधनों पर नियंत्रण था उनसे अपेक्षा की जाती थी कि वे मिल-बाँट कर उनका उपयोग करें।
उत्तर देखिए
सही (पृष्ठ 70, 71)
8हस्तिनापुर में बी.बी. लाल को मिले तीसरे स्तर (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू.) के घरों की दीवारें सरकंडों की थीं, जिन पर मिट्टी का पलस्तर चढ़ाया जाता था।
उत्तर देखिए
ग़लत
(सरकंडे की छाप वाला मिट्टी का पलस्तर दूसरे स्तर (लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ई.पू.) में मिला; तीसरे काल के घर कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के बने हुए थे; पृष्ठ 75)
खंड घ — अति लघूत्तरीय प्रश्न (2 अंक) — 8 प्रश्न
1★★महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण तैयार करने की प्रक्रिया में कौन-सी दो बातें विशेष रूप से उभर कर आईं?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1919 में वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में शुरू हुई इस परियोजना में, जिसे पूरा करने में सैंतालीस वर्ष लगे, दो बातें उभरीं:
- समानता: संस्कृत के कई पाठों के अनेक अंशों में समानता थी; उत्तर में कश्मीर और नेपाल से लेकर दक्षिण में केरल और तमिलनाडु तक सभी पांडुलिपियों में यह समानता दिखी।
- क्षेत्रीय प्रभेद: कुछ शताब्दियों के दौरान हुए महाभारत के प्रेषण में अनेक क्षेत्रीय प्रभेद भी उभरे; इन्हें मुख्य पाठ की पादटिप्पणियों और परिशिष्टों में संकलित किया गया, और 13,000 पृष्ठों में से आधे से भी अधिक इन्हीं का ब्योरा देते हैं।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 54
2पितृवंशिकता और मातृवंशिकता में क्या अंतर है? महाभारत ने पितृवंशिकता के आदर्श को कैसे सुदृढ़ किया?
उत्तर देखिए
उत्तर: दोनों शब्द वंश परंपरा के दो रूप बताते हैं, और महाभारत की मुख्य कथा पहले रूप को आगे बढ़ाती है।
- पितृवंशिकता: वंश परंपरा पिता के पुत्र, फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि से चलती है।
- मातृवंशिकता: वंश परंपरा माँ से जुड़ी होती है।
- महाभारत: कुरु वंश के बांधवों के दो दलों, कौरव और पांडव, के बीच भूमि और सत्ता के संघर्ष में पांडव विजयी हुए, और इसके उपरांत पितृवंशिक उत्तराधिकार को उद्घोषित किया गया। पितृवंशिकता महाकाव्य की रचना से पहले भी मौजूद थी, पर महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इस आदर्श को और सुदृढ़ किया।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 55
3★ब्राह्मणीय गोत्र पद्धति के दो महत्वपूर्ण नियम कौन-से थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: लगभग 1000 ई.पू. के बाद प्रचलन में आई इस पद्धति में प्रत्येक गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था, और उस गोत्र के सदस्य ऋषि के वंशज माने जाते थे। इसके दो नियम महत्वपूर्ण थे:
- विवाह के पश्चात स्त्रियों को पिता के स्थान पर पति के गोत्र का माना जाता था।
- एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह संबंध नहीं रख सकते थे।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 58
4धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों के अनुसार ब्राह्मणों और क्षत्रियों की ‘जीविका’ क्या थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र चारों वर्णों के लिए ‘जीविका’ से जुड़े कई नियम देते हैं; पहले दो वर्णों के लिए ये नियम थे:
- ब्राह्मण: वेदों तथा अन्य शास्त्रों का अध्ययन और अध्यापन, यज्ञ करना और कराना, तथा दान देना और ग्रहण करना।
- क्षत्रिय: युद्ध करना, लोगों की रक्षा करना और न्याय संचालन; साथ ही वेदों और शास्त्रों का अध्ययन, यज्ञ कराना, दान देना और सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखना।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 61
5★मंदसौर के अभिलेख से श्रेणियों के स्वरूप के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: मंदसौर (मध्य प्रदेश) से मिला अभिलेख (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी) रेशम के बुनकरों की एक श्रेणी का वर्णन करता है, जो लाट (गुजरात) से मंदसौर (उस समय दशपुर) जाकर बसी थी। इससे पता चलता है कि:
- श्रेणी की सदस्यता शिल्प में विशेषज्ञता पर निर्भर थी, पर कुछ सदस्य अन्य जीविका भी अपना लेते थे।
