Chapter 7एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

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NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग II (कक्षा 12), विषय 7

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यह पन्ना परीक्षा से पहले दोहराने के लिए है। हर हिस्से की शुरुआत में किताब के पृष्ठ लिखे हैं, ताकि शक हो तो वहीं खोलकर देख लीजिए। पृष्ठ संख्याएँ 2026-27 में छपी किताब की हैं।

यह अध्याय लगभग चौदहवीं से सोलहवीं सदी तक के विजयनगर साम्राज्य और उसकी राजधानी की बात करता है। चौदहवीं शताब्दी में स्थापित यह साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर उत्तर में कृष्णा नदी से प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण तक फैला था। 1565 में राजधानी पर आक्रमण हुआ, उसे लूटा गया और कुछ ही वर्षों में वह उजड़ गई। अध्याय दिखाता है कि इतिहासकार और पुरातत्त्वविद इस शहर को उसके खंडहरों, अभिलेखों, विदेशी यात्रियों के वृत्तांतों और साहित्य से कैसे पढ़ते हैं: 1800 में कॉलिन मैकेन्ज़ी के सर्वेक्षण से शुरू होकर राय और नायकों की राजनीति, शहर के पानी और क़िलेबंदी, राजकीय केंद्र और धार्मिक केंद्र तक, और अंत में उन प्रश्नों तक जिनके उत्तर इमारतें अकेले नहीं दे सकतीं।

तारों का मतलब: ★★किताब की प्रश्नावली (पृष्ठ 194–195) में सीधे पूछा गया · ★उन उत्तरों में काम आता है · बिना तारे के: पृष्ठभूमि या किताब की गतिविधि।


1. अध्याय एक नज़र में

  • काल: लगभग चौदहवीं से सोलहवीं सदी तक।
  • इस अध्याय के स्रोत: भवनों के अवशेष और उनके नक्शे, खड़े रेखाचित्र और छाया चित्र, अभिलेख, विदेशी यात्रियों के वृत्तांत, तेलुगु, कन्नड़, तमिल और संस्कृत का साहित्य, और लोगों की मौखिक परंपराएँ।

2. ज़रूरी शब्द★

शब्दमतलब (हमारे शब्दों में)पृष्ठ
हम्पीउजड़े विजयनगर का वह नाम जिससे कृष्णा–तुंगभद्रा दोआब के लोग उसे याद रखते रहे; यह नाम स्थानीय मातृदेवी पम्पादेवी के नाम से बना170
कर्नाटक साम्राज्यमुविजयनगर साम्राज्य के लिए समकालीन लोगों का नाम; “विजयनगर साम्राज्य” इतिहासकारों का शब्द है171
रायविजयनगर के शासक अपने को इसी नाम से पुकारते थे172
कुदिरई चेट्टीघोड़ों के स्थानीय व्यापारी, जो अरब व्यापारियों के साथ घोड़ों के व्यापार में भाग लेते थे172
गजपतिशाब्दिक अर्थ हाथियों का स्वामी; पंद्रहवीं शताब्दी में उड़ीसा के एक शक्तिशाली वंश का नाम172
अश्वपतिघोड़ों के स्वामी: विजयनगर की लोक परंपराओं में दक्कन के सुल्तानों के लिए172
नरपतिलोगों के स्वामी: विजयनगर की लोक परंपराओं में रायों के लिए172
यवनसंस्कृत शब्द, जो यूनानियों और उत्तर-पश्चिम से उपमहाद्वीप में आने वाले दूसरे लोगों के लिए प्रयोग होता था174
नायकविजयनगर साम्राज्य के सेना प्रमुख, जो आम तौर पर क़िलों पर नियंत्रण रखते थे और जिनके पास सशस्त्र समर्थक होते थे; ये आम तौर पर तेलुगु या कन्नड़ बोलते थे175
अमर–नायकसैनिक कमांडर, जिन्हें राय प्रशासन के लिए राज्य-क्षेत्र देते थे; अमर शब्द संस्कृत समर (लड़ाई या युद्ध) से बना माना जाता है175
इक्तादिल्ली सल्तनत की प्रणाली; ऐसा प्रतीत होता है कि अमर–नायक प्रणाली के कई तत्त्व इसी से लिए गए175
हौज़विजयनगर में जल-धाराओं के साथ बाँध बनाकर बनाए गए अलग-अलग आकार के जलाशय177
बुर्ज़क़िलेबंद दीवार से बाहर की ओर निकले वर्गाकार या आयताकार हिस्से177
इंडो–इस्लामिक (हिंद–इस्लामी)कला-इतिहासकारों का नाम उस शैली के लिए जो अलग-अलग क्षेत्रों की स्थानीय स्थापत्य परंपराओं के साथ संपर्क से विकसित हुई; मेहराब और गुंबद इसके तत्त्व माने जाते हैं178
राजकीय केंद्रविजयनगर बस्ती का दक्षिण-पश्चिमी भाग, जिसमें लगभग तीस महल और 60 से भी अधिक मन्दिर थे179
महानवमी डिब्बाराजकीय केंद्र में शहर के सबसे ऊँचे स्थानों में से एक पर बना विशाल मंच; नाम महानवमी (महान नवाँ दिवस) के त्योहार से180
खड़ा रेखाचित्रकिसी वस्तु या संरचना का ऊर्ध्व अवलोकन, जो वे अभिलक्षण भी दिखाता है जो छाया-चित्र में नहीं दिखते181
नक्शाकिसी संरचना का समस्तरी (ऊपर से देखा) अवलोकन182
धार्मिक केंद्रविजयनगर शहर का तुंगभद्रा नदी के किनारे वाला चट्टानी उत्तरी भाग184
हिन्दू सूरतराणाविजयनगर के शासकों की उपाधि: अरबी शब्द सुल्तान (राजा) का संस्कृत रूपांतरण, शाब्दिक अर्थ हिंदू सुलतान184
राय गोपुरम्मन्दिर का राजकीय प्रवेशद्वार, जो अक्सर केंद्रीय देवालयों की मीनारों को बौना कर देता था और दूर से मन्दिर का संकेत देता था185
मण्डपमन्दिर के देवस्थलों के चारों ओर बने सभागार: कुछ में संगीत, नृत्य और नाटक, कुछ में देवताओं के विवाह, कुछ में देवताओं को झूला झुलाना185, 187
रथ गलीमन्दिर के गोपुरम् से सीधी रेखा में जाने वाली, पत्थर के फर्श वाली गली, जिसके दोनों ओर स्तंभ वाले मण्डपों में व्यापारी दुकानें लगाते थे188

3. हम्पी की खोज★★

किताब का भाग 1 और स्रोत 1, पृष्ठ 170–171 · प्रश्नावली में: प्रश्न 1

साम्राज्य और उसकी याद (अध्याय की शुरुआत)

  • स्थापना और फैलाव: विजयनगर साम्राज्य चौदहवीं शताब्दी में स्थापित हुआ। अपने चरमोत्कर्ष पर यह उत्तर में कृष्णा नदी से प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण तक फैला था।
  • पतन: 1565 में राजधानी पर आक्रमण हुआ, उसे लूटा गया और बाद में वह उजड़ गई। सत्रहवीं–अठारहवीं शताब्दियों तक यह पूरी तरह नष्ट हो गई।
  • याद में ज़िंदा: फिर भी यह कृष्णा–तुंगभद्रा दोआब के लोगों की स्मृतियों में हम्पी के नाम से जीवित रहा। यह नाम स्थानीय मातृदेवी पम्पादेवी के नाम से बना।
  • किनसे जाना: मौखिक परंपराओं, पुरातात्विक खोजों, स्थापत्य के नमूनों, अभिलेखों और दूसरे दस्तावेज़ों ने विद्वानों को इस साम्राज्य को फिर से खोजने में मदद की।

भग्नावशेष कैसे सामने आए (भाग 1)

  • 1800 ई.: ईस्ट इण्डिया कंपनी में कार्यरत अभियंता और पुराविद कर्नल कॉलिन मैकेन्ज़ी ने हम्पी के भग्नावशेष प्रकाश में लाए, और इस स्थान का पहला सर्वेक्षण मानचित्र बनाया।
  • पहली जानकारी पुरोहितों से: मैकेन्ज़ी की शुरुआती जानकारी विरुपाक्ष मंदिर और पम्पादेवी के पूजास्थल के पुरोहितों की स्मृतियों पर आधारित थी।
  • 1856 ई. से छाया चित्र: छायाचित्रकारों ने यहाँ के भवनों के चित्र संकलित करने शुरू किए।
  • 1836 से अभिलेख: अभिलेखकर्ताओं ने यहाँ से कई दर्जन अभिलेख इकट्ठे किए।
  • मिलान: इतिहासकारों ने इन स्रोतों का विदेशी यात्रियों के वृत्तांतों और तेलुगु, कन्नड़, तमिल और संस्कृत में लिखे साहित्य से मिलान करके शहर और साम्राज्य का इतिहास जोड़ा।

हम्पी को पढ़ने के तरीके, साल के क्रम में

1800सर्वेक्षण मानचित्रकॉलिन मैकेन्ज़ी; पुरोहितों की स्मृतियों पर आधारित शुरुआती जानकारी
1836 सेअभिलेखकई दर्जन अभिलेख इकट्ठे हुए
1856छाया चित्रअलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ के पहले विस्तृत चित्र
1876मन्दिरों की दीवारों के अभिलेखजे.एफ. फ्लीट ने प्रलेखन शुरू किया
1902संरक्षणजॉन मार्शल के अधीन
1976राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल
1980 के दशक के आरंभ सेविस्तृत प्रलेखनपूरे क्षेत्र के 25 वर्ग; लगभग बीस वर्ष
1986विश्व धरोहर स्थलयूनेस्को ने घोषित किया
NCERT, पृष्ठ 170, 188–189, 193

कॉलिन मैकेन्ज़ी (स्रोत 1, पृष्ठ 171)

  • परिचय: 1754 ई. में जन्मे मैकेन्ज़ी अभियंता, सर्वेक्षक और मानचित्रकार थे। 1815 में उन्हें “भारत का पहला सर्वेयर जनरल” बनाया गया, और 1821 में अपनी मृत्यु तक वे इसी पद पर रहे।
  • काम का उद्देश्य: उन्होंने स्थानीय इतिहास और परंपराएँ इकट्ठी कीं और ऐतिहासिक स्थलों का सर्वेक्षण किया, “भारत के अतीत को बेहतर ढंग से समझने और उपनिवेश के प्रशासन को आसान बनाने के लिए”।
  • उनका नज़रिया: उनके अनुसार ब्रिटिश प्रशासन के आने से पहले दक्षिण भारत लंबे समय तक “खराब प्रबंधन की दुर्गति” से जूझता रहा।
  • सहायक: मैकेन्ज़ी के साथ उनके ब्राह्मण सहायक काम करते थे: एक जैन पंडित, और तेलुगु ब्राह्मण कावलेरी वेन्तक लच्छमैया।

4. राय, नायक और सुलतान★

किताब का भाग 2, पृष्ठ 171–175 · प्रश्नावली में: प्रश्न 3, 7, 8, 10

साम्राज्य की स्थापना और पड़ोसी (भाग 2)

  • स्थापना: “परंपरा और अभिलेखीय साक्ष्यों के अनुसार” विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 में दो भाइयों, हरिहर और बुक्का ने की। (पृष्ठ 193 की काल-रेखा 1 में यह तिथि “1336?” छपी है, यानी अनिश्चित।)
  • लोग: साम्राज्य की सीमाएँ बदलती रहती थीं, और इसमें अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले और अलग-अलग धार्मिक परंपराओं को मानने वाले लोग रहते थे।
  • उत्तरी सीमा पर संघर्ष: विजयनगर के शासकों की होड़ दक्कन के सुलतानों और उड़ीसा के गजपति शासकों से थी, उपजाऊ नदी घाटियों और विदेशी व्यापार से होने वाली समृद्धि के लिए।
  • संपर्क से सीखना: इन राज्यों से संपर्क में विचारों का आदान-प्रदान हुआ, “विशेष रूप से स्थापत्य के क्षेत्र में”। विजयनगर के शासकों ने अवधारणाएँ और भवन निर्माण की तकनीकें ग्रहण कीं और उन्हें आगे विकसित किया।
  • पुरानी परंपराएँ: तमिलनाडु में चोल और कर्नाटक में होयसाल राज्य पहले रह चुके थे। उनके शासक वर्ग ने तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर और बेलूर के चन्नकेशव मंदिर जैसे मंदिरों को संरक्षण दिया था। विजयनगर के शासक, जो अपने को राय कहते थे, इन परंपराओं को आगे ले गए और “नयी ऊँचाइयों तक पहुँचाया”।
  • नाम (बॉक्स, पृष्ठ 171): “जहाँ इतिहासकार विजयनगर साम्राज्य शब्द का प्रयोग करते हैं वहीं समकालीन लोगों ने उसे कर्नाटक साम्राज्यमु की संज्ञा दी।”

शासक और व्यापारी (भाग 2.1)

  • घोड़े: उस समय की युद्धकला प्रभावशाली अश्वसेना पर आधारित थी, इसलिए अरब और मध्य एशिया से घोड़ों का आयात ज़रूरी था। शुरुआती दौर में यह व्यापार अरब व्यापारियों के हाथ में था; स्थानीय व्यापारी, कुदिरई चेट्टी (घोड़ों के व्यापारी), भी इसमें भाग लेते थे।
  • पुर्तगाली: 1498 ई. से पुर्तगाली उपमहाद्वीप के पश्चिमी तट पर आने लगे और व्यापारिक और सामरिक केंद्र बनाने की कोशिश करने लगे। उनकी बेहतर सैन्य तकनीक, विशेषकर बंदूकों, ने उनकी मदद की।
  • बाज़ार और प्रतिष्ठा: विजयनगर मसालों, वस्त्रों और रत्नों के बाज़ारों के लिए जाना जाता था। व्यापार प्रतिष्ठा का मानक था; समृद्ध जनता मँहगी विदेशी वस्तुएँ, विशेषकर रत्न और आभूषण, चाहती थी; और व्यापार से मिलने वाला राजस्व राज्य की समृद्धि बढ़ाता था।
  • हाथी, घोड़े और लोग (बॉक्स, पृष्ठ 172): “गजपति का शाब्दिक अर्थ हाथियों का स्वामी होता है।” यह पंद्रहवीं शताब्दी में उड़ीसा के एक शक्तिशाली वंश का नाम था। विजयनगर की लोक परंपराओं में दक्कन के सुल्तानों को अश्वपति (घोड़ों के स्वामी) और रायों को नरपति (लोगों के स्वामी) कहा गया।

राज्य का चरमोत्कर्ष तथा पतन (भाग 2.2)

