Chapter 7एक साम्राज्य की राजधानी: विजयनगर

Interactive chapter60 min

NCERT — भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग II (कक्षा 12), अध्याय 7 (पृ. 170–195)।

This note is written in Hindi.Read in Hindi →

पढ़िए, क्रम लगाइए, जोड़े बनाइए, सवाल पूछिए

एक साम्राज्य की राजधानी: विजयनगर

विजयनगर, यानी "विजय का शहर", एक शहर का नाम भी था और एक साम्राज्य का भी। यह साम्राज्य चौदहवीं शताब्दी में स्थापित हुआ और अपने चरमोत्कर्ष पर उत्तर में कृष्णा नदी से प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण तक फैला था। यह अध्याय लगभग चौदहवीं से सोलहवीं सदी तक की बात करता है।

पृष्ठ 170

शहर का क्या हुआ? (पृष्ठ 170)

  • 1565 में राजधानी पर आक्रमण हुआ, उसे लूटा गया और बाद में वह उजड़ गई।
  • सत्रहवीं–अठारहवीं शताब्दियों तक यह शहर पूरी तरह नष्ट हो गया।
  • फिर भी कृष्णा–तुंगभद्रा दोआब के लोगों की स्मृतियों में यह हम्पी के नाम से जीवित रहा। यह नाम स्थानीय मातृदेवी पम्पादेवी के नाम से बना।
घास और झाड़ियों के बीच बड़े पत्थरों से बनी पुरानी दीवार के टूटे हिस्से

तस्वीर: हम्पी: पत्थर की पुरानी दीवारों के अवशेष।

PP Yoonus, CC BY-SA 3.0. Image: Wikimedia Commons.

₹50 के नोट का पिछला हिस्सा, जिस पर रथ के साथ हम्पी का चित्र छपा है

तस्वीर: महात्मा गांधी (नई) शृंखला के ₹50 के नोट का पिछला हिस्सा: इस पर रथ के साथ हम्पी का चित्र है, जो देश की सांस्कृतिक धरोहर दिखाता है।

Reserve Bank of India, GODL-India. Image: Wikimedia Commons.

Hampi | Monuments of IndiaPlayलगभग 30 मिनट
Prasar Bharati Archives: हम्पी के स्मारकों पर प्रसार भारती अभिलेखागार की फ़िल्म; हिंदी आवाज़ भी चुन सकते हैंWatch on YouTube

विद्वानों ने इस साम्राज्य को किन चीज़ों की मदद से फिर से खोजा? (पृष्ठ 170)

  • मौखिक परंपराएँ, यानी लोगों की याद में बची बातें
  • पुरातात्विक खोजें
  • स्थापत्य के नमूने, यानी बची हुई इमारतें
  • अभिलेख
  • दूसरे दस्तावेज़

सही या ग़लत? (पृष्ठ 170)

  1. विजयनगर साम्राज्य चौदहवीं शताब्दी में स्थापित हुआ।

  2. 1565 में हमले के बाद भी विजयनगर शहर बसा रहा।

  3. हम्पी नाम स्थानीय मातृदेवी पम्पादेवी के नाम से बना।

  4. शहर उजड़ने के बाद आस-पास के लोग उसे पूरी तरह भूल गए।

अध्याय का रास्ता

  1. 1हम्पी की खोजमैकेन्ज़ी, अभिलेख और छाया चित्रपृष्ठ 170–171 · प्रश्न 1
  2. 2राय, नायक तथा सुलतानवंश, व्यापार, 1565 और अमर-नायकपृष्ठ 171–175
  3. 3विजयनगर : राजधानी तथा उसके परिप्रदेशपानी, क़िलेबंदी, सड़कें और शहरी केंद्रपृष्ठ 176–179 · प्रश्न 2, 3
  4. 4राजकीय केंद्रमहानवमी डिब्बा, कमल महल, हज़ार राम मन्दिरपृष्ठ 179–183 · प्रश्न 4, 6, 7
  5. 5धार्मिक केंद्रहेमकूट, गोपुरम्, विरुपाक्ष और विट्ठलपृष्ठ 184–188 · प्रश्न 5, 8
  6. 6महलों, मन्दिरों तथा बाज़ारों का अंकननक्शे, वर्ग और योजनाएँपृष्ठ 188–190
  7. 7उत्तरों की खोज में प्रश्नबाज़ार, कृष्णदेव राय और भवनों की सीमापृष्ठ 191–192 · प्रश्न 9
  8. 8सार और काल-रेखाकाल-रेखा, मानचित्र और परियोजनापृष्ठ 193–195 · प्रश्न 10–12

1हम्पी की खोज

इस पड़ाव का सवाल

हम्पी के खंडहर फिर से कैसे प्रकाश में आए, और किसकी स्मृतियों ने इसमें मदद की?

पिछली बात से कड़ी शुरुआत में आपने देखा कि विजयनगर शहर 1565 के बाद उजड़ गया। अब देखिए कि 1800 ई. से उसके खंडहर फिर कैसे पढ़े गए।

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 1

हम्पी के भग्नावशेष 1800 ई. में कर्नल कॉलिन मैकेन्ज़ी ने प्रकाश में लाए। वे ईस्ट इण्डिया कंपनी में कार्यरत अभियंता और पुराविद थे, और उन्होंने इस स्थान का पहला सर्वेक्षण मानचित्र बनाया।

पहली जानकारी किससे मिली? (पृष्ठ 170)

  • मैकेन्ज़ी की शुरुआती जानकारी विरुपाक्ष मंदिर और पम्पादेवी के पूजास्थल के पुरोहितों की स्मृतियों पर आधारित थी।
  • बाद में छाया चित्र, अभिलेख, विदेशी यात्रियों के वृत्तांत और तेलुगु, कन्नड़, तमिल और संस्कृत में लिखा साहित्य भी जुड़ा। इतिहासकारों ने इन सबका मिलान करके शहर और साम्राज्य का इतिहास जोड़ा।

हम्पी को पढ़ने के तरीके: पहले से बाद तक क्रम लगाइए

कार्ड ऊपर–नीचे खिसकाकर सही क्रम बनाइए।

▲ सबसे पहले

  1. 1जे.एफ. फ्लीट ने मन्दिरों की दीवारों के अभिलेखों का प्रलेखन शुरू किया
  2. 2कर्नल कॉलिन मैकेन्ज़ी ने इस स्थान का पहला सर्वेक्षण मानचित्र बनाया
  3. 3जॉन मार्शल के अधीन संरक्षण का काम शुरू हुआ
  4. 4अभिलेखकर्ताओं ने यहाँ से कई दर्जन अभिलेख इकट्ठे करने शुरू किए
  5. 5छायाचित्रकारों ने यहाँ के भवनों के चित्र संकलित करने शुरू किए; अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ ने अवशेषों के पहले विस्तृत चित्र लिए

▼ सबसे बाद में

स्रोत 1: कॉलिन मैकेन्ज़ी (पृष्ठ 171)

1754 ई. में जन्मे मैकेन्ज़ी अभियंता, सर्वेक्षक और मानचित्रकार थे। 1815 में उन्हें भारत का पहला सर्वेयर जनरल बनाया गया, और 1821 में अपनी मृत्यु तक वे इसी पद पर रहे।

उन्होंने स्थानीय इतिहास और परंपराएँ इकट्ठी कीं और ऐतिहासिक स्थलों का सर्वेक्षण किया, "भारत के अतीत को बेहतर ढंग से समझने और उपनिवेश के प्रशासन को आसान बनाने के लिए"।

उनके अनुसार ब्रिटिश प्रशासन के आने से पहले दक्षिण भारत लंबे समय तक "खराब प्रबंधन की दुर्गति" से जूझता रहा।

एक तैलचित्र: बीच में खड़े एक अंग्रेज़ अफ़सर और उनके पास खड़े भारतीय सहायक

तस्वीर: कर्नल कॉलिन मैकेन्ज़ी और उनके भारतीय पंडित; थॉमस हिकी का तैलचित्र, 1816।

Thomas Hickey. Public domain. Image: Wikimedia Commons.

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 171

किताब के चित्र 7.2 में कर्नल कॉलिन मैकेन्ज़ी अपने सहायकों के साथ हैं। यह थॉमस हिकी के एक तैलचित्र की प्रतिलिपि है, जिसे लगभग 1825 ई. में एक अज्ञात चित्रकार ने बनाया।

मैकेन्ज़ी और उनके देशज सूचनादाताओं को चित्रकार ने किस प्रकार चित्रित किया है? उनके तथा उनके सूचनादाताओं के विषय में दर्शकों पर किस प्रकार के विचार डालने का प्रयास किया गया है?

जवाब देखिए

किताब का चित्र 7.2 एक तैलचित्र है, जिसमें लाल कोट पहने मैकेन्ज़ी तीन पगड़ीधारी भारतीयों के बीच खड़े हैं: बायीं ओर दूरबीन थामे उनका चपरासी, और दायीं ओर उनके ब्राह्मण सहायक, एक जैन पंडित और उनके पीछे तेलुगु ब्राह्मण कावलेरी वेन्तक लच्छमैया। राय आपकी अपनी होगी; किताब से ये बातें काम आएँगी:

  • चित्र में कौन: मैकेन्ज़ी के बायीं ओर दूरबीन थामे उनका चपरासी, और दायीं ओर उनके ब्राह्मण सहायक: एक जैन पंडित और उनके पीछे तेलुगु ब्राह्मण कावलेरी वेन्तक लच्छमैया।
  • क्या देखें: किसे बीच में और प्रमुख दिखाया गया है, और सूचनादाता किस मुद्रा में खड़े हैं।
  • मैकेन्ज़ी का नज़रिया: स्रोत 1 में वे कहते हैं कि ब्रिटिश प्रशासन से पहले दक्षिण भारत "खराब प्रबंधन की दुर्गति" से जूझता रहा।

सोचिए कि क्या चित्र भी यही संदेश देता है कि ज्ञान का श्रेय अंग्रेज़ अधिकारी का है और भारतीय जानकार केवल सहायक हैं।

उस समय का नाम (बॉक्स, पृष्ठ 171)

  • "जहाँ इतिहासकार विजयनगर साम्राज्य शब्द का प्रयोग करते हैं वहीं समकालीन लोगों ने उसे कर्नाटक साम्राज्यमु की संज्ञा दी।"

किताब के अपने प्रश्न

1पिछली दो शताब्दियों में हम्पी के भवनावशेषों के अध्ययन में कौन–सी पद्धतियों का प्रयोग किया गया है? आपके अनुसार यह पद्धतियाँ विरुपाक्ष मन्दिर के पुरोहितों द्वारा प्रदान की गई जानकारी का किस प्रकार पूरक रहीं?

लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 170, 176, 188–189, 193

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • 1800 से आज तक हम्पी के खंडहर कई पद्धतियों से पढ़े गए, और हर पद्धति ने पुरोहितों की स्मृति को परखा और आगे बढ़ाया।
  • सर्वेक्षण मानचित्र: 1800 ई. में कर्नल कॉलिन मैकेन्ज़ी ने भग्नावशेष प्रकाश में लाए और इस स्थान का पहला सर्वेक्षण मानचित्र बनाया।
  • अभिलेख: 1836 से अभिलेखकर्ताओं ने कई दर्जन अभिलेख इकट्ठे किए; 1876 में जे.एफ. फ्लीट ने मंदिरों की दीवारों के अभिलेखों का प्रलेखन शुरू किया।
  • छाया चित्र: 1856 ई. से भवनों के चित्र संकलित हुए; अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ ने अवशेषों के पहले विस्तृत चित्र लिए।
  • मिलान: इतिहासकारों ने इन स्रोतों का विदेशी यात्रियों के वृत्तांतों और तेलुगु, कन्नड़, तमिल और संस्कृत साहित्य से मिलान किया।
  • संरक्षण और अंकन: 1902 से जॉन मार्शल के अधीन संरक्षण हुआ; 1980 के दशक के आरंभ से लगभग बीस वर्ष तक पूरे क्षेत्र को 25 वर्गों और फिर छोटी इकाइयों में बाँटकर हज़ारों संरचनाओं का प्रलेखन हुआ।
  • पूरक कैसे: मैकेन्ज़ी की शुरुआती जानकारी विरुपाक्ष मंदिर और पम्पादेवी के पूजास्थल के पुरोहितों की स्मृतियों पर आधारित थी। बाकी पद्धतियों ने इस स्मृति को लिखित और भौतिक साक्ष्य से परखा और जोड़ा: अभिलेखों ने मन्दिरों को दिए दान और घटनाएँ बताईं, चित्रों और नक्शों ने भवनों का रूप और जगह दर्ज की, और यात्रियों के वृत्तांतों ने उस समय का जीवन दिखाया।

Checkpoint

  1. 1कर्नल कॉलिन मैकेन्ज़ी ने 1800 में हम्पी के भग्नावशेषों के बारे में अपनी शुरुआती जानकारी किससे ली?

  2. 2कॉलिन मैकेन्ज़ी को 1815 में कौन-सा पद मिला, जिस पर वे 1821 में अपनी मृत्यु तक रहे?

  3. 3जिसे इतिहासकार "विजयनगर साम्राज्य" कहते हैं, उसे उस समय के लोग किस नाम से पुकारते थे?

2राय, नायक तथा सुलतान

इस पड़ाव का सवाल

विजयनगर साम्राज्य किसने स्थापित किया, किन वंशों ने उस पर राज किया, और 1565 में क्या हुआ?

पिछली बात से कड़ी खंडहरों की खोज के बाद अब उस साम्राज्य को देखिए जिसकी यह राजधानी थी।

"परंपरा और अभिलेखीय साक्ष्यों के अनुसार" विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 में दो भाइयों, हरिहर और बुक्का ने की। किताब की काल-रेखा में यह साल प्रश्नचिह्न के साथ "1336?" छपा है। इस साम्राज्य की सीमाएँ बदलती रहती थीं, और इसमें अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले और अलग-अलग धार्मिक परंपराओं को मानने वाले लोग रहते थे।

पृष्ठ 171–175

पड़ोसियों से होड़ और लेन-देन (पृष्ठ 171)

  • विजयनगर के शासकों की होड़ दक्कन के सुलतानों और उड़ीसा के गजपति शासकों से थी।
  • यह होड़ उपजाऊ नदी घाटियों और विदेशी व्यापार से होने वाली समृद्धि के लिए थी।
  • संपर्क से विचारों का आदान-प्रदान भी हुआ, "विशेष रूप से स्थापत्य के क्षेत्र में"। विजयनगर के शासकों ने अवधारणाएँ और भवन निर्माण की तकनीकें ग्रहण कीं और उन्हें आगे विकसित किया।

2.1शासक और व्यापारीपृष्ठ 172

पुरानी परंपराएँ, जिन्हें राय आगे ले गए (पृष्ठ 171–172)

  • तमिलनाडु में चोल राज्य और कर्नाटक में होयसाल राज्य पहले रह चुके थे।
  • उनके शासक वर्ग ने तंजावुर के बृहदेश्वर मन्दिर और बेलूर के चन्नकेशव मन्दिर जैसे मन्दिरों को संरक्षण दिया था।
  • विजयनगर के शासक, जो अपने को राय कहते थे, इन परंपराओं को आगे ले गए और "नयी ऊँचाइयों तक पहुँचाया"।
ऊँचा, कई तलों वाला पत्थर का मन्दिर-द्वार, जिस पर ऊपर तक नक्काशी है

तस्वीर: तंजावुर (तमिलनाडु) के बृहदेश्वर मन्दिर का एक गोपुरम्।

Gayathriveluri, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

घोड़ों का व्यापार (पृष्ठ 172)

  • उस समय की युद्धकला प्रभावशाली अश्वसेना पर आधारित थी, इसलिए अरब और मध्य एशिया से घोड़ों का आयात ज़रूरी था।
  • शुरुआती दौर में यह व्यापार अरब व्यापारियों के हाथ में था।
  • स्थानीय व्यापारी भी इसमें भाग लेते थे। इन्हें कुदिरई चेट्टी, यानी घोड़ों के व्यापारी, कहा जाता था।

पुर्तगाली और व्यापार (पृष्ठ 172)

  • 1498 ई. से पुर्तगाली उपमहाद्वीप के पश्चिमी तट पर आने लगे और व्यापारिक और सामरिक केंद्र स्थापित करने का प्रयास करने लगे। उनकी बेहतर सामरिक तकनीक, विशेष रूप से बंदूकों के प्रयोग, ने उनकी मदद की।
  • विजयनगर मसालों, वस्त्रों और रत्नों के बाज़ारों के लिए जाना जाता था।
  • व्यापार प्रतिष्ठा का मानक था। समृद्ध जनता मँहगी विदेशी वस्तुएँ, विशेषकर रत्न और आभूषण, चाहती थी।
  • व्यापार से मिलने वाला राजस्व राज्य की समृद्धि बढ़ाता था।

तीन उपाधियाँ: हर नाम को उसके अर्थ से मिलाइए (बॉक्स, पृष्ठ 172)

बाईं ओर का एक कार्ड छूइए, फिर दाईं ओर उसका जोड़ा।

गजपति
हाथियों का स्वामी: पंद्रहवीं शताब्दी में उड़ीसा का एक शक्तिशाली वंश
अश्वपति
घोड़ों का स्वामी: विजयनगर की लोक परंपराओं में दक्कन के सुल्तान
नरपति
लोगों का स्वामी: विजयनगर की लोक परंपराओं में राय

2.2राज्य का चरमोत्कर्ष तथा पतनपृष्ठ 173–174

विजयनगर के चार राजवंश: किताब के क्रम में लगाइए (पृष्ठ 173)

कार्ड ऊपर–नीचे खिसकाकर सही क्रम बनाइए।

▲ सबसे पहले

  1. 1तुलुव वंश: कृष्णदेव राय इसी वंश के थे
  2. 2संगम वंश: 1485 तक नियंत्रण
  3. 3अराविदु वंश: 1542 तक केंद्र पर नियंत्रण इनके हाथ में चला गया; सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक सत्ता में
  4. 4सुलुव वंश: सैनिक कमांडर; 1503 तक शासन

▼ सबसे बाद में

कृष्णदेव राय (तुलुव वंश, शासनकाल 1509–29) (पृष्ठ 173)

  • उनका शासन "विस्तार और दृढ़ीकरण" का था: 1512 में तुंगभद्रा और कृष्णा के बीच का रायचूर दोआब हासिल हुआ, 1514 में उड़ीसा के शासकों का दमन हुआ, और 1520 में बीजापुर के सुल्तान को बुरी तरह पराजित किया गया।
  • राज्य हमेशा सैनिक रूप से तैयार रहता था, फिर भी "अतुलनीय शांति और समृद्धि की स्थितियों में फला–फूला"।
  • कुछ बेहतरीन मन्दिरों के निर्माण और कई महत्त्वपूर्ण दक्षिण भारतीय मन्दिरों में भव्य गोपुरमों को जोड़ने का श्रेय उन्हें दिया जाता है।
  • उन्होंने अपनी माँ के नाम पर विजयनगर के समीप नगलपुरम् नामक उपनगर बसाया।
  • विजयनगर के सबसे विस्तृत विवरण उनके या उनके तुरंत बाद के काल के हैं।

स्रोत 2: राजा और व्यापारी (पृष्ठ 173)

कृष्णदेव राय ने शासनकला पर तेलुगु में अमुक्तमल्यद नामक कृति लिखी। व्यापारियों के बारे में वे लिखते हैं:

"एक राजा को अपने बन्दरगाहों को सुधारना चाहिए और वाणिज्य को इस प्रकार प्रोत्साहित करना चाहिए कि घोड़ों, हाथियों, रत्नों, चंदन, मोती तथा अन्य वस्तुओं का खुले तौर पर आयात किया जा सके…"

तूफ़ान, बीमारी या थकान के कारण बंदरगाह पर उतरने वाले विदेशी नाविकों की अच्छी देखभाल होनी चाहिए।

हाथी और अच्छे घोड़े लाने वाले दूर देशों के व्यापारियों को रोज़ बैठक में बुलाकर तोहफ़े देने चाहिए और उचित मुनाफ़ा कमाने देना चाहिए। "ऐसा करने पर ये वस्तुएँ कभी भी तुम्हारे दुश्मनों तक नहीं पहुँचेंगी।"

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 173

यह प्रश्न स्रोत 2 के पास है, जिसमें कृष्णदेव राय की अमुक्तमल्यद बताती है कि राजा को व्यापारियों से कैसा व्यवहार करना चाहिए।

आपके विचार में राजा व्यापार को प्रोत्साहित करने का इच्छुक क्यों था? इन विनिमयों से किन समूहों को लाभ पहुँचा होगा?