- सदस्य एक व्यवसाय के अतिरिक्त और चीज़ों में भी सहभागी होते थे: सामूहिक रूप से उन्होंने शिल्पकर्म से अर्जित धन सूर्य देवता के सम्मान में मंदिर बनवाने पर खर्च किया।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 63, 64
6मनुस्मृति में चाण्डालों के कौन-से ‘कर्तव्य’ बताए गए हैं? कोई चार लिखिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: मनुस्मृति में चाण्डालों के ‘कर्तव्यों’ की सूची मिलती है:
- उन्हें गाँव के बाहर रहना होता था।
- वे फेंके हुए बर्तनों का इस्तेमाल करते थे, और मरे हुए लोगों के वस्त्र तथा लोहे के आभूषण पहनते थे।
- रात्रि में वे गाँव और नगरों में चल-फिर नहीं सकते थे।
- संबंधियों से विहीन मृतकों की अंत्येष्टि उन्हें करनी पड़ती थी, और वधिक के रूप में भी कार्य करना होता था।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 66
7★महाभारत की भाषा और विषयवस्तु के बारे में इतिहासकार क्या कहते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: इतिहासकार महाभारत की भाषा और उसकी विषयवस्तु, दोनों को अलग-अलग देखते हैं:
- भाषा: जिस पाठ का इस्तेमाल किया जाता है वह संस्कृत में है (अन्य भाषाओं में भी इसके संस्करण मिलते हैं), पर यह संस्कृत वेदों अथवा प्रशस्तियों की संस्कृत से कहीं अधिक सरल है; इसलिए संभव है कि इसे व्यापक स्तर पर समझा जाता था।
- विषयवस्तु: इसे दो मुख्य शीर्षकों में रखा जाता है: आख्यान (कहानियों का संग्रह) और उपदेशात्मक (सामाजिक आचार-विचार के मानदंडों का चित्रण)। यह विभाजन पूरी तरह अलग नहीं है, और अधिकतर इतिहासकार मानते हैं कि उपदेशात्मक अंश बाद में जोड़े गए।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 73
8बी.बी. लाल ने जिस हस्तिनापुर गाँव में उत्खनन किया, उसे महाभारत में वर्णित हस्तिनापुर क्यों माना जा सकता है, और फिर भी सावधानी क्यों ज़रूरी है?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1951-52 में पुरातत्ववेत्ता बी.बी. लाल ने मेरठ ज़िले (उ.प्र.) के हस्तिनापुर नामक गाँव में उत्खनन किया।
- पक्ष में: यह पुरास्थल गंगा के ऊपरी दोआब वाले क्षेत्र में है, जहाँ कुरु राज्य भी स्थित था; इसलिए यह कुरुओं की राजधानी हस्तिनापुर हो सकती थी, जिसका उल्लेख महाभारत में आता है।
- सावधानी: नामों की समानता मात्र एक संयोग भी हो सकती है।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 75
खंड ङ — लघूत्तरीय प्रश्न (3 अंक) — 6 प्रश्न
1★★सातवाहन राजाओं के मातृनामों से क्या यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि माताएँ महत्वपूर्ण थीं? किताब के आधार पर समझाइए।
उत्तर देखिए
उत्तर: मातृनामों से माताओं का महत्व प्रतीत होता है, पर किताब कहती है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले बहुत सावधानी बरतनी होगी।
- मातृनाम: सातवाहन राजाओं को उनके मातृनाम (माता के नाम से उद्भूत) से चिह्नित किया जाता था; इससे लगता है कि माताएँ महत्वपूर्ण थीं।
- उत्तराधिकार: फिर भी सातवाहन राजाओं के सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक होता था।
- गांधारी की सलाह (स्रोत 5): महाभारत में, जब कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध अवश्यंभावी हो गया, गांधारी ने अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन से युद्ध न करने की विनती की; पर दुर्योधन ने माँ की सलाह नहीं मानी, वह युद्ध में लड़ा और हार गया।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 60
2★वर्ण और जाति में क्या अंतर था? सातवाहनों के उदाहरण से समझाइए कि जाति प्रथा के भीतर आत्मसात होना एक जटिल सामाजिक प्रक्रिया क्यों थी।
उत्तर देखिए
उत्तर: शास्त्र समाज के वर्गीकरण के लिए वर्ण के साथ जाति शब्द का भी प्रयोग करते हैं, और दोनों में बड़ा अंतर था।
- संख्या: वर्ण मात्र चार थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी; नए सामाजिक समूहों और नए व्यवसायों से संपर्क के साथ जातियों की संख्या निरंतर बढ़ती रही।
- श्रेणी: एक ही जीविका अथवा व्यवसाय से जुड़ी जातियों को कभी-कभी श्रेणियों में भी संगठित किया जाता था।
- सातवाहन: वे स्वयं को ब्राह्मण वर्ण का बताते थे, जबकि ब्राह्मणीय शास्त्र के अनुसार राजा को क्षत्रिय होना चाहिए। वे चतुर्वर्णी व्यवस्था की मर्यादा बनाए रखने का दावा करते थे, पर उन लोगों से वैवाहिक संबंध भी स्थापित करते थे जो इस वर्ण व्यवस्था से बाहर थे, और अंतर्विवाह पद्धति का पालन करते थे, न कि ब्राह्मणीय ग्रंथों में प्रस्तावित बहिर्विवाह प्रणाली का।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 63