विजयनगर के राजवंश, किताब के क्रम में

पहला राजवंशसंगम1485 तक नियंत्रण
दूसरासुलुव1503 तक शासन
तीसरातुलुवकृष्णदेव राय इसी वंश के
चौथाअराविदुसत्रहवीं शताब्दी के अंत तक सत्ता में; 1565 के बाद पेनुकोण्डा, फिर चन्द्रगिरी से शासन
NCERT, पृष्ठ 173
  • सत्ता के दावेदार: सत्ता के दावेदारों में शासक वंश के सदस्य और सैनिक कमांडर, दोनों थे। सुलुव “सैनिक कमांडर थे”।
  • कृष्णदेव राय (तुलुव वंश; शासनकाल 1509–29): उनका शासन “विस्तार और दृढ़ीकरण” का था।
    • 1512 में तुंगभद्रा और कृष्णा के बीच का रायचूर दोआब हासिल हुआ; 1514 में उड़ीसा के शासकों का दमन हुआ; 1520 में बीजापुर के सुल्तान को बुरी तरह पराजित किया गया।
    • राज्य हमेशा सैनिक रूप से तैयार रहता था, फिर भी “अतुलनीय शांति और समृद्धि की स्थितियों में फला–फूला”।
    • कुछ बेहतरीन मंदिरों का निर्माण और कई महत्त्वपूर्ण दक्षिण भारतीय मंदिरों में भव्य गोपुरमों को जोड़ने का श्रेय उन्हें दिया जाता है। उन्होंने अपनी माँ के नाम पर विजयनगर के समीप नगलपुरम् नामक उपनगर बसाया।
    • विजयनगर के सबसे विस्तृत विवरण उनके या उनके तुरंत बाद के काल के हैं।
  • दबाव और पतन: 1529 में कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद राजकीय ढाँचे में तनाव बढ़ा; उनके उत्तराधिकारियों को विद्रोही नायकों या सेनापतियों से चुनौती मिली। 1542 तक केंद्र पर नियंत्रण अराविदु वंश के हाथ में चला गया।
  • 1565 का युद्ध: दक्कन की सल्तनतों ने विजयनगर के विरुद्ध मैत्री–समझौता किया। 1565 में विजयनगर की सेना प्रधानमंत्री रामराय के नेतृत्व में राक्षसी–तांगड़ी (जिसे तालीकोटा भी कहते हैं) के युद्ध में बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुण्डा की संयुक्त सेनाओं से हारी। विजयी सेनाओं ने शहर लूटा, और कुछ ही वर्षों में शहर पूरी तरह उजड़ गया।
  • बाद में: साम्राज्य का केंद्र पूर्व की ओर चला गया; अराविदु वंश ने पेनुकोण्डा से और बाद में चन्द्रगिरी (तिरुपति के समीप) से शासन किया।
  • स्रोत 2 (राजा और व्यापारी): कृष्णदेव राय ने शासनकला पर तेलुगु में अमुक्तमल्यद लिखी। उसमें व्यापारियों के बारे में वे लिखते हैं:
    • “एक राजा को अपने बन्दरगाहों को सुधारना चाहिए और वाणिज्य को इस प्रकार प्रोत्साहित करना चाहिए कि घोड़ों, हाथियों, रत्नों, चंदन, मोती तथा अन्य वस्तुओं का खुले तौर पर आयात किया जा सके…”
    • तूफ़ान, बीमारी या थकान के कारण बंदरगाह पर उतरने वाले विदेशी नाविकों की अच्छी देखभाल होनी चाहिए।
    • हाथी और अच्छे घोड़े लाने वाले दूर देशों के व्यापारियों को रोज़ बैठक में बुलाकर तोहफ़े देने चाहिए और उचित मुनाफ़ा कमाने देना चाहिए; “ऐसा करने पर ये वस्तुएँ कभी भी तुम्हारे दुश्मनों तक नहीं पहुँचेंगी।”
  • सुल्तानों से संबंध (पृष्ठ 174): सुल्तानों की सेनाओं ने शहर लूटा, फिर भी किताब बताती है कि दोनों के संबंध “धार्मिक भिन्नताएँ होने पर भी हमेशा या अपरिहार्य रूप से शत्रुतापूर्ण नहीं रहते थे।”
    • कृष्णदेव राय ने सल्तनतों में सत्ता के कई दावेदारों का समर्थन किया और गर्व से “यवन राज्य की स्थापना करने वाला” उपाधि ली।
    • कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर के उत्तराधिकार विवाद सुलझाने में बीजापुर के सुल्तान ने हस्तक्षेप किया। दोनों पक्ष एक-दूसरे की स्थिरता चाहते थे।
    • किताब के अनुसार “यह रामराय की जोखिम भरी नीति थी”: उन्होंने एक सुल्तान को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की कोशिश की, पर सुल्तानों ने मिलकर उन्हें निर्णायक रूप से हराया।
  • यवन (बॉक्स, पृष्ठ 174): “यवन संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका प्रयोग यूनानियों तथा उत्तर–पश्चिम से उपमहाद्वीप में आनेवाले अन्य लोगों के लिए किया जाता था।”

राय तथानायक (भाग 2.3)

  • नायक कौन: विजयनगर साम्राज्य में सेना प्रमुख आम तौर पर क़िलों पर नियंत्रण रखते थे और उनके पास सशस्त्र समर्थक होते थे। वे एक जगह से दूसरी जगह जाते रहते थे, और कई बार उपजाऊ भूमि की तलाश में किसान भी उनके साथ चलते थे। इन्हें नायक कहा जाता था, और ये आम तौर पर तेलुगु या कन्नड़ बोलते थे।
  • अधीनता और विद्रोह: कई नायकों ने विजयनगर की अधीनता मानी, पर वे अक्सर विद्रोह करते थे और सैनिक कार्रवाई से दबाए जाते थे।
  • अमर–नायक प्रणाली: “अमर–नायक प्रणाली विजयनगर साम्राज्य की एक प्रमुख राजनीतिक खोज थी। ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रणाली के कई तत्त्व दिल्ली सल्तनत की इक्ता प्रणाली से लिए गए थे।”

राय और अमर–नायक, किताब के अनुसार

शासकरायअमर–नायकों को प्रशासन के लिए राज्य-क्षेत्र देते थे; कभी-कभी उनका तबादला
सैनिक कमांडरअमर–नायककिसानों, शिल्पकर्मियों और व्यापारियों से भू राजस्व और दूसरे कर वसूलते थे
राजस्व के हिस्सेतीन काम
  • निजी उपयोग
  • घोड़ों और हाथियों का निर्धारित दल रखना
  • मन्दिरों और सिंचाई के साधनों का रख-रखाव
नतीजाप्रभावी सैनिक शक्तिजिससे राय पूरे दक्षिणी प्रायद्वीप को नियंत्रण में ला सके
NCERT, पृष्ठ 175
  • निष्ठा: अमर–नायक राजा को वर्ष में एक बार भेंट भेजते थे और अपनी स्वामिभक्ति दिखाने के लिए उपहारों के साथ राजकीय दरबार में उपस्थित होते थे। राजा कभी-कभी उनका एक जगह से दूसरी जगह तबादला करके अपना नियंत्रण जताते थे।
  • सत्रहवीं शताब्दी: कई नायकों ने अपने स्वतंत्र राज्य बना लिए, जिससे केंद्रीय राजकीय ढाँचा तेज़ी से बिखरने लगा।
  • अमर (बॉक्स, पृष्ठ 175): अमर शब्द संस्कृत समर (लड़ाई या युद्ध) से बना माना जाता है; यह फ़ारसी अमीर (ऊँचे पद का कुलीन व्यक्ति) से भी मिलता-जुलता है।

5. राजधानी: पानी, दीवारें, सड़कें और शहरी केंद्र★★

किताब का भाग 3 (विजयनगर : राजधानी तथा उसके परिप्रदेश), पृष्ठ 176–179 · प्रश्नावली में: प्रश्न 2, 3, 9

शहर का रूप (भाग 3)

  • ख़ास शहर: विजयनगर अपने समय के सबसे प्रसिद्ध शहरों में से था। ज़्यादातर राजधानियों की तरह इसकी भी एक ख़ास भौतिक रूपरेखा और भवन निर्माण की शैली थी।
  • स्रोत 3 (विशाल, फैला हुआ शहर): डोमिंगो पेस कहता है कि वह पूरा शहर एक जगह से नहीं देख सका, क्योंकि यह कई पर्वत शृंखलाओं के बीच बसा है। ऊँचाई से “वहाँ से मैंने जो देखा वह मुझे रोम जितना विशाल प्रतीत हुआ, और देखने में अत्यंत सुन्दर”। वह पेड़ों के उपवनों, बगीचों, पानी की कई नालियों और झीलों का, और राजा के महल के पास खजूर के पेड़ों के बगीचे और दूसरे फलदार पेड़ों का वर्णन करता है।
  • शहर के विषय में खोज (बॉक्स, पृष्ठ 176): राजाओं और नायकों के कई अभिलेख मंदिरों को दिए दान और महत्त्वपूर्ण घटनाएँ दर्ज करते हैं। यहाँ आए यात्री:
    • पंद्रहवीं शताब्दी: निकोलो दे कॉन्ती (इतालवी व्यापारी), अब्दुर रज़्ज़ाक (फ़ारस के राजा का दूत), अफ़ानासी निकितिन (रूस का एक व्यापारी)।
    • सोलहवीं शताब्दी: दुआर्ते बरबोसा, डोमिंगो पेस और पुर्तगाल का फर्नाओ नूनिज़।

विजयनगर शहर के भाग, जैसे किताब उन्हें रखती है

उत्तर मेंधार्मिक केंद्रतुंगभद्रा के किनारे का चट्टानी भाग; विरुपाक्ष और पम्पादेवी के मन्दिर
बीच मेंकृषि क्षेत्रधार्मिक केंद्र और नगरीय केंद्र के बीच; तुंगभद्रा से नहरों का पानी
शहरी केंद्रनगरीय केंद्रदूसरी क़िलेबंदी इसके भीतरी भाग के चारों ओर; उत्तर-पूर्वी कोने में मुस्लिम रिहायशी मुहल्ला
दक्षिण-पश्चिम मेंराजकीय केंद्रतीसरी क़िलेबंदी; लगभग तीस महल और 60 से भी अधिक मन्दिर
सबसे बाहरबाहरी दीवारशहर के चारों ओर की पहाड़ियों को जोड़ती; भीतर शहर, खेत और जंगल
NCERT, पृष्ठ 177–179, 184

जल–संपदा (भाग 3.1)

  • नदी का कुण्ड: विजयनगर की भौगोलिक स्थिति की सबसे चौंकाने वाली बात है “तुंगभद्रा नदी द्वारा यहाँ निर्मित एक प्राकृतिक कुण्ड”। नदी उत्तर–पूर्व दिशा में बहती है।
  • पहाड़ियाँ: आस-पास की ग्रेनाइट की पहाड़ियाँ शहर के चारों ओर करधनी-सी बनाती प्रतीत होती हैं। इन पहाड़ियों से कई जल-धाराएँ आकर नदी में मिलती हैं।
  • हौज़ क्यों: लगभग सभी धाराओं के साथ बाँध बनाकर अलग-अलग आकार के हौज़ बनाए गए। विजयनगर “प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक” में था, इसलिए पानी इकट्ठा करने और उसे शहर तक ले जाने के व्यापक प्रबंध ज़रूरी थे।
  • कमलपुरम् जलाशय: “पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में” बना एक बड़ा हौज़, जिसे आज कमलपुरम् जलाशय कहते हैं। इससे आस-पास के खेत सींचे जाते थे, और एक नहर से इसका पानी “राजकीय केंद्र” तक ले जाया जाता था।
  • हिरिया नहर: इसके अवशेष आज भी खंडहरों के बीच दिखते हैं। यह तुंगभद्रा पर बने बाँध से पानी लाकर “धार्मिक केंद्र” को “शहरी केंद्र” से अलग करने वाली घाटी को सींचती थी। इसे संभवत: संगम वंश के राजाओं ने बनवाया था।
  • स्रोत 4 (हौज़ों/जलाशयों का निर्माण किस प्रकार होता था?): पेस कृष्णदेव राय के बनवाए एक जलाशय का वर्णन करता है:
    • यह दो पहाड़ियों के मुहाने पर बना था, ताकि दोनों ओर का पानी यहाँ इकट्ठा हो।
    • पानी “9 मील (लगभग 15 किमी) से भी अधिक की दूरी से पाइपों से” एक झील से आता था।
    • जलाशय में “तीन विशाल स्तंभ” थे, जिनसे जुड़े पाइप बगीचों और धान के खेतों को सींचने के लिए पानी ले जाते थे।
    • इसे बनाने के लिए राजा ने एक पूरी पहाड़ी तुड़वा दी; वहाँ “पन्द्रह से बीस हज़ार आदमी थे, चीटियों की तरह…”।

क़िलेबंदियाँ तथा सड़कें (भाग 3.2)

  • सात पंक्तियाँ: पंद्रहवीं शताब्दी में फ़ारस के शासक ने अब्दुर रज़्ज़ाक को कालीकट (कोज़ीकोड) भेजा था। वह विजयनगर की क़िलेबंदी से बहुत प्रभावित हुआ और उसने “दुर्गों की सात पंक्तियों” का उल्लेख किया।
  • क्या घेरा: इन दीवारों से शहर ही नहीं, उसके आस-पास का कृषि क्षेत्र और जंगल भी घिरे थे। सबसे बाहरी दीवार शहर के चारों ओर की पहाड़ियों को आपस में जोड़ती थी।
  • दीवार की बनावट:
    • दीवार थोड़ी शुण्डाकार (ऊपर पतली होती) थी।
    • गारे या जोड़ने के किसी मसाले का प्रयोग नहीं हुआ; पत्थर के टुकड़े फानाकार (कील जैसे) थे, जो अपनी जगह टिके रहते थे।
    • दीवारों का भीतरी भाग मिट्टी और मलबे से भरा था।
    • बाहर की ओर निकले वर्गाकार और आयताकार बुर्ज़ थे।
  • खेत दीवारों के भीतर: किताब इस क़िलेबंदी की सबसे ख़ास बात यही बताती है कि इससे खेत भी घिरे थे। अब्दुर रज़्ज़ाक लिखता है: “पहली, दूसरी और तीसरी दीवारों के बीच जुते हुए खेत, बग़ीचे तथा आवास हैं”। पेस भी लिखता है: “इस पहली परिधि से शहर में प्रवेश करने तक की दूरी बहुत है, जिसमें खेत हैं जहाँ वे धान उगाते हैं और कई उद्यान हैं और बहुत जल जो दो झीलों से लाया जाता है।”
  • पुरातत्त्व की पुष्टि: आज के पुरातत्त्वविदों को धार्मिक केंद्र और नगरीय केंद्र के बीच एक कृषि क्षेत्र के साक्ष्य मिले हैं, जिसे तुंगभद्रा से पानी लाने वाली नहरों की व्यापक व्यवस्था सींचती थी।
  • क्यों: मध्यकालीन घेराबंदियों का मुख्य उद्देश्य विरोधी को खाद्य सामग्री से वंचित कर समर्पण के लिए बाध्य करना होता था, और वे कई महीनों, यहाँ तक कि वर्षों तक चल सकती थीं। आम तौर पर शासक क़िलेबंद क्षेत्रों में विशाल अन्नागार बनवाते थे, पर विजयनगर के शासकों ने पूरे कृषि भूभाग को बचाने के लिए “एक अधिक मँहगी तथा व्यापक नीति” अपनाई।
  • दूसरी और तीसरी क़िलेबंदी: दूसरी क़िलेबंदी नगरीय केंद्र के भीतरी भाग के चारों ओर थी, और तीसरी राजकीय केंद्र के चारों ओर। राजकीय केंद्र में महत्त्वपूर्ण इमारतों के हर समूह को अपनी ऊँची दीवारों से घेरा गया था।
  • प्रवेशद्वार: अच्छी तरह सुरक्षित प्रवेशद्वार शहर को मुख्य सड़कों से जोड़ते थे। क़िलेबंद बस्ती में जाने के प्रवेशद्वार की मेहराब और ऊपर बना गुंबद तुर्की सुल्तानों द्वारा प्रवर्तित स्थापत्य के चारित्रिक तत्त्व माने जाते हैं। “कला–इतिहासकार इस शैली को इंडो–इस्लामिक (हिंद–इस्लामी) कहते हैं क्योंकि इसका विकास विभिन्न क्षेत्रों की स्थानीय स्थापत्य की परंपराओं के साथ संपर्क से हुआ।”
  • सड़कें: पुरातत्त्वविदों ने प्रवेशद्वारों से होकर जाने वाले रास्तों और पक्की सड़कों के अवशेषों से सड़कों की पहचान की। सड़कें आम तौर पर पहाड़ी भूभाग से बचकर घाटियों से होकर जाती थीं। सबसे महत्त्वपूर्ण सड़कों में से कई मन्दिरों के प्रवेशद्वारों से आगे बढ़ती थीं, और उनके दोनों ओर बाज़ार थे।