जवाब देखिए
  • क्यों: युद्धकला अश्वसेना पर आधारित थी, इसलिए अरब और मध्य एशिया के घोड़े ज़रूरी थे।
  • क्यों: व्यापार प्रतिष्ठा का मानक था, और उसका राजस्व राज्य की समृद्धि बढ़ाता था।
  • क्यों: व्यापारियों को अपने साथ जोड़ने से, कृष्णदेव राय के शब्दों में, "ये वस्तुएँ कभी भी तुम्हारे दुश्मनों तक नहीं पहुँचेंगी।"
  • किन्हें लाभ: राजा और राज्य (घोड़े, हाथी, राजस्व); दूर देशों के व्यापारी (तोहफ़े और उचित मुनाफ़ा); अरब व्यापारी और कुदिरई चेट्टी।
  • किन्हें लाभ: विदेशी नाविक, जिनकी देखभाल का प्रबंध होना था; और समृद्ध जनता, जो मँहगी विदेशी वस्तुएँ, विशेषकर रत्न और आभूषण चाहती थी।

कृष्णदेव राय के बाद (पृष्ठ 173)

  • 1529 में कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद राजकीय ढाँचे में तनाव बढ़ा। उनके उत्तराधिकारियों को विद्रोही नायकों या सेनापतियों से चुनौती मिली।
  • 1542 तक केंद्र पर नियंत्रण अराविदु वंश के हाथ में चला गया।

1565: विजयनगर क्यों हारा? किताब दो बातें बताती है

सल्तनतों का मैत्री–समझौता (पृष्ठ 173)

  • दक्कन की सल्तनतों ने विजयनगर के विरुद्ध मैत्री–समझौता किया।
  • 1565 में विजयनगर की सेना प्रधानमंत्री रामराय के नेतृत्व में राक्षसी–तांगड़ी (जिसे तालीकोटा भी कहते हैं) के युद्ध में बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुण्डा की संयुक्त सेनाओं से हारी।

रामराय की नीति (पृष्ठ 174)

  • किताब के अनुसार "यह रामराय की जोखिम भरी नीति थी": उन्होंने एक सुल्तान को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की कोशिश की।
  • पर सुल्तानों ने मिलकर उन्हें निर्णायक रूप से हराया।

विजयी सेनाओं ने विजयनगर शहर लूटा, और कुछ ही वर्षों में शहर पूरी तरह उजड़ गया। साम्राज्य का केंद्र पूर्व की ओर चला गया: अराविदु वंश ने पेनुकोण्डा से और बाद में चन्द्रगिरी (तिरुपति के समीप) से शासन किया (पृष्ठ 173)।

सुल्तानों से संबंध हमेशा शत्रुता के नहीं थे (पृष्ठ 174)

  • किताब के अनुसार विजयनगर के शासकों और सुल्तानों के संबंध "धार्मिक भिन्नताएँ होने पर भी हमेशा या अपरिहार्य रूप से शत्रुतापूर्ण नहीं रहते थे।"
  • कृष्णदेव राय ने सल्तनतों में सत्ता के कई दावेदारों का समर्थन किया और गर्व से "यवन राज्य की स्थापना करने वाला" उपाधि ली।
  • कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर के उत्तराधिकार विवाद सुलझाने में बीजापुर के सुल्तान ने हस्तक्षेप किया। दोनों पक्ष एक-दूसरे की स्थिरता चाहते थे।

यवन किसे कहते थे? (बॉक्स, पृष्ठ 174)

  • "यवन संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका प्रयोग यूनानियों तथा उत्तर–पश्चिम से उपमहाद्वीप में आनेवाले अन्य लोगों के लिए किया जाता था।"

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 174

यह प्रश्न किताब के मानचित्र 1 के पास है: "दक्षिण भारत, लगभग चौदहवीं–अठारहवीं शताब्दी।"

उन आधुनिक राज्यों को चिह्नित कीजिए जो विजयनगर साम्राज्य का भाग थे।

जवाब देखिए

किताब आधुनिक राज्यों की सूची नहीं देती। भारत के आज के राजनीतिक मानचित्र को किताब के मानचित्र 1 के साथ रखकर स्वयं पहचानिए। मदद के लिए:

  • अपने चरमोत्कर्ष पर साम्राज्य उत्तर में कृष्णा नदी से प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण तक फैला था (पृष्ठ 170)।
  • अध्याय में तमिलनाडु (चोल) और कर्नाटक (होयसाल) के नाम आते हैं।
  • नीचे के नक्शे में विजयनगर, चन्द्रगिरी, तंजावुर, मदुरई और मैसूर ढूँढिए और पता कीजिए कि ये आज किन राज्यों में हैं।

दक्षिण भारत का नक्शा: विजयनगर और नायक शक्ति के केंद्र (मानचित्र 1, पृष्ठ 174)

अरब सागरबंगाल कीखाड़ीहिंद महासागरविजयनगर (हम्पी)चन्द्रगिरीइक्केरीमैसूरतंजावुरमदुरई

इस नक्शे में विजयनगर (हम्पी) के साथ वे पाँच नायक केंद्र हैं जिनके नाम किताब की चर्चा (पृष्ठ 175) में आते हैं। किताब के मानचित्र 1 में भीमा, कृष्णा, तुंगभद्रा, पेन्नार, कावेरी और वैगाई नदियाँ भी हैं; इस नक्शे में नदियाँ नहीं बनी हैं।

इसमें सिर्फ़ समुद्र तट दिखाए गए हैं, देशों की सीमाएँ नहीं।

Coastlines: Natural Earth (public domain). Places at their Wikipedia coordinates.

पुराना छपा हुआ नक्शा: दक्षिण भारत, जिसमें कुछ इलाके पीले और कुछ लाल रंग में हैं

तस्वीर: रॉबर्ट सीवेल की किताब का नक्शा: दक्षिण भारत, 1336–1570 ई.। पीला रंग: दक्कन की सल्तनतें; लाल रंग: विजयनगर।

Robert Sewell. Public domain. Image: Wikimedia Commons.

Special Report : Hampi - Jewel of Vijayanagar EmpirePlayलगभग 25 मिनट
Sansad TV: हम्पी और विजयनगर साम्राज्य पर संसद टीवी की हिंदी रिपोर्टWatch on YouTube

2.3राय तथा नायकपृष्ठ 175

नायक कौन थे? (पृष्ठ 175)

  • विजयनगर साम्राज्य में सेना प्रमुख आम तौर पर क़िलों पर नियंत्रण रखते थे और उनके पास सशस्त्र समर्थक होते थे। इन्हें नायक कहा जाता था।
  • वे एक जगह से दूसरी जगह जाते रहते थे, और कई बार उपजाऊ भूमि की तलाश में किसान भी उनके साथ चलते थे।
  • नायक आम तौर पर तेलुगु या कन्नड़ बोलते थे।
  • कई नायकों ने विजयनगर की अधीनता मानी, पर वे अक्सर विद्रोह करते थे और सैनिक कार्रवाई से दबाए जाते थे।

अमर–नायक प्रणाली: पहले से बाद तक क्रम लगाइए (पृष्ठ 175)

"अमर–नायक प्रणाली विजयनगर साम्राज्य की एक प्रमुख राजनीतिक खोज थी। ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रणाली के कई तत्त्व दिल्ली सल्तनत की इक्ता प्रणाली से लिए गए थे।"

कार्ड ऊपर–नीचे खिसकाकर सही क्रम बनाइए।

▲ पहला कदम

  1. 1राजस्व का कुछ भाग निजी उपयोग में, कुछ घोड़ों और हाथियों का निर्धारित दल रखने में लगता था
  2. 2राय अमर–नायकों को प्रशासन के लिए राज्य-क्षेत्र देते थे
  3. 3इन दलों से राय को प्रभावी सैनिक शक्ति मिली, जिससे वे पूरे दक्षिणी प्रायद्वीप को नियंत्रण में ला सके
  4. 4अमर–नायक किसानों, शिल्पकर्मियों और व्यापारियों से भू राजस्व और दूसरे कर वसूलते थे

▼ आख़िरी नतीजा

सत्रहवीं शताब्दी में इनमें से कई नायकों ने अपने स्वतंत्र राज्य बना लिए, जिससे केंद्रीय राजकीय ढाँचा तेज़ी से बिखरने लगा (पृष्ठ 175)।

अमर शब्द कहाँ से आया? (बॉक्स, पृष्ठ 175)

  • अमर शब्द संस्कृत के समर शब्द से बना माना जाता है, जिसका अर्थ है लड़ाई या युद्ध।
  • यह फ़ारसी शब्द अमीर से भी मिलता-जुलता है, जिसका अर्थ है ऊँचे पद का कुलीन व्यक्ति।

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए

पहला भाग नक्शे पर अंकन का है; दूसरा भाग चर्चा का, जिसका उत्तर किताब सीधे नहीं देती।

  • अंकन: पाँचों केंद्र ऊपर के नक्शे और किताब के मानचित्र 1 पर ढूँढिए, और देखिए कि हर एक विजयनगर से किस दिशा में है।
  • नदियाँ: किताब के मानचित्र 1 पर कृष्णा, तुंगभद्रा, पेन्नार, कावेरी और वैगाई देखिए। चर्चा कीजिए कि नदी के साथ-साथ चलना आसान रहा होगा, पर उसे पार करना कठिन।
  • पहाड़: पहाड़ों के लिए एटलस का भौतिक मानचित्र देखिए। किताब (पृष्ठ 178) बताती है कि विजयनगर की सड़कें पहाड़ी भूभाग से बचकर घाटियों से होकर जाती थीं; इससे सोचिए कि पहाड़ कहाँ रास्ता रोकते होंगे।

Checkpoint

  1. 1किताब के अनुसार विजयनगर के शासकों की होड़ किनसे थी?

  2. 2कृष्णदेव राय किस राजवंश के थे?

  3. 3शासनकला पर तेलुगु में लिखी कृति अमुक्तमल्यद में कृष्णदेव राय दूर देशों के व्यापारियों का ख़याल रखने का कौन-सा कारण बताते हैं?

  4. 4अमर–नायक अपने राजस्व का उपयोग किसमें करते थे?

3विजयनगर : राजधानी तथा उसके परिप्रदेश

इस पड़ाव का सवाल

विजयनगर शहर कैसा था: पानी कहाँ से आता था, दीवारें क्या घेरती थीं, और लोग कहाँ रहते थे?

पिछली बात से कड़ी राजाओं और नायकों के बाद अब उनकी राजधानी में चलिए।

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 2, 3

विजयनगर अपने समय के सबसे प्रसिद्ध शहरों में से था। ज़्यादातर राजधानियों की तरह इसकी भी एक ख़ास भौतिक रूपरेखा और भवन निर्माण की शैली थी।

पृष्ठ 176–179

स्रोत 3: एक विशाल शहर, डोमिंगो पेस की नज़र में (पृष्ठ 176)

"इस शहर का परिमाप मैं यहाँ नहीं लिख रहा हूँ क्योंकि यह एक स्थान से पूरी तरह नहीं देखा जा सकता, पर मैं एक पहाड़ पर चढ़ा जहाँ से मैं इसका एक बड़ा भाग देख पाया। मैं इसे पूरी तरह से नहीं देख पाया क्योंकि यह कई पर्वत शृंखलाओं के बीच स्थित है। वहाँ से मैंने जो देखा वह मुझे रोम जितना विशाल प्रतीत हुआ, और देखने में अत्यंत सुन्दर; इसमें पेड़ों के कई उपवन हैं, आवासों के बगीचों में, तथा पानी की कई नालियाँ जो इसमें आती हैं, तथा कई स्थानों पर झीलें हैं; तथा राजा के महल के समीप ही खजूर के पेड़ों का बगीचा तथा अन्य फल प्रदान करने वाले वृक्ष थे।"

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 176

यह प्रश्न स्रोत 3 के पास है, जिसमें डोमिंगो पेस शहर के उपवनों, बगीचों, नालियों और झीलों का वर्णन करता है।

क्या आप आज किसी शहर में ये अभिलक्षण देख सकते हैं? आपके विचार में पेस ने उद्यानों तथा जल–स्रोतों को विशेष–उल्लेख के लिए क्यों चुना?

जवाब देखिए

पहला भाग आपके अपने अनुभव से है: अपने या किसी जाने-पहचाने शहर में उपवन, बगीचे, नहरें या झीलें खोजिए। दूसरे भाग के लिए:

  • विजयनगर प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक में था, इसलिए वहाँ इतने उपवन, बगीचे, पानी की नालियाँ और झीलें देखना एक यात्री को उल्लेख के लायक लगा होगा।
  • ये शहर की समृद्धि और जल-प्रबंध दिखाते थे (पृष्ठ 176–177)।
पुराना छपा हुआ नक्शा, जिसमें नदी, पहाड़ियाँ और खंडहरों की जगहें बनी हैं

तस्वीर: हम्पी के खंडहरों का नक्शा; भारत आने वाले यात्रियों के लिए 1911 में छपी एक अंग्रेज़ी पुस्तिका से।

John Murray, Handbook for Travellers in India, Burma and Ceylon (1911). Public domain. Image: Wikimedia Commons.

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 176

यह प्रश्न किताब के चित्र 7.4 (विजयनगर का नक्शा) के पास है। उस नक्शे पर तुंगभद्रा, अनेगंदी, हम्पी, "पवित्र केंद्र", "शाही केंद्र" और "केंद्रीय भाग" लिखे हैं, और पैमाना 0 से 1.0 Km तक है।

नक्शे पर बने तीन अंचलों को पहचानिए। मध्यभाग को ध्यान से देखिए। क्या आप नदियों से जुड़ती हुई नहरों को देख सकते हैं? आप कितनी किलेबन्द दीवारों को देख सकते हैं। क्या धार्मिक केंद्र किलेबन्द था?