3प्राचीन तमिलकम् में सरदारों और चारणों के संबंध से दानशीलता के आदर्श के बारे में क्या पता चलता है? स्रोत 14 (एक चारण द्वारा अपने आश्रयदाता का चित्रण) का उदाहरण भी दीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: प्राचीन तमिलकम् में दानशील आदमी का सम्मान किया जाता था, और कृपण व्यक्ति, या जो केवल अपने लिए संपत्ति संग्रह करता था, घृणा का पात्र होता था।
- सरदार और चारण: इस क्षेत्र में 2000 वर्ष पहले अनेक सरदारियाँ थीं; ये सरदार अपनी प्रशंसा गाने वाले चारणों और कवियों के आश्रयदाता होते थे।
- मिल-बाँट: तमिल भाषा के संगम साहित्यिक संग्रह से पता चलता है कि धनी और निर्धन के बीच विषमताएँ थीं, पर संसाधनों पर नियंत्रण रखने वालों से अपेक्षा थी कि वे मिल-बाँट कर उनका उपयोग करें।
- स्रोत 14: पुरनानूरु (किताब में ‘पुरुनारुरू’ छपा है; तमिल संगम साहित्य की एक पद्यावली, लगभग प्रथम शताब्दी ईसवी) की इस रचना में एक चारण बताता है कि इरंतई में रहने वाले उसके आश्रयदाता के पास हर रोज़ दूसरों पर खर्च करने के लिए धन नहीं है, फिर भी वह दान देने से मना नहीं करता; चारणों की भूख देखकर वह गाँव के लोहार से युद्ध के लिए एक लंबा भाला तैयार करने को कहेगा।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 70, 71
4★सुत्तपिटक के मिथक से राजा के पद और ‘कर’ के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: सुत्तपिटक का मिथक बताता है कि प्रारंभ में सभी जीव शांति के एक निर्बाध लोक में रहते थे, पर यह व्यवस्था क्रमश: पतनशील हुई और मनुष्य अधिकाधिक लालची, प्रतिहिंसक और कपटी हो गए।
- राजा का पद: लोगों ने एक ऐसे मनुष्य को चुनने का विचार किया जो उचित बात पर क्रोधित हो और दोषी को दंड दे; सब लोगों द्वारा चुने जाने के कारण उसे महासम्मत्त की उपाधि मिलनी थी। इससे पता चलता है कि राजा का पद लोगों द्वारा चुने जाने पर निर्भर करता था।
- ‘कर’: ‘कर’ वह मूल्य था जो लोग राजा की इस सेवा के बदले उसे देते थे।
- मानवीय कर्म: आर्थिक और सामाजिक संबंधों को बनाने में मानवीय कर्म का बड़ा हाथ था; यदि मनुष्य स्वयं एक प्रणाली को बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार थे, तो भविष्य में उसमें परिवर्तन भी ला सकते थे।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 72
5इतिहासकार किसी ग्रंथ का विश्लेषण करते समय किन पहलुओं की जाँच करते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: किसी ग्रंथ की विषयवस्तु को इतिहास के पुनर्निर्माण में इस्तेमाल करने से पहले इतिहासकार ये पहलू देखते हैं:
- भाषा: पालि, प्राकृत अथवा तमिल, जो आम लोगों द्वारा बोली जाती थी, या संस्कृत, जो विशिष्ट रूप से पुरोहितों और खास वर्ग द्वारा प्रयोग में लाई जाती थी।
- प्रकार: अनुष्ठानकर्ताओं द्वारा पढ़े और उच्चरित किए जाने वाले ‘मंत्र’, या ‘कथा’ ग्रंथ, जिन्हें लोग पढ़ और सुन सकते थे।
- लेखक और श्रोता: लेखकों के दृष्टिकोण और विचार, और श्रोताओं की अभिरुचि, जिस पर लेखकों ने रचना करते समय ध्यान दिया होगा।
- काल और रचनाभूमि: ग्रंथ का संभावित संकलन/रचना काल और उसकी रचनाभूमि।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 72, 73
6★महाभारत को एक गतिशील ग्रंथ क्यों कहा जाता है? महाश्वेता देवी के उदाहरण से समझाइए।
उत्तर देखिए
उत्तर: महाभारत का विकास संस्कृत के पाठ के साथ ही समाप्त नहीं हुआ; शताब्दियों तक यह नए रूप लेता रहा।
- पाठान्तर: इसके अनेक पाठान्तर भिन्न-भिन्न भाषाओं में लिखे गए, और किसी क्षेत्र विशेष में उभरी अनेक कहानियाँ इसमें समाहित कर ली गईं।
- कला: इसके प्रसंग मूर्तिकला और चित्रों में दर्शाए गए, और इसने नाटकों और नृत्य कलाओं के लिए भी विषय-वस्तु दी।
- पुनर्व्याख्या: समसामयिक बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी ने “कुंती ओ निषादी” में लाक्षागृह के प्रसंग के अंत से कथा शुरू की और उन प्रश्नों की ओर ध्यान खींचा जिन पर संस्कृत पाठ पूर्णतया मूक है: एक निषादी कुंती को याद दिलाती है कि उन्हें उन छ: निर्दोष लोगों की याद एक बार भी नहीं आई।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 77, 78