शहरी केंद्र (भाग 3.3)

  • कम साक्ष्य: शहरी केंद्र में सामान्य लोगों के आवासों के अपेक्षाकृत कम पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं।
  • उत्तर-पूर्वी कोना: शहरी केंद्र के उत्तर-पूर्वी कोने जैसे कुछ स्थानों से परिष्कृत चीनी मिट्टी के बर्तन मिले, जिससे पुरातत्त्वविद मानते हैं कि हो सकता है वहाँ अमीर व्यापारी रहते हों। “यह मुस्लिम रिहायशी मुहल्ला भी था।” यहाँ के मक़बरों और मस्ज़िदों के काम ख़ास थे, फिर भी उनका स्थापत्य हम्पी के मन्दिरों के मण्डपों से मिलता-जुलता है।
  • बरबोसा का वर्णन: सोलहवीं शताब्दी का पुर्तगाली यात्री बरबोसा लिखता है: “लोगों के अन्य आवास छप्पर के हैं, पर फिर भी सुदृढ़ हैं, और व्यवसाय के आधार पर कई खुले स्थानों वाली लंबी गलियों में व्यवस्थित हैं।”
  • पूजा और पानी: क्षेत्र सर्वेक्षणों में बहुत से पूजा स्थल और छोटे मन्दिर मिले, जो विविध संप्रदायों की ओर संकेत करते हैं, “जो संभवत: विभिन्न समुदायों द्वारा संरक्षित थे”। कुएँ, बरसात के पानी वाले जलाशय और मन्दिरों के जलाशय संभवत: सामान्य नगर निवासियों के लिए पानी के स्रोत थे।

6. राजकीय केंद्र★★

किताब का भाग 4, पृष्ठ 179–183 · प्रश्नावली में: प्रश्न 4, 6, 7

मन्दिर भी, महल भी (भाग 4)

  • जगह: राजकीय केंद्र विजयनगर बस्ती के दक्षिण-पश्चिमी भाग में था।
  • नाम और सच: इसे राजकीय केंद्र कहा जाता है, पर इसमें “60 से भी अधिक मन्दिर” थे। मन्दिरों और संप्रदायों को संरक्षण देना उन शासकों के लिए ज़रूरी था जो देवी-देवताओं से संबंध के माध्यम से अपनी सत्ता को स्थापित करने और वैधता देने का प्रयास कर रहे थे।
  • महल: “लगभग तीस संरचनाओं” की पहचान महलों के रूप में हुई है। ये अपेक्षाकृत बड़ी संरचनाएँ हैं, जो आनुष्ठानिक कार्यों से नहीं जुड़ी थीं।
  • क्या बचा: मन्दिर पूरी तरह राजगिरी (पत्थर की चिनाई) से बने थे, जबकि धर्मेतर भवनों की अधिरचना विकारी (नष्ट हो जाने वाली) वस्तुओं से बनी थी।

महानवमी डिब्बा (भाग 4.1)

  • “राजा का भवन”: कुछ संरचनाओं के नाम उनके आकार और काम के आधार पर रखे गए हैं। “राजा का भवन” घेरे की सबसे बड़ी संरचना है, पर इसके राजकीय आवास होने का कोई निश्चित साक्ष्य नहीं है। इसके दो सबसे प्रभावशाली मंचों को आम तौर पर “सभा मंडप” और “महानवमी डिब्बा” कहा जाता है। पूरा क्षेत्र ऊँची दोहरी दीवारों से घिरा है, जिनके बीच एक गली है।
  • सभा मंडप: एक ऊँचा मंच, जिसमें पास-पास और नियमित दूरी पर लकड़ी के स्तंभों के लिए छेद हैं; उन पर टिकी दूसरी मंज़िल तक जाने के लिए सीढ़ी थी। स्तंभ इतने पास-पास थे कि खुली जगह बहुत कम बचती थी, इसलिए यह मंडप किस काम आता था, यह स्पष्ट नहीं है।
  • माप: “शहर के सबसे ऊँचे स्थानों में से एक पर स्थित “महानवमी डिब्बा” एक विशालकाय मंच है जो लगभग 11000 वर्ग फीट के आधार से 40 फीट की ऊँचाई तक जाता है।” इस पर लकड़ी की एक संरचना के साक्ष्य मिले हैं, और इसका आधार उभारदार उत्कीर्णन से ढका है।
  • कौन-सा त्योहार: इस संरचना से जुड़े अनुष्ठान संभवत: सितंबर और अक्टूबर के शरद मास में मनाए जाने वाले दस दिन के हिंदू त्योहार के महानवमी (शाब्दिक अर्थ, महान नवाँ दिवस) के अवसर पर किए जाते थे। यह त्योहार उत्तर भारत में दशहरा, बंगाल में दुर्गा पूजा और प्रायद्वीपीय भारत में नवरात्री या महानवमी के नाम से जाना जाता है।
  • प्रदर्शन: इस अवसर पर विजयनगर शासक “अपने रुतबे, ताक़त तथा अधिराज्य का प्रदर्शन” करते थे।
  • अनुष्ठान और उत्सव:
    • मूर्ति की पूजा, राज्य के अश्व की पूजा, और भैंसों और दूसरे जानवरों की बलि।
    • नृत्य, कुश्ती प्रतिस्पर्धा, और साज़ लगे घोड़ों, हाथियों, रथों और सैनिकों की शोभायात्रा।
    • प्रमुख नायकों और अधीनस्थ राजाओं द्वारा राजा और उसके अतिथियों को दी जाने वाली औपचारिक भेंट।
    • किताब कहती है: “इन उत्सवों के गहन सांकेतिक अर्थ थे।”
  • अंतिम दिन: त्योहार के अंतिम दिन राजा खुले मैदान में आयोजित भव्य समारोह में अपनी और अपने नायकों की सेना का निरीक्षण करता था। नायक इस अवसर पर बड़ी मात्रा में भेंट और नियत कर भी लाते थे।
  • पहेली: विद्वानों का मानना है कि आज की संरचना के चारों ओर का स्थान सशस्त्र पुरुषों, स्त्रियों और बड़ी संख्या में जानवरों की शोभायात्रा के लिए पर्याप्त नहीं था। “राजकीय केंद्र में स्थित कई और संरचनाओं की तरह यह भी एक पहेली बना हुआ है।”
  • विजय का एक भवन? (बॉक्स, पृष्ठ 180): पेस सभा मंडप और महानवमी डिब्बा को मिलाकर “विजय का भवन” कहता है। उसके वर्णन में एक के ऊपर एक दो मंच हैं; ऊपर वाले पर राजा के लिए कपड़े का बना एक कक्ष था, जिसमें “मूर्ति का एक पूजा स्थल” था; एक अन्य में बीच में एक चबूतरा था, जिस पर राज्य का सिंहासन खड़ा था।

राजकीय केंद्र में स्थित अन्य भवन (भाग 4.2)

  • कमल महल: राजकीय केंद्र के सबसे सुंदर भवनों में से एक लोटस (कमल) महल है। यह नाम उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों ने रखा। इतिहासकार निश्चित नहीं हैं कि यह भवन किस काम के लिए बना था।
    • मैकेन्ज़ी के बनाए मानचित्र से मिले एक सुझाव के अनुसार यह परिषदीय सदन था, जहाँ राजा अपने परामर्शदाताओं से मिलता था।
    • “कमल महल में नौ मीनारें थीं– बीच में एक ऊँची, तथा आठ उसकी भुजाओं के साथ–साथ।”
    • किताब के अनुसार इसकी मेहराबें “संभवत: इण्डो–इस्लामी तकनीकों से प्रभावित थीं”।
  • “हाथियों का अस्तबल”: कमल महल के समीप स्थित भवन; किताब यह नाम उद्धरण-चिह्नों में देती है।
  • हज़ार राम मन्दिर: ज़्यादातर मन्दिर धार्मिक केंद्र में थे, पर राजकीय केंद्र में भी कई थे। इनमें एक हज़ार राम मन्दिर है: “संभवत: इसका प्रयोग केवल राजा और उनके परिवार द्वारा ही किया जाता था।”
    • इसके केंद्रीय देवालय की मूर्तियाँ अब नहीं हैं, पर दीवारों पर उत्कीर्णित पटल बचे हैं। इनमें मन्दिर की भीतरी दीवारों पर रामायण के दृश्यांश हैं।
  • आक्रमण के बाद: शहर पर आक्रमण के बाद कई संरचनाएँ नष्ट हो गईं, पर नायकों ने महलनुमा संरचनाएँ बनाने की परंपरा जारी रखी। इनमें से कई आज भी बची हैं।

7. धार्मिक केंद्र★★

किताब का भाग 5, पृष्ठ 184–188 · प्रश्नावली में: प्रश्न 5, 8

राजधानी का चयन (भाग 5.1)

  • जगह: धार्मिक केंद्र शहर का तुंगभद्रा नदी के किनारे वाला चट्टानी उत्तरी भाग है।
  • स्थानीय मान्यताएँ:
    • स्थानीय मान्यताओं के अनुसार ये पहाड़ियाँ “रामायण में उल्लिखित बाली और सुग्रीव के वानर राज्य की रक्षा करती थीं”।
    • अन्य मान्यताओं के अनुसार स्थानीय मातृदेवी पम्पादेवी ने इन पहाड़ियों में विरुपाक्ष से विवाह के लिए तप किया था। विरुपाक्ष राज्य के संरक्षक देवता और शिव का एक रूप माने जाते हैं। आज तक यह विवाह हर वर्ष विरुपाक्ष मन्दिर में धूमधाम से मनाया जाता है।
    • इन पहाड़ियों में विजयनगर साम्राज्य से पहले के जैन मन्दिर भी मिले हैं। यानी यह क्षेत्र कई धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा था।
  • मन्दिरों का लंबा इतिहास: इस क्षेत्र में मन्दिर निर्माण का इतिहास पल्लव, चालुक्य, होयसाल और चोल वंशों तक जाता है।
    • शासक अपने को ईश्वर से जोड़ने के लिए मन्दिर निर्माण को बढ़ावा देते थे। मन्दिर शिक्षा के केंद्र भी थे।
    • शासक और दूसरे लोग मन्दिरों के रख-रखाव के लिए भूमि या संपत्ति देते थे, इसलिए मन्दिर धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र बन गए।
    • शासकों के लिए मन्दिरों का निर्माण, मरम्मत और रख-रखाव अपनी सत्ता, संपत्ति और निष्ठा के लिए समर्थन और मान्यता पाने के महत्त्वपूर्ण माध्यम थे।
  • स्थान का चुनाव: “यह संभव है कि विजयनगर के स्थान का चयन वहाँ विरुपाक्ष तथा पम्पादेवी के मन्दिरों के अस्तित्व से प्रेरित था।”
  • विरुपाक्ष की ओर से शासन: विजयनगर के शासक भगवान विरुपाक्ष की ओर से शासन करने का दावा करते थे। राजकीय आदेशों पर सामान्यतया कन्नड़ लिपि में “श्री विरुपाक्ष” अंकित होता था।
  • हिन्दू सूरतराणा: शासक यह उपाधि भी लेते थे; यह अरबी शब्द सुल्तान (राजा) का संस्कृत रूपांतरण है, शाब्दिक अर्थ हिंदू सुलतान।
  • राजा मन्दिर में: विजयनगर के शासकों ने पुरानी परंपराएँ अपनाईं, उनमें नवीनता लाए और उन्हें आगे बढ़ाया। राजकीय प्रतिकृति मूर्तियाँ अब मन्दिरों में प्रदर्शित होने लगीं, और राजा की मन्दिर यात्राएँ महत्त्वपूर्ण राजकीय अवसर बन गईं, जिनमें साम्राज्य के महत्त्वपूर्ण नायक भी साथ जाते थे।

गोपुरम् और मण्डप (भाग 5.2)

  • विशाल पैमाना: विजयनगर के मन्दिरों की नई विशेषताओं में राजकीय सत्ता की द्योतक विशाल संरचनाएँ थीं। इसका सबसे अच्छा उदाहरण राय गोपुरम् या राजकीय प्रवेशद्वार हैं, जो अक्सर केंद्रीय देवालयों की मीनारों को बौना कर देते थे और दूर से ही मन्दिर का संकेत देते थे।
  • ताकत की याद: ये गोपुरम् संभवत: शासकों की ताकत की याद भी दिलाते थे, जो इतनी ऊँची मीनारें बनाने के लिए ज़रूरी साधन, तकनीक और कौशल जुटा सकते थे।
  • मण्डप और गलियारे: दूसरी विशेषताओं में मण्डप और देवस्थलों के चारों ओर बने लंबे, स्तंभों वाले गलियारे थे।
  • विरुपाक्ष मन्दिर: यह कई शताब्दियों में बना।
    • अभिलेखों के अनुसार सबसे प्राचीन मन्दिर नवीं–दसवीं शताब्दियों का था; विजयनगर साम्राज्य की स्थापना के बाद इसे बहुत बड़ा किया गया।
    • मुख्य मन्दिर के सामने का मण्डप कृष्णदेव राय ने अपने राज्यारोहण के उपलक्ष्य में बनवाया; इसे सूक्ष्मता से उत्कीर्णित स्तंभों से सजाया गया। पूर्वी गोपुरम् के निर्माण का श्रेय भी उन्हीं को दिया जाता है।
    • इन जोड़ों के कारण केंद्रीय देवालय पूरे परिसर का एक छोटा भाग रह गया।
  • सभागार किस काम के: कुछ सभागारों में देवताओं की मूर्तियाँ संगीत, नृत्य और नाटकों के विशेष कार्यक्रम देखने के लिए रखी जाती थीं; कुछ में देवताओं के विवाह के उत्सव होते थे (कल्याण मंडप); और कुछ देवताओं को झूला झुलाने के लिए थे (जैसे जिंजी का झूलता मण्डप)। इन अवसरों पर छोटे केंद्रीय देवालयों में रखी मूर्तियों से अलग, विशेष मूर्तियों का प्रयोग होता था।
  • विट्ठल मन्दिर: यहाँ के प्रमुख देवता विट्ठल हैं, विष्णु का एक रूप, जो सामान्यत: महाराष्ट्र में पूजे जाते हैं। कर्नाटक में इनकी पूजा आरंभ करना दिखाता है कि विजयनगर के शासकों ने एक साम्राज्यिक संस्कृति बनाने के लिए अलग-अलग परंपराओं को कैसे आत्मसात किया।
    • इस मन्दिर में भी कई सभागार हैं, और रथ के आकार का एक अनूठा मन्दिर है।
  • रथ गलियाँ: मन्दिर परिसरों की एक विशेषता रथ गलियाँ हैं, जो गोपुरम् से सीधी रेखा में जाती थीं। इनका फर्श पत्थर के टुकड़ों से बना था, और दोनों ओर स्तंभ वाले मण्डप थे, जिनमें व्यापारी दुकानें लगाते थे।
  • नायकों ने आगे बढ़ाया: नायकों ने क़िलेबंदी और मन्दिर निर्माण की परंपराएँ जारी रखीं और उन्हें और व्यापक बनाया। “कुछ सबसे दर्शनीय गोपुरमों का निर्माण भी स्थानीय नायकों द्वारा किया गया था”; मदुरई के नायकों का बनवाया एक गोपुरम् इसका उदाहरण है।