जवाब देखिए

यह प्रश्न किताब के नक्शे पर है। किताब के पाठ से ये बातें काम आएँगी:

  • तीन अंचल: नक्शे पर "पवित्र केंद्र" (हम्पी के पास), "शाही केंद्र" और "केंद्रीय भाग" लिखे हैं।
  • नहरें: मध्यभाग में नदी से निकलती नहरें खोजिए। पाठ के अनुसार हिरिया नहर तुंगभद्रा पर बने बाँध से पानी लाती थी, और कमलपुरम् जलाशय से एक नहर राजकीय केंद्र तक जाती थी।
  • दीवारें: नक्शे पर दीवारें गिनिए। पाठ तीन क़िलेबंदियों का वर्णन करता है: सबसे बाहरी, नगरीय केंद्र के चारों ओर, और राजकीय केंद्र के चारों ओर; अब्दुर रज़्ज़ाक ने दुर्गों की सात पंक्तियाँ बताई थीं।
  • धार्मिक केंद्र: पाठ दूसरी क़िलेबंदी को नगरीय केंद्र और तीसरी को राजकीय केंद्र के चारों ओर बताता है, धार्मिक केंद्र के लिए अलग दीवार नहीं बताता; नक्शे पर स्वयं जाँचकर उत्तर दीजिए।

शहर के विषय में खोज (बॉक्स, पृष्ठ 176)

  • राजाओं और नायकों के कई अभिलेख मन्दिरों को दिए दान और महत्त्वपूर्ण घटनाएँ दर्ज करते हैं।
  • पंद्रहवीं शताब्दी में यहाँ आए: निकोलो दे कॉन्ती (इतालवी व्यापारी), अब्दुर रज़्ज़ाक (फ़ारस के राजा का दूत) और अफ़ानासी निकितिन (रूस का एक व्यापारी)।
  • सोलहवीं शताब्दी में आए: दुआर्ते बरबोसा, डोमिंगो पेस और पुर्तगाल का फर्नाओ नूनिज़।

विजयनगर शहर के भाग, जैसे किताब उन्हें रखती है (पृष्ठ 177–179, 184)

  • धार्मिक केंद्र (उत्तर में): तुंगभद्रा के किनारे का चट्टानी भाग, जहाँ विरुपाक्ष और पम्पादेवी के मन्दिर हैं।
  • कृषि क्षेत्र: धार्मिक केंद्र और नगरीय केंद्र के बीच, जिसे तुंगभद्रा से आती नहरें सींचती थीं।
  • नगरीय केंद्र: दूसरी क़िलेबंदी इसके भीतरी भाग के चारों ओर थी; इसमें मुस्लिम रिहायशी मुहल्ला भी था, जहाँ मक़बरे और मस्ज़िदें थीं।
  • राजकीय केंद्र (दक्षिण-पश्चिम में): तीसरी क़िलेबंदी इसके चारों ओर थी; इसमें 60 से भी अधिक मन्दिर थे, और लगभग तीस संरचनाओं की पहचान महलों के रूप में की गई है।
  • बाहरी दीवार (सबसे बाहर): शहर के चारों ओर की पहाड़ियों को जोड़ती थी; इसके भीतर शहर, खेत और जंगल थे।

3.1जल–संपदापृष्ठ 177

नदी, पहाड़ियाँ और हौज़ (पृष्ठ 177)

  • विजयनगर की भौगोलिक स्थिति की सबसे चौंकाने वाली बात है "तुंगभद्रा नदी द्वारा यहाँ निर्मित एक प्राकृतिक कुण्ड"। नदी उत्तर–पूर्व दिशा में बहती है।
  • आस-पास की ग्रेनाइट की पहाड़ियाँ शहर के चारों ओर करधनी-सी बनाती प्रतीत होती हैं। इन पहाड़ियों से कई जल-धाराएँ आकर नदी में मिलती हैं।
  • लगभग सभी धाराओं के साथ बाँध बनाकर अलग-अलग आकार के हौज़ बनाए गए।
  • कारण: विजयनगर "प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक" में था, इसलिए पानी इकट्ठा करने और उसे शहर तक ले जाने के व्यापक प्रबंध ज़रूरी थे।

कमलपुरम् जलाशय और हिरिया नहर (पृष्ठ 177)

  • कमलपुरम् जलाशय: "पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में" बना एक बड़ा हौज़। इससे आस-पास के खेत सींचे जाते थे, और एक नहर से इसका पानी "राजकीय केंद्र" तक ले जाया जाता था।
  • हिरिया नहर: इसके अवशेष आज भी खंडहरों के बीच दिखते हैं। यह तुंगभद्रा पर बने बाँध से पानी लाकर "धार्मिक केंद्र" को "शहरी केंद्र" से अलग करने वाली घाटी को सींचती थी।
  • हिरिया नहर को संभवत: संगम वंश के राजाओं ने बनवाया था।

स्रोत 4: हौज़ों/जलाशयों का निर्माण किस प्रकार होता था? (पृष्ठ 177)

डोमिंगो पेस कृष्णदेव राय के बनवाए एक जलाशय का वर्णन करता है। यह दो पहाड़ियों के मुहाने पर बना था, ताकि दोनों ओर का पानी यहाँ इकट्ठा हो।

पानी "9 मील (लगभग 15 किमी) से भी अधिक की दूरी से पाइपों से" एक झील से आता था।

जलाशय में "तीन विशाल स्तंभ" थे, जिनसे जुड़े पाइप बगीचों और धान के खेतों को सींचने के लिए पानी ले जाते थे।

इसे बनाने के लिए राजा ने एक पूरी पहाड़ी तुड़वा दी। पेस लिखता है कि वहाँ "पन्द्रह से बीस हज़ार आदमी थे, चीटियों की तरह…"।

पत्थर के खंभों पर टिकी पत्थर की एक लंबी नाली

तस्वीर: हम्पी: राजमहल के पास पत्थर की एक जल-नाली।

Ingo Mehling, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

3.2क़िलेबंदियाँ तथा सड़केंपृष्ठ 177–178

दुर्गों की सात पंक्तियाँ (पृष्ठ 177)

  • पंद्रहवीं शताब्दी में फ़ारस के शासक ने अब्दुर रज़्ज़ाक को कालीकट (कोज़ीकोड) भेजा था। वह विजयनगर की क़िलेबंदी से बहुत प्रभावित हुआ और उसने "दुर्गों की सात पंक्तियों" का उल्लेख किया।
  • इन दीवारों से शहर ही नहीं, उसके आस-पास का कृषि क्षेत्र और जंगल भी घिरे थे। सबसे बाहरी दीवार शहर के चारों ओर की पहाड़ियों को आपस में जोड़ती थी।
  • दीवार थोड़ी शुण्डाकार थी, यानी ऊपर की ओर पतली होती जाती थी।
  • गारे या जोड़ने के किसी मसाले का प्रयोग नहीं हुआ। पत्थर के टुकड़े फानाकार (कील जैसे) थे, जो अपनी जगह टिके रहते थे।
  • दीवारों का भीतरी भाग मिट्टी और मलबे से भरा था, और बाहर की ओर वर्गाकार और आयताकार बुर्ज़ निकले हुए थे।

दीवारों के भीतर खेत (पृष्ठ 177–178)

  • अब्दुर रज़्ज़ाक लिखता है: "पहली, दूसरी और तीसरी दीवारों के बीच जुते हुए खेत, बग़ीचे तथा आवास हैं"।
  • पेस भी लिखता है: "इस पहली परिधि से शहर में प्रवेश करने तक की दूरी बहुत है, जिसमें खेत हैं जहाँ वे धान उगाते हैं और कई उद्यान हैं और बहुत जल जो दो झीलों से लाया जाता है।"
  • आज के पुरातत्त्वविदों को धार्मिक केंद्र और नगरीय केंद्र के बीच एक कृषि क्षेत्र के साक्ष्य मिले हैं, जिसे तुंगभद्रा से पानी लाने वाली नहरों की व्यापक व्यवस्था सींचती थी।

किताब का सवाल: कृषि–क्षेत्रों को क़िलेबंद भूभाग में क्यों समाहित किया जाता था? (पृष्ठ 178)

  • किताब के अनुसार अक्सर मध्यकालीन घेराबंदियों का मुख्य उद्देश्य विरोधी को खाद्य सामग्री से वंचित कर समर्पण के लिए बाध्य करना होता था। ये घेराबंदियाँ कई महीनों, यहाँ तक कि वर्षों तक चल सकती थीं।
  • आम तौर पर शासक ऐसी परिस्थितियों के लिए क़िलेबंद क्षेत्रों के भीतर ही विशाल अन्नागार बनवाते थे।
  • विजयनगर के शासकों ने पूरे कृषि भूभाग को बचाने के लिए "एक अधिक मँहगी तथा व्यापक नीति" अपनाई।

सही या ग़लत? (पृष्ठ 177–178)

  1. विजयनगर की क़िलेबंद दीवारों में गारे या जोड़ने के किसी मसाले का प्रयोग नहीं हुआ।

  2. विजयनगर की क़िलेबंदी के भीतर केवल महल और मन्दिर थे; खेत दीवारों के बाहर थे।

  3. राजकीय केंद्र में महत्त्वपूर्ण इमारतों के हर समूह को अपनी ऊँची दीवारों से घेरा गया था।

प्रवेशद्वार और सड़कें (पृष्ठ 178)

  • दूसरी क़िलेबंदी नगरीय केंद्र के भीतरी भाग के चारों ओर थी, और तीसरी राजकीय केंद्र के चारों ओर।
  • अच्छी तरह सुरक्षित प्रवेशद्वार शहर को मुख्य सड़कों से जोड़ते थे। क़िलेबंद बस्ती में जाने के प्रवेशद्वार की मेहराब और ऊपर बना गुंबद तुर्की सुल्तानों द्वारा प्रवर्तित स्थापत्य के चारित्रिक तत्त्व माने जाते हैं।
  • "कला–इतिहासकार इस शैली को इंडो–इस्लामिक (हिंद–इस्लामी) कहते हैं क्योंकि इसका विकास विभिन्न क्षेत्रों की स्थानीय स्थापत्य की परंपराओं के साथ संपर्क से हुआ।"
  • पुरातत्त्वविदों ने प्रवेशद्वारों से होकर जाने वाले रास्तों और पक्की सड़कों के अवशेषों से सड़कों की पहचान की। सड़कें आम तौर पर पहाड़ी भूभाग से बचकर घाटियों से होकर जाती थीं।
  • सबसे महत्त्वपूर्ण सड़कों में से कई मन्दिरों के प्रवेशद्वारों से आगे बढ़ती थीं, और उनके दोनों ओर बाज़ार थे।
पत्थर की ऊँची दीवारें और उनमें बना एक मेहराबदार प्रवेशद्वार

तस्वीर: हम्पी का भीम द्वार: क़िलेबंदी का एक प्रवेशद्वार।

Rupeshsarkar, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

कई तलों वाला ऊँचा मन्दिर-द्वार, जिसके ऊपर तक मूर्तियाँ और नक्काशी है

तस्वीर: हम्पी के विरुपाक्ष मन्दिर का गोपुरम्।

Ingo Mehling, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 178

यह प्रश्न किताब के दो चित्रों के पास है: चित्र 7.6 (क़िलेबंद दीवार में बना एक प्रवेशद्वार) और चित्र 7.7 (एक गोपुरम्)।

इन दो प्रवेश–द्वारों के बीच समानताओं तथा विभिन्नताओं का वर्णन कीजिए। आपके विचार में विजयनगर के शासकों ने इण्डो–इस्लामी स्थापत्य के तत्त्वों को क्यों अपनाया?

जवाब देखिए

किताब का पहला चित्र क़िलेबंद दीवार में बना एक टूटा-फूटा प्रवेशद्वार है, जिसमें मेहराब है और ऊपर गुंबद; दूसरा एक गोपुरम् है, मन्दिर का कई तलों वाला ऊँचा प्रवेशद्वार। ऊपर की दो तस्वीरें भी ऐसे ही एक प्रवेशद्वार और एक गोपुरम् की हैं। काम की बातें:

  • तुलना: दोनों प्रवेश को नियंत्रित करते हैं और विशिष्ट स्थापत्य के नमूने हैं। किताब के अनुसार क़िलेबंदी के प्रवेशद्वार में मेहराब और ऊपर गुंबद है, जबकि दूसरा मन्दिर का गोपुरम् है। अंतर के लिए दोनों के ऊपरी भाग का आकार, ऊँचाई और सजावट मिलाइए।
  • क्यों अपनाए: दक्कन के सुलतानों और गजपतियों से संपर्क में विजयनगर के शासकों ने अवधारणाएँ और भवन निर्माण की तकनीकें ग्रहण कीं और उन्हें आगे विकसित किया; इंडो–इस्लामिक शैली स्थानीय परंपराओं के साथ संपर्क से ही विकसित हुई थी।

अपने विचार में जोड़िए कि नई तकनीकें मज़बूत और प्रभावशाली प्रवेशद्वार बनाने में काम आती होंगी।

3.3शहरी केंद्रपृष्ठ 178–179

शहरी केंद्र: किताब क्या कहती है, और कितने भरोसे से (पृष्ठ 178–179)

  • शहरी केंद्र में सामान्य लोगों के आवासों के अपेक्षाकृत कम पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं।
  • उत्तर-पूर्वी कोने जैसे कुछ स्थानों से परिष्कृत चीनी मिट्टी मिली है। इससे पुरातत्त्वविदों का सुझाव है कि "हो सकता है इन स्थानों में अमीर व्यापारी रहते हों"।
  • "यह मुस्लिम रिहायशी मुहल्ला भी था।" यहाँ के मक़बरों और मस्ज़िदों के काम ख़ास थे, फिर भी उनका स्थापत्य हम्पी के मन्दिरों के मण्डपों से मिलता-जुलता है।
  • सामान्य लोगों के आवास, जो अब अस्तित्व में नहीं हैं, उनके बारे में सोलहवीं शताब्दी का पुर्तगाली यात्री बरबोसा लिखता है: "लोगों के अन्य आवास छप्पर के हैं, पर फिर भी सुदृढ़ हैं, और व्यवसाय के आधार पर कई खुले स्थानों वाली लंबी गलियों में व्यवस्थित हैं।"
  • क्षेत्र सर्वेक्षणों में बहुत से पूजा स्थल और छोटे मन्दिर मिले, जो विविध संप्रदायों की ओर संकेत करते हैं, "जो संभवत: विभिन्न समुदायों द्वारा संरक्षित थे"।
  • कुएँ, बरसात के पानी वाले जलाशय और मन्दिरों के जलाशय संभवत: सामान्य नगर निवासियों के लिए पानी के स्रोत थे।
सफ़ेद चीनी मिट्टी की एक गोल तश्तरी, जिस पर नीले रंग की चित्रकारी है

तस्वीर: चीन की चीनी मिट्टी (पोर्सलेन) की एक तश्तरी, नीले रंग की चित्रकारी के साथ; पंद्रहवीं शताब्दी के अंत से सोलहवीं शताब्दी की शुरुआत तक; लोवे आर्ट म्यूज़ियम।

Wmpearl, CC0. Image: Wikimedia Commons.

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 179

यह प्रश्न किताब के चित्र 7.9 के पास है, जिसमें चीनी मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े दिखाए गए हैं।

आपके विचार में ये टुकड़े मूलत: किस प्रकार के बर्तनों का हिस्सा थे?

जवाब देखिए

किताब के चित्र 7.9 में नीले-सफ़ेद चीनी मिट्टी के लगभग एक दर्जन टुकड़े हैं। उनके आकार और मोड़ से अपना अनुमान लिखिए, जैसे प्याले, कटोरे या थालियाँ। ऊपर की तस्वीर में उसी दौर की चीन की एक पूरी तश्तरी है, जो एक संग्रहालय में रखी है। किताब से:

  • शहरी केंद्र के उत्तर-पूर्वी कोने जैसे स्थानों में परिष्कृत चीनी मिट्टी मिली, जिससे पुरातत्त्वविद मानते हैं कि हो सकता है वहाँ अमीर व्यापारी रहते हों (पृष्ठ 179)।
पत्थर का एक भवन, जिसके सामने के हिस्से में कई मेहराबें हैं, और आगे खुला आँगन

तस्वीर: हम्पी में अहमद ख़ान की मस्जिद।

Saif Arash, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 179

यह प्रश्न किताब के चित्र 7.10 (विजयनगर में एक मस्जिद) के पास है।

क्या इस मस्जिद में इण्डो–इस्लामी स्थापत्य के चारित्रिक तत्त्व विद्यमान हैं?

जवाब देखिए

किताब के चित्र की मस्जिद पत्थर का एक खुला, स्तंभों वाला सभागार-जैसा भवन है। ऊपर की तस्वीर हम्पी की एक मस्जिद की है। काम की बातें:

  • मेहराब और गुंबद खोजिए, जिन्हें किताब तुर्की सुल्तानों द्वारा प्रवर्तित स्थापत्य के चारित्रिक तत्त्व मानती है।
  • याद रखिए कि किताब के अनुसार शहरी केंद्र के मक़बरों और मस्ज़िदों का स्थापत्य हम्पी के मन्दिरों के मण्डपों से मिलता-जुलता है; देखिए कि यह मस्जिद स्तंभों वाले मण्डप जैसी तो नहीं लगती (पृष्ठ 178–179)।

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए

यह आपके अपने इलाके की तुलना है। तरीका:

  • विजयनगर के भाग लिखिए: बाहरी दीवार, धार्मिक केंद्र, शहरी केंद्र, राजकीय केंद्र, दीवारों के भीतर खेत, नहरें और जलाशय, घाटियों से होकर जाती सड़कें, और मन्दिरों से निकलती बाज़ार वाली सड़कें।
  • अपने नगर या गाँव में खोजिए: पानी कहाँ से आता है, बाज़ार कहाँ है, पूजा स्थल कहाँ हैं, खेत बस्ती के भीतर हैं या बाहर, और सरकारी दफ़्तर कहाँ हैं।
  • दोनों का एक सादा नक्शा बनाकर समानताएँ और अंतर लिखिए।

किताब के अपने प्रश्न

2विजयनगर की जल–आवश्यकताओं को किस प्रकार पूरा किया जाता था?

लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 177, 179

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • विजयनगर प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक में था, इसलिए पानी इकट्ठा करने और उसे शहर तक ले जाने के व्यापक प्रबंध किए गए।
  • नदी और पहाड़ियाँ: तुंगभद्रा नदी ने यहाँ एक प्राकृतिक कुण्ड बनाया; चारों ओर की ग्रेनाइट पहाड़ियों से कई जल-धाराएँ नदी में मिलती थीं।
  • हौज़: लगभग सभी धाराओं के साथ बाँध बनाकर अलग-अलग आकार के हौज़ बनाए गए।
  • कमलपुरम् जलाशय: पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में बना; इससे आस-पास के खेत सींचे जाते थे और एक नहर से पानी राजकीय केंद्र तक जाता था।
  • हिरिया नहर: तुंगभद्रा पर बने बाँध से पानी लाकर धार्मिक केंद्र को शहरी केंद्र से अलग करने वाली घाटी सींचती थी; संभवत: संगम वंश के राजाओं ने बनवाई।
  • कृष्णदेव राय का जलाशय (स्रोत 4): पेस के अनुसार इसमें पानी 9 मील (लगभग 15 किमी) से भी अधिक दूरी से पाइपों से आता था, और यह बगीचों तथा धान के खेतों को सींचता था।
  • आम लोगों के लिए: कुएँ, बरसात के पानी वाले जलाशय और मन्दिरों के जलाशय संभवत: सामान्य नगर निवासियों के लिए पानी के स्रोत थे।

3शहर के क़िलेबंद क्षेत्र में कृषि क्षेत्र को रखने के आपके विचार में क्या फ़ायदे और नुकसान थे?

लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 173, 177–178

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • विजयनगर की क़िलेबंदी ने शहर के साथ खेतों को भी घेरा था। अब्दुर रज़्ज़ाक के अनुसार "पहली, दूसरी और तीसरी दीवारों के बीच जुते हुए खेत, बग़ीचे तथा आवास हैं"।
  • फ़ायदा, घेराबंदी में भोजन: मध्यकालीन घेराबंदियों का मुख्य उद्देश्य प्रतिपक्ष को खाद्य सामग्री से वंचित कर समर्पण के लिए बाध्य करना होता था, और वे महीनों या वर्षों चल सकती थीं; भीतर खेत होने से शहर भूखा नहीं रहता।
  • फ़ायदा, भीतर ही पानी: यह कृषि क्षेत्र तुंगभद्रा से पानी लाने वाली नहर प्रणाली से सींचा जाता था, इसलिए घेरे में भी फ़सल उग सकती थी।
  • फ़ायदा, अन्नागार से आगे: आम तौर पर शासक ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए क़िलेबंद क्षेत्रों के भीतर ही विशाल अन्नागार बनवाते थे, पर विजयनगर के शासकों ने पूरे कृषि भूभाग को बचाने की नीति अपनाई।
  • नुकसान, भारी खर्च: किताब इसे "एक अधिक मँहगी तथा व्यापक नीति" कहती है; इतनी लंबी दीवारें बनाना और सँभालना महँगा था।
  • नुकसान, बचाव कठिन: पहाड़ियों, खेतों और जंगलों तक फैले इतने बड़े घेरे की रक्षा के लिए बहुत सैनिक चाहिए होते।
  • नुकसान, फिर भी नहीं बचा: 1565 में सेना की हार के बाद विजयी सेनाओं ने शहर लूट लिया।

Checkpoint

  1. 1किताब के अनुसार विजयनगर में पानी इकट्ठा करने और शहर तक ले जाने के व्यापक प्रबंध क्यों ज़रूरी थे?