खंड च — दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक) — 6 प्रश्न
1★★स्पष्ट कीजिए कि विशिष्ट परिवारों में पितृवंशिकता क्यों महत्वपूर्ण रही होगी।
उत्तर देखिए
उत्तर: शासक और धनी परिवारों में पितृवंशिकता से तय होता था कि संसाधन और सत्ता आगे किसके हाथ जाएँगे, इसलिए उनके लिए यह महत्वपूर्ण रही होगी।
- विरासत: पिता की मृत्यु के बाद पुत्र उनके संसाधनों पर, और राजाओं के मामले में सिंहासन पर भी, अधिकार जमा सकते थे।
- राजवंश: अधिकतर राजवंश (लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से) पितृवंशिकता प्रणाली का अनुसरण करते थे।
- पुत्र की कामना: ऋग्वेद के विवाह मंत्र (स्रोत 1) में कामना है कि इंद्र के अनुग्रह से वधू के “उत्तम पुत्र हों”।
- गद्दी का झगड़ा: महाभारत के आदिपर्वन् (स्रोत 2) में दुर्योधन को डर है कि पांडवों को विरासत मिली तो “उनके बाद उनके पुत्र, पौत्र और फिर प्रपौत्र इस पैतृक संपत्ति के अधिकारी हो जाएँगे”।
- बेटियों पर नियंत्रण: पितृवंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्र महत्वपूर्ण थे; ऊँची प्रतिष्ठा वाले परिवारों की कन्याओं का विवाह गोत्र से बाहर, ‘उचित’ समय और ‘उचित’ व्यक्ति से किया जाता था, और कन्यादान पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया।
निष्कर्ष नियम में लचीलापन भी था: पुत्र न होने पर कभी भाई और कभी बंधु-बांधव गद्दी पर बैठे, और कुछ विशेष परिस्थितियों में प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियों ने सत्ता का उपभोग किया।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 55, 56, 57
2★★क्या आरंभिक राज्यों में शासक निश्चित रूप से क्षत्रिय ही होते थे? चर्चा कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: नहीं। शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे, पर अनेक महत्वपूर्ण राजवंशों की उत्पत्ति अन्य वर्णों से भी हुई थी।
- मौर्य: इनके उद्भव पर बहस होती रही है; बाद के बौद्ध ग्रंथ इन्हें क्षत्रिय बताते हैं, जबकि ब्राह्मणीय शास्त्र इन्हें ‘निम्न’ कुल का मानते हैं।
- शुंग और कण्व: मौर्यों के उत्तराधिकारी ये दोनों वंश ब्राह्मण थे।
- शक: मध्य एशिया से आए शकों को ब्राह्मण मलेच्छ, बर्बर अथवा अन्यदेशीय मानते थे; फिर भी शक राजा रुद्रदामन (लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी) द्वारा सुदर्शन सरोवर के जीर्णोद्धार का वर्णन संस्कृत के संभवत: आरंभिक अभिलेखों में से एक में मिलता है।
- सातवाहन: गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को अनूठा ब्राह्मण और क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया, पर रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध स्थापित किए।
- सत्ता का आधार: राजनीतिक सत्ता का उपभोग हर वह व्यक्ति कर सकता था जो समर्थन और संसाधन जुटा सके।
निष्कर्ष किताब के शब्दों में, “राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर शायद ही निर्भर करता था।”
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 62, 63
3★द्रोण, हिडिम्बा और मातंग की कथाओं में धर्म के मानदंडों की तुलना कीजिए और उनके अंतर को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: तीनों कथाएँ वर्ण और जन्म के मानदंडों से जुड़ी हैं, पर तीनों में उनका निभाव अलग है।
- द्रोण और एकलव्य (स्रोत 7, आदिपर्वन्): कुरु राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाने वाले ब्राह्मण द्रोण ने वनवासी निषाद एकलव्य को शिष्य बनाने से मना कर दिया। एकलव्य ने अभ्यास से महारत पाई, तो द्रोण ने गुरु दक्षिणा में उसके दाहिने हाथ का अँगूठा माँग लिया; यहाँ मानदंड पूरी सख्ती से लागू हुआ।
- हिडिम्बा (स्रोत 9, आदिपर्वन्): राक्षस स्त्री हिडिम्बा भीम पर मोहित होकर उनसे विवाह करना चाहती थी; युधिष्ठिर ने शर्त के साथ विवाह मान लिया, पुत्र घटोत्कच हुआ, और माँ-पुत्र पांडवों को छोड़कर वन में चले गए। यहाँ मानदंड से बाहर का रिश्ता शर्तों के साथ स्वीकार हुआ।
- मातंग (स्रोत 10, पालि की मातंग जातक): चाण्डाल के रूप में जन्मे बोधिसत्त मातंग को उसके पुत्र माण्डव्यकुमार ने, जो ब्राह्मणों को भोजन कराता था, भोजन देने से मना कर दिया। मातंग ने कहा कि जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर जो अज्ञानी हैं, वे भेंट के पात्र नहीं हैं; यहाँ जन्म पर टिके मानदंड को ही चुनौती दी गई।