8. शहर का अंकन, और वे प्रश्न जिनके उत्तर इमारतें नहीं देतीं★★

किताब का भाग 6 (महलों, मन्दिरों तथा बाज़ारों का अंकन) और भाग 7 (उत्तरों की खोज में प्रश्न), पृष्ठ 188–192 · प्रश्नावली में: प्रश्न 1, 9

हम्पी का अंकन (भाग 6)

  • किन साधनों से: विजयनगर के बारे में जानकारी छाया चित्रों, नक्शों, खड़े रेखाचित्रों और मूर्तिकला से मिलती है। मैकेन्ज़ी के शुरुआती सर्वेक्षणों के बाद यात्रियों के वृत्तांतों और अभिलेखों से मिली जानकारी को जोड़ा गया।
  • संरक्षण: बीसवीं शताब्दी में इस स्थल का संरक्षण भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण और कर्नाटक पुरातात्विक एवं संग्रहालय विभाग ने किया। 1976 में हम्पी को “राष्ट्रीय महत्त्व के स्थल के रूप में” मान्यता मिली।
  • बड़ी परियोजना: 1980 के दशक के आरंभ में भौतिक अवशेषों का विस्तार से प्रलेखन करने की एक बड़ी परियोजना शुरू हुई, जिसमें व्यापक और गहन सर्वेक्षणों में तरह-तरह की रिकॉर्डिंग पद्धतियाँ अपनाई गईं। “लगभग बीस वर्षों” में दुनिया भर के दर्जनों विद्वानों ने यह जानकारी इकट्ठी और सुरक्षित की।
  • वर्गों में बाँटकर नक्शा: पूरे क्षेत्र को 25 वर्गाकार भागों में बाँटा गया, और हर वर्ग को वर्णमाला के एक अक्षर से इंगित किया गया। फिर इन्हें छोटे वर्गों के समूहों में, और उन्हें और छोटी इकाइयों में बाँटा गया।
    • उदाहरण: वर्ग N को फिर 25 छोटे वर्गों में बाँटा गया, जिनमें से एक NM है; NM के एक मन्दिर का अलग नक्शा बना, जिसमें उसके भाग A से M तक के अक्षरों से दिखाए गए हैं।
  • क्या मिला: छोटे देवस्थलों और घरों से लेकर विशाल मन्दिरों तक हज़ारों संरचनाओं के अवशेष खोजे और प्रलेखित किए गए। सड़कों, रास्तों और बाज़ारों के अवशेष भी मिले, जिनकी जगह स्तंभों के आधारों और मंचों से पहचानी गई: “एक समय जो बाज़ार, जीवंत थे, उनका बस अब यही कुछ बचा है”।
  • लकड़ी की कल्पना: वर्षों तक इस स्थल पर काम करने वाले जॉन एम. फ्रिट्ज़, जॉर्ज मिशेल और एम. एस. नागराज राव लिखते हैं: “विजयनगर के स्मारकों के अपने अध्ययन में हमें नष्ट हो चुकी लकड़ी की वस्तुओं–स्तंभ, टेक (ब्रेकेट), धरन, भीतरी छत, लटकते हुए छज्जों के अंदरूनी भाग तथा मीनारों–की एक पूरी श्रेणी की कल्पना करनी पड़ती है जो प्लास्टर से सजाए और संभवत: चटकीले रंगों से चित्रित थे।”
  • यात्रियों की मदद: लकड़ी की संरचनाएँ नष्ट हो गईं और केवल पत्थर बचा, फिर भी यात्रियों के वृत्तांत उस समय के जीवंत जीवन के कुछ पहलू फिर से जोड़ने में मदद करते हैं।

बाज़ार (स्रोत 5, पृष्ठ 191)

  • पेस की गली: पेस एक चौड़ी और सुंदर गली का वर्णन करता है, जिसमें बहुत से व्यापारी थे। वहाँ “सभी प्रकार के माणिक्य, और हीरे, और पन्ने, और मोती, और छोटे मोती, और वस्त्र, और पृथ्वी पर होने वाली हर वस्तु” मिलती थी। हर शाम वहाँ एक मेला लगता था, जिसमें साधारण घोड़े और टट्टू, तुरंज, नींबू, संतरे, अंगूर, बगीचों की उपज और लकड़ी बिकती थी।
  • अनाज: पेस विजयनगर को “विश्व के सबसे अच्छे संभरण वाले शहर” कहता है; उसके अनुसार बाज़ार “चावल, गेहूँ, अनाज, भारतीय मकई और कुछ मात्रा में जौ तथा सेम, मूँग, दालें, काला चना जैसे खाद्य पदार्थों से भरे रहते थे”, और ये सब सस्ते और भरपूर थे।
  • नूनिज़ के फल: फर्नाओ नूनिज़ के अनुसार बाज़ार “प्रचुर मात्रा में फलों, अंगूरों और संतरों, नींबू, अनार, कटहल तथा आम से भरे रहते थे और सभी बहुत सस्ते।”
  • मांस: बाज़ारों में मांस भी बड़ी मात्रा में बिकता था। नूनिज़ के अनुसार बिसनग (विजयनगर) के बाज़ारों में “भेड़–बकरी का मांस, सूअर, मृगमांस, तीतर–मांस, खरगोश, कबूतर, बटेर और सभी प्रकार के पक्षी, चिड़ियाँ, चूहे तथा बिल्लियाँ और छिपकलियाँ” बिकती थीं।

इमारतें क्या बताती हैं (भाग 7)

  • स्थान और सामग्री: बची हुई इमारतें बताती हैं कि स्थानों को कैसे संगठित किया गया और उनका कैसे प्रयोग हुआ, और वे किस सामग्री और किन तकनीकों से बनीं।
  • सुरक्षा: किसी शहर की क़िलेबंदी के अध्ययन से उसकी रक्षा की ज़रूरतों और सैनिक तैयारी का पता चलता है।
  • विचारों का फैलाव: दूसरी जगहों की इमारतों से तुलना करने पर विचारों के फैलाव और सांस्कृतिक प्रभावों का पता चलता है।
  • प्रतीक: इमारतें वे विचार व्यक्त करती हैं जो बनाने वाले या संरक्षक देना चाहते थे। उनमें अक्सर अपने सांस्कृतिक संदर्भ के प्रतीक भरे होते हैं, जिन्हें हम दूसरे स्रोतों, जैसे “साहित्य, अभिलेखों तथा लोकप्रचलित परंपराओं”, से मिली जानकारी जोड़कर समझते हैं।
  • कृष्णदेव राय (बॉक्स, पृष्ठ 192): तमिलनाडु के चिदम्बरम मन्दिर के गोपुरम् में उनकी एक मूर्ति है, जिसमें वे हाथ जोड़े खड़े हैं (चित्र 7.31)। किताब कहती है: “स्वाभाविक है कि शासक इसी रूप में अपने आप को प्रस्तुत करना चाहता था।” पेस उन्हें ऐसे बताता है: “मझला कद, गोरा रंग और अच्छी काठी, कुछ मोटा, राजा के चेहरे पर चेचक के दाग़ हैं।”

इमारतें क्या नहीं बतातीं (भाग 7)

  • सामान्य लोग: स्थापत्य यह नहीं बताता कि जनसंख्या का बड़ा भाग, यानी सामान्य स्त्री, पुरुष और बच्चे, इन इमारतों के बारे में क्या सोचते थे। क्या वे शाही या धार्मिक केंद्र के किसी भी भाग में जा सकते थे? क्या वे मूर्तियों के पास से जल्दी निकल जाते थे, या रुककर उनकी जटिल प्रतिमा-विद्या समझने की कोशिश करते थे? मज़दूर क्या सोचते थे?
  • बनाने वाले: शासक तय करते थे कि क्या, कहाँ, किस सामग्री से और किस शैली में बने। पर विशेष ज्ञान किसके पास था, नक्शे किसने बनाए, राजगीर, पत्थर काटने वाले और मूर्तिकार कहाँ से आए, क्या वे पड़ोसी क्षेत्रों से युद्ध में पकड़कर लाए गए थे, उन्हें कैसा वेतन मिलता था, देखरेख कौन करता था, और कच्चा माल कहाँ से और कैसे लाया जाता था?
  • आगे का रास्ता: इन प्रश्नों के उत्तर केवल इमारतें देखकर नहीं मिलते: “संभवत: अन्य स्त्रोतों के प्रयोग से जारी शोध कुछ और संकेत दे सकें।”

9. आँकड़े और साल एक जगह★

पूरे अध्याय से, पृष्ठ 170–193

अध्याय के साल और संख्याएँ

साल या संख्याक्यापृष्ठ
चौदहवीं शताब्दीविजयनगर साम्राज्य की स्थापना170
1336परंपरा और अभिलेखीय साक्ष्यों के अनुसार हरिहर और बुक्का ने साम्राज्य की स्थापना की (काल-रेखा 1 में “1336?”)171, 193
1754; 1815; 1821मैकेन्ज़ी का जन्म; भारत के पहले सर्वेयर जनरल बने; मृत्यु171
1800 ई.मैकेन्ज़ी ने हम्पी के भग्नावशेष प्रकाश में लाए और पहला सर्वेक्षण मानचित्र बनाया170
1836 सेअभिलेखकर्ताओं ने कई दर्जन अभिलेख इकट्ठे किए170
1856 ई. सेछायाचित्रकारों ने भवनों के चित्र संकलित किए170
1485संगम वंश का नियंत्रण इस वर्ष तक; फिर सुलुवों ने उखाड़ा173
1498 ई.पुर्तगाली उपमहाद्वीप के पश्चिमी तट पर आने लगे172
1503सुलुवों का शासन इस वर्ष तक; फिर तुलुव173
1509–29कृष्णदेव राय का शासनकाल (स्रोत 2)173
1512; 1514; 1520रायचूर दोआब हासिल; उड़ीसा के शासकों का दमन; बीजापुर के सुल्तान की हार173
1529कृष्णदेव राय की मृत्यु173
1542केंद्र पर नियंत्रण अराविदु वंश के हाथ में173
1565राक्षसी–तांगड़ी (तालीकोटा) का युद्ध: रामराय के नेतृत्व में विजयनगर की सेना बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुण्डा की संयुक्त सेनाओं से हारी; शहर लूटा गया173
सत्रहवीं शताब्दीकई नायकों ने स्वतंत्र राज्य बनाए; अराविदु वंश इस शताब्दी के अंत तक सत्ता में173, 175
सत्रहवीं–अठारहवीं शताब्दियाँविजयनगर शहर पूरी तरह नष्ट170
पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षकमलपुरम् जलाशय बना177
सातअब्दुर रज़्ज़ाक के अनुसार दुर्गों की पंक्तियाँ177
9 मील (लगभग 15 किमी) से अधिकपेस के अनुसार कृष्णदेव राय के जलाशय तक पाइपों से पानी आने की दूरी177
पन्द्रह से बीस हज़ारपेस के अनुसार उस जलाशय पर काम करते आदमी177
60 से भी अधिक; लगभग तीसराजकीय केंद्र के मन्दिर; महल के रूप में पहचानी गई संरचनाएँ179
लगभग 11000 वर्ग फीट; 40 फीटमहानवमी डिब्बा का आधार; ऊँचाई180
दस दिन; सितंबर और अक्टूबरवह हिंदू त्योहार जिसके महानवमी के अवसर पर डिब्बा के अनुष्ठान संभवत: किए जाते थे180
नौकमल महल की मीनारें181
नवीं–दसवीं शताब्दियाँविरुपाक्ष का सबसे प्राचीन मन्दिर186
बीसवीं शताब्दीभारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण और कर्नाटक पुरातात्विक एवं संग्रहालय विभाग का संरक्षण188
1976हम्पी राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल188
1980 के दशक का आरंभ; लगभग बीस वर्षप्रलेखन परियोजना की शुरुआत; उसकी अवधि188
25पूरे क्षेत्र के वर्गाकार भाग, हर एक वर्णमाला के एक अक्षर से189

काल-रेखा 1: महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन (पृष्ठ 193)

लगभग कालघटनाएँपृष्ठ
लगभग 1200-1300 ईसवीदिल्ली सल्तनत की स्थापना (1206)193
लगभग 1300-1400 ईसवीविजयनगर साम्राज्य की स्थापना (1336?); बहमनी राज्य की स्थापना (1347); जौनपुर, कश्मीर और मदुरई में सल्तनतें193
लगभग 1400-1500 ईसवीउड़ीसा के गजपति राज्य की स्थापना (1435); गुजरात और मालवा की सल्तनतों की स्थापना; अहमदनगर, बीजापुर तथा बेरार सल्तनतों का उदय (1490)193
लगभग 1500-1600 ईसवीपुर्तगालियों द्वारा गोवा पर विजय (1510); बहमनी राज्य का विनाश; गोलकुंडा की सल्तनत का उदय (1518); बाबर द्वारा मुगल साम्राज्य की स्थापना (1526)193
  • प्रश्नचिह्न: जिस तिथि के साथ प्रश्नचिह्न लगा है, वह अनिश्चित है; इसलिए 1336 को पक्की तिथि मत मानिए।

काल-रेखा 2: विजयनगर की खोज व संरक्षण की मुख्य घटनाएँ (पृष्ठ 193)

वर्षघटनापृष्ठ
1800कॉलिन मैकेन्ज़ी द्वारा विजयनगर की यात्रा193
1856अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ ने हम्पी के पुरातात्विक अवशेषों के पहले विस्तृत चित्र लिए193
1876पुरास्थल की मंदिर की दीवारों के अभिलेखों का जे.एफ. फ्लीट द्वारा प्रलेखन आरंभ193
1902जॉन मार्शल के अधीन संरक्षण कार्य आरंभ193
1986हम्पी को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया जाना193

10. ये ग़लतियाँ मत कीजिएध्यान

ग़लतीसही बातपृष्ठ
“विजयनगर साम्राज्य” को उस समय का नाम माननायह इतिहासकारों का शब्द है; समकालीन लोग इसे कर्नाटक साम्राज्यमु कहते थे171
1336 को पक्की तिथि माननाकाल-रेखा 1 में “1336?” छपा है; प्रश्नचिह्न अनिश्चित तिथि बताता है171, 193
हम्पी की जानकारी को केवल मैकेन्ज़ी की अपनी खोज माननामैकेन्ज़ी की शुरुआती जानकारी विरुपाक्ष मंदिर और पम्पादेवी के पूजास्थल के पुरोहितों की स्मृतियों पर आधारित थी170
सुलुवों को संगम वंश की ही एक शाखा माननासुलुव सैनिक कमांडर थे, जिन्होंने संगम वंश को उखाड़ फेंका और 1503 तक शासन किया173
1565 में रामराय को राजा लिखनारामराय विजयनगर के प्रधानमंत्री थे; सेना उनके नेतृत्व में राक्षसी–तांगड़ी (तालीकोटा) में हारी173
यह लिखना कि विजयनगर और सुल्तानों के संबंध हमेशा शत्रुतापूर्ण रहेधार्मिक भिन्नताओं के बावजूद संबंध हमेशा शत्रुतापूर्ण नहीं थे: कृष्णदेव राय ने सल्तनतों के दावेदारों का समर्थन किया, और उनकी मृत्यु के बाद बीजापुर के सुल्तान ने उत्तराधिकार विवाद सुलझाने में हस्तक्षेप किया174
अमर–नायक प्रणाली को पूरी तरह विजयनगर की नई चीज़ लिखनायह विजयनगर की एक प्रमुख राजनीतिक खोज थी, पर ऐसा प्रतीत होता है कि इसके कई तत्त्व दिल्ली सल्तनत की इक्ता प्रणाली से लिए गए175
खेतों को शहर की दीवारों के बाहर माननाक़िलेबंदी ने खेतों को भी घेरा था; पहली, दूसरी और तीसरी दीवारों के बीच जुते हुए खेत, बग़ीचे और आवास थे177–178
हिरिया नहर को पक्के तौर पर संगम राजाओं की बनवाई लिखनाकिताब कहती है कि इसे संभवत: संगम वंश के राजाओं ने बनवाया177
राजकीय केंद्र में केवल महल माननावहाँ 60 से भी अधिक मन्दिर थे; महल के रूप में लगभग तीस संरचनाएँ पहचानी गई हैं179
“राजा का भवन”, सभा मंडप, महानवमी डिब्बा या कमल महल का काम पक्का मानकर लिखनाइनका प्रयोजन निश्चित नहीं है; किताब के अनुसार राजकीय केंद्र की कई संरचनाएँ आज भी पहेली हैं180–181
“कमल महल” को उसका पुराना नाम माननायह नाम उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों ने दिया था181
विट्ठल को शिव का रूप लिखनाविट्ठल विष्णु का एक रूप हैं, जो सामान्यत: महाराष्ट्र में पूजे जाते हैं187

11. अपने को जाँचिए: किताब के प्रश्न और उत्तर★★

किताब की प्रश्नावली, पृष्ठ 194–195

उत्तर दीजिए (लगभग 100-150 शब्दों में)

प्रश्न 1. पिछली दो शताब्दियों में हम्पी के भवनावशेषों के अध्ययन में कौन–सी पद्धतियों का प्रयोग किया गया है? आपके अनुसार यह पद्धतियाँ विरुपाक्ष मन्दिर के पुरोहितों द्वारा प्रदान की गई जानकारी का किस प्रकार पूरक रहीं?