  2. 2किस यात्री ने विजयनगर के "दुर्गों की सात पंक्तियों" का उल्लेख किया?

  3. 3शहरी केंद्र के उत्तर-पूर्वी कोने में मिली परिष्कृत चीनी मिट्टी से पुरातत्त्वविद क्या सुझाव देते हैं?

4राजकीय केंद्र

इस पड़ाव का सवाल

राजकीय केंद्र की इमारतों के नाम कैसे पड़े, और महानवमी डिब्बा पर क्या होता था?

पिछली बात से कड़ी शहर की दीवारों और सड़कों के बाद अब शहर के उस भाग को देखिए जहाँ राजा के भवन थे।

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 4, 6, 7

राजकीय केंद्र विजयनगर बस्ती के दक्षिण–पश्चिमी भाग में था। इसे राजकीय केंद्र कहा जाता है, पर इसमें 60 से भी अधिक मन्दिर थे।

पृष्ठ 179–183

मन्दिर भी, महल भी (पृष्ठ 179–180)

  • किताब के अनुसार मन्दिरों और संप्रदायों को प्रश्रय देना उन शासकों के लिए महत्त्वपूर्ण था, जो इन देव–स्थलों में प्रतिष्ठित देवी–देवताओं से संबंध के माध्यम से अपनी सत्ता को स्थापित करने और वैधता देने का प्रयास कर रहे थे।
  • लगभग तीस संरचनाओं की पहचान महलों के रूप में हुई है। ये अपेक्षाकृत बड़ी संरचनाएँ हैं, जो आनुष्ठानिक कार्यों से जुड़ी नहीं थीं।
  • एक अंतर: "मंदिर पूरी तरह से राजगिरी से निर्मित थे जबकि धर्मेतर भवनों की अधिरचना विकारी वस्तुओं से बनाई गई थी।" राजगिरी यानी पत्थर की चिनाई, और विकारी यानी नष्ट हो जाने वाली।

भवनों के नाम कैसे पड़े? (पृष्ठ 180)

  • "इस क्षेत्र की कुछ अधिक विशिष्ट संरचनाओं का नामकरण भवनों के आकार और साथ ही उनके कार्यों के आधार पर किया गया है।"
  • "राजा का भवन" नाम की संरचना अंत:क्षेत्र में सबसे विशाल है, पर इसके राजकीय आवास होने का कोई निश्चित साक्ष्य नहीं मिला है।
  • इसके दो सबसे प्रभावशाली मंचों को सामान्यत: "सभा मंडप" और "महानवमी डिब्बा" कहा जाता है। पूरा क्षेत्र ऊँची दोहरी दीवारों से घिरा है, जिनके बीच एक गली है।
  • सभा मंडप एक ऊँचा मंच है, जिसमें पास-पास और निश्चित दूरी पर लकड़ी के स्तंभों के लिए छेद बने हैं। इन स्तंभों पर टिकी दूसरी मंज़िल तक जाने के लिए सीढ़ी बनी थी।
  • स्तंभ बहुत पास-पास होने से खुला स्थान बहुत कम बचता होगा, इसलिए किताब कहती है कि "यह स्पष्ट नहीं है कि यह मंडप किस प्रयोजन के लिए बनाया गया था।"

सही या ग़लत? (पृष्ठ 180)

  1. "राजा का भवन" नाम की संरचना के राजकीय आवास होने का निश्चित साक्ष्य मिला है।

  2. राजकीय केंद्र की कुछ संरचनाओं के नाम उनके आकार और कार्यों के आधार पर रखे गए हैं।

  3. सभा मंडप किस प्रयोजन के लिए बना था, यह पूरी तरह स्पष्ट है।

4.1महानवमी डिब्बापृष्ठ 180–181

महानवमी डिब्बा: एक विशालकाय मंच (पृष्ठ 180)

  • "शहर के सबसे ऊँचे स्थानों में से एक पर स्थित "महानवमी डिब्बा" एक विशालकाय मंच है जो लगभग 11000 वर्ग फीट के आधार से 40 फीट की ऊँचाई तक जाता है।"
  • ऐसे साक्ष्य मिले हैं जिनसे पता चलता है कि इस पर लकड़ी की एक संरचना बनी थी। मंच का आधार उभारदार उत्कीर्णन से पटा पड़ा है (किताब का चित्र 7.12)।
  • इस संरचना से जुड़े अनुष्ठान संभवत: सितंबर और अक्टूबर के शरद मासों में मनाए जाने वाले दस दिन के हिंदू त्यौहार के महानवमी (शाब्दिक अर्थ, महान नवाँ दिवस) के अवसर पर किए जाते थे।
  • इस त्यौहार को दशहरा (उत्तर भारत), दुर्गा पूजा (बंगाल में) और नवरात्री या महानवमी (प्रायद्वीपीय भारत में) नामों से जाना जाता है।
  • इस अवसर पर विजयनगर शासक अपने "रुतबे, ताक़त तथा अधिराज्य" का प्रदर्शन करते थे।
ऊपर से दिखता पत्थर का एक बड़ा, सीढ़ीदार चौकोर मंच

तस्वीर: हम्पी: महानवमी डिब्बा, ऊपर से लिया गया फ़ोटो।

Ms Sarah Welch, CC0. Image: Wikimedia Commons.

महानवमी पर क्या-क्या होता था? किताब के तीन समूहों में रखिए (पृष्ठ 181)

हर कार्ड को सही खाने में रखिए।

पत्थर के ऊँचे मंच की दीवार, जिस पर उकेरी गई पट्टियों की कई पंक्तियाँ हैं

तस्वीर: महानवमी डिब्बा के किनारे पत्थर में उकेरे गए हाथी और घोड़े।

SUDHIR KUMAR D, CC BY-SA 3.0. Image: Wikimedia Commons.

पुरानी श्वेत-श्याम तस्वीर: एक बड़ा पेड़ और मेहराबों वाला पत्थर का मण्डप

तस्वीर: 1856 में अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ का लिया फ़ोटो: राजकीय केंद्र में आठ कोनों वाला फ़व्वारा और मण्डप।

Alexander Greenlaw (Victoria and Albert Museum, London). Public domain. Image: Wikimedia Commons.

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 180

यह प्रश्न किताब के चित्र 7.12 (महानवमी डिब्बा पर उत्कीर्णित चित्र) के पास है।

क्या आप इन चित्रों के विषयों को पहचान सकते हैं?

जवाब देखिए

किताब के चित्र 7.12 में महानवमी डिब्बा का उत्कीर्णन आड़ी पट्टियों में है, जिनमें मानव आकृतियाँ, घोड़े, एक धनुर्धारी और सैनिक हैं। ऊपर की तस्वीर भी डिब्बा के किनारे की नक्काशी की है। हर पट्टी के लोग, जानवर और काम लिखिए। मदद के लिए:

  • महानवमी के अवसर के प्रमुख आकर्षण थे नृत्य, कुश्ती प्रतिस्पर्धा, साज़ लगे घोड़ों, हाथियों, रथों और सैनिकों की शोभायात्रा, और राजा को दी जाने वाली औपचारिक भेंट; देखिए इनमें से कौन-से दृश्य उत्कीर्णन में दिखते हैं (पृष्ठ 180–181)।

फिर भी एक पहेली (पृष्ठ 181)

  • किताब पूछती है: क्या आज का "महानवमी डिब्बा" ही इस विस्तृत अनुष्ठान का केंद्र था?
  • "विद्वानों का मानना है कि संरचना के चारों ओर का स्थान सशस्त्र आदमियों, औरतों तथा बड़ी संख्या में जानवरों की शोभायात्रा के लिए पर्याप्त नहीं था।"
  • "राजकीय केंद्र में स्थित कई और संरचनाओं की तरह यह भी एक पहेली बना हुआ है।"

विजय का एक भवन? (बॉक्स, पृष्ठ 180)

  • डोमिंगो पेस सभा मंडप और महानवमी डिब्बा को मिलाकर "विजय का भवन" कहता है।
  • उसके वर्णन में इन संरचनाओं में एक के ऊपर एक, दो मंच हैं, सुंदरता से चित्रित।
  • ऊपरी मंच पर, इस विजय के भवन में, राजा ने कपड़े से बना एक कमरा बनवाया था, "जहाँ मूर्ति का एक पूजा स्थल है"।
  • एक अन्य में बीच में एक चबूतरा रखा था, "जिस पर राज्य का सिंहासन खड़ा हुआ है"।

4.2राजकीय केंद्र में स्थित अन्य भवनपृष्ठ 181–183

कमल महल (पृष्ठ 181–182)

  • राजकीय केंद्र के सबसे सुंदर भवनों में से एक लोटस (कमल) महल है। यह नाम उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों ने रखा था।
  • किताब के अनुसार यह नाम रोमांचक है, "लेकिन इतिहासकार इस बारे में निश्चित नहीं हैं कि यह भवन किस कार्य के लिए बना था।"
  • एक सुझाव, जो मैकेन्ज़ी के बनाए मानचित्र से मिलता है, यह है कि "यह परिषदीय सदन था जहाँ राजा अपने परामर्शदाताओं से मिलता था।"
  • "कमल महल में नौ मीनारें थीं– बीच में एक ऊँची, तथा आठ उसकी भुजाओं के साथ–साथ।"
  • किताब के खड़े रेखाचित्र (चित्र 7.13) के नीचे लिखा है: "मेहराबों को ध्यान से देखिए। ये संभवत: इण्डो–इस्लामी तकनीकों से प्रभावित थीं।"
  • खड़ा रेखाचित्र किसी संरचना का ऊर्ध्व अवलोकन होता है; यह वे अभिलक्षण भी दिखाता है जो छाया-चित्र में नहीं दिखते।
पत्थर का दो मंज़िला भवन, जिसमें नुकीली मेहराबें हैं और छत पर सीढ़ीदार मीनारें

तस्वीर: हम्पी का कमल महल।

Ingo Mehling, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

360°360° दृश्य खोलिए
गूगल मैप्स में खोलिए
360° दृश्य: कमल महलछूने पर गूगल मैप्स का एक दृश्य खुलेगा, जिसे उँगली या माउस से चारों ओर घुमाकर देख सकते हैं।360° view: Archaeological Survey of India / Google

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 181

यह प्रश्न किताब के कमल महल के चित्रों के पास है: चित्र 7.13 (खड़ा रेखाचित्र), 7.14 (एक मेहराब का सूक्ष्म चित्रण) और 7.15 (छाया-चित्र)। साथ में चित्र 7.6 (क़िलेबंद दीवार का प्रवेशद्वार) से तुलना करनी है।

चित्र 7.13 तथा 7.15 की तुलना कीजिए तथा उन अभिलक्षणों की सूची बनाइये जो दोनों में हैं, और साथ ही उनकी भी जो इनमें से केवल एक में ही देखे जा सकते हैं। चित्र 7.14 में बनी मेहराब की तुलना चित्र 7.6 में बनी मेहराब से कीजिए। कमल महल में नौ मीनारें थीं– बीच में एक ऊँची, तथा आठ उसकी भुजाओं के साथ–साथ। छाया–चित्र तथा खड़े रेखाचित्र में आप कितनी–कितनी मीनारें देख पाते हैं। यदि आप कमल महल का फिर से नामकरण करते तो इसे क्या कहते?

जवाब देखिए

किताब के चित्र 7.13 (खड़ा रेखाचित्र) में चबूतरे पर बना दो मंज़िला भवन है: नीचे पाँच कटावदार मेहराबें, ऊपर छोटी खिड़कियाँ, और तलों में उठती मीनारें, जिनमें बीच वाली सबसे ऊँची। चित्र 7.15 की तसवीर भवन को एक कोने से दिखाती है; उसमें भी तलों वाली मीनारें और कटावदार मेहराबें हैं। चित्र 7.14 की मेहराब कटावदार है और फूल-पत्ती और गुँथी पट्टियों से सजी है; चित्र 7.6 के प्रवेशद्वार की मेहराब के ऊपर गुंबद है। ऊपर की तस्वीर और 360° दृश्य में भी आप कमल महल की मेहराबें और मीनारें देख सकते हैं। तरीका:

  • 7.13 और 7.15: दो सूचियाँ बनाइए: जो दोनों में दिखे (मेहराबें, मीनारें, मंज़िलें) और जो केवल एक में। याद रखिए, खड़ा रेखाचित्र वे अभिलक्षण भी दिखाता है जो छाया-चित्र में नहीं दिखते।
  • मेहराबें: चित्र 7.14 की मेहराब को चित्र 7.6 के प्रवेशद्वार की मेहराब से मिलाइए; किताब के अनुसार कमल महल की मेहराबें संभवत: इण्डो–इस्लामी तकनीकों से प्रभावित थीं।
  • मीनारें: कुल नौ थीं; गिनिए कि छाया-चित्र और खड़े रेखाचित्र में कितनी-कितनी दिखती हैं, और सोचिए कि किसी कोने से ली गई तस्वीर में कुछ मीनारें क्यों छिप जाती हैं।
  • नया नाम: अपना नाम सुझाइए और कारण लिखिए। ध्यान रखिए कि "कमल महल" नाम उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों ने दिया था, और एक सुझाव के अनुसार यह परिषदीय सदन था।

"हाथियों का अस्तबल" (पृष्ठ 182)

  • यह भवन राजकीय केंद्र में कमल महल के समीप है। किताब इसका नाम उद्धरण-चिह्नों में देती है।
  • किताब में इसके तीन चित्र हैं: चित्र 7.16(क) खड़ा रेखाचित्र, 7.16(ख) नक्शा ("नक्शा एक संरचना का समस्तरी अवलोकन देता है") और 7.17 तसवीर।
पत्थर का लंबा भवन, जिसमें एक कतार में मेहराबदार दरवाज़े हैं और ऊपर गुंबद

तस्वीर: हम्पी: गुंबदों वाले कक्षों की लंबी कतार, जिसे "हाथियों का अस्तबल" कहा जाता है।

iMahesh, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

पुरानी श्वेत-श्याम तस्वीर: ऊँचाई पर एक मीनार, और आगे पत्थर के भवन और खंडहर

तस्वीर: 1856 में अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ का लिया फ़ोटो: आठ कोनों वाली निगरानी मीनार, "हाथियों का अस्तबल" और माधव मन्दिर।

Alexander Greenlaw (Victoria and Albert Museum, London). Public domain. Image: Wikimedia Commons.

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 182

यह प्रश्न किताब के "हाथियों का अस्तबल" के तीन चित्रों के पास है: चित्र 7.16(क), 7.16(ख) और 7.17।

चित्र 7.16(क) तथा 7.16(ख) की तुलना चित्र 7.17 से कीजिए। प्रत्येक में दिखाई देने वाले अभिलक्षणों की सूची बनाइए। क्या आपको लगता है कि ये वास्तव में हाथियों के अस्तबल थे?

जवाब देखिए

किताब के खड़े रेखाचित्र में लंबा दो मंज़िला अग्रभाग है: नीचे ग्यारह बड़ी नुकीली मेहराबें, ऊपर छोटे मेहराबदार झरोखे, सबसे ऊपर अलग-अलग आकार के ग्यारह गुंबद, और बीच में एक ऊँचा मण्डप। नक्शा ग्यारह वर्गाकार कमरों की पंक्ति दिखाता है, हर कमरे में आगे से प्रवेश, और बीच में सीढ़ियाँ। चित्र 7.17 की तसवीर में यही लंबा भवन है: नीचे नुकीली मेहराबें, ऊपर गुंबद। ऊपर की दो तस्वीरें भी इसी भवन की हैं। काम की बातें:

  • सूची: चित्र 7.16(क) खड़ा रेखाचित्र है, 7.16(ख) नक्शा, जो किताब के अनुसार "एक संरचना का समस्तरी अवलोकन देता है", और 7.17 आज की तसवीर; हर एक में दिखते कमरे, दरवाज़े, मेहराबें और छत लिखिए।
  • हाथी आ-जा सकते थे? नक्शे में कमरों की संख्या और आकार, और रेखाचित्र में दरवाज़ों की ऊँचाई देखिए।
  • अपनी राय: किताब यह नाम उद्धरण-चिह्नों में देती है और निश्चित उत्तर नहीं देती। सोचने के लिए: विजयनगर की सेना में घोड़ों और हाथियों के दल थे, और यह भवन राजकीय केंद्र में कमल महल के समीप है (पृष्ठ 175, 182)।

हज़ार राम मन्दिर (पृष्ठ 182–183)

  • ज़्यादातर मन्दिर धार्मिक केंद्र में थे, पर राजकीय केंद्र में भी कई थे। इनमें एक अत्यंत दर्शनीय मन्दिर हज़ार राम मन्दिर कहलाता है।
  • किताब लिखती है: "संभवत: इसका प्रयोग केवल राजा और उनके परिवार द्वारा ही किया जाता था।"
  • बीच के देवस्थल की मूर्तियाँ अब नहीं हैं, लेकिन दीवारों पर बने पटल-मूर्तियाँ सुरक्षित हैं। इनमें मन्दिर की भीतरी दीवारों पर उत्कीर्णित रामायण से लिए गए कुछ दृश्यांश हैं।
  • शहर पर आक्रमण के बाद विजयनगर की कई संरचनाएँ नष्ट हो गईं, पर नायकों ने महलनुमा संरचनाएँ बनाने की परंपरा जारी रखी। इनमें से कई भवन आज भी अस्तित्व में हैं।
पत्थर की दीवार पर ऊपर-नीचे कई पट्टियाँ, जिनमें हाथी, घोड़े और लोग उकेरे गए हैं

तस्वीर: हम्पी के हज़ार राम मन्दिर की दीवार पर उकेरी गई मूर्तियों की पंक्तियाँ।

Ingo Mehling, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 183

यह प्रश्न किताब के चित्र 7.18 (हज़ार राम मन्दिर की दीवारों पर मूर्तिकला) के पास है।

क्या आप नृत्य के दृश्यांशों को पहचान सकते हैं। आपके विचार में हाथियों और घोड़ों को पटलों पर क्यों चित्रित किया गया था?

