कुल 62 प्रश्न
तारों का मतलब: ★ज़रूरी · ★★बहुत ज़रूरी; समय कम हो तो पहले ये प्रश्न और ये बातें दोहराइए।
खंड क — वस्तुनिष्ठ प्रश्न (1 अंक) — 20 प्रश्न
पृष्ठ संख्याएँ NCERT की किताब “भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I” (कक्षा 12) के 2026-27 में छपे संस्करण की हैं।
1किताब का यह अध्याय ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक के सांस्कृतिक विकास को पढ़ता है। उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित कौन-सी है?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (ब) साँची का स्तूप
व्याख्या: किताब के शब्द हैं: “उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित है साँची का स्तूप”। अमरावती का स्तूप उन्नीसवीं सदी में नष्ट हो गया, जबकि साँची बच गया।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 82, 99
2भोपाल की नवाब शाहजहाँ बेगम (शासनकाल 1868-1901) की आत्मकथा का 1876 में अनुवाद किसने किया?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (स) एच.डी. बार्स्टो
व्याख्या: आत्मकथा का नाम ताज–उल-इकबाल तारीख भोपाल (भोपाल का इतिहास) है, और 1876 में एच.डी. बार्स्टो ने इसका अनुवाद किया। जॉन मार्शल ने साँची पर लिखे अपने ग्रंथ सुल्तानजहाँ बेगम को समर्पित किए।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 82, 83
3पूर्व वैदिक परंपरा की जानकारी देने वाला ऋग्वेद किस काल में संकलित हुआ?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (अ) 1500 से 1000 ईसा पूर्व
व्याख्या: ऋग्वेद अग्नि, इंद्र, सोम आदि कई देवताओं की स्तुति का संग्रह है। लगभग 1000 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व का काल वह है जब कुछ यज्ञ घरों के मालिक करने लगे, और उपनिषदों की विचारधाराएँ छठी सदी ई.पू. से मिलती हैं।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 84
4राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ कौन किया करते थे?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (द) सरदार और राजा
व्याख्या: इन यज्ञों के अनुष्ठान के लिए सरदारों और राजाओं को ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भर रहना पड़ता था। घरों के मालिक (लगभग 1000 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व) कुछ दूसरे यज्ञ करते थे।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 84
5घूम-घूम कर तर्क-वितर्क करने वाले शिक्षकों की चर्चाएँ कुटागारशालाओं में होती थीं। कुटागारशाला का शब्दार्थ क्या है?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (ब) नुकीली छत वाली झोपड़ी
व्याख्या: ये चर्चाएँ कुटागारशालाओं या ऐसे उपवनों में होती थीं जहाँ घुमक्कड़ मनीषी ठहरा करते थे। मूर्ति रखने का चौकोर कमरा गर्भगृह है और अंड के ऊपर का ढाँचा हर्मिका।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 85
6सुत्त पिटक के एक अंश (स्रोत 3) में मगध के राजा अजातसत्तु बुद्ध को मक्खलि गोसाल नामक शिक्षक की बातें बताते हैं। मक्खलि गोसाल किस परंपरा के थे?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (अ) आजीविक
व्याख्या: किताब के अनुसार स्रोत 3 के पहले अंश के उपदेशक मक्खलि गोसाल आजीविक परंपरा के थे, और “उन्हें अक्सर नियतिवादी कहा जाता है”। दूसरे अंश के उपदेशक अजीत केसकंबलिन् लोकायत परंपरा के थे। थेरवाद और महायान बौद्ध धर्म की परंपराओं के नाम हैं।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 87, 103
7बौद्ध त्रिपिटक के किस पिटक में संघ या बौद्ध मठों में रहने वाले लोगों के लिए नियमों का संग्रह था?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (स) विनय पिटक
व्याख्या: बुद्ध की शिक्षाएँ सुत्त पिटक में रखी गईं और दर्शन से जुड़े विषय अभिधम्म पिटक में आए। थेरीगाथा कोई पिटक नहीं, सुत्त पिटक का हिस्सा है।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 86, 93
8बुद्ध की मृत्यु के बाद (पाँचवीं–चौथी सदी ई.पू.) उनके शिष्यों ने वरिष्ठ श्रमणों की एक सभा बुलाकर उनकी शिक्षाओं का संकलन कहाँ किया?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (द) वेसली
व्याख्या: वेसली बिहार स्थित वैशाली का पालि भाषा में रूप है। लुम्बिनी में बुद्ध जन्मे थे, सारनाथ में उन्होंने प्रथम उपदेश दिया और कुशीनगर में निब्बान प्राप्त किया।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 86, 95, 96
9जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले कितने शिक्षक (तीर्थंकर) हो चुके थे?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (स) 23
व्याख्या: तीर्थंकर यानी “वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं”। 5 जैन साधुओं के व्रतों की संख्या है, 10 वैष्णव परंपरा में अवतारों की, और 64 बौद्ध ग्रंथों में बताए संप्रदायों की।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 85, 88, 104
10जैन दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा कौन-सी है?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (अ) संपूर्ण विश्व प्राणवान है
व्याख्या: जैन मान्यता में पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन होता है। विश्व को आत्माविहीन बौद्ध दर्शन मानता है, चार तत्वों की बात लोकायत उपदेशक अजीत केसकंबलिन् की है और पूर्व निर्धारित सुख-दुख की बात आजीविक मक्खलि गोसाल की।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 87, 88, 91
11जैन ग्रंथ उत्तराध्ययन सूत्र के एक अंश (स्रोत 4) में अपने पति को संन्यास लेने के लिए कौन समझा रही है?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (ब) महारानी कमलावती
व्याख्या: जैन उपदेश अक्सर कहानियों के रूप में होते थे जो आम लोगों को आकर्षित करते थे; इसी ग्रंथ में कमलावती नामक महारानी अपने पति को समझाती है। गोतमी पहली भिक्खुनी थीं और पुन्ना की बात बौद्ध थेरीगाथा में है।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 88
12आठवीं सदी का वह मंदिर कौन-सा है, जिसमें पूरी पहाड़ी काटकर उसे मंदिर का रूप दे दिया गया था?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (द) एलोरा का कैलाशनाथ मंदिर
व्याख्या: कैलाशनाथ शिव का एक नाम है; बराबर (बिहार) की गुफाएँ लगभग तीसरी सदी ईसा पूर्व की हैं। एक ताम्रपत्र अभिलेख में एलोरा के प्रमुख तक्षक ने निर्माण पूरा होने पर अपना आश्चर्य इन शब्दों में कहा है: “हे भगवान यह मैंने कैसे बनाया!”