- स्रोत का अंतर: पहली दो कथाएँ संस्कृत महाभारत से हैं; तीसरी बौद्ध परंपरा के पालि ग्रंथ से है और चाण्डाल के नज़रिए से कही गई है।
- मानदंड का अंतर: द्रोण की कथा मानदंड को लागू करती है, हिडिम्बा की कथा उसमें समझौता दिखाती है, और मातंग की कथा उसे नकारती है।
निष्कर्ष तीनों कथाएँ दिखाती हैं कि धर्म के मानदंड हर जगह एक जैसे नहीं माने जाते थे; कहीं उन्हें लागू किया गया, कहीं ढीला किया गया और कहीं चुनौती दी गई।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 62, 65, 67
4★★क्या यह संभव है कि महाभारत का एक ही रचयिता था? चर्चा कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: साहित्यिक परंपरा में ऋषि व्यास महाभारत के रचयिता माने जाते हैं, पर महाभारत किसने लिखा, इस प्रश्न के कई उत्तर हैं: यह कई शताब्दियों में, कई चरणों में बना।
- सूत: संभवत: मूल कथा के रचयिता भाट सारथी थे, जिन्हें ‘सूत’ कहा जाता था; वे क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्धक्षेत्र में जाते थे, और इन रचनाओं का प्रेषण मौखिक रूप में हुआ।
- ब्राह्मण: पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इस कथा परंपरा पर अपना अधिकार कर लिया और इसे लिखा।
- लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी: विष्णु देवता की आराधना प्रभावी हो रही थी, और श्रीकृष्ण को विष्णु का रूप बताया जा रहा था।
- लगभग 200-400 ईसवी: मनुस्मृति से मिलते-जुलते बृहत उपदेशात्मक प्रकरण महाभारत में जोड़े गए।
- आकार: इन परिवर्धनों के कारण ग्रंथ, जो अपने प्रारंभिक रूप में संभवत: 10,000 श्लोकों से भी कम रहा होगा, बढ़ कर एक लाख श्लोकों वाला हो गया।
निष्कर्ष परंपरा व्यास का नाम लेती है, पर जो महाभारत सूतों की मौखिक कथा से शुरू होकर कई शताब्दियों के चरणों में बढ़ा, उसका एक ही रचयिता होना संभव नहीं लगता।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 74, 75
5★आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष के संबंधों की विषमताएँ कितनी महत्वपूर्ण रही होंगी? कारण सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: ये विषमताएँ बहुत गहरी थीं, क्योंकि वंश, विवाह और संपत्ति के नियम पुरुषों के पक्ष में बने थे; फिर भी कुछ स्त्रियों के उदाहरण बताते हैं कि तस्वीर पूरी तरह एक जैसी नहीं थी।
- वंश: पितृवंशिकता में पिता की मृत्यु के बाद पुत्र उनके संसाधनों पर (राजाओं के संदर्भ में सिंहासन पर भी) अधिकार जमा सकते थे; पितृवंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्र महत्वपूर्ण थे, जबकि पुत्रियों को अलग तरह से देखा जाता था।
- विवाह: बेटियों का विवाह गोत्र से बाहर कराया जाता था, कन्यादान पिता का धार्मिक कर्तव्य माना गया, और विवाह के बाद स्त्री पति के गोत्र की मानी जाती थी।
- धन अर्जन: मनुस्मृति पुरुषों के लिए धन अर्जित करने के सात तरीके बताती है, पर स्त्रियों के लिए संपत्ति अर्जन के छ: तरीके सब भेंट या उपहार हैं।
- संसाधनों पर नियंत्रण: सामान्यत: भूमि, पशु और धन पर पुरुषों का ही नियंत्रण था, और इस कारण स्त्री और पुरुष के बीच सामाजिक हैसियत की भिन्नता “अधिक प्रखर हुई”।
- दूसरा पहलू: स्त्रीधन पर पति का कोई अधिकार नहीं होता था; उच्च वर्ग की महिलाएँ संसाधनों पर अपनी पैठ रखती थीं, और प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियों ने सत्ता का उपभोग किया।
निष्कर्ष स्त्री-पुरुष की विषमता उस समाज की बुनियाद में थी: इससे तय होता था कि वंश किससे चलेगा और संपत्ति किसके पास रहेगी, भले ही कुछ स्त्रियों ने इसके भीतर अपनी जगह बनाई।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 55, 56, 57, 58, 68, 69
6★★उन साक्ष्यों की चर्चा कीजिए जो यह दर्शाते हैं कि बंधुत्व और विवाह संबंधी ब्राह्मणीय नियमों का सर्वत्र अनुसरण नहीं होता था।
उत्तर देखिए
उत्तर: ब्राह्मण लेखक मानते थे कि उनके नियमों का सबके द्वारा पालन होना चाहिए, पर क्षेत्रीय विभिन्नता और संचार की बाधाओं की वजह से उनका प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”। ये साक्ष्य यही दिखाते हैं:
- आठ प्रकार के विवाह: धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र विवाह के आठ प्रकारों को स्वीकृति देते हैं; पहले चार ‘उत्तम’ और बाकी निंदित माने गए, और संभव है कि ये पद्धतियाँ उन लोगों में प्रचलित थीं जो ब्राह्मणीय नियमों को अस्वीकार करते थे।