जवाब देखिए

पहला भाग: किताब का चित्र 7.18 इसी मन्दिर की दीवार दिखाता है, जिस पर नक्काशी की पट्टियाँ हैं: सबसे ऊपर गोल घेरों में आकृतियाँ, फिर नाचती आकृतियों, सैनिकों, साईसों के साथ घोड़ों और हाथियों की पंक्तियाँ। ऊपर की तस्वीर में भी ऐसी पट्टियाँ हैं। दूसरे भाग के लिए अपना विचार लिखिए और किताब से जोड़िए:

  • युद्धकला अश्वसेना पर आधारित थी, अमर-नायक घोड़ों और हाथियों के दल रखते थे, और महानवमी पर साज़ लगे घोड़ों और हाथियों की शोभायात्रा निकलती थी।
  • यह मन्दिर संभवत: केवल राजा और उनके परिवार के प्रयोग के लिए था, इसलिए ये पटल राजा की शक्ति और वैभव दिखाते होंगे (पृष्ठ 172, 175, 181, 183)।
ऊँचे गोल स्तंभों और मेहराबों वाला एक बड़ा दालान

तस्वीर: मदुरई का तिरुमलै नायक महल।

Sundaram Perumal, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए

किताब बताती है कि शहर पर आक्रमण के बाद भी नायकों ने महलनुमा संरचनाएँ बनाने की परंपरा जारी रखी, क़िलेबंदी और मन्दिर निर्माण को और व्यापक बनाया, और कुछ सबसे दर्शनीय गोपुरम् भी बनवाए। कारणों की चर्चा के लिए किताब की ये बातें जोड़िए:

  • नायक पहले विजयनगर के अधीन सेना प्रमुख थे, और सत्रहवीं शताब्दी में इनमें से कई ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए।
  • विजयनगर के शासकों के लिए मन्दिरों का निर्माण, मरम्मत और रख-रखाव सत्ता, संपत्ति और निष्ठा के लिए समर्थन और मान्यता पाने के माध्यम थे; नायक भी यही चाहते होंगे।
  • ऊँचे गोपुरम् संभवत: शासकों की ताकत की याद दिलाते थे (पृष्ठ 175, 183–184, 186, 188)।

किताब के अपने प्रश्न

4आपके विचार में महानवमी डिब्बा से संबद्ध अनुष्ठानों का क्या महत्त्व था?

लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 180–181

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • महानवमी डिब्बा से जुड़े अनुष्ठान संभवत: सितंबर-अक्टूबर के दस दिन के हिंदू त्यौहार के महानवमी (महान नवाँ दिवस) के अवसर पर किए जाते थे, और किताब कहती है कि "इन उत्सवों के गहन सांकेतिक अर्थ थे।"
  • ताक़त का प्रदर्शन: इस अवसर पर विजयनगर शासक अपने "रुतबे, ताक़त तथा अधिराज्य" का प्रदर्शन करते थे।
  • धर्म से जुड़ाव: मूर्ति की पूजा, राज्य के अश्व की पूजा और भैंसों तथा अन्य जानवरों की बलि से राजसत्ता धार्मिक अनुष्ठान के साथ जुड़ी दिखती थी।
  • नायकों की निष्ठा: प्रमुख नायक और अधीनस्थ राजा राजा और उसके अतिथियों को औपचारिक भेंट देते थे; अंतिम दिन नायक बड़ी मात्रा में भेंट और नियत कर भी लाते थे।
  • सेना का निरीक्षण: त्यौहार के अंतिम दिन राजा खुले मैदान में भव्य समारोह में अपनी और अपने नायकों की सेना का निरीक्षण करता था।
  • उत्सव: नृत्य, कुश्ती प्रतिस्पर्धा और साज़ लगे घोड़ों, हाथियों, रथों और सैनिकों की शोभायात्रा इस अवसर के प्रमुख आकर्षण थे।
  • ध्यान रखिए: विद्वानों के अनुसार आज के महानवमी डिब्बा के चारों ओर का स्थान इतनी बड़ी शोभायात्रा के लिए पर्याप्त नहीं था, इसलिए यह मंच ही इस अनुष्ठान का केंद्र था या नहीं, यह पहेली बना हुआ है।

6"शाही केंद्र" शब्द शहर के जिस भाग के लिए प्रयोग किए गए हैं, क्या वे उस भाग का सही वर्णन करते हैं।

लगभग 250 से 300 शब्द · पृष्ठ 176–183

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • चित्र 7.4 के नक्शे पर जिसे "शाही केंद्र" लिखा है, किताब का पाठ उसे राजकीय केंद्र कहता है। यह नाम आधा ही सही है: यहाँ राजसत्ता के भवन थे, पर धर्म के भी।
  • नाम के पक्ष में: यह बस्ती के दक्षिण-पश्चिमी भाग में था; तीसरी क़िलेबंदी इसी को घेरती थी, और महत्त्वपूर्ण इमारतों के हर समूह की अपनी ऊँची दीवारें थीं।
  • नाम के पक्ष में: लगभग तीस संरचनाएँ महल मानी गई हैं: अपेक्षाकृत बड़ी, और आनुष्ठानिक कार्यों से न जुड़ी। सभा मंडप और महानवमी डिब्बा यहीं हैं, जहाँ महानवमी पर शासक अपने "रुतबे, ताक़त तथा अधिराज्य" का प्रदर्शन करते थे।
  • नाम के पक्ष में: मैकेन्ज़ी के मानचित्र से मिले सुझाव के अनुसार कमल महल परिषदीय सदन था, जहाँ राजा परामर्शदाताओं से मिलता था; उसके समीप "हाथियों का अस्तबल" है। कमलपुरम् जलाशय से एक नहर इस केंद्र तक पानी लाती थी।
  • नाम के विरुद्ध: इसमें 60 से भी अधिक मन्दिर थे; इनमें हज़ार राम मन्दिर संभवत: केवल राजा और उनके परिवार के प्रयोग के लिए था।
  • नाम के विरुद्ध: "राजा का भवन" के राजकीय आवास होने का कोई निश्चित साक्ष्य नहीं; सभा मंडप का प्रयोजन स्पष्ट नहीं; कमल महल का काम भी निश्चित नहीं, और उसका नाम उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों ने रखा।
  • नाम के विरुद्ध: विद्वानों का मानना है कि महानवमी डिब्बा के चारों ओर का स्थान बड़ी शोभायात्रा के लिए पर्याप्त नहीं था; किताब कहती है कि राजकीय केंद्र की कई संरचनाओं की तरह यह भी "एक पहेली बना हुआ है"।
  • धर्म और राजसत्ता साथ-साथ: किताब के अनुसार मन्दिरों और संप्रदायों को प्रश्रय देना शासकों के लिए "स्पष्टत:" महत्त्वपूर्ण था, क्योंकि वे देवी-देवताओं से संबंध के माध्यम से अपनी सत्ता को स्थापित करने और वैधता देने का प्रयास कर रहे थे। महानवमी के अनुष्ठानों में भी पूजा और राजकीय प्रदर्शन साथ चलते थे।
  • निष्कर्ष: "शाही केंद्र" बताता है कि यहाँ राजसत्ता रहती और दिखाई जाती थी, पर यह पूरा वर्णन नहीं है। मन्दिरों की बड़ी संख्या दिखाती है कि विजयनगर की राजसत्ता धर्म के सहारे खड़ी थी, और कई भवनों का असली काम आज भी अनिश्चित है।

7कमल महल और हाथियों के अस्तबल जैसे भवनों का स्थापत्य हमें उनके बनवाने वाले शासकों के विषय में क्या बताता है?

लगभग 250 से 300 शब्द · पृष्ठ 171–172, 175, 178–182, 186

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • दोनों भवन राजकीय केंद्र में हैं। इनका असली काम निश्चित नहीं है, इसलिए उत्तर सावधानी से लिखिए।
  • कमल महल: राजकीय केंद्र के सबसे सुंदर भवनों में से एक; इसमें नौ मीनारें थीं, बीच में एक ऊँची और आठ उसकी भुजाओं के साथ-साथ। चित्र 7.13 के नीचे किताब लिखती है कि इसकी मेहराबें "संभवत: इण्डो–इस्लामी तकनीकों से प्रभावित थीं।"
  • कमल महल का नाम उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों ने रखा; मैकेन्ज़ी के मानचित्र से मिले सुझाव के अनुसार यह परिषदीय सदन था, जहाँ राजा अपने परामर्शदाताओं से मिलता था।
  • "हाथियों का अस्तबल": कमल महल के समीप स्थित; किताब यह नाम उद्धरण-चिह्नों में देती है और पूछती है कि क्या ये वास्तव में हाथियों के अस्तबल थे।
  • शैलियाँ अपनाईं: मेहराब और गुंबद तुर्की सुल्तानों द्वारा प्रवर्तित स्थापत्य के तत्त्व माने जाते हैं; दक्कन के सुलतानों और गजपतियों से संपर्क में विजयनगर के शासकों ने अवधारणाएँ और भवन निर्माण की तकनीकें ग्रहण कीं और आगे विकसित कीं।
  • राजकाज के भवन: लगभग तीस संरचनाओं की पहचान महलों के रूप में की गई है; ये अपेक्षाकृत बड़ी संरचनाएँ हैं जो आनुष्ठानिक कार्यों से संबद्ध नहीं होतीं (पृष्ठ 179)।
  • सैनिक शक्ति: युद्धकला प्रभावशाली अश्वसेना पर आधारित थी और अमर-नायक घोड़ों और हाथियों के दल रखते थे; यदि ये सचमुच अस्तबल थे, तो यह भवन उसी सैनिक शक्ति को दिखाता है।
  • साधन और कौशल: ऊँचे गोपुरमों के बारे में किताब कहती है कि वे संभवत: शासकों की उस ताकत की याद दिलाते थे जो साधन, तकनीक और कौशल जुटा सकती थी; इतने बड़े और सजे महलों पर भी यही बात लागू होती है।
  • निष्कर्ष: ये भवन ऐसे शासकों के हैं जो अलग-अलग परंपराओं को मिलाकर अपनी शक्ति और वैभव दिखाना चाहते थे। पर इनका काम अनिश्चित है, इसलिए यह निष्कर्ष केवल स्थापत्य पर टिका है।

Checkpoint

  1. 1किताब के अनुसार महानवमी डिब्बा का आकार कितना है?

  2. 2किताब के अनुसार राजकीय केंद्र के मन्दिरों और धर्मेतर भवनों में एक अंतर क्या था?

  3. 3"कमल महल" नाम किसने रखा?

  4. 4हज़ार राम मन्दिर के बारे में किताब क्या कहती है?

5धार्मिक केंद्र

इस पड़ाव का सवाल

शासकों ने यह जगह राजधानी के लिए क्यों चुनी, और यहाँ के मन्दिरों में क्या नया था?

पिछली बात से कड़ी राजकीय केंद्र के बाद अब शहर के धार्मिक केंद्र को देखिए।

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 5, 8

अब किताब तुंगभद्रा नदी के तट से लगे शहर के चट्टानी उत्तरी भाग की ओर चलती है। यही विजयनगर का धार्मिक केंद्र है।

पृष्ठ 184–188

5.1राजधानी का चयनपृष्ठ 184–185

इन पहाड़ियों से जुड़ी मान्यताएँ (पृष्ठ 184)

  • स्थानीय मान्यताओं के अनुसार ये पहाड़ियाँ रामायण में उल्लिखित बाली और सुग्रीव के वानर राज्य की रक्षा करती थीं।
  • अन्य मान्यताओं के अनुसार स्थानीय मातृदेवी पम्पादेवी ने इन पहाड़ियों में विरुपाक्ष से विवाह के लिए तप किया था। विरुपाक्ष राज्य के संरक्षक देवता तथा शिव का एक रूप माने जाते हैं।
  • किताब के अनुसार आज तक यह विवाह विरुपाक्ष मन्दिर में हर वर्ष धूम–धाम से आयोजित किया जाता है।
  • इन पहाड़ियों में विजयनगर साम्राज्य से पहले के जैन मन्दिर भी मिले हैं। दूसरे शब्दों में, यह क्षेत्र कई धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा था।
पुरानी श्वेत-श्याम तस्वीर: बड़ी चट्टानों के बीच पत्थर के मण्डप

तस्वीर: 1856 में अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ का लिया फ़ोटो: हेमकूट पहाड़ी पर एक प्रवेशद्वार और मण्डप।

Alexander Greenlaw (Victoria and Albert Museum, London). Public domain. Image: Wikimedia Commons.

360°360° दृश्य खोलिए
गूगल मैप्स में खोलिए
360° दृश्य: हेमकूट पहाड़ी: छोटे मन्दिर और बड़ी चट्टानेंछूने पर गूगल मैप्स का एक दृश्य खुलेगा, जिसे उँगली या माउस से चारों ओर घुमाकर देख सकते हैं।360° view: Archaeological Survey of India / Google

मन्दिर बनवाने की पुरानी परंपरा (पृष्ठ 184)

  • इस क्षेत्र में मन्दिर निर्माण का एक लंबा इतिहास रहा है, जो पल्लव, चालुक्य, होयसाल तथा चोल वंशों तक जाता है।
  • आमतौर पर शासक अपने आप को ईश्वर से जोड़ने के लिए मन्दिर निर्माण को प्रोत्साहन देते थे; अकसर देवता को व्यक्त या अव्यक्त रूप से राजा से जोड़ा जाता था।
  • मन्दिर शिक्षा के केंद्रों के रूप में भी काम करते थे। शासक और अन्य लोग मन्दिर के रख–रखाव के लिए भूमि या अन्य संपदा दान में देते थे। इसलिए मन्दिर महत्त्वपूर्ण धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक केंद्र बन गए।
  • शासकों की नज़र से मन्दिरों का निर्माण, मरम्मत और रखरखाव अपनी सत्ता, संपत्ति और निष्ठा के लिए समर्थन और मान्यता पाने के महत्त्वपूर्ण माध्यम थे।

राजधानी यहीं क्यों? (पृष्ठ 184)

  • "यह संभव है कि विजयनगर के स्थान का चयन वहाँ विरुपाक्ष तथा पम्पादेवी के मन्दिरों के अस्तित्व से प्रेरित था।"
  • विजयनगर के शासक भगवान विरुपाक्ष की ओर से शासन करने का दावा करते थे। सभी राजकीय आदेशों पर सामान्यतया कन्नड़ लिपि में "श्री विरुपाक्ष" शब्द अंकित होता था।
  • शासक विरुद "हिन्दू सूरतराणा" का प्रयोग भी करते थे। यह अरबी भाषा के शब्द सुल्तान (अर्थ: राजा) का संस्कृत अनुवाद था, और इसका शाब्दिक अर्थ था हिंदू सुलतान।
  • शासकों ने पुरानी परंपराओं को अपनाया, उनमें नवीनता लाई और उन्हें आगे विकसित किया। अब राजकीय प्रतिकृति मूर्तियाँ मन्दिरों में प्रदर्शित की जाने लगीं, और राजा की मन्दिर यात्राएँ महत्त्वपूर्ण राजकीय अवसर मानी जाने लगीं, जिन पर साम्राज्य के महत्त्वपूर्ण नायक भी उसके साथ जाते थे।

सही या ग़लत? (पृष्ठ 184)

  1. किताब के अनुसार यह पक्का है कि विजयनगर का स्थान विरुपाक्ष और पम्पादेवी के मन्दिरों के कारण चुना गया।

  2. राजकीय आदेशों पर सामान्यतया कन्नड़ लिपि में "श्री विरुपाक्ष" अंकित होता था।

  3. "हिन्दू सूरतराणा" एक फ़ारसी विरुद है, जिसका अर्थ है हिंदू राजा।

5.2गोपुरम् और मण्डपपृष्ठ 185–188

राय गोपुरम्: दूर से दिखने वाले प्रवेशद्वार (पृष्ठ 185–186)

  • इस समय तक मन्दिर स्थापत्य में कई नए तत्व दिखते हैं। इनमें विशाल स्तर पर बनाई गई संरचनाएँ शामिल हैं, जो राजकीय सत्ता की द्योतक थीं।
  • इनका सबसे अच्छा उदाहरण राय गोपुरम् या राजकीय प्रवेशद्वार थे। ये अकसर केंद्रीय देवालयों की मीनारों को बौना प्रतीत कराते थे, और लंबी दूरी से ही मन्दिर के होने का संकेत देते थे।
  • "ये संभवत: शासकों की ताकत की याद भी दिलाते थे, जो इतनी ऊँची मीनारों के निर्माण के लिए आवश्यक साधन, तकनीक तथा कौशल जुटाने में सक्षम थे।"
  • दूसरी विशेषताएँ: मण्डप, और लंबे स्तंभों वाले गलियारे, जो अकसर मन्दिर परिसर के देवस्थलों के चारों ओर बने थे।
चट्टानी पहाड़ी के ऊपर से दिखता एक ऊँचा, सीढ़ीदार गोपुरम् और उसके आसपास के मन्दिर

तस्वीर: हेमकूट पहाड़ी से दिखता विरुपाक्ष मन्दिर।

Ingo Mehling, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

पुरानी श्वेत-श्याम तस्वीर: एक ऊँचा गोपुरम् और आसपास के भवन

तस्वीर: 1856 में अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ का लिया फ़ोटो: विरुपाक्ष मन्दिर परिसर।

Alexander Greenlaw (Victoria and Albert Museum, London). Public domain. Image: Wikimedia Commons.