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 107
13बौद्ध ग्रंथों के अनुसार संघ में आने वाली पहली भिक्खुनी कौन बनीं?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (स) महाप्रजापति गोतमी
व्याख्या: शुरू में सिर्फ़ पुरुष संघ में आ सकते थे; बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद ने बुद्ध को समझाकर महिलाओं के लिए अनुमति प्राप्त की। बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गोतमी पहली भिक्खुनी बनीं।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 92
14ऊँची आवाज़ में पढ़े जाने वाले पुराणों को वे लोग भी सुन सकते थे जिन्हें वैदिक साहित्य पढ़ने-सुनने की अनुमति नहीं थी। ये कौन थे?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (अ) महिलाएँ और शूद्र
व्याख्या: पुराण सामान्यत: संस्कृत श्लोकों में लिखे गए थे और इन्हें ऊँची आवाज़ में पढ़ा जाता था, जिसे कोई भी सुन सकता था।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 105
15स्तूप में अंड के ऊपर बना छज्जे जैसा ढाँचा, जो देवताओं के घर का प्रतीक था, क्या कहलाता था?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (ब) हर्मिका
व्याख्या: हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था जिसे यष्टि कहते थे, और उस पर अक्सर एक छत्री लगी होती थी। टीले के चारों ओर की वेदिका पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 96, 97
16साँची की खोज किस वर्ष हुई, जब इसके तीन तोरणद्वार तब भी खड़े थे?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (द) 1818
व्याख्या: 1818 में चौथा तोरणद्वार वहीं पर गिरा हुआ था और टीला भी अच्छी हालत में था। 1796 में एक स्थानीय राजा को अमरावती के स्तूप के अवशेष मिले, 1854 में गुंटूर (आंध्र प्रदेश) के कमिश्नर ने अमरावती की यात्रा की, और 1989 में साँची को विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 98, 99, 110
17कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर प्रतीकों से दिखाया। बुद्ध द्वारा सारनाथ में दिए गए पहले उपदेश का प्रतीक कौन-सा था?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (स) चक्र
व्याख्या: रिक्त स्थान बुद्ध के ध्यान की दशा का और स्तूप महापरिनिब्बान का प्रतीक बना। शालभंजिका बुद्ध का प्रतीक नहीं, लोक परंपरा का एक शुभ प्रतीक थी।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 100, 101
18बौद्ध चिंतन की जिस नयी परंपरा में मुक्तिदाता और बोधिसत्त की अवधारणा उभरी, उसे अपनाने वालों ने पुरानी परंपरा को किस नाम से संबोधित किया?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (ब) हीनयान
व्याख्या: नयी परंपरा महायान कहलाई। पुरातन परंपरा के अनुयायी खुद को हीनयानी नहीं, थेरवादी कहते थे।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 103
19शुरू के मंदिरों में एक दरवाज़े वाला वह चौकोर कमरा क्या कहलाता था, जिसमें उपासक मूर्ति की पूजा करने के लिए भीतर जाता था?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (द) गर्भगृह
व्याख्या: धीरे-धीरे गर्भगृह के ऊपर एक ऊँचा ढाँचा बनाया जाने लगा जिसे शिखर कहा जाता था। विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें और तोरण बाद के युगों के मंदिरों में जुड़े।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 105, 106
20सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से किनके लिए बनाई गई थीं?
उत्तर और व्याख्या देखिए
सही उत्तर: (अ) आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए
व्याख्या: कृत्रिम गुफाएँ बनाने की परंपरा अलग-अलग चरणों में विकसित होती रही, और इसका सबसे विकसित रूप आठवीं सदी के कैलाशनाथ मंदिर में दिखता है।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 106, 107
खंड ख — रिक्त स्थान (1 अंक) — 10 प्रश्न
1भोपाल की नवाब शाहजहाँ बेगम (शासनकाल 1868-1901) की आत्मकथा का नाम ______ (भोपाल का इतिहास) है। (पृष्ठ 82)
उत्तर देखिए
भोपाल की नवाब शाहजहाँ बेगम (शासनकाल 1868-1901) की आत्मकथा का नाम ताज–उल-इकबाल तारीख भोपाल (भोपाल का इतिहास) है। (पृष्ठ 82)
2बुद्ध की शिक्षाओं के संग्रहों को त्रिपिटक कहा जाता था, जिसका शब्दार्थ है भिन्न प्रकार के ग्रंथों को रखने के लिए ______। (पृष्ठ 86)
उत्तर देखिए
बुद्ध की शिक्षाओं के संग्रहों को त्रिपिटक कहा जाता था, जिसका शब्दार्थ है भिन्न प्रकार के ग्रंथों को रखने के लिए तीन टोकरियाँ। (पृष्ठ 86)
3बुद्ध के जीवन पर लिखे चरितों के अनुसार उनके बचपन का नाम ______ था; वे शाक्य कबीले के सरदार के बेटे थे। (पृष्ठ 89)
उत्तर देखिए
बुद्ध के जीवन पर लिखे चरितों के अनुसार उनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था; वे शाक्य कबीले के सरदार के बेटे थे। (पृष्ठ 89)
4बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बुद्ध के प्रिय शिष्य ______ ने बुद्ध को समझाकर महिलाओं के संघ में आने की अनुमति प्राप्त की। (पृष्ठ 92)
उत्तर देखिए
बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद ने बुद्ध को समझाकर महिलाओं के संघ में आने की अनुमति प्राप्त की। (पृष्ठ 92)
5भिक्खुनियों द्वारा रचित छंदों का संकलन थेरीगाथा ______ का हिस्सा है। (पृष्ठ 93)
उत्तर देखिए
भिक्खुनियों द्वारा रचित छंदों का संकलन थेरीगाथा सुत्त पिटक का हिस्सा है। (पृष्ठ 93)
6साँची और भरहुत के प्रारंभिक स्तूपों की पत्थर की ______ किसी बाँस के या काठ के घेरे के समान थीं। (पृष्ठ 97)
उत्तर देखिए
साँची और भरहुत के प्रारंभिक स्तूपों की पत्थर की वेदिकाएँ किसी बाँस के या काठ के घेरे के समान थीं। (पृष्ठ 97)
7महायान परंपरा में ______ को परम करुणामय जीव माना गया, जो अपने सत्कार्यों से कमाए पुण्य से दूसरों की सहायता करते थे। (पृष्ठ 103)