- सातवाहन रानियों का गोत्र: रानियों के नाम गौतम तथा वसिष्ठ गोत्रों से उद्भूत थे, जो उनके पिता के गोत्र थे; उन्होंने पति के कुल का गोत्र ग्रहण नहीं किया।
- अंतर्विवाह: कुछ सातवाहन रानियाँ एक ही गोत्र से थीं, जो बहिर्विवाह पद्धति के नियमों के विरुद्ध था; यह बंधुओं में विवाह का उदाहरण है, जिसका प्रचलन दक्षिण भारत के कई समुदायों में (भी) है।
- बहुपति विवाह: द्रौपदी का पाँचों पांडवों से विवाह; वर्तमान इतिहासकारों का सुझाव है कि संभवत: यह प्रथा शासकों के विशिष्ट वर्ग में मौजूद थी।
- समुदाय से बाहर विवाह: महाभारत में भीम का हिडिम्बा (एक नरभक्षी राक्षस की बहन) से विवाह, और पालि में लिखी मातंग जातक में चाण्डाल मातंग का व्यापारी की पुत्री दिथ्थ मांगलिक से विवाह।
निष्कर्ष ब्राह्मणीय नियम एक आदर्श थे; असल व्यवहार क्षेत्र, समुदाय और परिस्थिति के हिसाब से बदलता था।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 58, 60, 65, 67, 76, 77
खंड छ — स्रोत पर आधारित प्रश्न (4 अंक) — 4 प्रश्न
1★स्रोत 3 (मनुस्मृति में विवाह के प्रकार) के ये अंश पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
“पहली : कन्या का दान, बहुमूल्य वस्त्रों और अलंकारों से विभूषित कर उसे वेदज्ञ वर को दान दिया जाए जिसे पिता ने स्वयं आमंत्रित किया हो।” “पाँचवीं : वर को वधू की प्राप्ति तब होती है जब वह अपनी क्षमता व इच्छानुसार उसके बांधवों को और स्वयं वधू को यथेष्ट धन प्रदान करता है।” “छठीं : स्त्री और पुरुष के बीच अपनी इच्छा से संयोग… जिसकी उत्पत्ति काम से है…”
उत्तर और व्याख्या देखिए
उत्तर:
- (क) वधू के पिता ने; वह स्वयं वेदज्ञ वर को आमंत्रित करता था और कन्या को बहुमूल्य वस्त्रों और अलंकारों से विभूषित कर उसका दान करता था।
- (ख) वर अपनी क्षमता व इच्छानुसार वधू के बांधवों को और स्वयं वधू को यथेष्ट धन देता था, तब उसे वधू मिलती थी।
- (ग) पहली पद्धति पहले चार में आती है, इसलिए ‘उत्तम’ थी; पाँचवीं और छठीं निंदित थीं। छठीं में निर्णय स्त्री और पुरुष का अपना था। संभव है कि निंदित पद्धतियाँ उन लोगों में प्रचलित थीं जो ब्राह्मणीय नियमों को अस्वीकार करते थे।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 58
2★स्रोत 11 (द्रौपदी के प्रश्न) का यह अंश पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
“ऐसा माना जाता है कि द्रौपदी ने युधिष्ठिर से यह प्रश्न किया था कि वह उसे दाँव पर लगाने से पहले स्वयं को हार बैठे थे अथवा नहीं। इस प्रश्न के उत्तर में दो भिन्न मतों को प्रस्तुत किया गया।” “प्रथम तो यह कि यदि युधिष्ठिर ने स्वयं को हार जाने के पश्चात द्रौपदी को दाँव पर लगाया तो यह अनुचित नहीं क्योंकि पत्नी पर पति का नियंत्रण सदैव रहता है।” “दूसरा यह कि एक दासत्व स्वीकार करने वाला पुरुष (जैसे उस क्षण युधिष्ठिर थे) किसी और को दाँव पर नहीं लगा सकता।”
उत्तर और व्याख्या देखिए
उत्तर:
- (क) द्यूत क्रीड़ा में; दुर्योधन ने युधिष्ठिर को द्यूत क्रीड़ा के लिए आमंत्रित किया था।
- (ख) इस तर्क पर कि पत्नी पर पति का नियंत्रण सदैव रहता है।
- (ग) हाँ की ओर: युधिष्ठिर स्वर्ण, हस्ति, रथ, दास, सेना, कोष, राज्य, अनुजों और स्वयं को हारने के बाद द्रौपदी को भी दाँव पर लगाकर हार गए, और पहला मत इसे अनुचित नहीं मानता था। नहीं की ओर: दूसरा मत कहता था कि दासत्व स्वीकार करने वाला पुरुष किसी और को दाँव पर नहीं लगा सकता; इन मुद्दों का कोई निष्कर्ष नहीं निकला, और अंत में धृतराष्ट्र ने सभी पांडवों और द्रौपदी को उनकी निजी स्वतंत्रता लौटा दी। यानी यह विचार मौजूद था, पर उस पर विवाद भी था।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 68
3★★स्रोत 13 (एक धनाढ्य शूद्र) के ये अंश पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
“अवन्तिपुत्र ने कच्चन से पूछा कि ब्राह्मणों के इस मत के बारे में उनकी क्या राय है, कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं और अन्य जातियाँ निम्न कोटि की हैं; ब्राह्मण का वर्ण शुभ्र है और अन्य जातियाँ काली हैं; केवल ब्राह्मण पवित्र हैं अन्य नहीं; ब्राह्मण ब्रह्मा के पुत्र हैं, ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं, उनसे ही रचित हैं तथा ब्रह्मा के वंशज हैं।” ”…यदि शूद्र के पास धन अथवा अनाज, स्वर्ण या फिर रजत होती वह दूसरे शूद्र को अपने आज्ञाकारी सेवक के रूप में प्राप्त कर सकता था… अथवा वह क्षत्रिय, ब्राह्मण या फिर वैश्य को भी आज्ञावाही सेवक बना सकता था।” “अवन्तिपुत्र ने यह स्वीकार किया कि इस आधार पर चारों वर्णों में कोई भेद नहीं है।”