360°360° दृश्य खोलिए
गूगल मैप्स में खोलिए
360° दृश्य: हेमकूट पहाड़ी से विरुपाक्ष मन्दिर की ओरछूने पर गूगल मैप्स का एक दृश्य खुलेगा, जिसे उँगली या माउस से चारों ओर घुमाकर देख सकते हैं।360° view: Archaeological Survey of India / Google

विरुपाक्ष मन्दिर (पृष्ठ 185–186)

  • इस मन्दिर का निर्माण कई शताब्दियों में हुआ था। अभिलेखों से पता चलता है कि सबसे प्राचीन मन्दिर नवीं–दसवीं शताब्दियों का था; विजयनगर साम्राज्य की स्थापना के बाद इसे कहीं अधिक बड़ा किया गया।
  • मुख्य मन्दिर के सामने बना मण्डप कृष्णदेव राय ने अपने राज्यारोहण के उपलक्ष्य में बनवाया था। इसे सूक्ष्मता से उत्कीर्णित स्तंभों से सजाया गया था। पूर्वी गोपुरम् के निर्माण का श्रेय भी कृष्णदेव राय को ही दिया जाता है।
  • इन परिवर्धनों (जोड़ों) का अर्थ था कि केंद्रीय देवालय पूरे परिसर के एक छोटे भाग तक सीमित रह गया।
  • किताब का चित्र 7.21 इस मन्दिर का नक्शा है: "अधिकांश वर्गाकार संरचनाएँ देवस्थल हैं। दो प्रमुख प्रवेश द्वारों को काले रंग से भरा गया है। प्रत्येक छोटा बिंदु एक स्तंभ को दर्शाता है।"
360°360° दृश्य खोलिए
गूगल मैप्स में खोलिए
360° दृश्य: विरुपाक्ष मन्दिर का आँगनछूने पर गूगल मैप्स का एक दृश्य खुलेगा, जिसे उँगली या माउस से चारों ओर घुमाकर देख सकते हैं।360° view: Archaeological Survey of India / Google

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 185

यह प्रश्न किताब के चित्र 7.21 (विरुपाक्ष मन्दिर का नक्शा) के पास है। इसे करने के लिए किताब का नक्शा और एक रूलर चाहिए।

नक्शे में दिए गए स्केल का प्रयोग कर मुख्य गोपुरम् से केंद्रीय देवालय की दूरी नापिए। जलाशय से देवालय तक जाने के लिए सबसे आसान मार्ग कौन सा रहा होगा?

जवाब देखिए

तरीका:

  • दूरी: नक्शे पर 30m वाली स्केल पट्टी की लंबाई रूलर से नापिए। फिर मुख्य गोपुरम् (काले रंग से भरे दो प्रमुख प्रवेशद्वारों में से) से "देवालय" लिखे केंद्रीय देवालय तक की दूरी नापिए, और अनुपात से मीटर निकालिए: (नापी गई दूरी ÷ स्केल पट्टी की लंबाई) × 30 मीटर।
  • मार्ग: "जलाशय" से देवालय तक नक्शे पर उँगली से चलकर देखिए कि रास्ते में कौन-से प्रवेशद्वार और स्तंभों वाले सभागार (बिंदुओं की पंक्तियाँ) आते हैं, और सबसे कम रुकावट वाला मार्ग चुनिए।

मन्दिर के सभागार किस काम आते थे? (पृष्ठ 187)

  • कुछ सभागारों में देवताओं की मूर्तियाँ संगीत, नृत्य और नाटकों के विशेष कार्यक्रम देखने के लिए रखी जाती थीं।
  • कुछ का प्रयोग देवी–देवताओं के विवाह के उत्सव पर आनंद मनाने के लिए होता था। किताब का चित्र 7.22 ऐसा ही एक कल्याण मंडप है।
  • कुछ अन्य का प्रयोग देवी–देवताओं को झूला झुलाने के लिए होता था। किताब का चित्र 7.25 जिंजी का झूलता मण्डप है।
  • इन अवसरों पर विशिष्ट मूर्तियों का प्रयोग होता था, जो छोटे केंद्रीय देवालयों में स्थापित मूर्तियों से भिन्न होती थीं।
पत्थर के ऊँचे, नक्काशीदार स्तंभों की कतारें

तस्वीर: हम्पी के विट्ठल मन्दिर के कल्याण मण्डप के नक्काशीदार स्तंभ।

Ingo Mehling, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

पुरानी श्वेत-श्याम तस्वीर: पत्थर के स्तंभों वाला एक मण्डप

तस्वीर: 1856 में अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ का लिया फ़ोटो: विट्ठल मन्दिर परिसर का कल्याण मण्डप।

Alexander Greenlaw (Victoria and Albert Museum, London). Public domain. Image: Wikimedia Commons.

360°360° दृश्य खोलिए
गूगल मैप्स में खोलिए
360° दृश्य: विट्ठल मन्दिर: नक्काशीदार स्तंभों वाला मण्डपछूने पर गूगल मैप्स का एक दृश्य खुलेगा, जिसे उँगली या माउस से चारों ओर घुमाकर देख सकते हैं।360° view: Archaeological Survey of India / Google
पत्थर के स्तंभ पर उकेरा गया, पिछली टाँगों पर खड़ा एक काल्पनिक पशु और उस पर बैठा सवार

तस्वीर: विट्ठल मन्दिर के कल्याण मण्डप का एक स्तंभ: याली (एक काल्पनिक पशु) और उसका सवार।

G41rn8, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 186

यह प्रश्न किताब के चित्र 7.23 (मूर्तियों वाले स्तम्भ का एक रेखाचित्र) के पास है। पहले किताब का रेखाचित्र देखिए, फिर ऊपर की तस्वीर से मिलाइए।

स्तंभ पर आप जो देख रहे हैं उसका वर्णन कीजिए।

जवाब देखिए

तरीका:

  • स्तंभ को ऊपर से नीचे तक पढ़िए और हर पटल में दिखती आकृति लिखिए: मनुष्य, जानवर या फूल-पत्ती, और वह क्या कर रही है।
  • ऊपर की तस्वीर में स्तंभ पर याली (एक काल्पनिक पशु) और उसका सवार उकेरे गए हैं। देखिए कि किताब के रेखाचित्र में भी ऐसी कोई आकृति है या नहीं।
  • किताब के अनुसार विरुपाक्ष मन्दिर में कृष्णदेव राय का बनवाया मण्डप सूक्ष्मता से उत्कीर्णित स्तंभों से सजाया गया था (पृष्ठ 186)।

विट्ठल मन्दिर (पृष्ठ 187–188)

  • यहाँ के प्रमुख देवता विट्ठल थे, जो सामान्यत: महाराष्ट्र में पूजे जाने वाले विष्णु के एक रूप हैं।
  • इस देवता की पूजा को कर्नाटक में आरंभ करना उन माध्यमों का द्योतक है, जिनसे विजयनगर के शासकों ने एक साम्राज्यिक संस्कृति के निर्माण के लिए अलग-अलग परंपराओं को आत्मसात किया।
  • अन्य मन्दिरों की तरह इस मन्दिर में भी कई सभागार हैं, और "रथ के आकार का एक अनूठा मन्दिर" भी है (किताब का चित्र 7.24)।
पत्थर के पहियों वाला, रथ के आकार का एक छोटा पत्थर का मन्दिर

तस्वीर: हम्पी के विट्ठल मन्दिर के आँगन में रथ के आकार का पत्थर का मन्दिर, जो गरुड़ को समर्पित है।

Parthasarathi Chakrabarty, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

पुरानी श्वेत-श्याम तस्वीर: आगे रथ के आकार का मन्दिर, पीछे स्तंभों वाला मण्डप और गोपुरम्

तस्वीर: 1856 में अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ का लिया फ़ोटो: विट्ठल मन्दिर परिसर में गरुड़ मन्दिर, महामण्डप और पूर्वी गोपुरम्।

Alexander Greenlaw (Victoria and Albert Museum, London). Public domain. Image: Wikimedia Commons.

360°360° दृश्य खोलिए
गूगल मैप्स में खोलिए
360° दृश्य: विट्ठल मन्दिर: पत्थर का रथछूने पर गूगल मैप्स का एक दृश्य खुलेगा, जिसे उँगली या माउस से चारों ओर घुमाकर देख सकते हैं।360° view: Archaeological Survey of India / Google

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 187

यह प्रश्न किताब के चित्र 7.24 (विट्ठल मन्दिर का रथ) के पास है। ऊपर की तस्वीरें और 360° दृश्य उसी रथ के हैं।

क्या आपको लगता है कि वास्तव में इस प्रकार के रथ बनाए जाते होंगे?

जवाब देखिए

यह आपकी राय का प्रश्न है। सोचने के लिए:

  • किताब इसे "रथ के आकार का एक अनूठा मन्दिर" कहती है, यानी यह चलने वाला रथ नहीं, रथ के आकार में बना एक मन्दिर है (पृष्ठ 188)।
  • मन्दिर परिसरों में रथ गलियाँ होती थीं, जो गोपुरम् से सीधी रेखा में जाती थीं। इन गलियों के नाम से अनुमान लगाइए कि मन्दिरों से जुड़े रथ वास्तव में बनते होंगे या नहीं (पृष्ठ 188)।

रथ गलियाँ, और नायकों के गोपुरम् (पृष्ठ 188)

  • मन्दिर परिसरों की एक चारित्रिक विशेषता रथ गलियाँ हैं, जो मन्दिर के गोपुरम् से सीधी रेखा में जाती हैं।
  • इन गलियों का फर्श पत्थर के टुकड़ों से बनाया गया था। इनके दोनों ओर स्तंभ वाले मण्डप थे, जिनमें व्यापारी अपनी दुकानें लगाया करते थे।
  • जैसे नायकों ने क़िलेबंदी की परंपराओं को जारी रखा और अधिक व्यापक बनाया, वैसे ही मन्दिर निर्माण की परंपराओं के साथ भी किया। "यहाँ तक कि कुछ सबसे दर्शनीय गोपुरमों का निर्माण भी स्थानीय नायकों द्वारा किया गया था।"
रंग-बिरंगी मूर्तियों से भरा एक बहुत ऊँचा, सीढ़ीदार गोपुरम्

तस्वीर: मदुरई के मीनाक्षी मन्दिर का एक गोपुरम्।

Krishvino, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए

इस चर्चा के दो भाग हैं:

  • कैसे: पल्लव, चालुक्य, होयसाल और चोल वंशों तक जाने वाली मन्दिर परंपरा अपनाई। उसमें विशाल राय गोपुरम्, लंबे स्तंभों वाले गलियारे, अलग-अलग कामों के सभागार, रथ गलियाँ और मन्दिरों में राजकीय प्रतिकृति मूर्तियाँ जोड़ीं। महाराष्ट्र में पूजे जाने वाले विट्ठल की पूजा कर्नाटक में आरंभ की।
  • क्यों: शासक मन्दिर निर्माण से अपने को ईश्वर से जोड़ते थे और भगवान विरुपाक्ष की ओर से शासन करने का दावा करते थे। मन्दिर धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र थे। और अलग-अलग परंपराओं को आत्मसात कर शासक एक साम्राज्यिक संस्कृति बना रहे थे।

(पृष्ठ 184–188)

किताब के अपने प्रश्न

5चित्र 7.33 विरुपाक्ष मन्दिर के एक अन्य स्तंभ का रेखाचित्र है। क्या आप कोई पुष्प–विषयक रूपांकन देखते हैं? किन जानवरों को दिखाया गया है? आपके विचार में उन्हें क्यों चित्रित किया गया है? मानव आकृतियों का वर्णन कीजिए।

लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 183–186, 194

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • किताब के रेखाचित्र में स्तंभ के सबसे ऊपर कमल की कली के आकार का शीर्ष है, एक ओर सवार वाला एक जानवर पिछले पैरों पर खड़ा है, दूसरी ओर एक के ऊपर एक पटल हैं: एक में धनुष से एक लिंग पर बाण चलाती आकृति, नीचे के पटल में गदा लिए बैठी एक भारी-भरकम पुरुष आकृति, और ऊपर के छोटे पटल में एक बैठी आकृति; नीचे उत्कीर्णित पट्टियों वाला आधार है।
  • सजे हुए स्तंभ: मुख्य मन्दिर के सामने कृष्णदेव राय का बनवाया मण्डप सूक्ष्मता से उत्कीर्णित स्तंभों से सजाया गया था; किताब का चित्र 7.23 भी मूर्तियों वाले एक स्तंभ का रेखाचित्र है।
  • फूल: स्तंभ के हर भाग में फूल, कली या पत्तियों जैसे आकार खोजिए, और लिखिए कि वे कहाँ हैं।
  • जानवर क्यों: यह अपने विचार से लिखिए। सोचने का एक सिरा: किताब के अनुसार गोपुरम् और मण्डप राजकीय सत्ता के द्योतक थे, और मन्दिर धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र थे।
  • मानव आकृतियाँ: हर आकृति के लिए लिखिए कि वह खड़ी है या बैठी, उसके हाथ में क्या है और वह क्या करती दिखती है। ये किसी कथा के दृश्य भी हो सकते हैं, जैसे हज़ार राम मन्दिर की भीतरी दीवारों पर रामायण के दृश्यांश उत्कीर्णित हैं।

8स्थापत्य की कौन–कौन–सी परंपराओं ने विजयनगर के वास्तुविदों को प्रेरित किया? उन्होंने इन परंपराओं में किस प्रकार बदलाव किए?

लगभग 250 से 300 शब्द · पृष्ठ 171–172, 178–179, 181, 184–188

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • पुराने दक्षिणी राज्य: तमिलनाडु में चोलों और कर्नाटक में होयसालों के शासक वर्ग ने तंजावुर के बृहदेश्वर और बेलूर के चन्नकेशव जैसे विशाल मन्दिरों को संरक्षण दिया; विजयनगर के राय इन परंपराओं को "नयी ऊँचाइयों तक" ले गए।
  • लंबा मन्दिर इतिहास: इस क्षेत्र में मन्दिर निर्माण पल्लव, चालुक्य, होयसाल और चोल वंशों तक जाता है; विरुपाक्ष का सबसे प्राचीन मन्दिर नवीं–दसवीं शताब्दियों का था।
  • सुलतानों से संपर्क: दक्कन के सुलतानों और उड़ीसा के गजपतियों से संपर्क में विचारों का आदान-प्रदान हुआ, विशेषकर स्थापत्य में; मेहराब और गुंबद तुर्की सुल्तानों द्वारा प्रवर्तित तत्त्व माने जाते हैं।
  • बदलाव 1, विशाल पैमाना: राय गोपुरम् इतने ऊँचे बने कि केंद्रीय देवालयों की मीनारें बौनी लगतीं; वे दूर से मन्दिर का संकेत देते, और संभवत: शासकों की ताकत की याद दिलाते।
  • बदलाव 2, मण्डप और गलियारे: लंबे स्तंभों वाले गलियारे, और अलग-अलग कामों के सभागार: संगीत, नृत्य और नाटक देखने, देवताओं के विवाह और झूला झुलाने के लिए।
  • बदलाव 3, परिसर का विस्तार और रथ गलियाँ: विरुपाक्ष मन्दिर में कृष्णदेव राय का मण्डप, और पूर्वी गोपुरम् जिसके निर्माण का श्रेय भी उसे दिया जाता है; गोपुरम् से सीधी रेखा में पत्थर के फर्श वाली रथ गलियाँ; विट्ठल मन्दिर में रथ के आकार का एक अनूठा मन्दिर।
  • बदलाव 4, राजा मन्दिर में: राजकीय प्रतिकृति मूर्तियाँ मन्दिरों में प्रदर्शित होने लगीं, और महाराष्ट्र में पूजे जाने वाले विट्ठल की पूजा कर्नाटक में आरंभ की गई।
  • इंडो–इस्लामिक तत्त्व: क़िलेबंद बस्ती के प्रवेशद्वारों पर मेहराब और गुंबद; कमल महल की मेहराबें संभवत: इण्डो–इस्लामी तकनीकों से प्रभावित थीं; शहरी केंद्र की मस्ज़िदों और मक़बरों का स्थापत्य मन्दिरों के मण्डपों से मिलता-जुलता है।
  • निष्कर्ष: शासकों ने "एक साम्राज्यिक संस्कृति के निर्माण के लिए" अलग-अलग परंपराओं को आत्मसात किया; बाद में नायकों ने ये परंपराएँ जारी रखीं, और कुछ सबसे दर्शनीय गोपुरम् स्थानीय नायकों ने बनवाए।

Checkpoint

  1. 1किताब के अनुसार राय गोपुरम् जैसी विशाल संरचनाएँ किसकी द्योतक थीं?

  2. 2अभिलेखों के अनुसार विरुपाक्ष का सबसे प्राचीन मन्दिर किस समय का था?

  3. 3विट्ठल मन्दिर के प्रमुख देवता विट्ठल के बारे में किताब क्या बताती है?

  4. 4रथ गलियों के दोनों ओर बने स्तंभ वाले मण्डपों में क्या होता था?

6महलों, मन्दिरों तथा बाज़ारों का अंकन

इस पड़ाव का सवाल

इतिहासकारों ने इतने बड़े स्थल के महलों, मन्दिरों और बाज़ारों का अंकन कैसे किया?