उत्तर देखिए

उत्तर: 1800 से आज तक हम्पी के खंडहर कई पद्धतियों से पढ़े गए, और हर पद्धति ने पुरोहितों की स्मृति को परखा और आगे बढ़ाया।

  • सर्वेक्षण मानचित्र: 1800 ई. में कर्नल कॉलिन मैकेन्ज़ी ने भग्नावशेष प्रकाश में लाए और इस स्थान का पहला सर्वेक्षण मानचित्र बनाया।

  • अभिलेख: 1836 से अभिलेखकर्ताओं ने कई दर्जन अभिलेख इकट्ठे किए; 1876 में जे.एफ. फ्लीट ने मंदिरों की दीवारों के अभिलेखों का प्रलेखन शुरू किया।

  • छाया चित्र: 1856 ई. से भवनों के चित्र संकलित हुए; अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ ने अवशेषों के पहले विस्तृत चित्र लिए।

  • मिलान: इतिहासकारों ने इन स्रोतों का विदेशी यात्रियों के वृत्तांतों और तेलुगु, कन्नड़, तमिल और संस्कृत साहित्य से मिलान किया।

  • संरक्षण और अंकन: 1902 से जॉन मार्शल के अधीन संरक्षण हुआ; 1980 के दशक के आरंभ से लगभग बीस वर्ष तक पूरे क्षेत्र को 25 वर्गों और फिर छोटी इकाइयों में बाँटकर हज़ारों संरचनाओं का प्रलेखन हुआ।

पूरक कैसे: मैकेन्ज़ी की शुरुआती जानकारी विरुपाक्ष मंदिर और पम्पादेवी के पूजास्थल के पुरोहितों की स्मृतियों पर आधारित थी। बाकी पद्धतियों ने इस स्मृति को लिखित और भौतिक साक्ष्य से परखा और जोड़ा: अभिलेखों ने मन्दिरों को दिए दान और घटनाएँ बताईं, चित्रों और नक्शों ने भवनों का रूप और जगह दर्ज की, और यात्रियों के वृत्तांतों ने उस समय का जीवन दिखाया। (पृष्ठ 170, 176, 188–189, 193)

प्रश्न 2. विजयनगर की जल–आवश्यकताओं को किस प्रकार पूरा किया जाता था?

उत्तर देखिए

उत्तर: विजयनगर प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक में था, इसलिए पानी इकट्ठा करने और उसे शहर तक ले जाने के व्यापक प्रबंध किए गए।

  • नदी और पहाड़ियाँ: तुंगभद्रा नदी ने यहाँ एक प्राकृतिक कुण्ड बनाया; चारों ओर की ग्रेनाइट पहाड़ियों से कई जल-धाराएँ नदी में मिलती थीं।

  • हौज़: लगभग सभी धाराओं के साथ बाँध बनाकर अलग-अलग आकार के हौज़ बनाए गए।

  • कमलपुरम् जलाशय: पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में बना; इससे आस-पास के खेत सींचे जाते थे और एक नहर से पानी राजकीय केंद्र तक जाता था।

  • हिरिया नहर: तुंगभद्रा पर बने बाँध से पानी लाकर धार्मिक केंद्र को शहरी केंद्र से अलग करने वाली घाटी सींचती थी; संभवत: संगम वंश के राजाओं ने बनवाई।

  • कृष्णदेव राय का जलाशय (स्रोत 4): पेस के अनुसार इसमें पानी 9 मील (लगभग 15 किमी) से भी अधिक दूरी से पाइपों से आता था, और यह बगीचों तथा धान के खेतों को सींचता था।

  • आम लोगों के लिए: कुएँ, बरसात के पानी वाले जलाशय और मन्दिरों के जलाशय संभवत: सामान्य नगर निवासियों के लिए पानी के स्रोत थे।

(पृष्ठ 177, 179)

प्रश्न 3. शहर के क़िलेबंद क्षेत्र में कृषि क्षेत्र को रखने के आपके विचार में क्या फ़ायदे और नुकसान थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: विजयनगर की क़िलेबंदी ने शहर के साथ खेतों को भी घेरा था। अब्दुर रज़्ज़ाक के अनुसार “पहली, दूसरी और तीसरी दीवारों के बीच जुते हुए खेत, बग़ीचे तथा आवास हैं”।

फ़ायदे:

  • घेराबंदी में भोजन: मध्यकालीन घेराबंदियों का मुख्य उद्देश्य प्रतिपक्ष को खाद्य सामग्री से वंचित कर समर्पण के लिए बाध्य करना होता था, और वे महीनों या वर्षों चल सकती थीं; भीतर खेत होने से शहर भूखा नहीं रहता।

  • भीतर ही पानी: यह कृषि क्षेत्र तुंगभद्रा से पानी लाने वाली नहर प्रणाली से सींचा जाता था, इसलिए घेरे में भी फ़सल उग सकती थी।

  • अन्नागार से आगे: दूसरे शासक आम तौर पर क़िलेबंद क्षेत्र में विशाल अन्नागार बनवाते थे; अन्नागार ख़ाली हो सकते हैं, पर पूरा कृषि भूभाग बचाने से भोजन मिलता रहता।

नुकसान:

  • भारी खर्च: किताब इसे “एक अधिक मँहगी तथा व्यापक नीति” कहती है; इतनी लंबी दीवारें बनाना और सँभालना महँगा था।

  • बचाव कठिन: पहाड़ियों, खेतों और जंगलों तक फैले इतने बड़े घेरे की रक्षा के लिए बहुत सैनिक चाहिए होते।

  • फिर भी नहीं बचा: 1565 में सेना की हार के बाद विजयी सेनाओं ने शहर लूट लिया; दीवारें और भीतर के खेत शहर को नहीं बचा सके।

(पृष्ठ 173, 177–178)

प्रश्न 4. आपके विचार में महानवमी डिब्बा से संबद्ध अनुष्ठानों का क्या महत्त्व था?

उत्तर देखिए

उत्तर: महानवमी डिब्बा से जुड़े अनुष्ठान संभवत: सितंबर-अक्टूबर के दस दिन के हिंदू त्यौहार के महानवमी (महान नवाँ दिवस) पर होते थे, और किताब कहती है कि “इन उत्सवों के गहन सांकेतिक अर्थ थे।”

  • ताक़त का प्रदर्शन: इस अवसर पर विजयनगर शासक अपने “रुतबे, ताक़त तथा अधिराज्य” का प्रदर्शन करते थे।

  • धर्म से जुड़ाव: मूर्ति की पूजा, राज्य के अश्व की पूजा और भैंसों तथा अन्य जानवरों की बलि से राजसत्ता धार्मिक अनुष्ठान के साथ जुड़ी दिखती थी।

  • नायकों की निष्ठा: प्रमुख नायक और अधीनस्थ राजा राजा और उसके अतिथियों को औपचारिक भेंट देते थे; अंतिम दिन नायक बड़ी मात्रा में भेंट और नियत कर भी लाते थे।

  • सेना का निरीक्षण: त्यौहार के अंतिम दिन राजा खुले मैदान में भव्य समारोह में अपनी और अपने नायकों की सेना का निरीक्षण करता था।

  • उत्सव: नृत्य, कुश्ती प्रतिस्पर्धा और साज़ लगे घोड़ों, हाथियों, रथों और सैनिकों की शोभायात्रा इस अवसर के प्रमुख आकर्षण थे।

! ध्यान रखिए: विद्वानों के अनुसार आज के महानवमी डिब्बा के चारों ओर का स्थान इतनी बड़ी शोभायात्रा के लिए पर्याप्त नहीं था, इसलिए यह मंच ही इस अनुष्ठान का केंद्र था या नहीं, यह पहेली बना हुआ है। (पृष्ठ 180–181)

प्रश्न 5. चित्र 7.33 विरुपाक्ष मन्दिर के एक अन्य स्तंभ का रेखाचित्र है। क्या आप कोई पुष्प–विषयक रूपांकन देखते हैं? किन जानवरों को दिखाया गया है? आपके विचार में उन्हें क्यों चित्रित किया गया है? मानव आकृतियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: रेखाचित्र में स्तंभ के सबसे ऊपर कमल की कली के आकार का शीर्ष है, एक ओर सवार वाला एक जानवर पिछले पैरों पर खड़ा है, दूसरी ओर एक के ऊपर एक पटल हैं, और नीचे उत्कीर्णित पट्टियों वाला आधार। किताब इस चित्र का अलग वर्णन नहीं देती, पर विरुपाक्ष मन्दिर और उसके स्तंभों के बारे में ये बातें बताती है:

  • सजे हुए स्तंभ: मुख्य मन्दिर के सामने कृष्णदेव राय का बनवाया मण्डप सूक्ष्मता से उत्कीर्णित स्तंभों से सजाया गया था।

  • फूल: हाँ, स्तंभ का शीर्ष कमल की कली के आकार का है।

  • जानवर और क्यों: एक जानवर पिछले पैरों पर खड़ा है और उस पर सवार बैठा है। उसे क्यों चित्रित किया गया, यह अपने विचार में लिखिए। किताब के अनुसार गोपुरम् और मण्डप राजकीय सत्ता के द्योतक थे, और मन्दिर धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र थे; इसलिए सजावट शासक की शान भी दिखाती थी।

  • मानव आकृतियाँ: जानवर पर सवार; एक पटल में धनुष से एक लिंग पर बाण चलाती आकृति; नीचे के पटल में गदा लिए बैठी एक भारी-भरकम पुरुष आकृति; और ऊपर के छोटे पटल में एक बैठी आकृति। ये किसी कथा के दृश्य हो सकते हैं, जैसे हज़ार राम मन्दिर की भीतरी दीवारों पर रामायण के दृश्यांश उत्कीर्णित हैं।

(पृष्ठ 183–186, 194)

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)

प्रश्न 6. “शाही केंद्र” शब्द शहर के जिस भाग के लिए प्रयोग किए गए हैं, क्या वे उस भाग का सही वर्णन करते हैं।

उत्तर देखिए

उत्तर: शहर के नक्शे पर जिसे “शाही केंद्र” लिखा है, किताब का पाठ उसे राजकीय केंद्र कहता है। यह नाम आधा ही सही है: यहाँ राजसत्ता के भवन थे, पर धर्म के भी।

1. नाम के पक्ष में

  • यह बस्ती के दक्षिण-पश्चिमी भाग में था; तीसरी क़िलेबंदी इसी को घेरती थी, और महत्त्वपूर्ण इमारतों के हर समूह की अपनी ऊँची दीवारें थीं।

  • लगभग तीस संरचनाएँ महल मानी गई हैं: अपेक्षाकृत बड़ी, और आनुष्ठानिक कार्यों से न जुड़ी।

  • सभा मंडप और महानवमी डिब्बा यहीं हैं, जहाँ महानवमी पर शासक अपने “रुतबे, ताक़त तथा अधिराज्य” का प्रदर्शन करते थे।

  • मैकेन्ज़ी के मानचित्र से मिले सुझाव के अनुसार कमल महल परिषदीय सदन था, जहाँ राजा परामर्शदाताओं से मिलता था; उसके समीप “हाथियों का अस्तबल” है।

  • कमलपुरम् जलाशय से एक नहर इस केंद्र तक पानी लाती थी।

2. नाम के विरुद्ध

  • इसमें 60 से भी अधिक मन्दिर थे; इनमें हज़ार राम मन्दिर संभवत: केवल राजा और उनके परिवार के प्रयोग के लिए था।

  • “राजा का भवन” के राजकीय आवास होने का कोई निश्चित साक्ष्य नहीं; सभा मंडप का प्रयोजन स्पष्ट नहीं; कमल महल का काम भी निश्चित नहीं, और उसका नाम उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों ने रखा।

  • विद्वानों का मानना है कि महानवमी डिब्बा के चारों ओर का स्थान बड़ी शोभायात्रा के लिए पर्याप्त नहीं था; किताब कहती है कि राजकीय केंद्र की कई संरचनाओं की तरह यह भी “एक पहेली बना हुआ है”।

  • मन्दिर पूरी तरह राजगिरी से बने थे, जबकि धर्मेतर भवनों की अधिरचना विकारी वस्तुओं से बनी थी।

3. धर्म और राजसत्ता साथ-साथ

  • शासक देवी-देवताओं से संबंध के माध्यम से अपनी सत्ता को स्थापित करने और वैधता देने का प्रयास कर रहे थे, इसलिए राजा के केंद्र में मन्दिर होना स्वाभाविक था।

  • महानवमी के अनुष्ठानों में भी पूजा और राजकीय प्रदर्शन साथ चलते थे।

निष्कर्ष: “शाही केंद्र” बताता है कि यहाँ राजसत्ता रहती और दिखाई जाती थी, पर यह पूरा वर्णन नहीं है। मन्दिरों की बड़ी संख्या दिखाती है कि विजयनगर की राजसत्ता धर्म के सहारे खड़ी थी, और कई भवनों का असली काम आज भी अनिश्चित है। (पृष्ठ 176–183)

प्रश्न 7. कमल महल और हाथियों के अस्तबल जैसे भवनों का स्थापत्य हमें उनके बनवाने वाले शासकों के विषय में क्या बताता है?