उत्तर देखिए
महायान परंपरा में बोधिसत्तों को परम करुणामय जीव माना गया, जो अपने सत्कार्यों से कमाए पुण्य से दूसरों की सहायता करते थे। (पृष्ठ 103)
8पुरातत्ववेत्ता ______ को इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना “आत्मघाती और असमर्थनीय नीति” लगती थी। (पृष्ठ 98)
उत्तर देखिए
पुरातत्ववेत्ता एच.एच. कोल को इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना “आत्मघाती और असमर्थनीय नीति” लगती थी। (पृष्ठ 98)
9लोक परंपरा में माना जाता था कि ______ के छूने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे और फल होने लगते थे। (पृष्ठ 101)
उत्तर देखिए
लोक परंपरा में माना जाता था कि शालभंजिका के छूने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे और फल होने लगते थे। (पृष्ठ 101)
10साँची को ______ में एक विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया। (पृष्ठ 110)
उत्तर देखिए
साँची को 1989 में एक विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया। (पृष्ठ 110)
खंड ग — सही/ग़लत (1 अंक) — 8 प्रश्न
1उन्नीसवीं सदी में फ्रांसीसी साँची का पूर्वी तोरणद्वार फ्रांस ले गए।
उत्तर देखिए
ग़लत
(फ्रांसीसी और अंग्रेज़ दोनों प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए और मूल कृति भोपाल राज्य में अपनी जगह पर ही रही; पृष्ठ 83)
2आजीविक और लोकायत परंपराओं के अपने ग्रंथ आज भी मिलते हैं।
उत्तर देखिए
ग़लत
(इन परंपराओं के ग्रंथ नष्ट हो गए हैं, इसलिए उनके बारे में जानकारी अन्य परंपराओं से ही मिलती है; पृष्ठ 87)
3बुद्ध के किसी भी संभाषण को उनके जीवन काल में लिखा नहीं गया।
उत्तर देखिए
सही (पृष्ठ 86)
4बौद्ध धर्म की प्रारंभिक परंपराओं में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था।
उत्तर देखिए
सही (पृष्ठ 91)
5बौद्ध संघ में आने पर सभी को बराबर माना जाता था, क्योंकि भिक्खु और भिक्खुनी बनने पर उन्हें अपनी पुरानी पहचान त्याग देनी पड़ती थी।
उत्तर देखिए
सही (पृष्ठ 92)
6स्तूप बनाने की परंपरा निश्चित रूप से बौद्ध धर्म ने ही शुरू की थी।
उत्तर देखिए
ग़लत
(किताब के अनुसार यह परंपरा बुद्ध से पहले की रही होगी, लेकिन वह बौद्ध धर्म से जुड़ गई; पृष्ठ 96)
7जेम्स फर्गुसन ने बौद्ध ग्रंथ पढ़कर साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र माना था।
उत्तर देखिए
ग़लत
(वे बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे; उन्होंने सिर्फ़ उत्कीर्णित मूर्तियों का अध्ययन करके अपने निष्कर्ष निकाले थे; पृष्ठ 103)
8महाबलीपुरम् की चट्टान पर उकेरी गई कथा को कुछ विद्वान गंगा नदी के स्वर्ग से अवतरण का चित्रण मानते हैं, तो दूसरे विद्वान अर्जुन की तपस्या का।
उत्तर देखिए
सही (पृष्ठ 108, 109)
खंड घ — अति लघूत्तरीय प्रश्न (2 अंक) — 8 प्रश्न
1★★स्तूप के मुख्य हिस्सों के नाम लिखिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: स्तूप का जन्म एक गोलार्ध लिए हुए मिट्टी के टीले से हुआ, और धीरे-धीरे इसकी संरचना जटिल होती गई:
- अंड: गोलार्ध जैसा मिट्टी का टीला।
- हर्मिका: अंड के ऊपर छज्जे जैसा ढाँचा, जो देवताओं के घर का प्रतीक था।
- यष्टि और छत्री: हर्मिका से निकलने वाला मस्तूल यष्टि कहलाता था, जिस पर अक्सर एक छत्री लगी होती थी।
- वेदिका और तोरणद्वार: टीले के चारों ओर की वेदिका पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी; साँची और भरहुत के प्रारंभिक स्तूपों में पत्थर की वेदिकाएँ और चारों दिशाओं में नक्काशी वाले तोरणद्वार हैं।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 96, 97
2★बौद्ध त्रिपिटक के तीनों पिटकों में क्या रखा गया?
उत्तर देखिए
उत्तर: बुद्ध की मृत्यु के बाद संकलित उनकी शिक्षाओं के संग्रह त्रिपिटक कहलाए:
- विनय पिटक: संघ या बौद्ध मठों में रहने वाले लोगों के लिए नियम।
- सुत्त पिटक: बुद्ध की शिक्षाएँ।
- अभिधम्म पिटक: दर्शन से जुड़े विषय।
पहले ये मौखिक रूप से ही आगे बढ़ाए गए; बाद में लिखकर इनका विषय और लंबाई के अनुसार वर्गीकरण किया गया।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 86
3★★जैन साधु और साध्वी कौन-से पाँच व्रत करते थे, और वे संसार का त्याग क्यों करते थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: जैन मान्यता के अनुसार जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म के द्वारा निर्धारित होता है:
- संसार का त्याग क्यों: कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या की ज़रूरत होती है, और यह संसार के त्याग से ही संभव हो पाता है। इसीलिए मुक्ति के लिए विहारों में निवास करना एक अनिवार्य नियम बन गया।
- पाँच व्रत: हत्या न करना, चोरी नहीं करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य और धन संग्रह न करना।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 88
4★स्रोत 3 के आधार पर नियतिवादी और भौतिकवादी विचारों में अंतर बताइए।
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 3 सुत्त पिटक से लिया गया है। इसमें राजा अजातसत्तु बुद्ध के पास जाकर मक्खलि गोसाल की बातें बताते हैं, और उसके बाद अजीत केसकंबलिन् का उपदेश आता है:
- नियतिवादी: आजीविक परंपरा के मक्खलि गोसाल, जिनकी परंपरा के लोगों को “अक्सर नियतिवादी कहा जाता है”, यानी जो मानते थे कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है: “सुख और दुख मानो पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं।”
- भौतिकवादी: लोकायत परंपरा के अजीत केसकंबलिन्, जिन्हें “सामान्यत: भौतिकवादी कहा जाता है”: “मनुष्य चार तत्वों से बना होता है।” और “मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता।”
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 87
5★महायान, हीनयान और थेरवाद नाम किसने, किसके लिए इस्तेमाल किए?