पिछली बात से कड़ी मन्दिरों और मण्डपों के बाद अब देखिए कि इन सबको नक्शों और योजनाओं में कैसे दर्ज किया गया।

विजयनगर के बारे में इतनी जानकारी कैसे जुटी? इस पड़ाव में देखिए कि हम्पी के खंडहरों को बरसों की मेहनत से नक्शों पर कैसे उतारा गया।

पृष्ठ 188–190

जानकारी कैसे जुटी? (पृष्ठ 188)

  • विजयनगर के बारे में जानकारी के भण्डार में फ़ोटोग्राफ़, नक्शे, संरचनाओं के खड़े रेखाचित्र और मूर्तियाँ हैं।
  • मैकेन्ज़ी के आरंभिक सर्वेक्षणों के बाद यात्रा वृत्तांतों और अभिलेखों से मिली जानकारी को एक साथ जोड़ा गया।
  • बीसवीं शताब्दी में इस स्थान का संरक्षण भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण और कर्नाटक पुरातात्विक एवं संग्रहालय विभाग ने किया। 1976 में हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व के स्थल के रूप में मान्यता मिली।
  • 1980 के दशक के आरंभ में विजयनगर के भौतिक अवशेषों के सूक्ष्म प्रलेखन की एक बड़ी परियोजना शुरू हुई। इसमें व्यापक और गहन सर्वेक्षण हुए, और तरह-तरह के अभिलेखन (रिकॉर्डिंग) तरीके अपनाए गए।
  • लगभग बीस वर्षों में पूरे विश्व के दर्जनों विद्वानों ने यह जानकारी इकट्ठी और संरक्षित की।

नक्शा कैसे बना: बड़े से छोटे की ओर, चार कदम (पृष्ठ 188–190)

इस बड़े काम का एक हिस्सा था मानचित्र निर्माण। किताब के चित्र 7.27 से 7.30 तक हर नक्शा पिछले नक्शे के एक हिस्से को बड़ा करके दिखाता है। हर कदम खोलकर पढ़िए।

  1. 1पूरा स्थल, 25 वर्गों में

    पहला चरण: पूरे क्षेत्र को 25 वर्गाकार भागों में बाँटा गया, और हर वर्ग को वर्णमाला के एक अक्षर से इंगित किया गया। किताब का चित्र 7.27 है "विजयनगर स्थल का विस्तृत मानचित्र"; उसकी स्केल पट्टी 0 से 5 कि.मी. की है।

  2. 2एक बड़ा वर्ग: वर्ग N

    फिर इन वर्गों को और छोटे वर्गों के समूहों में बाँटा गया। किताब का चित्र 7.28 है "चित्र 7.27 का वर्ग N"; उसकी स्केल पट्टी पर 0, 500 मी. और 1 कि.मी. लिखे हैं।

  3. 3एक छोटा वर्ग: वर्ग NM

    इतना भी काफ़ी नहीं था: छोटे वर्गों को और छोटी इकाइयों में बाँटा गया। किताब का चित्र 7.29 है "चित्र 7.28 का वर्ग NM"; इसके छोटे वर्गों पर अंग्रेज़ी के छोटे अक्षर (a, b, c …) लगे हैं, और स्केल पट्टी 0 से 250 मीटर की है।

  4. 4एक मन्दिर का नक्शा

    आख़िर में एक इमारत: किताब का चित्र 7.30 है "चित्र 7.29 के मन्दिर का नक्शा"। इसके भाग A से M तक के अक्षरों से दिखाए गए हैं, और स्केल पट्टी पर 0, 20 और 40 मीटर लिखे हैं।

इन सर्वेक्षणों से क्या मिला? (पृष्ठ 189)

  • ये गहन सर्वेक्षण बहुत परिश्रम से किए गए। इनसे हज़ारों संरचनाओं के अंश, छोटे देवस्थलों और आवासों से लेकर विशाल मन्दिरों तक, फिर से उजागर हुए, और उनका प्रलेखन भी किया गया।
  • इससे सड़कों, रास्तों और बाज़ारों के अवशेष भी फिर से मिल सके। इनकी जगह स्तंभों के आधारों और मंचों से पहचानी गई: "एक समय जो बाज़ार, जीवंत थे, उनका बस अब यही कुछ बचा है"।

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 189

यह प्रश्न किताब के चित्र 7.27 (विजयनगर स्थल का विस्तृत मानचित्र) के पास है। इसे करने के लिए किताब का नक्शा और एक रूलर चाहिए।

अंग्रेजी वर्णमाला का कौन सा अक्षर प्रयोग नहीं किया गया था? मानचित्र में दिए गए पैमाने का प्रयोग करते हुए किसी एक छोटे वर्ग की लंबाई नापिए।

जवाब देखिए

तरीका:

  • अक्षर: पूरा क्षेत्र 25 वर्गों में बँटा है, और अंग्रेज़ी वर्णमाला में 26 अक्षर हैं। वर्गों पर A से Z तक के अक्षर क्रम से पढ़िए: I नहीं लगाया गया है।
  • लंबाई: नक्शे के नीचे की स्केल पट्टी (0 से 5 कि.मी.) रूलर से नापिए। फिर एक वर्ग की भुजा नापिए, और अनुपात से किलोमीटर निकालिए: (वर्ग की भुजा ÷ स्केल पट्टी की लंबाई) × 5 कि.मी.।

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 189

यह प्रश्न किताब के चित्र 7.28 (चित्र 7.27 का वर्ग N) के पास है। इसके लिए किताब का नक्शा चाहिए।

इस मानचित्र में कौन सा पैमाना प्रयोग किया गया है?

जवाब देखिए
  • चित्र 7.28 की स्केल पट्टी पर 0, 500 मी. और 1 कि.मी. लिखे हैं।
  • चित्र 7.27 की पट्टी 0 से 5 कि.मी. की थी। यानी चित्र 7.28 एक छोटे क्षेत्र को ज़्यादा विस्तार से दिखाता है।
360°360° दृश्य खोलिए
गूगल मैप्स में खोलिए
360° दृश्य: विट्ठल मन्दिर का आँगनछूने पर गूगल मैप्स का एक दृश्य खुलेगा, जिसे उँगली या माउस से चारों ओर घुमाकर देख सकते हैं।360° view: Archaeological Survey of India / Google

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 190

यह प्रश्न किताब के चित्र 7.29 (चित्र 7.28 का वर्ग NM) के पास है। इसे करने के लिए किताब का नक्शा चाहिए।

किसी एक मन्दिर को पहचानिए। दीवारों, एक केंद्रीय देवालय, तथा मन्दिर तक जाने वाले रास्तों के अवशेषों को खोजिए। मानचित्र पर उन वर्गों को नाम दीजिए जिनमें मन्दिर का नक्शा स्थित है।

जवाब देखिए

तरीका:

  • दीवार से घिरा कोई मन्दिर खोजिए: चारों ओर की दीवार, बीच में केंद्रीय देवालय, और उस तक आने वाले रास्ते।
  • फिर नक्शे के छोटे वर्गों के अक्षरों (a, b, c …) से उन वर्गों के नाम लिखिए जिनमें यह मन्दिर फैला है।
  • किताब के चित्र 7.30 में "चित्र 7.29 के मन्दिर का नक्शा" बड़ा करके दिया गया है; उससे मिलाकर देखिए।

किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 190

यह प्रश्न किताब के चित्र 7.30 (चित्र 7.29 के मन्दिर का नक्शा) के पास है। इसे करने के लिए किताब का नक्शा चाहिए।

गोपुरम्, सभागारों, स्तंभावलियों तथा केंद्रीय देवालय को पहचानिए। बाहरी प्रवेशद्वार से केंद्रीय देवालय तक पहुँचने के लिए आप किन भागों से होकर गुज़रेंगे।

जवाब देखिए

तरीका:

  • इस नक्शे में मन्दिर के भाग A से M तक के अक्षरों से दिखाए गए हैं।
  • पहचानने में किताब के चित्र 7.21 (विरुपाक्ष मन्दिर का नक्शा) की व्याख्या मदद करती है: वहाँ प्रमुख प्रवेशद्वार काले रंग से भरे हैं, और हर छोटा बिंदु एक स्तंभ है।
  • पहले केंद्रीय देवालय पहचानिए। फिर बाहरी प्रवेशद्वार से भीतर चलते हुए जिन अक्षरों वाले भागों से आप गुज़रें, उनकी क्रम से सूची बनाइए। किताब कोई एक तय रास्ता नहीं देती, इसलिए अपना रास्ता और उसके भाग साफ़ लिखिए।

लकड़ी, जो अब नहीं बची (पृष्ठ 190)

  • जॉन एम. फ्रिट्ज़, जॉर्ज मिशेल और एम. एस. नागराज राव ने वर्षों तक इस स्थान पर काम किया। वे लिखते हैं: "विजयनगर के स्मारकों के अपने अध्ययन में हमें नष्ट हो चुकी लकड़ी की वस्तुओं–स्तंभ, टेक (ब्रेकेट), धरन, भीतरी छत, लटकते हुए छज्जों के अंदरूनी भाग तथा मीनारों–की एक पूरी श्रेणी की कल्पना करनी पड़ती है जो प्लास्टर से सजाए और संभवत: चटकीले रंगों से चित्रित थे।"
  • लकड़ी की संरचनाएँ अब नहीं हैं, केवल पत्थर की संरचनाएँ बची हैं। फिर भी यात्रियों के छोड़े विवरण उस समय के भरे-पूरे जीवन के कुछ पहलू फिर से जोड़ने में मदद करते हैं।

Checkpoint

  1. 1किताब के अनुसार 1976 में हम्पी को कौन-सी मान्यता मिली?

  2. 2हम्पी का विस्तृत मानचित्र बनाने का पहला चरण क्या था?

  3. 3हम्पी में पुराने बाज़ारों और सड़कों की जगह किस आधार पर पहचानी गई?

  4. 4फ्रिट्ज़, मिशेल और नागराज राव के अनुसार विजयनगर के स्मारकों के अध्ययन में किसकी कल्पना करनी पड़ती है?

7उत्तरों की खोज में प्रश्न

इस पड़ाव का सवाल

भवन हमें क्या बताते हैं, और कौन-सी बातें उनसे पता नहीं चलतीं?

पिछली बात से कड़ी नक्शों और योजनाओं के बाद अब उन प्रश्नों की बारी जिनके उत्तर अभी खोजे जा रहे हैं।

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 9

बचे हुए भवन बहुत कुछ बताते हैं, पर सब कुछ नहीं। इस पड़ाव में पहले यात्रियों के शब्दों में विजयनगर के बाज़ार देखिए, फिर सोचिए कि भवन हमें क्या बताते हैं और किन प्रश्नों पर चुप रहते हैं।

पृष्ठ 191–192

स्रोत 5: बाज़ार (पृष्ठ 191)

डोमिंगो पेस बाज़ार का एक सजीव विवरण देता है। एक चौड़ी और सुंदर गली में कई व्यापारी रहते थे, और वहाँ "सभी प्रकार के माणिक्य, और हीरे, और पन्ने, और मोती, और छोटे मोती, और वस्त्र, और पृथ्वी पर होने वाली हर वस्तु" मिलती थी।

हर शाम वहाँ एक मेला लगता था। उसमें साधारण घोड़े और टट्टू, तुरंज, नींबू, संतरे, अंगूर, बगीचों में उगने वाली हर तरह की चीज़ें और लकड़ी मिलती थी।

पेस विजयनगर को "विश्व के सबसे अच्छे संभरण वाले शहर" कहता है। उसके अनुसार बाज़ार "चावल, गेहूँ, अनाज, भारतीय मकई और कुछ मात्रा में जौ तथा सेम, मूँग, दालें, काला चना जैसे खाद्य पदार्थों से भरे रहते थे", और ये सब सस्ते दामों पर और प्रचुर मात्रा में मिलते थे।

फर्नाओ नूनिज़ के अनुसार विजयनगर के बाज़ार "प्रचुर मात्रा में फलों, अंगूरों और संतरों, नींबू, अनार, कटहल तथा आम से भरे रहते थे और सभी बहुत सस्ते।"

बाज़ारों में मांस भी बड़ी मात्रा में बिकता था। नूनिज़ के अनुसार बिसनग (विजयनगर) के बाज़ारों में "भेड़–बकरी का मांस, सूअर, मृगमांस, तीतर–मांस, खरगोश, कबूतर, बटेर और सभी प्रकार के पक्षी, चिड़ियाँ, चूहे तथा बिल्लियाँ और छिपकलियाँ" बिकती थीं।

पुरानी तस्वीर: खुले मैदान में पत्थर के खंडहर, पीछे चट्टानी पहाड़ियाँ

तस्वीर: 1868 में एडमंड लायन का लिया फ़ोटो: हम्पी में विरुपाक्ष मन्दिर के सामने के बाज़ार के खंडहर।

Edmund David Lyon (British Library). Public domain. Image: Wikimedia Commons.

किसने क्या लिखा? हर चीज़ उस यात्री के खाने में रखिए जिसके वर्णन में वह आती है (स्रोत 5, पृष्ठ 191)

हर कार्ड को सही खाने में रखिए।

भवन क्या बताते हैं, और क्या नहीं? हर बात सही खाने में रखिए (पृष्ठ 191–192)

हर कार्ड को सही खाने में रखिए।

भवनों के चिह्न कैसे पढ़ें (पृष्ठ 191)

  • भवन वे विचार ज़ाहिर करते हैं जो बनवाने वाले या प्रश्रयदाता (संरक्षक) व्यक्त करना चाहते थे।
  • वे अकसर ऐसे चिह्नों से भरे रहते हैं जो उनके सांस्कृतिक संदर्भ से आते हैं। इन्हें हम तब समझ पाते हैं, जब दूसरे स्रोतों, जैसे "साहित्य, अभिलेखों तथा लोकप्रचलित परंपराओं", से मिली जानकारी साथ जोड़ें।

जिन प्रश्नों के उत्तर भवन नहीं देते (पृष्ठ 192)

  • सामान्य लोग: क्या वे मूर्ति के सामने से तेज़ी से निकल जाते, या रुककर उसके जटिल प्रतीक चित्रण को समझने का प्रयास करते? और जिन लोगों ने इन विशाल निर्माणों पर श्रम किया, वे इनके बारे में क्या सोचते थे?
  • बनाने वाले: क्या बनेगा, कहाँ बनेगा, कौन-सा माल लगेगा और किस शैली में बनेगा, ये निर्णय शासक लेते थे। पर इतने बड़े कामों का विशेष ज्ञान किसके पास था? राजगीर, पत्थर काटने वाले और मूर्तिकार कहाँ से आते थे? क्या उन्हें युद्ध के दौरान पड़ोसी क्षेत्रों से बंदी बनाकर लाया जाता था?
  • देखरेख और माल: निर्माण का अधीक्षण कौन करता था, और कच्चा माल कैसे और कहाँ से लाया जाता था?

कृष्णदेव राय: मूर्ति और यात्री का वर्णन (बॉक्स, पृष्ठ 192)

  • तमिलनाडु में चिदम्बरम के मन्दिर के गोपुरम् में कृष्णदेव राय की एक सुंदर प्रतिमा रखी है। किताब उसका चित्र और पेस का वर्णन साथ रखकर "परिदृश्य की कुछ समस्याओं" को फिर से याद दिलाती है: एक ही राजा अलग-अलग स्रोतों में अलग दिखता है।
  • मूर्ति के बारे में किताब कहती है: "स्वाभाविक है कि शासक इसी रूप में अपने आप को प्रस्तुत करना चाहता था।"
  • और डोमिंगो पेस राजा का वर्णन कुछ इस प्रकार करता है: "मझला कद, गोरा रंग और अच्छी काठी, कुछ मोटा, राजा के चेहरे पर चेचक के दाग़ हैं।"
पुरानी श्वेत-श्याम तस्वीर: खड़ी हुई काँसे की तीन मूर्तियाँ

तस्वीर: तिरुमला (आंध्र प्रदेश) के वेंकटेश्वर मन्दिर में राजा कृष्णदेव राय और उनकी रानियों चिन्ना देवी और तिरुमला देवी की काँसे की मूर्तियाँ। यह कृष्णदेव राय की एक दूसरी मूर्ति है।

The Tirupati Devasthanam Epigraphical Report (1930). Public domain. Image: Wikimedia Commons.

चर्चा कीजिए

आपका लिखा इसी ब्राउज़र में रहता है।

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए

सोचने के लिए:

  • मूर्ति: किताब के अनुसार शासक "इसी रूप में अपने आप को प्रस्तुत करना चाहता था", यानी मूर्ति वह छवि दिखाती है जो राजा दिखाना चाहता था।
  • पेस का वर्णन: यह एक विदेशी यात्री की नज़र है। वह कद, रंग, काठी और चेचक के दाग़ जैसी बातें लिखता है, जो मूर्ति बनवाने वाला शायद न दिखाना चाहे।
  • इसलिए किसी एक स्रोत को पूरी तस्वीर मत मानिए; दोनों को मिलाकर, और यह पूछकर पढ़िए कि किसने, किसके लिए और क्यों बनाया या लिखा।

(पृष्ठ 192)

किताब के अपने प्रश्न

9अध्याय के विभिन्न विवरणों से आप विजयनगर के सामान्य लोगों के जीवन की क्या छवि पाते हैं?

लगभग 250 से 300 शब्द · पृष्ठ 175–181, 188, 191–192

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • भूमिका: अध्याय के विवरण, खासकर विदेशी यात्रियों के वृत्तांत, सामान्य लोगों के जीवन की कुछ झलक देते हैं; पर किताब साफ़ कहती है कि बहुत-सी बातें हम नहीं जानते।
  • घर और मुहल्ले: शहरी केंद्र में सामान्य लोगों के आवासों के अपेक्षाकृत कम पुरातात्विक साक्ष्य हैं। सोलहवीं शताब्दी के पुर्तगाली यात्री बरबोसा के अनुसार लोगों के घर छप्पर के थे, पर सुदृढ़, और व्यवसाय के आधार पर खुले स्थानों वाली लंबी गलियों में बसे थे।
  • अमीर मुहल्ले: शहरी केंद्र के उत्तर-पूर्वी कोने जैसे स्थानों में परिष्कृत चीनी मिट्टी मिली; हो सकता है वहाँ अमीर व्यापारी रहते हों; यह मुस्लिम रिहायशी मुहल्ला भी था, जहाँ मक़बरे और मस्ज़िदें थीं।
  • पानी, खेती और पूजा: कुएँ, बरसात के पानी वाले जलाशय और मन्दिरों के जलाशय संभवत: सामान्य नगर निवासियों के पानी के स्रोत थे। दीवारों के बीच जुते हुए खेत, बग़ीचे और आवास थे। बहुत से पूजा स्थल और छोटे मन्दिर विविध संप्रदायों की ओर संकेत करते हैं, जो संभवत: अलग-अलग समुदायों द्वारा संरक्षित थे।
  • बाज़ार और भोजन: पेस (स्रोत 5) एक चौड़ी गली का वर्णन करता है जहाँ माणिक्य, हीरे, मोती और वस्त्र बिकते थे, और हर शाम मेला लगता था; उसके अनुसार चावल, गेहूँ और दालें सस्ते और प्रचुर थे। नूनिज़ के अनुसार फल सस्ते और प्रचुर थे, और मांस भी बड़ी मात्रा में बिकता था। रथ गलियों के दोनों ओर के मण्डपों में व्यापारी दुकानें लगाते थे।
  • श्रम, कर और उत्सव: स्रोत 4 में पेस ने कृष्णदेव राय के जलाशय पर "पन्द्रह से बीस हज़ार आदमी" काम करते देखे। अमर-नायक किसानों, शिल्पकर्मियों और व्यापारियों से भू राजस्व और अन्य कर वसूलते थे। महानवमी पर नृत्य, कुश्ती प्रतिस्पर्धा और शोभायात्राएँ होती थीं।
  • जो हम नहीं जानते: सामान्य लोग इन भवनों के बारे में क्या सोचते थे, क्या वे शाही या धार्मिक केंद्र के किसी भाग में जा सकते थे, और राजगीर, पत्थर काटने वाले और मूर्तिकार कहाँ से आते थे और उन्हें कैसा वेतन मिलता था: भवनों को देखने मात्र से इनके उत्तर नहीं मिलते।
  • निष्कर्ष: छवि एक भरे-पूरे व्यापारिक शहर की है, जहाँ सस्ता भोजन, कई संप्रदाय और भारी श्रम करने वाले लोग थे। पर यह छवि ज़्यादातर बाहर से आए यात्रियों की आँखों से बनी है, सामान्य लोगों की अपनी आवाज़ में नहीं।

Checkpoint

  1. 1डोमिंगो पेस विजयनगर को किस रूप में बताता है?