उत्तर देखिए

उत्तर: दोनों भवन राजकीय केंद्र में हैं, और इनका स्थापत्य बताता है कि विजयनगर के शासक दूसरी शैलियाँ अपनाने वाले, भव्यता चाहने वाले और अपनी ताक़त दिखाने वाले थे। इनका असली काम निश्चित नहीं है, इसलिए उत्तर सावधानी से लिखिए।

1. कमल महल

  • राजकीय केंद्र के सबसे सुंदर भवनों में से एक; इसमें नौ मीनारें थीं, बीच में एक ऊँची और आठ उसकी भुजाओं के साथ-साथ।

  • किताब के अनुसार इसकी मेहराबें “संभवत: इण्डो–इस्लामी तकनीकों से प्रभावित थीं।”

  • नाम उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों ने रखा; मैकेन्ज़ी के मानचित्र से मिले सुझाव के अनुसार यह परिषदीय सदन था, जहाँ राजा अपने परामर्शदाताओं से मिलता था।

2. “हाथियों का अस्तबल”

  • कमल महल के समीप स्थित एक लंबा भवन: नीचे नुकीली मेहराबों की पंक्ति, ऊपर गुंबदों की पंक्ति, और बीच में एक ऊँचा मण्डप।

  • किताब यह नाम उद्धरण-चिह्नों में देती है और पूछती है कि क्या ये वास्तव में हाथियों के अस्तबल थे। इसकी मेहराबें और गुंबद वही तत्त्व हैं जो क़िलेबंद बस्ती के प्रवेशद्वार पर हैं।

3. शासकों के बारे में क्या पता चलता है

  • शैलियाँ अपनाईं: मेहराब और गुंबद तुर्की सुल्तानों द्वारा प्रवर्तित स्थापत्य के तत्त्व माने जाते हैं; दक्कन के सुलतानों और गजपतियों से संपर्क में विजयनगर के शासकों ने अवधारणाएँ और भवन निर्माण की तकनीकें ग्रहण कीं और आगे विकसित कीं।

  • राजकाज के भवन: महल आनुष्ठानिक कार्यों से नहीं जुड़े थे; शासक राजकाज और अपनी शान के लिए भी भव्य भवन बनवाते थे।

  • सैनिक शक्ति: युद्धकला प्रभावशाली अश्वसेना पर आधारित थी और अमर-नायक घोड़ों और हाथियों के दल रखते थे; यदि ये सचमुच अस्तबल थे, तो यह भवन उसी सैनिक शक्ति को दिखाता है।

  • साधन और कौशल: ऊँचे गोपुरमों के बारे में किताब कहती है कि वे शासकों की उस ताकत की याद दिलाते थे जो साधन, तकनीक और कौशल जुटा सकती थी; इतने बड़े और सजे महलों पर भी यही बात लागू होती है।

निष्कर्ष: ये भवन ऐसे शासकों के हैं जो अलग-अलग परंपराओं को मिलाकर अपनी शक्ति और वैभव दिखाना चाहते थे। पर इनका काम अनिश्चित है, इसलिए यह निष्कर्ष केवल स्थापत्य पर टिका है। (पृष्ठ 171–172, 175, 178–182, 186)

प्रश्न 8. स्थापत्य की कौन–कौन–सी परंपराओं ने विजयनगर के वास्तुविदों को प्रेरित किया? उन्होंने इन परंपराओं में किस प्रकार बदलाव किए?

उत्तर देखिए

उत्तर: विजयनगर के वास्तुविदों ने दक्षिण भारत की पुरानी मन्दिर परंपरा और सुल्तानों की इंडो–इस्लामिक शैली, दोनों से सीखा, और उन्हें राजकीय सत्ता दिखाने के लिए नए रूप दिए।

1. किन परंपराओं से प्रेरणा मिली

  • पुराने दक्षिणी राज्य: तमिलनाडु में चोलों और कर्नाटक में होयसालों के शासक वर्ग ने तंजावुर के बृहदेश्वर और बेलूर के चन्नकेशव जैसे विशाल मन्दिरों को संरक्षण दिया; विजयनगर के राय इन परंपराओं को “नयी ऊँचाइयों तक” ले गए।

  • लंबा मन्दिर इतिहास: इस क्षेत्र में मन्दिर निर्माण पल्लव, चालुक्य, होयसाल और चोल वंशों तक जाता है; विरुपाक्ष का सबसे प्राचीन मन्दिर नवीं–दसवीं शताब्दियों का था।

  • सुल्तानों से संपर्क: दक्कन के सुलतानों और उड़ीसा के गजपतियों से संपर्क में विचारों का आदान-प्रदान हुआ, विशेषकर स्थापत्य में; मेहराब और गुंबद तुर्की सुल्तानों द्वारा प्रवर्तित तत्त्व माने जाते हैं।

  • दूसरे क्षेत्रों की पूजा: महाराष्ट्र में पूजे जाने वाले विट्ठल की पूजा कर्नाटक में आरंभ की गई।

2. क्या बदलाव किए

  • विशाल पैमाना: राय गोपुरम् इतने ऊँचे बने कि केंद्रीय देवालयों की मीनारें बौनी लगतीं; वे दूर से मन्दिर का संकेत देते और शासकों की ताकत की याद दिलाते।

  • मण्डप और गलियारे: लंबे स्तंभों वाले गलियारे और अलग-अलग कामों के सभागार बने: संगीत, नृत्य और नाटक देखने, देवताओं के विवाह और झूला झुलाने के लिए।

  • परिसर का विस्तार: विरुपाक्ष मन्दिर में कृष्णदेव राय ने राज्यारोहण के उपलक्ष्य में मण्डप बनवाया और पूर्वी गोपुरम् का श्रेय भी उसी को है; केंद्रीय देवालय पूरे परिसर का छोटा भाग रह गया।

  • रथ गलियाँ: गोपुरम् से सीधी रेखा में पत्थर के फर्श वाली गलियाँ, जिनके दोनों ओर स्तंभ वाले मण्डपों में व्यापारी दुकानें लगाते थे; विट्ठल मन्दिर में रथ के आकार का एक अनूठा मन्दिर भी है।

  • राजा मन्दिर में: राजकीय प्रतिकृति मूर्तियाँ मन्दिरों में प्रदर्शित होने लगीं, और राजा की मन्दिर यात्राएँ महत्त्वपूर्ण राजकीय अवसर बन गईं।

  • इंडो–इस्लामिक तत्त्व: क़िलेबंद बस्ती के प्रवेशद्वारों पर मेहराब और गुंबद बने; कमल महल की मेहराबें संभवत: इण्डो–इस्लामी तकनीकों से प्रभावित थीं; शहरी केंद्र की मस्ज़िदों और मक़बरों का स्थापत्य मन्दिरों के मण्डपों से मिलता-जुलता है।

निष्कर्ष: किताब के शब्दों में, शासकों ने “एक साम्राज्यिक संस्कृति के निर्माण के लिए” अलग-अलग परंपराओं को आत्मसात किया। बाद में नायकों ने भी ये परंपराएँ जारी रखीं, और कुछ सबसे दर्शनीय गोपुरम् स्थानीय नायकों ने बनवाए। (पृष्ठ 171–172, 178–179, 181, 184–188)

प्रश्न 9. अध्याय के विभिन्न विवरणों से आप विजयनगर के सामान्य लोगों के जीवन की क्या छवि पाते हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: अध्याय के विवरण, खासकर विदेशी यात्रियों के वृत्तांत, सामान्य लोगों के जीवन की कुछ झलक देते हैं; पर किताब साफ़ कहती है कि बहुत-सी बातें हम नहीं जानते।

1. घर और मुहल्ले

  • शहरी केंद्र में सामान्य लोगों के आवासों के अपेक्षाकृत कम पुरातात्विक साक्ष्य हैं।

  • सोलहवीं शताब्दी के पुर्तगाली यात्री बरबोसा के अनुसार लोगों के घर छप्पर के थे, पर सुदृढ़, और व्यवसाय के आधार पर खुले स्थानों वाली लंबी गलियों में बसे थे।

  • शहरी केंद्र के उत्तर-पूर्वी कोने जैसे स्थानों में परिष्कृत चीनी मिट्टी मिली, यानी हो सकता है वहाँ अमीर व्यापारी रहते हों; यह मुस्लिम रिहायशी मुहल्ला भी था, जहाँ मक़बरे और मस्ज़िदें थीं।

2. पानी, खेती और पूजा

  • कुएँ, बरसात के पानी वाले जलाशय और मन्दिरों के जलाशय संभवत: सामान्य नगर निवासियों के पानी के स्रोत थे।

  • दीवारों के बीच जुते हुए खेत, बग़ीचे और आवास थे, और धान उगाया जाता था।

  • बहुत से पूजा स्थल और छोटे मन्दिर विविध संप्रदायों की ओर संकेत करते हैं, जो संभवत: अलग-अलग समुदायों द्वारा संरक्षित थे।

3. बाज़ार और भोजन

  • पेस (स्रोत 5) एक चौड़ी गली का वर्णन करता है जहाँ माणिक्य, हीरे, मोती और वस्त्र बिकते थे, और हर शाम मेला लगता था; उसके अनुसार चावल, गेहूँ और दालें सस्ते और प्रचुर थे।

  • नूनिज़ के अनुसार फल सस्ते और प्रचुर थे, और बाज़ारों में मांस भी बड़ी मात्रा में बिकता था।

  • रथ गलियों के दोनों ओर के मण्डपों में व्यापारी दुकानें लगाते थे।

4. श्रम, कर और उत्सव

  • स्रोत 4 में पेस ने कृष्णदेव राय के जलाशय पर “पन्द्रह से बीस हज़ार आदमी” काम करते देखे।

  • अमर-नायक किसानों, शिल्पकर्मियों और व्यापारियों से भू राजस्व और अन्य कर वसूलते थे; कई बार उपजाऊ भूमि की तलाश में किसान नायकों के साथ चलते थे।

  • महानवमी पर नृत्य, कुश्ती प्रतिस्पर्धा और शोभायात्राएँ होती थीं।

5. जो हम नहीं जानते

  • सामान्य लोग इन भवनों के बारे में क्या सोचते थे, क्या वे शाही या धार्मिक केंद्र के किसी भाग में जा सकते थे, और राजगीर, पत्थर काटने वाले और मूर्तिकार कहाँ से आते थे और उन्हें कैसा वेतन मिलता था: भवनों को देखने मात्र से इनके उत्तर नहीं मिलते।

निष्कर्ष: छवि एक भरे-पूरे व्यापारिक शहर की है, जहाँ सस्ता भोजन, कई संप्रदाय और भारी श्रम करने वाले लोग थे। पर यह छवि ज़्यादातर बाहर से आए यात्रियों की आँखों से बनी है, सामान्य लोगों की अपनी आवाज़ में नहीं। (पृष्ठ 175–181, 188, 191–192)

मानचित्र कार्य

प्रश्न 10. विश्व के सीमारेखा मानचित्र पर इटली, पुर्तगाल, ईरान तथा रूस को सन्निकटता से अंकित कीजिए। उन मार्गों को पहचानिए जिनका प्रयोग पृ. 176 पर उल्लिखित यात्रियों ने विजयनगर पहुँचने के लिए किया था।

उत्तर देखिए

उत्तर: पहले एटलस की मदद से चारों देश अंकित कीजिए, फिर पृष्ठ 176 के यात्रियों को उनके देश से जोड़िए:

  • इटली: निकोलो दे कॉन्ती, इतालवी व्यापारी, पंद्रहवीं शताब्दी।

  • ईरान: अब्दुर रज़्ज़ाक, जिसे किताब फ़ारस के राजा का दूत बताती है, पंद्रहवीं शताब्दी; पृष्ठ 177 के अनुसार उसे कालीकट (कोज़ीकोड) भेजा गया था।

  • रूस: अफ़ानासी निकितिन, रूस का व्यापारी, पंद्रहवीं शताब्दी।

  • पुर्तगाल: फर्नाओ नूनिज़ (पुर्तगाल का) और दुआर्ते बरबोसा (पुर्तगाली यात्री), दोनों सोलहवीं शताब्दी; डोमिंगो पेस भी सोलहवीं शताब्दी में आया।

मार्ग: किताब इन यात्रियों के मार्ग नहीं बताती। मार्गों के लिए एटलस या अपने अध्यापक की मदद लीजिए। किताब से इतना जोड़ सकते हैं कि पुर्तगाली 1498 ई. से उपमहाद्वीप के पश्चिमी तट पर आने लगे थे; अपने नक्शे पर कालीकट और गोवा भी अंकित कीजिए। (पृष्ठ 172, 174, 176–177, 179)

परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11. भारतीय उपमहाद्वीप के किसी एक ऐसे प्रमुख शहर के विषय में और जानकारी हासिल कीजिए जो लगभग चौदहवीं–सत्रहवीं शताब्दियों में फला–फूला। शहर के स्थापत्य का वर्णन कीजिए। क्या कोई ऐसे लक्षण हैं जो इनके राजनीतिक केंद्र होने की ओर संकेत करें? क्या ऐसे भवन हैं जो आनुष्ठानिक रूप से महत्त्वपूर्ण हों? कौन–से ऐसे लक्षण हैं जो शहरी भाग को आस–पास के क्षेत्रों से विभाजित करते हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: यह परियोजना आपको स्वयं खोजकर करनी है। तरीका:

  • लगभग चौदहवीं–सत्रहवीं शताब्दियों में फला-फूला कोई एक बड़ा शहर चुनिए, और अपने अध्यापक या पुस्तकालय की किताबों से उसकी जानकारी जुटाइए।

  • विजयनगर के अध्याय को ढाँचा बनाइए: नक्शा, दीवारें और प्रवेशद्वार, पानी के प्रबंध, राजकीय भवन, धार्मिक भवन, बाज़ार और सड़कें।

  • प्रश्न के तीनों भागों के उत्तर अलग-अलग लिखिए: राजनीतिक केंद्र होने के लक्षण (महल, सभा भवन, ऊँची दीवारों वाले घेरे); आनुष्ठानिक रूप से महत्त्वपूर्ण भवन; और शहरी भाग को आस-पास से अलग करने वाले लक्षण (क़िलेबंदी, प्रवेशद्वार, नदी या पहाड़ियाँ)।

  • हर बात के साथ लिखिए कि वह किस स्रोत से मिली: यात्रियों के वृत्तांत, अभिलेख, नक्शे या तसवीरें।

  • प्रस्तुति: एक सादा नक्शा या रेखाचित्र, विजयनगर से तुलना की एक तालिका, और अंत में दो-तीन वाक्य कि दोनों शहर कहाँ मिलते हैं और कहाँ अलग हैं।

प्रश्न 12. अपने आस–पास के किसी धार्मिक भवन को देखिए। रेखाचित्र के माध्यम से छत, स्तंभों, मेहराबों, यदि हों तो, गलियारों, रास्तों, सभागारों, प्रवेशद्वारों, जलआपूर्ति आदि का वर्णन कीजिए। इन सभी की तुलना विरुपाक्ष मन्दिर के अभिलक्षणों से कीजिए। वर्णन कीजिए कि भवन का हर भाग किस प्रयोग में लाया जाता था। इसके इतिहास के विषय में पता कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: यह परियोजना आपको स्वयं देखकर करनी है। तरीका:

  • अपने आस-पास का कोई धार्मिक भवन चुनिए और उसका एक सादा रेखाचित्र बनाइए; उस पर छत, स्तंभ, मेहराबें (यदि हों), गलियारे, रास्ते, सभागार, प्रवेशद्वार और पानी का प्रबंध अंकित कीजिए।

  • विरुपाक्ष मन्दिर से तुलना की तालिका बनाइए। विरुपाक्ष की ओर ये बातें लिखिए: ऊँचा गोपुरम्, कृष्णदेव राय का बनवाया मण्डप और पूर्वी गोपुरम्, स्तंभों वाले सभागार और गलियारे, जलाशय, और पूरे परिसर में छोटा-सा केंद्रीय देवालय।

  • हर भाग के आगे लिखिए कि उसका प्रयोग किस काम के लिए होता है (पूजा, उत्सव, सभा, भोजन या कुछ और); यह वहाँ के लोगों से पूछकर पता कीजिए।

  • इतिहास के लिए पुजारी, प्रबंधक या बुज़ुर्गों से पूछिए, और कोई शिलालेख या स्थापना-पट्ट हो तो उसे पढ़कर लिखिए।

किताब की गतिविधियाँ

ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर अध्याय समझने में मदद करती हैं।

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 171). मैकेन्ज़ी और उनके देशज सूचनादाताओं को चित्रकार ने किस प्रकार चित्रित किया है? उनके तथा उनके सूचनादाताओं के विषय में दर्शकों पर किस प्रकार के विचार डालने का प्रयास किया गया है?