उत्तर देखिए
उत्तर: ईसा की प्रथम सदी के बाद बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव दिखते हैं, और उन्हीं से ये नाम निकले:
- महायान: मुक्तिदाता, बोधिसत्त और मूर्ति-पूजा वाली बौद्ध चिंतन की नयी परंपरा।
- हीनयान: महायान के अनुयायी दूसरी बौद्ध परंपराओं के समर्थकों को हीनयान के अनुयायी कहते थे।
- थेरवाद: पुरातन परंपरा के अनुयायी खुद को थेरवादी कहते थे।
किताब की कालरेखा 1 में “महायान बौद्ध मत का विकास” लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे के समय में रखा गया है।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 103, 110
6★वैष्णव और शैव परंपराएँ क्या हैं, और भक्ति किसे कहते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: मुक्तिदाता की कल्पना सिर्फ़ बौद्ध धर्म तक सीमित नहीं थी; ऐसे विश्वास उन परंपराओं में भी विकसित हुए जिन्हें आज हिंदू धर्म के नाम से जाना जाता है:
- वैष्णव: वह हिंदू परंपरा जिसमें विष्णु को सबसे महत्वपूर्ण देवता माना जाता है; इसमें दस अवतारों की कल्पना है।
- शैव: वह संकल्पना जिसमें शिव परमेश्वर है।
- भक्ति: एक विशेष देवता की ऐसी आराधना, जिसमें पूजने वाले और ईश्वर के बीच का रिश्ता प्रेम और समर्पण का रिश्ता माना जाता था।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 104
7★स्तूप के अलंकरण में शालभंजिका की मूर्ति क्यों दिखती है, और इससे बौद्ध धर्म के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: साँची के तोरणद्वार के किनारे पेड़ पकड़कर झूलती इस स्त्री की मूर्ति ने शुरू में विद्वानों को उलझन में डाला:
- पहले असमंजस: शुरू-शुरू में विद्वान इसके महत्त्व के बारे में थोड़े असमंजस में थे, क्योंकि इसका त्याग और तपस्या से कोई रिश्ता नज़र नहीं आता था।
- पहचान: साहित्यिक परंपराओं के अध्ययन से वे समझ पाए कि यह संस्कृत में वर्णित शालभंजिका है। लोक परंपरा में माना जाता था कि इस स्त्री के छूने से वृक्षों में फूल खिल उठते और फल होने लगते थे।
- शुभ प्रतीक: ऐसा लगता है कि इसे शुभ प्रतीक माना जाता था, और इसी कारण यह स्तूप के अलंकरण में आई।
इससे पता चलता है कि बौद्ध धर्म में आए लोगों ने बुद्ध-पूर्व और बौद्ध धर्म से इतर दूसरे विश्वासों, प्रथाओं और धारणाओं से बौद्ध धर्म को समृद्ध किया।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 101
8★चैत्य किन्हें कहा जाता था?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब में चैत्य शब्द दो तरह की जगहों के लिए आता है:
- छोटी वेदी: बहुत प्राचीन काल से लोग खास वनस्पति, अनूठी चट्टानों या विस्मयकारी प्राकृतिक सौंदर्य वाली जगहों को पवित्र मानते थे। ऐसे कुछ स्थलों पर बनी छोटी-सी वेदी को कभी-कभी चैत्य कहा जाता था।
- अंतिम संस्कार के टीले: शवदाह के बाद शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रख दिए जाते थे। अंतिम संस्कार से जुड़े ये टीले चैत्य के रूप में जाने गए।
बौद्ध साहित्य में कई चैत्यों की चर्चा है, और इसमें बुद्ध के जीवन से जुड़ी जगहों का भी वर्णन है।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 95
खंड ङ — लघूत्तरीय प्रश्न (3 अंक) — 6 प्रश्न
1★★उन्नीसवीं सदी में साँची का स्तूप बच गया, पर अमरावती का स्तूप नष्ट हो गया। किताब इसके कौन-से कारण बताती है?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब के अनुसार साँची के बचे रहने के पीछे कुछ विवेकपूर्ण निर्णयों की बड़ी भूमिका थी, और अमरावती के नष्ट होने का एक कारण शायद उसकी खोज का थोड़ा पहले हो जाना था:
- खोज का समय: शायद अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी, जब विद्वान यह नहीं समझ पाए थे कि किसी पुरातात्विक अवशेष को उठाकर ले जाने की बजाय खोज की जगह पर ही संरक्षित करना कितना महत्वपूर्ण है।
- अमरावती के पत्थर बिखरे: 1796 में मंदिर बनाना चाहने वाले एक स्थानीय राजा ने अमरावती के स्तूप के पत्थरों के इस्तेमाल का निश्चय किया; 1850 के दशक में इसके उत्कीर्ण पत्थर कलकत्ता, मद्रास और लंदन तक पहुँच गए।
- साँची की देखभाल: फ्रांसीसी और अंग्रेज़ पूर्वी तोरणद्वार की प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए; शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम ने रख-रखाव के लिए धन दिया; और एच.एच. कोल की खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात साँची के लिए मान ली गई।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 83, 98, 99
2★★बुद्ध की मुख्य शिक्षाएँ क्या थीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: बौद्ध दर्शन और बुद्ध की शिक्षाओं की मुख्य बातें ये हैं:
- विश्व अनित्य है: विश्व लगातार बदल रहा है और आत्माविहीन है, क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं है।
- दुख और मध्यम मार्ग: इस क्षणभंगुर दुनिया में दुख मनुष्य के जीवन का अंतर्निहित तत्व है; घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच मध्यम मार्ग अपनाकर मनुष्य दुखों से मुक्ति पा सकता है।
- भगवान और समाज: प्रारंभिक परंपराओं में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था; बुद्ध मानते थे कि समाज का निर्माण इनसानों ने किया था, इसलिए उन्होंने राजाओं और गृहपतियों को दयावान और आचारवान होने की सलाह दी।
- निर्वाण: निर्वाण का मतलब था “अहं और इच्छा का खत्म हो जाना”।
बौद्ध परंपरा के अनुसार शिष्यों के लिए उनका अंतिम निर्देश था: “तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें खुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढ़ना है।”
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 91, 92
3★बौद्ध संघ में कौन-कौन आए, और संघ में सबके साथ कैसा व्यवहार होता था?