उत्तर और व्याख्या देखिए
उत्तर:
- (क) पालि भाषा के बौद्ध ग्रंथ मज्झिमनिकाय से; यह राजा अवन्तिपुत्र और बुद्ध के अनुयायी कच्चन के बीच का संवाद है।
- (ख) कोई दो: ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ हैं और अन्य जातियाँ निम्न कोटि की; ब्राह्मण का वर्ण शुभ्र है और अन्य जातियाँ काली; केवल ब्राह्मण पवित्र हैं; ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं।
- (ग) धन होने पर शूद्र दूसरे शूद्र को, और क्षत्रिय, ब्राह्मण या वैश्य को भी अपना सेवक बना सकता था; इसलिए अवन्तिपुत्र ने माना कि इस आधार पर चारों वर्णों में कोई भेद नहीं। किताब के अनुसार यह कहानी अक्षरश: सत्य नहीं थी, पर बौद्धों का वर्ण संबंधी रवैया दिखाती है: बौद्धों ने माना कि समाज में विषमता मौजूद थी, पर यह भेद न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी, और उन्होंने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 69, 70
4★★स्रोत 16 (द्रौपदी का विवाह) पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
“पांचाल नरेश द्रुपद ने एक स्वयंवर का आयोजन किया जिसमें यह शर्त रखी गई कि धनुष की चाप चढ़ा कर निशाने पर तीर मारा जाए; विजेता उनकी पुत्री द्रौपदी से विवाह करने के लिए चुना जाएगा। अर्जुन ने यह प्रतियोगिता जीती और द्रौपदी ने उसे वरमाला पहनाई। पांडव उसे लेकर अपनी माता कुंती के पास गए जिन्होंने बिना देखे ही उन्हें लाई गई वस्तु को आपस में बाँट लेने को कहा। जब कुंती ने द्रौपदी को देखा तो उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ, किंतु उनकी आज्ञा की अवहेलना नहीं की जा सकती थी। बहुत सोच-विचार के बाद युधिष्ठिर ने यह निर्णय लिया कि द्रौपदी उन पाँचों की पत्नी होगी।” “जब द्रुपद को यह बताया गया तो उन्होंने इसका विरोध किया। किंतु ऋषि व्यास ने उन्हें इस तथ्य से अवगत कराया कि पांडव वास्तव में इंद्र के अवतार थे और उनकी पत्नी ने ही द्रौपदी के रूप में जन्म लिया था। अत: नियति ने ही उन सबका साथ निश्चित कर दिया था।” “व्यास ने यह भी बताया कि एक बार युवा स्त्री ने पति प्राप्ति के लिए शिव की आराधना की और उत्साह के अतिरेक में एक के बजाय पाँच बार पति प्राप्ति का वर माँग लिया। इसी स्त्री ने द्रौपदी के रूप में जन्म लिया तथा शिव ने उसकी प्रार्थना को परिपूर्ण किया है। इन कहानियों से संतुष्ट होकर द्रुपद ने इस विवाह को अपनी सहमति प्रदान की।”
उत्तर और व्याख्या देखिए
उत्तर:
- (क) द्रुपद पांचाल नरेश और द्रौपदी के पिता थे; प्रतियोगिता अर्जुन ने जीती।
- (ख) कुंती ने बिना देखे ही पांडवों से कहा कि लाई गई वस्तु को आपस में बाँट लें; उनकी आज्ञा की अवहेलना नहीं की जा सकती थी, इसलिए युधिष्ठिर ने निर्णय लिया कि द्रौपदी पाँचों की पत्नी होगी।
- (ग) तीन स्पष्टीकरण हैं: कुंती की आज्ञा, व्यास का कथन कि पांडव इंद्र के अवतार थे, और शिव का वर (एक युवा स्त्री ने पाँच बार पति प्राप्ति का वर माँगा था, उसी ने द्रौपदी के रूप में जन्म लिया)। वर्तमान इतिहासकारों का सुझाव है कि संभवत: बहुपति प्रथा शासकों के विशिष्ट वर्ग में मौजूद थी, पर इस प्रकरण के विभिन्न स्पष्टीकरण यह भी व्यंजित करते हैं कि समय के साथ बहुपति प्रथा धीरे-धीरे लोगों के बीच अमान्य होती चली गई।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3, पृष्ठ 76, 77
उत्तर लिखने का तरीक़ा
| अंक | लंबाई | कैसे लिखें |
|---|---|---|
| 1 अंक | एक वाक्य | सीधे उत्तर |
| 2 अंक | 30–40 शब्द | उत्तर + कारण या उदाहरण |
| 3 अंक | 60–80 शब्द | तीन बिंदु, पूरे वाक्यों में |
| 4 अंक (स्रोत) | हर भाग 1–3 वाक्य | पहले अंश में उत्तर खोजिए, फिर किताब की बात जोड़िए |
| 5 अंक | लगभग 120 शब्द | भूमिका + पाँच बिंदु + निष्कर्ष |
★इस अध्याय के लिए तीन सलाह:
- किताब के शब्द लिखिए: पितृवंशिकता, मातृवंशिकता, बहिर्विवाह, अंतर्विवाह, बहुपति प्रथा, बहुपत्नी प्रथा, गोत्र, कन्यादान, स्त्रीधन, वर्ण, जाति, श्रेणी, चाण्डाल, समालोचनात्मक संस्करण, आख्यान, उपदेशात्मक। पहले शब्द का अर्थ एक वाक्य में बताइए, फिर उदाहरण दीजिए।