उत्तर देखिए

उत्तर: यह एक तैलचित्र है, जिसमें लाल कोट पहने मैकेन्ज़ी तीन पगड़ीधारी भारतीयों के बीच खड़े हैं। राय आपकी अपनी होगी; किताब से ये बातें काम आएँगी:

  • चित्र में कौन: मैकेन्ज़ी के बायीं ओर दूरबीन थामे उनका चपरासी, और दायीं ओर उनके ब्राह्मण सहायक: एक जैन पंडित और उनके पीछे तेलुगु ब्राह्मण कावलेरी वेन्तक लच्छमैया।

  • बीच में कौन: चित्र के बीच में मैकेन्ज़ी हैं, और भारतीय सूचनादाता उनके दोनों ओर।

  • मैकेन्ज़ी का नज़रिया: स्रोत 1 में वे कहते हैं कि ब्रिटिश प्रशासन से पहले दक्षिण भारत “खराब प्रबंधन की दुर्गति” से जूझता रहा। सोचिए कि क्या चित्र भी यही संदेश देता है कि ज्ञान का श्रेय अंग्रेज़ अधिकारी का है और भारतीय जानकार केवल सहायक हैं।

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 173). आपके विचार में राजा व्यापार को प्रोत्साहित करने का इच्छुक क्यों था? इन विनिमयों से किन समूहों को लाभ पहुँचा होगा?

उत्तर देखिए

उत्तर: स्रोत 2 (कृष्णदेव राय की अमुक्तमल्यद) और भाग 2.1 से:

  • क्यों: युद्धकला अश्वसेना पर आधारित थी, इसलिए अरब और मध्य एशिया के घोड़े ज़रूरी थे; व्यापार प्रतिष्ठा का मानक था; व्यापार का राजस्व राज्य की समृद्धि बढ़ाता था; और व्यापारियों को अपने साथ जोड़ने से, कृष्णदेव राय के शब्दों में, “ये वस्तुएँ कभी भी तुम्हारे दुश्मनों तक नहीं पहुँचेंगी।”

  • किन्हें लाभ: राजा और राज्य (घोड़े, हाथी, राजस्व); दूर देशों के व्यापारी (तोहफ़े और उचित मुनाफ़ा); अरब व्यापारी और कुदिरई चेट्टी; विदेशी नाविक, जिनकी देखभाल का प्रबंध होना था; और समृद्ध जनता, जो मँहगी विदेशी वस्तुएँ, विशेषकर रत्न और आभूषण चाहती थी।

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 174). उन आधुनिक राज्यों को चिह्नित कीजिए जो विजयनगर साम्राज्य का भाग थे।

उत्तर देखिए

उत्तर: किताब आधुनिक राज्यों की सूची नहीं देती; भारत के आज के राजनीतिक मानचित्र को मानचित्र 1 के साथ रखकर स्वयं पहचानिए।

  • मदद के लिए: अपने चरमोत्कर्ष पर साम्राज्य उत्तर में कृष्णा नदी से प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण तक फैला था, और अध्याय में तमिलनाडु (चोल) और कर्नाटक (होयसाल) के नाम आते हैं।

  • मानचित्र 1 पर विजयनगर, चन्द्रगिरी, तंजावुर, मदुरई और मैसूर ढूँढिए और पता कीजिए कि ये आज किन राज्यों में हैं।

चर्चा कीजिए (पृष्ठ 175). मानचित्र 1 पर चन्द्रगिरी, मदुरई, इक्केरी, तंजावुर तथा मैसूर को चिह्नित कीजिए, ये सभी नायक शक्ति के केंद्र थे। यह भी चर्चा कीजिए कि नदियों और पहाड़ों ने किन मायनों में विजयनगर के साथ संचार को सरल अथवा बाधित किया।

उत्तर देखिए

उत्तर: पहला भाग मानचित्र पर अंकन का है; दूसरा भाग चर्चा का, जिसका उत्तर किताब सीधे नहीं देती।

  • अंकन: पाँचों केंद्र मानचित्र 1 पर ढूँढकर अंकित कीजिए, और देखिए कि हर एक विजयनगर से किस दिशा में है।

  • नदियाँ: मानचित्र 1 पर कृष्णा, तुंगभद्रा, पेन्नार, कावेरी और वैगाई देखिए। चर्चा कीजिए कि नदी के साथ-साथ चलना आसान रहा होगा, पर उसे पार करना कठिन।

  • पहाड़: पहाड़ों के लिए एटलस का भौतिक मानचित्र देखिए। किताब बताती है कि विजयनगर की सड़कें पहाड़ी भूभाग से बचकर घाटियों से होकर जाती थीं; इससे सोचिए कि पहाड़ कहाँ रास्ता रोकते होंगे।

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 176). नक्शे पर बने तीन अंचलों को पहचानिए। मध्यभाग को ध्यान से देखिए। क्या आप नदियों से जुड़ती हुई नहरों को देख सकते हैं? आप कितनी किलेबन्द दीवारों को देख सकते हैं। क्या धार्मिक केंद्र किलेबन्द था?

उत्तर देखिए

उत्तर: शहर के नक्शे (चित्र 7.4) पर:

  • तीन अंचल: नक्शे पर “पवित्र केंद्र” (हम्पी के पास), “शाही केंद्र” और “केंद्रीय भाग” लिखे हैं।

  • नहरें: मध्यभाग में नदी से निकलती नहरें खोजिए। पाठ के अनुसार हिरिया नहर तुंगभद्रा पर बने बाँध से पानी लाती थी, और कमलपुरम् जलाशय से एक नहर राजकीय केंद्र तक जाती थी।

  • दीवारें: नक्शे पर दीवारें गिनिए। पाठ तीन क़िलेबंदियों का वर्णन करता है: सबसे बाहरी, नगरीय केंद्र के चारों ओर, और राजकीय केंद्र के चारों ओर; अब्दुर रज़्ज़ाक ने दुर्गों की सात पंक्तियाँ बताई थीं।

  • धार्मिक केंद्र: पाठ दूसरी क़िलेबंदी को नगरीय केंद्र और तीसरी को राजकीय केंद्र के चारों ओर बताता है, धार्मिक केंद्र के लिए अलग दीवार नहीं बताता; नक्शे पर स्वयं जाँचकर उत्तर दीजिए।

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 176). क्या आप आज किसी शहर में ये अभिलक्षण देख सकते हैं? आपके विचार में पेस ने उद्यानों तथा जल–स्रोतों को विशेष–उल्लेख के लिए क्यों चुना?

उत्तर देखिए

उत्तर: पहला भाग आपके अपने अनुभव से है: अपने या किसी जाने-पहचाने शहर में उपवन, बगीचे, नहरें या झीलें खोजिए।

  • दूसरे भाग के लिए: विजयनगर प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक में था, इसलिए वहाँ इतने उपवन, बगीचे, पानी की नालियाँ और झीलें देखना एक यात्री को उल्लेख के लायक लगा होगा; ये शहर की समृद्धि और जल-प्रबंध दिखाते थे। (पृष्ठ 176–177)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 178). इन दो प्रवेश–द्वारों के बीच समानताओं तथा विभिन्नताओं का वर्णन कीजिए। आपके विचार में विजयनगर के शासकों ने इण्डो–इस्लामी स्थापत्य के तत्त्वों को क्यों अपनाया?

उत्तर देखिए

उत्तर: पहला चित्र क़िलेबंद दीवार में बना एक टूटा-फूटा प्रवेशद्वार है, जिसमें मेहराब है और ऊपर गुंबद। दूसरा एक गोपुरम् है: मन्दिर का कई तलों वाला ऊँचा प्रवेशद्वार।

  • तुलना: दोनों प्रवेश को नियंत्रित करते हैं और विशिष्ट स्थापत्य के नमूने हैं; अंतर यह कि क़िलेबंदी का प्रवेशद्वार मेहराब और गुंबद वाला है, जबकि गोपुरम् तलों में ऊपर उठती ऊँची मीनार है।

  • क्यों अपनाए: दक्कन के सुलतानों और गजपतियों से संपर्क में विजयनगर के शासकों ने अवधारणाएँ और भवन निर्माण की तकनीकें ग्रहण कीं और उन्हें आगे विकसित किया; इंडो–इस्लामिक शैली स्थानीय परंपराओं के साथ संपर्क से ही विकसित हुई थी। अपने विचार में जोड़िए कि नई तकनीकें मज़बूत और प्रभावशाली प्रवेशद्वार बनाने में काम आती होंगी।

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 179). आपके विचार में ये टुकड़े मूलत: किस प्रकार के बर्तनों का हिस्सा थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: चित्र में नीली-सफ़ेद चीनी मिट्टी के लगभग दर्जन भर टुकड़े हैं। किताब बर्तनों के प्रकार नहीं बताती, इसलिए अपना अनुमान लिखिए, जैसे प्याले, कटोरे या थालियाँ।

  • किताब इतना बताती है कि शहरी केंद्र के उत्तर-पूर्वी कोने जैसे स्थानों में परिष्कृत चीनी मिट्टी मिली, जिससे पुरातत्त्वविद मानते हैं कि हो सकता है वहाँ अमीर व्यापारी रहते हों; यानी ये मँहगे बर्तन रहे होंगे। (पृष्ठ 179)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 179). क्या इस मस्जिद में इण्डो–इस्लामी स्थापत्य के चारित्रिक तत्त्व विद्यमान हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: चित्र की मस्जिद पत्थर का एक खुला, स्तंभों वाला सभागार-जैसा भवन है। प्रश्न यह है कि उसमें मेहराब और गुंबद हैं या नहीं, जिन्हें किताब तुर्की सुल्तानों द्वारा प्रवर्तित स्थापत्य के चारित्रिक तत्त्व मानती है।

  • साथ ही याद रखिए कि किताब के अनुसार शहरी केंद्र के मक़बरों और मस्ज़िदों का स्थापत्य हम्पी के मन्दिरों के मण्डपों से मिलता-जुलता है; यह मस्जिद भी स्तंभों वाले मण्डप जैसी दिखती है। (पृष्ठ 178–179)

चर्चा कीजिए (पृष्ठ 179). विजयनगर की रूपरेखा की तुलना अपने नगर या गाँव की रूपरेखा से कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: यह आपके अपने इलाके की तुलना है। तरीका:

  • विजयनगर के भाग लिखिए: बाहरी दीवार, धार्मिक केंद्र, शहरी केंद्र, राजकीय केंद्र, दीवारों के भीतर खेत, नहरें और जलाशय, घाटियों से होकर जाती सड़कें, और मन्दिरों से निकलती बाज़ार वाली सड़कें।

  • अपने नगर या गाँव में खोजिए: पानी कहाँ से आता है, बाज़ार कहाँ है, पूजा स्थल कहाँ हैं, खेत बस्ती के भीतर हैं या बाहर, और सरकारी दफ़्तर कहाँ हैं।

  • दोनों का एक सादा नक्शा बनाकर समानताएँ और अंतर लिखिए।

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 180). क्या आप इन चित्रों के विषयों को पहचान सकते हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: महानवमी डिब्बा का उत्कीर्णन आड़ी पट्टियों में है, जिनमें मानव आकृतियाँ, घोड़े, एक धनुर्धारी और सैनिक हैं।

  • मदद के लिए: महानवमी के अवसर के आकर्षण थे नृत्य, कुश्ती प्रतिस्पर्धा, साज़ लगे घोड़ों, हाथियों, रथों और सैनिकों की शोभायात्रा, और राजा को दी जाने वाली भेंट; देखिए इनमें से कौन-से दृश्य उत्कीर्णन में दिखते हैं। (पृष्ठ 180–181)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 181). चित्र 7.13 तथा 7.15 की तुलना कीजिए तथा उन अभिलक्षणों की सूची बनाइये जो दोनों में हैं, और साथ ही उनकी भी जो इनमें से केवल एक में ही देखे जा सकते हैं। चित्र 7.14 में बनी मेहराब की तुलना चित्र 7.6 में बनी मेहराब से कीजिए। कमल महल में नौ मीनारें थीं– बीच में एक ऊँची, तथा आठ उसकी भुजाओं के साथ–साथ। छाया–चित्र तथा खड़े रेखाचित्र में आप कितनी–कितनी मीनारें देख पाते हैं। यदि आप कमल महल का फिर से नामकरण करते तो इसे क्या कहते?

उत्तर देखिए

उत्तर: यह चित्रों को ध्यान से देखने का अभ्यास है:

  • 7.13 और 7.15: खड़े रेखाचित्र में चबूतरे पर बना दो मंज़िला भवन है: नीचे पाँच कटावदार मेहराबें, ऊपर छोटी खिड़कियाँ, और तलों में उठती मीनारें, जिनमें बीच वाली सबसे ऊँची। तसवीर भवन को एक कोने से दिखाती है; उसमें भी तलों वाली मीनारें और कटावदार मेहराबें हैं। याद रखिए, खड़ा रेखाचित्र ऊर्ध्व अवलोकन है और वे अभिलक्षण भी दिखाता है जो छाया-चित्र में नहीं दिखते।

  • मेहराबें: कमल महल की मेहराब कटावदार है और फूल-पत्ती और गुँथी पट्टियों से सजी है; क़िलेबंदी के प्रवेशद्वार की मेहराब के ऊपर गुंबद है; किताब के अनुसार कमल महल की मेहराबें संभवत: इण्डो–इस्लामी तकनीकों से प्रभावित थीं।

  • मीनारें: कुल नौ थीं; गिनिए कि छाया-चित्र और खड़े रेखाचित्र में कितनी-कितनी दिखती हैं, और सोचिए कि किसी कोने से ली गई तसवीर में कुछ मीनारें क्यों छिप जाती हैं।

  • नया नाम: अपना नाम सुझाइए और कारण लिखिए। ध्यान रखिए कि “कमल महल” नाम उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों ने दिया था, और एक सुझाव के अनुसार यह परिषदीय सदन था।

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 182). चित्र 7.16(क) तथा 7.16(ख) की तुलना चित्र 7.17 से कीजिए। प्रत्येक में दिखाई देने वाले अभिलक्षणों की सूची बनाइए। क्या आपको लगता है कि ये वास्तव में हाथियों के अस्तबल थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: तीनों चित्र एक ही भवन को तीन तरह से दिखाते हैं:

  • सूची: खड़े रेखाचित्र में लंबा दो मंज़िला अग्रभाग है: नीचे ग्यारह बड़ी नुकीली मेहराबें, ऊपर छोटे मेहराबदार झरोखे, सबसे ऊपर अलग-अलग आकार के ग्यारह गुंबद, और बीच में एक ऊँचा मण्डप। नक्शा, जो किताब के अनुसार “एक संरचना का समस्तरी अवलोकन देता है”, ग्यारह वर्गाकार कमरों की पंक्ति दिखाता है, हर कमरे में आगे से प्रवेश, और बीच में सीढ़ियाँ। तसवीर में यही लंबा भवन है: नीचे नुकीली मेहराबें, ऊपर गुंबद।

  • हाथी आ-जा सकते थे? सोचिए कि ग्यारह बड़े कमरे और ऊँची मेहराबें हाथियों के लिए काफ़ी होतीं या नहीं।

  • अपनी राय: किताब यह नाम उद्धरण-चिह्नों में देती है और निश्चित उत्तर नहीं देती। सोचने के लिए: विजयनगर की सेना में घोड़ों और हाथियों के दल थे, और यह भवन राजकीय केंद्र में कमल महल के समीप है। (पृष्ठ 175, 182)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 183). क्या आप नृत्य के दृश्यांशों को पहचान सकते हैं। आपके विचार में हाथियों और घोड़ों को पटलों पर क्यों चित्रित किया गया था?