उत्तर देखिए
उत्तर: संघ भिक्षुओं की वह संस्था थी जो धम्म के शिक्षक बन गए:
- महिलाएँ: शुरू में सिर्फ़ पुरुष आ सकते थे; बाद में आनंद के समझाने पर महिलाओं को अनुमति मिली। महाप्रजापति गोतमी पहली भिक्खुनी बनीं, और कई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ बनीं।
- सभी वर्ग: अनुयायियों में राजा, धनवान, गृहपति और सामान्य जन कर्मकार, दास, शिल्पी, सभी शामिल थे।
- बराबरी: संघ में सभी बराबर माने जाते थे, क्योंकि उन्हें अपनी पुरानी पहचान त्याग देनी पड़ती थी। संघ गणों और संघों की परंपरा पर चलता था: लोग बातचीत से एकमत होने की कोशिश करते थे, और ऐसा न हो सके तो मतदान से निर्णय लेते थे।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 92
4★बुद्ध के जीवनकाल में और उनकी मृत्यु के बाद भी बौद्ध धर्म तेज़ी से क्यों फैला?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब इसके ये कारण बताती है:
- असंतोष: लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असंतुष्ट थे।
- उलझनें: उस युग में तेज़ी से हो रहे सामाजिक बदलावों ने लोगों को उलझनों में बाँध रखा था।
- आचरण, जन्म नहीं: बौद्ध शिक्षाओं में जन्म के आधार पर श्रेष्ठता की बजाय अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व दिया गया, जिससे महिलाएँ और पुरुष इस धर्म की तरफ़ आकर्षित हुए।
- करुणा: खुद से छोटे और कमज़ोर लोगों की तरफ़ मित्रता और करुणा के भाव के आदर्श काफ़ी लोगों को भाए।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 94
5★स्तूपों को बनाने और सजाने के लिए किन लोगों ने दान दिया, और इतिहासकारों को यह कैसे पता चलता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों पर मिले अभिलेखों से दान का पता चलता है:
- राजा: कुछ दान राजाओं ने दिए, जैसे सातवाहन वंश के राजा।
- श्रेणियाँ: कुछ दान शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियों ने दिए; साँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथी दाँत का काम करने वाले शिल्पकारों के दान से बना था।
- आम स्त्री-पुरुष और भिक्खु: सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों ने दान के अभिलेखों में अपना नाम, कभी-कभी गाँव या शहर, पेशा और रिश्तेदारों के नाम भी लिखवाए; भिक्खुओं और भिक्खुनियों ने भी दान दिया।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 96
6★उन्नीसवीं सदी में यूरोप के विद्वानों ने भारतीय मूर्तियों को समझने के लिए क्या तरीका अपनाया?
उत्तर देखिए
उत्तर: उन्होंने अपरिचित मूर्तियों को परिचित चीज़ों के आधार पर समझने की कोशिश की:
- पहली प्रतिक्रिया: देवी-देवताओं की मूर्तियाँ देखकर वे उनकी पृष्ठभूमि और महत्त्व नहीं समझ पाए; कई सिरों, हाथों वाली या मनुष्य और जानवर के रूपों को मिलाकर बनाई गई मूर्तियाँ उन्हें विकृत लगती थीं।
- यूनान से तुलना: उन्होंने इनकी तुलना प्राचीन यूनान की कला परंपरा से की, और प्रारंभिक भारतीय मूर्तिकला को उससे निम्न स्तर का माना।
- गांधार की मूर्तियाँ: बुद्ध और बोधिसत्त की मूर्तियों की खोज से वे काफ़ी उत्साहित हुए, क्योंकि ये मूर्तियाँ यूनानी प्रतिमानों से प्रभावित थीं। ये ज़्यादातर तक्षशिला और पेशावर जैसे उत्तर-पश्चिम के नगरों में मिली थीं, जहाँ ईसा से दो सौ साल पहले भारतीय-यूनानी शासकों ने राज्य बनाए थे। यूनानी परंपरा से परिचित होने के कारण विद्वानों ने इन्हें भारतीय मूर्ति कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना माना।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 107, 108
खंड च — दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 अंक) — 6 प्रश्न
1★★यज्ञों की परंपरा, उपनिषदों के नए प्रश्न और शिक्षकों के वाद-विवाद के बारे में लिखिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: चिंतन, धार्मिक विश्वास और व्यवहार की कई धाराएँ प्राचीन युग से ही चली आ रही थीं, और धीरे-धीरे उन पर नए प्रश्न उठने लगे:
- ऋग्वेद: 1500 से 1000 ईसा पूर्व में संकलित; अग्नि, इंद्र, सोम आदि देवताओं की स्तुति, जिसका उच्चारण यज्ञों के समय होता था और लोग मवेशी, बेटे, स्वास्थ्य, लंबी आयु आदि के लिए प्रार्थना करते थे।
- यज्ञ: शुरू में यज्ञ सामूहिक रूप से होते थे; बाद में (लगभग 1000 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व) कुछ यज्ञ घरों के मालिक करते थे। राजसूय और अश्वमेध सरदार और राजा करते थे, जो इनके लिए ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भर थे।
- नए प्रश्न: उपनिषदों (छठी सदी ई.पू. से) से पता चलता है कि लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे; वैदिक परंपरा से बाहर के कुछ दार्शनिक पूछ रहे थे कि सत्य एक होता है या अनेक।
- वाद-विवाद: समकालीन बौद्ध ग्रंथों में 64 संप्रदायों का उल्लेख है। शिक्षक घूम-घूम कर कुटागारशालाओं या उपवनों में तर्क-वितर्क करते थे, और जो शिक्षक अपने प्रतिद्वंद्वी को तर्कों से समझा लेता, प्रतिद्वंद्वी अपने अनुयायियों के साथ उसका शिष्य बन जाता था।
- वेदों पर प्रश्न: महावीर और बुद्ध समेत कई शिक्षक वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाते थे और मानते थे कि जीवन के दुखों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता था।
यह समझ ब्राह्मणवाद से बिलकुल भिन्न थी। आजीविक और लोकायत जैसी परंपराओं के ग्रंथ नष्ट हो गए हैं, इसलिए उनके बारे में हम अन्य परंपराओं से ही जानते हैं।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 84, 85, 87
2★★जैन धर्म के मुख्य सिद्धांत क्या थे, और यह धर्म कैसे फैला?