- हर बात के साथ लिखिए कि इतिहासकार उसे कैसे जानते हैं: कौन-सा ग्रंथ या अभिलेख, और किताब का कौन-सा स्रोत, जैसे स्रोत 3 (मनुस्मृति में विवाह के प्रकार) या स्रोत 13 (मज्झिमनिकाय का धनाढ्य शूद्र)। ब्राह्मणीय ग्रंथों के नियम लिखें तो यह भी लिखिए कि व्यवहार में उनका सर्वत्र अनुसरण नहीं होता था, और उसका कोई उदाहरण दीजिए।
- तिथियाँ और अनुमान किताब की तरह लिखिए: लगभग 500 ई.पू., लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी, 1919, 1951-52; और “संभवत:”, “कुछ इतिहासकार”, “शायद ही” जैसे शब्द मत छोड़िए, क्योंकि बात उन्हीं से सही बनती है।
तीन नमूना परीक्षा-पत्र
हर पत्र के सभी प्रश्नों के उत्तर इसी पन्ने के ऊपर के खंडों में हैं। पहले बिना देखे लिखिए, फिर मिलाइए।
नमूना पत्र 1 (कुल 20 अंक)
| प्र. | प्रश्न | अंक |
|---|---|---|
| 1 | धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र नामक संस्कृत ग्रंथों में से मनुस्मृति का संकलन कब हुआ? | 1 |
| 2 | रिक्त स्थान भरिए: बहिर्विवाह पद्धति का एक प्रभाव यह हुआ कि ………, अर्थात् विवाह में कन्या की भेंट, को पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया। | 1 |
| 3 | सही या ग़लत: धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र लिखने वाले ब्राह्मणों का प्रभाव पूरे उपमहाद्वीप में सार्वभौमिक था। | 1 |
| 4 | महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण तैयार करने की प्रक्रिया में कौन-सी दो बातें विशेष रूप से उभर कर आईं? | 2 |
| 5 | ब्राह्मणीय गोत्र पद्धति के दो महत्वपूर्ण नियम कौन-से थे? | 2 |
| 6 | सातवाहन राजाओं के मातृनामों से क्या यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि माताएँ महत्वपूर्ण थीं? किताब के आधार पर समझाइए। | 3 |
| 7 | स्पष्ट कीजिए कि विशिष्ट परिवारों में पितृवंशिकता क्यों महत्वपूर्ण रही होगी। | 5 |
| 8 | क्या यह संभव है कि महाभारत का एक ही रचयिता था? चर्चा कीजिए। | 5 |
नमूना पत्र 2 (कुल 20 अंक)
| प्र. | प्रश्न | अंक |
|---|---|---|
| 1 | शवों की अंत्येष्टि करने वालों और मृत पशुओं को छूने वालों को क्या कहा जाता था? | 1 |
| 2 | रिक्त स्थान भरिए: सातवाहन राजाओं को उनके ……… (माता के नाम से उद्भूत) से चिह्नित किया जाता था, फिर भी उनके सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक होता था। | 1 |
| 3 | सही या ग़लत: प्रारंभिक बौद्ध धर्म ने माना कि समाज में विषमता मौजूद थी, पर यह भेद न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी। | 1 |
| 4 | धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों के अनुसार ब्राह्मणों और क्षत्रियों की ‘जीविका’ क्या थी? | 2 |
| 5 | मंदसौर के अभिलेख से श्रेणियों के स्वरूप के बारे में क्या पता चलता है? | 2 |
| 6 | वर्ण और जाति में क्या अंतर था? सातवाहनों के उदाहरण से समझाइए कि जाति प्रथा के भीतर आत्मसात होना एक जटिल सामाजिक प्रक्रिया क्यों थी। | 3 |
| 7 | क्या आरंभिक राज्यों में शासक निश्चित रूप से क्षत्रिय ही होते थे? चर्चा कीजिए। | 5 |
| 8 | आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष के संबंधों की विषमताएँ कितनी महत्वपूर्ण रही होंगी? कारण सहित उत्तर दीजिए। | 5 |
नमूना पत्र 3 (कुल 20 अंक)
| प्र. | प्रश्न | अंक |
|---|---|---|
| 1 | आरंभिक संस्कृत परंपरा में महाभारत को किस श्रेणी में रखा गया है, जिसका अर्थ है ‘ऐसा ही था’? | 1 |
| 2 | रिक्त स्थान भरिए: मातंग जातक, जिसमें बोधिसत्त (पूर्वजन्म में बुद्ध) एक चाण्डाल के रूप में चित्रित हैं, ……… में लिखी कहानी है। | 1 |
| 3 | सही या ग़लत: व्यवहार में सभी महत्वपूर्ण राजवंश क्षत्रिय वर्ण के ही थे। | 1 |
| 4 | मनुस्मृति में चाण्डालों के कौन-से ‘कर्तव्य’ बताए गए हैं? कोई चार लिखिए। | 2 |
| 5 | महाभारत की भाषा और विषयवस्तु के बारे में इतिहासकार क्या कहते हैं? | 2 |
| 6 | महाभारत को एक गतिशील ग्रंथ क्यों कहा जाता है? महाश्वेता देवी के उदाहरण से समझाइए। | 3 |
| 7 | द्रोण, हिडिम्बा और मातंग की कथाओं में धर्म के मानदंडों की तुलना कीजिए और उनके अंतर को भी स्पष्ट कीजिए। | 5 |
| 8 | उन साक्ष्यों की चर्चा कीजिए जो यह दर्शाते हैं कि बंधुत्व और विवाह संबंधी ब्राह्मणीय नियमों का सर्वत्र अनुसरण नहीं होता था। | 5 |