उत्तर देखिए

उत्तर: हाँ। हज़ार राम मन्दिर की दीवार पर आड़ी पट्टियों में सबसे ऊपर गोल पदकों में आकृतियाँ हैं, फिर नाचती आकृतियों की पंक्तियाँ, धनुर्धारी और सैनिक, साईसों के साथ घोड़े, और हाथी।

  • दूसरे भाग के लिए अपना विचार लिखिए और किताब से जोड़िए: युद्धकला अश्वसेना पर आधारित थी, अमर-नायक घोड़ों और हाथियों के दल रखते थे, और महानवमी पर साज़ लगे घोड़ों और हाथियों की शोभायात्रा निकलती थी।

  • यह मन्दिर संभवत: केवल राजा और उनके परिवार के प्रयोग के लिए था, इसलिए ये पटल राजा की शक्ति और वैभव दिखाते होंगे। (पृष्ठ 172, 175, 181, 183)

चर्चा कीजिए (पृष्ठ 183). नायकों ने विजयनगर के शासकों की भवन निर्माण परंपराओं को जारी क्यों रखा?

उत्तर देखिए

उत्तर: किताब बताती है कि शहर पर आक्रमण के बाद भी नायकों ने महलनुमा संरचनाएँ बनाने की परंपरा जारी रखी, क़िलेबंदी और मन्दिर निर्माण को और व्यापक बनाया, और कुछ सबसे दर्शनीय गोपुरम् भी बनवाए, जैसे मदुरई के नायकों का बनवाया एक गोपुरम्। कारणों की चर्चा के लिए किताब की ये बातें जोड़िए:

  • नायक पहले विजयनगर के अधीन सेना प्रमुख थे, और सत्रहवीं शताब्दी में कई ने अपने स्वतंत्र राज्य बना लिए; नए शासकों को अपनी सत्ता दिखानी थी।

  • विजयनगर के शासकों के लिए मन्दिरों का निर्माण, मरम्मत और रख-रखाव सत्ता, संपत्ति और निष्ठा के लिए समर्थन और मान्यता पाने के माध्यम थे; नायक भी यही चाहते होंगे।

  • ऊँचे गोपुरम् शासकों की ताकत की याद दिलाते थे। (पृष्ठ 175, 183–184, 186, 188)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 185). नक्शे में दिए गए स्केल का प्रयोग कर मुख्य गोपुरम् से केंद्रीय देवालय की दूरी नापिए। जलाशय से देवालय तक जाने के लिए सबसे आसान मार्ग कौन सा रहा होगा?

उत्तर देखिए

उत्तर: यह विरुपाक्ष मन्दिर के नक्शे पर नापने का अभ्यास है; किताब कोई एक उत्तर नहीं देती। तरीका:

  • दूरी: नक्शे पर 30m वाली स्केल पट्टी की लंबाई रूलर से नापिए; फिर मुख्य गोपुरम् (काले रंग से भरे दो प्रमुख प्रवेशद्वारों में से) से “देवालय” लिखे केंद्रीय देवालय तक की दूरी नापिए, और अनुपात से मीटर निकालिए: (नापी गई दूरी ÷ स्केल पट्टी की लंबाई) × 30 मीटर।

  • मार्ग: “जलाशय” से देवालय तक नक्शे पर उँगली से चलकर देखिए कि रास्ते में कौन-से प्रवेशद्वार और स्तंभों वाले सभागार (बिंदुओं की पंक्तियाँ) आते हैं, और सबसे कम रुकावट वाला मार्ग चुनिए।

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 186). स्तंभ पर आप जो देख रहे हैं उसका वर्णन कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: यह एक ऊँचा स्तंभ है, जिस पर ऊपर से नीचे तक छोटे उत्कीर्णित पटल हैं: एक नर्तक, कुछ मानव आकृतियाँ, सवार वाला एक सिंह-जैसा जानवर जो पिछले पैरों पर खड़ा है, और दूसरे जानवर।

  • किताब के अनुसार विरुपाक्ष मन्दिर में कृष्णदेव राय का मण्डप सूक्ष्मता से उत्कीर्णित स्तंभों से सजाया गया था; ऐसे स्तंभ मण्डपों की शोभा बढ़ाते थे। (पृष्ठ 186)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 187). क्या आपको लगता है कि वास्तव में इस प्रकार के रथ बनाए जाते होंगे?

उत्तर देखिए

उत्तर: अपनी राय दीजिए।

  • विट्ठल मन्दिर में पत्थर का बना, दो पहियों वाला रथ है, जिसे किताब “रथ के आकार का एक अनूठा मन्दिर” कहती है, यानी यह चलने वाला रथ नहीं, रथ के आकार में बना एक मन्दिर है।

  • सोचने के लिए: मन्दिर परिसरों में रथ गलियाँ होती थीं, जो गोपुरम् से सीधी रेखा में जाती थीं; इन गलियों के नाम से अनुमान लगाइए कि मन्दिरों से जुड़े रथ वास्तव में बनते होंगे या नहीं। (पृष्ठ 187–188)

चर्चा कीजिए (पृष्ठ 188). आनुष्ठानिक स्थापत्य की पूर्ववर्ती परंपराओं को विजयनगर के शासकों ने कैसे और क्यों अपनाया तथा रूपान्तरित किया?

उत्तर देखिए

उत्तर: इस चर्चा के दो भाग हैं:

  • कैसे: पल्लव, चालुक्य, होयसाल और चोल वंशों तक जाने वाली मन्दिर परंपरा अपनाई; उसमें विशाल राय गोपुरम्, लंबे स्तंभों वाले गलियारे, अलग-अलग कामों के मण्डप, रथ गलियाँ और मन्दिरों में राजकीय प्रतिकृति मूर्तियाँ जोड़ीं; और महाराष्ट्र में पूजे जाने वाले विट्ठल की पूजा कर्नाटक में आरंभ की।

  • क्यों: शासक मन्दिर निर्माण से अपने को ईश्वर से जोड़ते थे और भगवान विरुपाक्ष की ओर से शासन करने का दावा करते थे; मन्दिर धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र थे; और अलग-अलग परंपराओं को आत्मसात कर वे एक साम्राज्यिक संस्कृति बना रहे थे।

(पृष्ठ 184–188)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 189). अंग्रेजी वर्णमाला का कौन सा अक्षर प्रयोग नहीं किया गया था? मानचित्र में दिए गए पैमाने का प्रयोग करते हुए किसी एक छोटे वर्ग की लंबाई नापिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: विजयनगर स्थल के विस्तृत मानचित्र में:

  • अक्षर: पूरा क्षेत्र 25 वर्गों में बँटा है, और अंग्रेज़ी वर्णमाला में 26 अक्षर हैं; वर्गों पर पाँच पंक्तियों में A से Z तक के अक्षर हैं, पर I नहीं है। उत्तर: I।

  • लंबाई: मानचित्र के नीचे की स्केल पट्टी (0 से 5 कि.मी.) रूलर से नापिए, फिर एक वर्ग की भुजा नापिए और अनुपात से किलोमीटर निकालिए।

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 189). इस मानचित्र में कौन सा पैमाना प्रयोग किया गया है?

उत्तर देखिए

उत्तर: वर्ग N के मानचित्र की स्केल पट्टी पर 0, 500 मी. और 1 कि.मी. लिखे हैं। पूरे स्थल के मानचित्र की पट्टी 0 से 5 कि.मी. की थी; यानी वर्ग N का मानचित्र एक छोटे क्षेत्र को ज़्यादा विस्तार से दिखाता है। (पृष्ठ 189)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 190). किसी एक मन्दिर को पहचानिए। दीवारों, एक केंद्रीय देवालय, तथा मन्दिर तक जाने वाले रास्तों के अवशेषों को खोजिए। मानचित्र पर उन वर्गों को नाम दीजिए जिनमें मन्दिर का नक्शा स्थित है।

उत्तर देखिए

उत्तर: वर्ग NM के नक्शे में 25 छोटे वर्ग हैं (a से z, i को छोड़कर)। दीवार से घिरा मन्दिर छोटे वर्ग h में है, और उसके बीच के वर्गाकार देवालय पर अंक 1 लिखा है। उसमें खोजिए: चारों ओर की दीवार, बीच में केंद्रीय देवालय, और उस तक आने वाले रास्ते।

  • वर्गों के नाम: मन्दिर का घेरा छोटे वर्ग h में है; दीवार पास के जिन वर्गों तक जाती हो, उनके अक्षर भी जोड़िए।

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 190). गोपुरम्, सभागारों, स्तंभावलियों तथा केंद्रीय देवालय को पहचानिए। बाहरी प्रवेशद्वार से केंद्रीय देवालय तक पहुँचने के लिए आप किन भागों से होकर गुज़रेंगे।

उत्तर देखिए

उत्तर: मन्दिर के नक्शे में भाग A से M तक के अक्षरों से दिखाए गए हैं: A बीच का केंद्रीय देवालय है; G और H उत्तर के भीतरी और बाहरी प्रवेशद्वार हैं, जो काले रंग से भरे हैं; E और F पूर्व और पश्चिम के प्रवेशद्वार; I और J स्तंभों वाले सभागार; बाकी अक्षर छोटे देवस्थल, कोने का सभागार और बाहरी दीवार के मण्डप हैं।

  • पहचानने का नियम विरुपाक्ष मन्दिर के नक्शे से आता है: प्रमुख प्रवेशद्वार काले रंग से भरे होते हैं और हर छोटा बिंदु एक स्तंभ है।

  • रास्ता: बाहरी उत्तरी प्रवेशद्वार H, फिर भीतरी प्रवेशद्वार G, और भीतर के आँगन से केंद्रीय देवालय A तक। (पृष्ठ 185, 190)

झटपट दोहराइए

1. हम्पी के भग्नावशेषों को 1800 ई. में किसने प्रकाश में लाया, और उन्होंने क्या तैयार किया?

उत्तर देखिए

उत्तर: ईस्ट इण्डिया कंपनी के अभियंता और पुराविद कर्नल कॉलिन मैकेन्ज़ी ने; उन्होंने इस स्थान का पहला सर्वेक्षण मानचित्र बनाया। (पृष्ठ 170)

2. कृष्णा–तुंगभद्रा दोआब के लोग उजड़े विजयनगर को किस नाम से याद रखते रहे, और वह नाम कहाँ से आया?

उत्तर देखिए

उत्तर: हम्पी; यह नाम स्थानीय मातृदेवी पम्पादेवी के नाम से बना। (पृष्ठ 170)

3. परंपरा और अभिलेखों के अनुसार विजयनगर साम्राज्य की स्थापना कब और किसने की?

उत्तर देखिए

उत्तर: 1336 में दो भाइयों, हरिहर और बुक्का ने। काल-रेखा 1 में यह तिथि “1336?” छपी है, यानी अनिश्चित। (पृष्ठ 171, 193)

4. समकालीन लोग विजयनगर साम्राज्य को किस नाम से पुकारते थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: कर्नाटक साम्राज्यमु। (पृष्ठ 171)

5. विजयनगर पर शासन करने वाले चार राजवंश, किताब के क्रम में?

उत्तर देखिए

उत्तर: संगम (1485 तक), सुलुव (1503 तक), तुलुव, और अराविदु (1542 तक केंद्र पर नियंत्रण, सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक सत्ता में)। (पृष्ठ 173)

6. विजयनगर के शासक कृष्णदेव राय किस वंश के थे, उनका शासनकाल क्या था, और शासनकला पर उन्होंने तेलुगु में कौन-सी कृति लिखी?

उत्तर देखिए

उत्तर: तुलुव वंश; शासनकाल 1509–29; अमुक्तमल्यद। (पृष्ठ 173)

7. 1565 के राक्षसी–तांगड़ी (तालीकोटा) के युद्ध में विजयनगर की सेना का नेतृत्व किसने किया, और किनकी संयुक्त सेनाओं ने उसे हराया?

उत्तर देखिए

उत्तर: प्रधानमंत्री रामराय ने; बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुण्डा की संयुक्त सेनाओं ने। (पृष्ठ 173)

8. विजयनगर साम्राज्य में अमर–नायक कौन थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: सैनिक कमांडर, जिन्हें राय प्रशासन के लिए राज्य-क्षेत्र देते थे; वे कर वसूलते, घोड़ों और हाथियों का दल रखते और राजा को वर्ष में एक बार भेंट भेजते थे। (पृष्ठ 175)

9. विजयनगर की लोक प्रचलित परंपराओं में दक्कन के सुल्तानों और रायों को किन नामों से पुकारा गया?

उत्तर देखिए

उत्तर: सुल्तानों को अश्वपति (घोड़ों के स्वामी) और रायों को नरपति (लोगों के स्वामी)। (पृष्ठ 172)

10. पंद्रहवीं शताब्दी में फ़ारस के शासक का जो दूत विजयनगर की क़िलेबंदी से प्रभावित हुआ, उसने दुर्गों की कितनी पंक्तियाँ बताईं?

उत्तर देखिए

उत्तर: अब्दुर रज़्ज़ाक ने दुर्गों की सात पंक्तियों का उल्लेख किया। (पृष्ठ 177)

11. विजयनगर का जो जलाशय पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में बना और एक नहर से राजकीय केंद्र तक पानी भेजता था, उसे आज क्या कहते हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: कमलपुरम् जलाशय। (पृष्ठ 177)

12. विजयनगर के राजकीय केंद्र में कितने मन्दिर और लगभग कितने महल पहचाने गए हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: 60 से भी अधिक मन्दिर; लगभग तीस संरचनाएँ महलों के रूप में। (पृष्ठ 179)

13. विजयनगर के महानवमी डिब्बा का आधार और ऊँचाई कितनी है?

उत्तर देखिए

उत्तर: लगभग 11000 वर्ग फीट का आधार और 40 फीट की ऊँचाई। (पृष्ठ 180)

14. विजयनगर के राजकीय केंद्र के लोटस (कमल) महल का यह नाम किसने रखा?

उत्तर देखिए

उत्तर: उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों ने; यह भवन किस काम के लिए बना था, इतिहासकार निश्चित नहीं हैं। (पृष्ठ 181)

15. विजयनगर के राजकीय आदेशों पर सामान्यतया किस लिपि में क्या अंकित होता था?

उत्तर देखिए

उत्तर: कन्नड़ लिपि में “श्री विरुपाक्ष”। (पृष्ठ 184)

16. विजयनगर के विट्ठल मन्दिर के प्रमुख देवता विट्ठल किसके रूप हैं, और सामान्यत: कहाँ पूजे जाते हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: विष्णु का एक रूप, जो सामान्यत: महाराष्ट्र में पूजे जाते हैं। (पृष्ठ 187)

17. हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व के स्थल की मान्यता कब मिली, और यूनेस्को ने उसे विश्व धरोहर स्थल कब घोषित किया?

उत्तर देखिए

उत्तर: 1976 में राष्ट्रीय महत्त्व के स्थल की मान्यता; 1986 में यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल। (पृष्ठ 188, 193)

18. 1980 के दशक के आरंभ में शुरू हुई हम्पी की प्रलेखन परियोजना में मानचित्र निर्माण का पहला चरण क्या था?

उत्तर देखिए

उत्तर: पूरे क्षेत्र को 25 वर्गाकार भागों में बाँटना, हर वर्ग को वर्णमाला के एक अक्षर से इंगित करके; फिर इन्हें और छोटे वर्गों और इकाइयों में बाँटा गया। (पृष्ठ 188–189)