उत्तर देखिए
उत्तर: जैनों के मूल सिद्धांत छठी सदी ईसा पूर्व में वर्धमान महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे:
- तीर्थंकर: जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक हो चुके थे, जिन्हें तीर्थंकर कहा जाता है।
- प्राणवान विश्व और अहिंसा: जैन दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा है कि “संपूर्ण विश्व प्राणवान है”; पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन माना जाता है। इनसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को न मारना जैन दर्शन का केंद्र बिंदु है, और जैन अहिंसा के सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया।
- कर्म और त्याग: जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म से निर्धारित होता है; मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या चाहिए, इसलिए विहारों में निवास एक अनिवार्य नियम बन गया।
- पाँच व्रत: हत्या न करना, चोरी नहीं करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य और धन संग्रह न करना।
- विस्तार: उपदेश अक्सर कहानियों के रूप में दिए जाते थे (जैसे उत्तराध्ययन सूत्र में महारानी कमलावती की बात)। धीरे-धीरे जैन धर्म भारत के कई हिस्सों में फैल गया, और जैन विद्वानों ने प्राकृत, संस्कृत, तमिल जैसी अनेक भाषाओं में काफ़ी साहित्य रचा।
जैन विद्वानों के रचे इन ग्रंथों की पांडुलिपियाँ सैकड़ों वर्षों से मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में संरक्षित हैं।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 88, 89
3★★स्तूप क्यों बनाए गए? उनकी संरचना और उपासकों की परिक्रमा का वर्णन कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: बुद्ध से जुड़ी जगहें धीरे-धीरे पवित्र स्थल बन गईं, और स्तूप बौद्ध धर्म के प्रतीक बन गए:
- पवित्र स्थल: लुम्बिनी (जन्म), बोधगया (ज्ञान), सारनाथ (प्रथम उपदेश) और कुशीनगर (निब्बान); बुद्ध के समय से लगभग दो सौ वर्षों बाद असोक ने लुम्बिनी की अपनी यात्रा की याद में एक स्तंभ बनवाया।
- अवशेष: कई पवित्र जगहों पर बुद्ध से जुड़े अवशेष, जैसे उनकी अस्थियाँ या उनके इस्तेमाल किए हुए सामान, गाड़े गए; इन टीलों को स्तूप कहते थे। यह परंपरा बुद्ध से पहले की रही होगी, लेकिन वह बौद्ध धर्म से जुड़ गई।
- असोक और प्रसार: अशोकावदान के अनुसार असोक ने बुद्ध के अवशेषों के हिस्से हर महत्वपूर्ण शहर में बाँटकर उनके ऊपर स्तूप बनाने का आदेश दिया; ईसा पूर्व दूसरी सदी तक भरहुत, साँची और सारनाथ जैसी जगहों पर स्तूप बनाए जा चुके थे।
- संरचना: मिट्टी का गोलार्ध टीला अंड, उसके ऊपर देवताओं के घर का प्रतीक हर्मिका, उससे निकला मस्तूल यष्टि और उस पर अक्सर छत्री; टीले के चारों ओर वेदिका, जो पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी, और चारों दिशाओं में नक्काशी वाले तोरणद्वार।
- परिक्रमा: उपासक पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश करके टीले को दाईं तरफ़ रखते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे, “मानो वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे हों”।
बाद में स्तूप के टीले पर भी अलंकरण और नक्काशी होने लगी, जैसे अमरावती और पेशावर (पाकिस्तान) में शाह जी की ढेरी के स्तूपों में।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 95, 96, 97
4★साँची की मूर्तिकला को इतिहासकार कैसे समझते हैं? कथाओं, प्रतीकों और लोक परंपराओं के उदाहरण दीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब कहती है कि “ऐसी मूर्तिकला को अक्षरश: नहीं समझा जा सकता है”, इसलिए इतिहासकार उसे ग्रंथों और परंपराओं से मिलाकर पढ़ते हैं:
- कथाएँ: पहली नज़र में एक मूर्तिकला अंश फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाला ग्रामीण दृश्य लगता है, पर गहराई से अध्ययन करने वाले कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक का एक दृश्य बताते हैं: एक दानी राजकुमार की कहानी, जिसने अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को सौंप दिया।
- प्रतीक: कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर प्रतीकों से दिखाया: रिक्त स्थान ध्यान की दशा का, स्तूप महापरिनिब्बान का और चक्र सारनाथ के पहले उपदेश का प्रतीक बना।
- शालभंजिका: लोक परंपरा का शुभ प्रतीक, जो दिखाता है कि बौद्ध धर्म में आए लोगों ने दूसरे विश्वासों से बौद्ध धर्म को समृद्ध किया।
- जानवर: ऐसा लगता है कि लोगों को आकर्षित करने के लिए जानवर उकेरे गए, और वे मनुष्यों के गुणों के प्रतीक भी थे: “हाथी शक्ति और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे”।
- कमल दल और हाथियों के बीच एक महिला: इस मूर्ति में हाथी उनके ऊपर जल छिड़क रहे हैं, जैसे उनका अभिषेक कर रहे हों; कुछ इतिहासकार उन्हें बुद्ध की माँ माया से जोड़ते हैं, तो दूसरे उन्हें सौभाग्य लाने वाली लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी मानते हैं।
सर्प जैसे प्रतीक भी उन लोक परंपराओं से लिए गए प्रतीत होते हैं जिनका ग्रंथों में हमेशा ज़िक्र नहीं होता था।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 99, 100, 101, 102, 103
5★★महायान बौद्ध मत और पौराणिक हिंदू धर्म में मुक्तिदाता की कल्पना कैसे उभरी?
उत्तर देखिए
उत्तर: “ईसा की प्रथम सदी के बाद” बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव नज़र आते हैं, और मिलते-जुलते विश्वास दूसरी परंपराओं में भी विकसित हुए:
- प्रारंभिक बौद्ध मत: निब्बान के लिए व्यक्तिगत प्रयास को विशेष महत्त्व था, और बुद्ध को भी एक मनुष्य समझा जाता था जिन्होंने व्यक्तिगत प्रयास से प्रबोधन और निब्बान प्राप्त किया।
- महायान: धीरे-धीरे मुक्तिदाता की कल्पना उभरी; बोधिसत्तों को परम करुणामय जीव माना गया जो अपने पुण्य से दूसरों की सहायता करते थे, और बुद्ध व बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा इस परंपरा का महत्वपूर्ण अंग बन गई। इसे अपनाने वालों ने पुरानी परंपरा को हीनयान कहा, जबकि उसके अनुयायी खुद को थेरवादी कहते थे।
- वैष्णव और शैव: विष्णु या शिव जैसे एक विशेष देवता की पूजा, जिसमें पूजा करने वाले और ईश्वर का रिश्ता प्रेम और समर्पण का था; इसे भक्ति कहते हैं।
- अवतार: वैष्णव परंपरा में दस अवतारों की कल्पना है; माना जाता था कि पापियों के बढ़ते प्रभाव से दुनिया में अव्यवस्था और नाश की स्थिति आने पर भगवान विश्व की रक्षा के लिए अलग-अलग रूपों में अवतार लेते थे।
- पुराण: सामान्यत: संस्कृत श्लोकों में लिखे पुराण ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते थे, और महिलाएँ और शूद्र भी इन्हें सुन सकते थे।
पुराणों की ज़्यादातर कहानियाँ लोगों के आपसी मेल-मिलाप से विकसित हुईं; उदाहरण के लिए, मथुरा इलाके के महत्वपूर्ण देवता वासुदेव-कृष्ण की पूजा कई शताब्दियों में देश के दूसरे इलाकों में भी फैल गई।
किताब की कालरेखा 1 में “महायान बौद्ध मत का विकास, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ” लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे के समय में रखी गई हैं।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 103, 104, 105, 110
6★प्रारंभिक मंदिरों का विकास कैसे हुआ?
उत्तर देखिए
उत्तर: जिस समय साँची जैसी जगहों में स्तूप अपने विकसित रूप में आ गए थे, उसी समय देवी-देवताओं की मूर्तियाँ रखने के लिए सबसे पहले मंदिर भी बनाए गए:
- गर्भगृह: शुरू के मंदिर एक चौकोर कमरे के रूप में थे, जिसमें एक दरवाज़ा होता था जिससे उपासक मूर्ति की पूजा करने भीतर जा सकता था।
- शिखर और दीवारें: धीरे-धीरे गर्भगृह के ऊपर एक ऊँचा ढाँचा, शिखर, बनने लगा; मंदिर की दीवारों पर अक्सर भित्ति चित्र उत्कीर्ण किए जाते थे।
- बाद के मंदिर: बाद के युगों में मंदिरों के साथ विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें और तोरण जुड़ गए, और जल आपूर्ति का इंतज़ाम भी होने लगा।
- कृत्रिम गुफाएँ: कुछ शुरुआती मंदिर पहाड़ियों को काटकर खोखला करके कृत्रिम गुफाओं के रूप में बनाए गए। सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनी थीं।
- कैलाशनाथ: इस परंपरा का सबसे विकसित रूप आठवीं सदी के कैलाशनाथ मंदिर में दिखता है, जिसमें पूरी पहाड़ी काटकर मंदिर बना दिया गया।
एक ताम्रपत्र अभिलेख में एलोरा के प्रमुख तक्षक का आश्चर्य दर्ज है: “हे भगवान यह मैंने कैसे बनाया!”
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 105, 106, 107
खंड छ — स्रोत पर आधारित प्रश्न (4 अंक) — 4 प्रश्न
1★स्रोत 3 (नियतिवादी और भौतिकवादी) के ये अंश पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
“सुख और दुख मानो पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं।” “मनुष्य चार तत्वों से बना होता है।” “मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता।”
उत्तर और व्याख्या देखिए
उत्तर:
- (क) पहला अंश मक्खलि गोसाल का है, जो आजीविक परंपरा के थे; इन्हें “अक्सर नियतिवादी कहा जाता है”। बाकी दो अंश लोकायत परंपरा के अजीत केसकंबलिन् के हैं।
- (ख) मगध के राजा अजातसत्तु ने: सुत्त पिटक के इस दृष्टांत में वे बुद्ध के पास जाकर मक्खलि गोसाल की बातें बताते हैं।
- (ग) किताब के शब्दों में: “इन दार्शनिक परंपराओं के ग्रंथ नष्ट हो गए हैं। इसलिए हमें अन्य परंपराओं से ही उनके बारे में जानकारी मिलती है।” स्रोत 3 भी ऐसा ही एक बौद्ध ग्रंथ है।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 87
2★★स्रोत 6 (थेरीगाथा) के ये अंश पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
“कि पानी में नहाने से बुराई से मुक्ति मिलती है?…” “वैसा हो तो सारे मेंढक और कछुए स्वर्ग जाएँगे”
उत्तर और व्याख्या देखिए
उत्तर:
- (क) थेरीगाथा सुत्त पिटक का हिस्सा है; इसमें भिक्खुनियों द्वारा रचित छंदों का संकलन है।
- (ख) पुन्ना एक दासी थी, जो अपने मालिक के घर के लिए प्रतिदिन सुबह नदी का पानी लाने जाती थी। वहाँ वह हर दिन एक ब्राह्मण को स्नान कर्म करते देखती थी; यह पद्य उसी ब्राह्मण से उसकी बातचीत है।
- (ग) पुन्ना का तर्क है कि पानी में नहाने से बुराई नहीं मिटती; अगर ऐसा होता तो पानी में रहने वाले मेंढक, कछुए, साँप और मगरमच्छ सब स्वर्ग जाते। किताब के अनुसार थेरीगाथा से “महिलाओं के सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभवों के बारे में अंतर्दृष्टि मिलती है”।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 93
3★★स्रोत 8 (स्तूप क्यों बनाए जाते थे?) का यह अंश पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
“उन्हें तथागत के लिए चार महापथों के चौक पर थूप (स्तूप का पालि रूप) बनाना चाहिए। जो भी वहाँ धूप या माला चढ़ाएगा… या वहाँ सिर नवाएगा, या वहाँ पर हृदय में शांति लाएगा, उन सबके लिए वह चिर काल तक सुख और आनंद का कारण बनेगा।”
उत्तर और व्याख्या देखिए
उत्तर:
- (क) महापरिनिब्बान सुत्त से, जो सुत्त पिटक का हिस्सा है; परिनिर्वाण से पूर्व आनंद ने पूछा था कि तथागत के अवशेषों का क्या करेंगे, और विशेष आग्रह करने पर बुद्ध ने यह बात कही।
- (ख) तथागत बुद्ध का दूसरा नाम है, और थूप स्तूप का पालि रूप है।
- (ग) जो वहाँ धूप या माला चढ़ाएगा, सिर नवाएगा या हृदय में शांति लाएगा, उसके लिए स्तूप चिर काल तक सुख और आनंद का कारण बनेगा। स्तूपों में ऐसे अवशेष रहते थे जिन्हें पवित्र समझा जाता था, इसलिए समूचे स्तूप को बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठा मिली।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 96
4★स्रोत 7 (भिक्षुओं और भिक्खुनियों के लिए नियम) के ये अंश पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
“जब कोई भिक्खु एक नया कंबल या गलीचा बनाएगा तो उसे इसका प्रयोग कम से कम छ: वर्षों तक करना पड़ेगा।” ”…वह दो से तीन कटोरा भर ही स्वीकार कर सकता है।”
उत्तर और व्याख्या देखिए
उत्तर:
- (क) विनय पिटक में।
- (ख) नया कंबल या गलीचा बनाने वाले भिक्खु को उसका प्रयोग कम से कम छ: वर्षों तक करना पड़ता था।
- (ग) इन नियमों से पता चलता है कि भिक्खु कम से कम चीज़ों में गुज़ारा करते थे: नया कंबल या गलीचा कम से कम छ: वर्षों तक चलाना पड़ता था, और गृहस्थ के घर भोजन मिलने पर वे दो से तीन कटोरा भर ही ले सकते थे। किताब का मुख्य पाठ भी बताता है कि संघ के ये श्रमण सादा जीवन बिताते थे: उनके पास जीवनयापन के लिए अत्यावश्यक चीज़ों के अलावा कुछ नहीं होता था, और दान पर निर्भर होने के कारण उन्हें भिक्खु कहा जाता था।
संदर्भ: NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4, पृष्ठ 92, 94
उत्तर लिखने का तरीक़ा
| अंक | लंबाई | कैसे लिखें |
|---|---|---|
| 1 अंक | एक वाक्य | सीधे उत्तर |
| 2 अंक | 30–40 शब्द | उत्तर + कारण या उदाहरण |
| 3 अंक | 60–80 शब्द | तीन बिंदु, पूरे वाक्यों में |
| 4 अंक (स्रोत) | हर भाग 1–3 वाक्य | पहले अंश में उत्तर खोजिए, फिर किताब की बात जोड़िए |
| 5 अंक | लगभग 120 शब्द | भूमिका + पाँच बिंदु + निष्कर्ष |
★इस अध्याय के लिए तीन सलाह:
- किताब के शब्द लिखिए: त्रिपिटक, भिक्खु, भिक्खुनी, तीर्थंकर, नियतिवादी, भौतिकवादी, अंड, हर्मिका, वेदिका, बोधिसत्त, गर्भगृह, शिखर। पहले शब्द का अर्थ एक वाक्य में बताइए, फिर उदाहरण दीजिए।
- हर बात के साथ लिखिए कि इतिहासकार उसे कैसे जानते हैं: कौन-सा ग्रंथ (सुत्त पिटक, विनय पिटक, थेरीगाथा, उत्तराध्ययन सूत्र, अशोकावदान), कौन-सा अभिलेख या कौन-सी मूर्ति, और किताब का कौन-सा स्रोत (स्रोत 3 से स्रोत 8)।
- तिथियाँ और अनुमान किताब की तरह लिखिए: “1500 से 1000 ईसा पूर्व”, “छठी सदी ई.पू.”, “ईसा पूर्व तीसरी सदी”, “आठवीं सदी”, 1796, 1818, 1989; और “शायद”, “लगभग”, “कुछ इतिहासकार” जैसे शब्द मत छोड़िए, क्योंकि बात उन्हीं से सही बनती है।
तीन नमूना परीक्षा-पत्र
हर पत्र के सभी प्रश्नों के उत्तर इसी पन्ने के ऊपर के खंडों में हैं। पहले बिना देखे लिखिए, फिर मिलाइए।
नमूना पत्र 1 (कुल 20 अंक)
| प्र. | प्रश्न | अंक |
|---|---|---|
| 1 | राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ कौन किया करते थे? | 1 |
| 2 | रिक्त स्थान भरिए: बुद्ध की शिक्षाओं के संग्रहों को त्रिपिटक कहा जाता था, जिसका शब्दार्थ है ……… । | 1 |
| 3 | सही या ग़लत: आजीविक और लोकायत परंपराओं के अपने ग्रंथ आज भी मिलते हैं। | 1 |
| 4 | स्तूप के मुख्य हिस्सों के नाम लिखिए। | 2 |
| 5 | स्रोत 3 के आधार पर नियतिवादी और भौतिकवादी विचारों में अंतर बताइए। | 2 |
| 6 | उन्नीसवीं सदी में साँची का स्तूप बच गया, पर अमरावती का स्तूप नष्ट हो गया। किताब इसके कौन-से कारण बताती है? | 3 |
| 7 | यज्ञों की परंपरा, उपनिषदों के नए प्रश्न और शिक्षकों के वाद-विवाद के बारे में लिखिए। | 5 |
| 8 | स्तूप क्यों बनाए गए? उनकी संरचना और उपासकों की परिक्रमा का वर्णन कीजिए। | 5 |
नमूना पत्र 2 (कुल 20 अंक)
| प्र. | प्रश्न | अंक |
|---|---|---|
| 1 | जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले कितने शिक्षक (तीर्थंकर) हो चुके थे? | 1 |
| 2 | रिक्त स्थान भरिए: महायान परंपरा में ……… को परम करुणामय जीव माना गया, जो अपने सत्कार्यों से कमाए पुण्य से दूसरों की सहायता करते थे। | 1 |
| 3 | सही या ग़लत: स्तूप बनाने की परंपरा निश्चित रूप से बौद्ध धर्म ने ही शुरू की थी। | 1 |
| 4 | बौद्ध त्रिपिटक के तीनों पिटकों में क्या रखा गया? | 2 |
| 5 | महायान, हीनयान और थेरवाद नाम किसने, किसके लिए इस्तेमाल किए? | 2 |
| 6 | बुद्ध की मुख्य शिक्षाएँ क्या थीं? | 3 |
| 7 | जैन धर्म के मुख्य सिद्धांत क्या थे, और यह धर्म कैसे फैला? | 5 |
| 8 | महायान बौद्ध मत और पौराणिक हिंदू धर्म में मुक्तिदाता की कल्पना कैसे उभरी? | 5 |
नमूना पत्र 3 (कुल 20 अंक)
| प्र. | प्रश्न | अंक |
|---|---|---|
| 1 | साँची की खोज किस वर्ष हुई, जब इसके तीन तोरणद्वार तब भी खड़े थे? | 1 |
| 2 | रिक्त स्थान भरिए: साँची को ……… में एक विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया। | 1 |
| 3 | सही या ग़लत: जेम्स फर्गुसन ने बौद्ध ग्रंथ पढ़कर साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र माना था। | 1 |
| 4 | जैन साधु और साध्वी कौन-से पाँच व्रत करते थे, और वे संसार का त्याग क्यों करते थे? | 2 |
| 5 | स्तूप के अलंकरण में शालभंजिका की मूर्ति क्यों दिखती है, और इससे बौद्ध धर्म के बारे में क्या पता चलता है? | 2 |
| 6 | बुद्ध के जीवनकाल में और उनकी मृत्यु के बाद भी बौद्ध धर्म तेज़ी से क्यों फैला? | 3 |
| 7 | साँची की मूर्तिकला को इतिहासकार कैसे समझते हैं? कथाओं, प्रतीकों और लोक परंपराओं के उदाहरण दीजिए। | 5 |
| 8 | प्रारंभिक मंदिरों का विकास कैसे हुआ? | 5 |