  2. 2किताब के अनुसार किसी शहर की क़िलेबंदी के अध्ययन से हम क्या समझ सकते हैं?

  3. 3किताब के अनुसार भवन देखकर किस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता?

सार और काल-रेखा

इस पड़ाव का सवाल

पूरे अध्याय को एक नज़र में कैसे याद रखें?

पिछली बात से कड़ी प्रश्नों के बाद अब पूरे अध्याय को काल-रेखा और मानचित्र पर एक साथ देखिए।

इस पड़ाव के आख़िर में: प्रश्न 10–12

अध्याय एक नज़र में

  • विजयनगर, यानी "विजय का शहर", एक शहर का नाम भी था और एक साम्राज्य का भी। परंपरा और अभिलेखीय साक्ष्यों के अनुसार हरिहर और बुक्का ने इस साम्राज्य की स्थापना 1336 में की; किताब की काल-रेखा में यह तिथि प्रश्नचिह्न के साथ छपी है, यानी अनिश्चित है (पृष्ठ 170–171, 193)।
  • विजयनगर पर कई वंशों ने राज किया: संगम वंश का नियंत्रण 1485 तक रहा, फिर सुलुवों ने 1503 तक शासन किया, फिर तुलुव आए, और 1542 तक केंद्र पर नियंत्रण अराविदु वंश के हाथ में चला गया (पृष्ठ 173)।
  • कृष्णदेव राय ने 1509 से 1529 तक शासन किया। 1512 में रायचूर दोआब हासिल हुआ, 1514 में उड़ीसा के शासकों का दमन हुआ और 1520 में बीजापुर के सुल्तान की हार हुई (पृष्ठ 173)।
  • 1565 में राक्षसी–तांगड़ी (तालीकोटा) के युद्ध में प्रधानमंत्री रामराय के नेतृत्व में विजयनगर की सेना बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुण्डा की संयुक्त सेनाओं से हारी, और शहर लूटा गया (पृष्ठ 173)।
  • अमर–नायक प्रणाली विजयनगर की एक प्रमुख राजनीतिक खोज थी, पर ऐसा प्रतीत होता है कि इसके कई तत्त्व दिल्ली सल्तनत की इक्ता प्रणाली से लिए गए (पृष्ठ 175)।
  • विजयनगर की क़िलेबंदी ने खेतों को भी घेरा था: पहली, दूसरी और तीसरी दीवारों के बीच जुते हुए खेत, बग़ीचे और आवास थे। पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में कमलपुरम् जलाशय बना (पृष्ठ 177–178)।
  • राजकीय केंद्र में 60 से भी अधिक मन्दिर थे, और महल के रूप में लगभग तीस संरचनाएँ पहचानी गई हैं। महानवमी डिब्बा या कमल महल जैसी कई संरचनाओं का प्रयोजन आज भी निश्चित नहीं है (पृष्ठ 179–181)।
  • हम्पी में विरुपाक्ष का सबसे प्राचीन मन्दिर नवीं–दसवीं शताब्दियों का है। विट्ठल विष्णु का एक रूप हैं, जो सामान्यत: महाराष्ट्र में पूजे जाते हैं (पृष्ठ 186–187)।
  • 1800 ई. में कॉलिन मैकेन्ज़ी ने हम्पी के भग्नावशेष प्रकाश में लाए और इस स्थान का पहला सर्वेक्षण मानचित्र बनाया। 1980 के दशक के आरंभ से लगभग बीस वर्ष तक पूरे क्षेत्र को 25 वर्गों में बाँटकर उसका प्रलेखन हुआ (पृष्ठ 170, 188–189)।

काल-रेखा 1 की पाँच घटनाएँ: पहले से बाद तक क्रम लगाइए

पृष्ठ 193 की पहली काल-रेखा (महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन) की पाँच घटनाएँ, बिना वर्षों के। सबसे पहले वाली को ऊपर रखिए।

कार्ड ऊपर–नीचे खिसकाकर सही क्रम बनाइए।

▲ सबसे पहले

  1. 1उड़ीसा के गजपति राज्य की स्थापना
  2. 2बाबर द्वारा मुगल साम्राज्य की स्थापना
  3. 3दिल्ली सल्तनत की स्थापना
  4. 4पुर्तगालियों द्वारा गोवा पर विजय
  5. 5विजयनगर साम्राज्य की स्थापना

▼ सबसे बाद में

काल-रेखा 1: महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन (पृष्ठ 193)

लगभग कालघटनाएँ
लगभग 1200-1300 ईसवीदिल्ली सल्तनत की स्थापना (1206)
लगभग 1300-1400 ईसवीविजयनगर साम्राज्य की स्थापना (1336?); बहमनी राज्य की स्थापना (1347); जौनपुर, कश्मीर और मदुरई में सल्तनतें
लगभग 1400-1500 ईसवीउड़ीसा के गजपति राज्य की स्थापना (1435); गुजरात और मालवा की सल्तनतों की स्थापना; अहमदनगर, बीजापुर तथा बेरार सल्तनतों का उदय (1490)
लगभग 1500-1600 ईसवीपुर्तगालियों द्वारा गोवा पर विजय (1510); बहमनी राज्य का विनाश; गोलकुंडा की सल्तनत का उदय (1518); बाबर द्वारा मुगल साम्राज्य की स्थापना (1526)

काल-रेखा 2 की पाँच घटनाएँ: पहले से बाद तक क्रम लगाइए

पृष्ठ 193 की दूसरी काल-रेखा (विजयनगर की खोज व संरक्षण) की पाँच घटनाएँ, बिना वर्षों के। सबसे पहले वाली को ऊपर रखिए।

कार्ड ऊपर–नीचे खिसकाकर सही क्रम बनाइए।

▲ सबसे पहले

  1. 1जॉन मार्शल के अधीन हम्पी में संरक्षण कार्य आरंभ हुआ
  2. 2कॉलिन मैकेन्ज़ी द्वारा विजयनगर की यात्रा
  3. 3यूनेस्को ने हम्पी को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया
  4. 4अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ ने हम्पी के पुरातात्विक अवशेषों के पहले विस्तृत चित्र लिए
  5. 5जे.एफ. फ्लीट ने मन्दिरों की दीवारों के अभिलेखों का प्रलेखन शुरू किया

▼ सबसे बाद में

काल-रेखा 2: विजयनगर की खोज व संरक्षण की मुख्य घटनाएँ (पृष्ठ 193)

वर्षघटना
1800कॉलिन मैकेन्ज़ी द्वारा विजयनगर की यात्रा
1856अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ ने हम्पी के पुरातात्विक अवशेषों के पहले विस्तृत चित्र लिए
1876पुरास्थल की मंदिर की दीवारों के अभिलेखों का जे.एफ. फ्लीट द्वारा प्रलेखन आरंभ
1902जॉन मार्शल के अधीन संरक्षण कार्य आरंभ
1986हम्पी को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया जाना यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में हम्पी
Sanskriti Yatra: Hampi World HeritagePlayलगभग 27 मिनट
Sansad TV: हम्पी पर संसद टीवी के कार्यक्रम 'संस्कृति यात्रा' का एक अंकWatch on YouTube
पत्थर की एक पुरानी इमारत के मेहराबदार हिस्से

तस्वीर: हम्पी में "रानी का स्नानघर" कहलाने वाली इमारत का एक भाग।

Rupeshsarkar, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

⚠️ ये ग़लतियाँ मत कीजिए

ग़लतीसही बातपृष्ठ
"विजयनगर साम्राज्य" को उस समय का नाम माननायह इतिहासकारों का शब्द है; समकालीन लोग इसे कर्नाटक साम्राज्यमु कहते थेपृष्ठ 171
1336 को पक्की तिथि माननाकाल-रेखा 1 में "1336?" छपा है; प्रश्नचिह्न अनिश्चित तिथि बताता हैपृष्ठ 171, 193
हम्पी की जानकारी को केवल मैकेन्ज़ी की अपनी खोज माननामैकेन्ज़ी की शुरुआती जानकारी विरुपाक्ष मंदिर और पम्पादेवी के पूजास्थल के पुरोहितों की स्मृतियों पर आधारित थीपृष्ठ 170
सुलुवों को संगम वंश की ही एक शाखा माननासुलुव सैनिक कमांडर थे, जिन्होंने संगम वंश को उखाड़ फेंका और 1503 तक शासन कियापृष्ठ 173
1565 में रामराय को राजा लिखनारामराय विजयनगर के प्रधानमंत्री थे; सेना उनके नेतृत्व में राक्षसी–तांगड़ी (तालीकोटा) में हारीपृष्ठ 173
यह लिखना कि विजयनगर और सुल्तानों के संबंध हमेशा शत्रुतापूर्ण रहेधार्मिक भिन्नताओं के बावजूद संबंध हमेशा शत्रुतापूर्ण नहीं थे: कृष्णदेव राय ने सल्तनतों के दावेदारों का समर्थन किया, और उनकी मृत्यु के बाद बीजापुर के सुल्तान ने उत्तराधिकार विवाद सुलझाने में हस्तक्षेप कियापृष्ठ 174
अमर–नायक प्रणाली को पूरी तरह विजयनगर की नई चीज़ लिखनायह विजयनगर की एक प्रमुख राजनीतिक खोज थी, पर ऐसा प्रतीत होता है कि इसके कई तत्त्व दिल्ली सल्तनत की इक्ता प्रणाली से लिए गएपृष्ठ 175
खेतों को शहर की दीवारों के बाहर माननाक़िलेबंदी ने खेतों को भी घेरा था; पहली, दूसरी और तीसरी दीवारों के बीच जुते हुए खेत, बग़ीचे और आवास थेपृष्ठ 177–178
हिरिया नहर को पक्के तौर पर संगम राजाओं की बनवाई लिखनाकिताब कहती है कि इसे संभवत: संगम वंश के राजाओं ने बनवायापृष्ठ 177
राजकीय केंद्र में केवल महल माननावहाँ 60 से भी अधिक मन्दिर थे; महल के रूप में लगभग तीस संरचनाएँ पहचानी गई हैंपृष्ठ 179
"राजा का भवन", सभा मंडप, महानवमी डिब्बा या कमल महल का काम पक्का मानकर लिखनाइनका प्रयोजन निश्चित नहीं है; किताब के अनुसार राजकीय केंद्र की कई संरचनाएँ आज भी पहेली हैंपृष्ठ 180–181
"कमल महल" को उसका पुराना नाम माननायह नाम उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों ने दिया थापृष्ठ 181
विट्ठल को शिव का रूप लिखनाविट्ठल विष्णु का एक रूप हैं, जो सामान्यत: महाराष्ट्र में पूजे जाते हैंपृष्ठ 187

मानचित्र: प्रश्न 10 के चार देश (पृष्ठ 195)

हर देश का बिंदु उस देश के भीतर लगभग किसी एक जगह पर है, जैसा प्रश्न "सन्निकटता से" अंकित करने को कहता है। साथ में कालीकट (कोज़ीकोड), गोवा और विजयनगर (हम्पी) के बिंदु हैं।

इटलीपुर्तगालईरानरूसकालीकट (कोज़ीकोड)गोवाविजयनगर (हम्पी)

हर देश से विजयनगर आने वाले यात्री (पृष्ठ 176)

  • इटली: निकोलो दे कॉन्ती, इतालवी व्यापारी, पंद्रहवीं शताब्दी।
  • ईरान: अब्दुर रज़्ज़ाक, फ़ारस के राजा का दूत, पंद्रहवीं शताब्दी; उसे कालीकट (कोज़ीकोड) भेजा गया था (पृष्ठ 177)।
  • रूस: अफ़ानासी निकितिन, रूस का व्यापारी, पंद्रहवीं शताब्दी।
  • पुर्तगाल: फर्नाओ नूनिज़ और दुआर्ते बरबोसा, दोनों सोलहवीं शताब्दी के पुर्तगाली यात्री; डोमिंगो पेस भी सोलहवीं शताब्दी में आया (पृष्ठ 179)।

मार्ग: इन यात्रियों के मार्ग अध्याय में नहीं दिए गए हैं, इसलिए रेखाचित्र पर कोई मार्ग नहीं खींचा गया। मार्गों के लिए एटलस या अपने अध्यापक की मदद लीजिए। इतना जोड़ सकते हैं कि पुर्तगाली 1498 ई. से उपमहाद्वीप के पश्चिमी तट पर आने लगे थे (पृष्ठ 172); कालीकट और गोवा इसी पश्चिमी तट पर हैं।

रेखाचित्र, पैमाना नहीं दिया गया है।

इसमें सिर्फ़ समुद्र तट दिखाए गए हैं, देशों की सीमाएँ नहीं।

Coastlines: Natural Earth (public domain). Places at their Wikipedia coordinates.

किताब के अपने प्रश्न

10विश्व के सीमारेखा मानचित्र पर इटली, पुर्तगाल, ईरान तथा रूस को सन्निकटता से अंकित कीजिए। उन मार्गों को पहचानिए जिनका प्रयोग पृ. 176 पर उल्लिखित यात्रियों ने विजयनगर पहुँचने के लिए किया था।

मानचित्र कार्य · पृष्ठ 172, 176–177, 179

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • पहले एटलस की मदद से चारों देश अंकित कीजिए, फिर पृष्ठ 176 के यात्रियों को उनके देश से जोड़िए।
  • इटली: निकोलो दे कॉन्ती, इतालवी व्यापारी, पंद्रहवीं शताब्दी।
  • ईरान: अब्दुर रज़्ज़ाक, फ़ारस के राजा का दूत, पंद्रहवीं शताब्दी; पृष्ठ 177 के अनुसार उसे कालीकट (कोज़ीकोड) भेजा गया था।
  • रूस: अफ़ानासी निकितिन, रूस का व्यापारी, पंद्रहवीं शताब्दी।
  • पुर्तगाल: फर्नाओ नूनिज़ (पुर्तगाल का) और दुआर्ते बरबोसा (पृष्ठ 179 पर पुर्तगाली यात्री), दोनों सोलहवीं शताब्दी; डोमिंगो पेस भी सोलहवीं शताब्दी में आया।
  • मार्ग: इन यात्रियों के मार्ग अध्याय में नहीं दिए गए हैं। मार्गों के लिए एटलस या अपने अध्यापक की मदद लीजिए। इतना जोड़ सकते हैं कि पुर्तगाली 1498 ई. से उपमहाद्वीप के पश्चिमी तट पर आने लगे थे; कालीकट और गोवा इसी पश्चिमी तट पर हैं।

11भारतीय उपमहाद्वीप के किसी एक ऐसे प्रमुख शहर के विषय में और जानकारी हासिल कीजिए जो लगभग चौदहवीं–सत्रहवीं शताब्दियों में फला–फूला। शहर के स्थापत्य का वर्णन कीजिए। क्या कोई ऐसे लक्षण हैं जो इनके राजनीतिक केंद्र होने की ओर संकेत करें? क्या ऐसे भवन हैं जो आनुष्ठानिक रूप से महत्त्वपूर्ण हों? कौन–से ऐसे लक्षण हैं जो शहरी भाग को आस–पास के क्षेत्रों से विभाजित करते हैं?

परियोजना कार्य · पृष्ठ 195

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • यह परियोजना आपको स्वयं खोजकर करनी है। नीचे उसका तरीका है।
  • लगभग चौदहवीं–सत्रहवीं शताब्दियों में फला-फूला कोई एक बड़ा शहर चुनिए, और अपने अध्यापक या पुस्तकालय की किताबों से उसकी जानकारी जुटाइए।
  • विजयनगर के अध्याय को ढाँचा बनाइए: नक्शा, दीवारें और प्रवेशद्वार, पानी के प्रबंध, राजकीय भवन, धार्मिक भवन, बाज़ार और सड़कें।
  • प्रश्न के तीनों भागों के उत्तर अलग-अलग लिखिए: राजनीतिक केंद्र होने के लक्षण (महल, सभा भवन, ऊँची दीवारों वाले घेरे); आनुष्ठानिक रूप से महत्त्वपूर्ण भवन; और शहरी भाग को आस-पास से अलग करने वाले लक्षण (क़िलेबंदी, प्रवेशद्वार, नदी या पहाड़ियाँ)।
  • हर बात के साथ लिखिए कि वह किस स्रोत से मिली: यात्रियों के वृत्तांत, अभिलेख, नक्शे या तसवीरें।
  • प्रस्तुति: एक सादा नक्शा या रेखाचित्र, विजयनगर से तुलना की एक तालिका, और अंत में दो-तीन वाक्य कि दोनों शहर कहाँ मिलते हैं और कहाँ अलग हैं।

12अपने आस–पास के किसी धार्मिक भवन को देखिए। रेखाचित्र के माध्यम से छत, स्तंभों, मेहराबों, यदि हों तो, गलियारों, रास्तों, सभागारों, प्रवेशद्वारों, जलआपूर्ति आदि का वर्णन कीजिए। इन सभी की तुलना विरुपाक्ष मन्दिर के अभिलक्षणों से कीजिए। वर्णन कीजिए कि भवन का हर भाग किस प्रयोग में लाया जाता था। इसके इतिहास के विषय में पता कीजिए।

परियोजना कार्य · पृष्ठ 195

जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
  • यह परियोजना आपको स्वयं देखकर करनी है। नीचे उसका तरीका है।
  • अपने आस-पास का कोई धार्मिक भवन चुनिए और उसका एक सादा रेखाचित्र बनाइए; उस पर छत, स्तंभ, मेहराबें (यदि हों), गलियारे, रास्ते, सभागार, प्रवेशद्वार और पानी का प्रबंध अंकित कीजिए।
  • विरुपाक्ष मन्दिर से तुलना की तालिका बनाइए। विरुपाक्ष की ओर ये बातें लिखिए: ऊँचा गोपुरम्, कृष्णदेव राय का बनवाया मण्डप और वह पूर्वी गोपुरम् जिसके निर्माण का श्रेय भी उसे दिया जाता है, स्तंभों वाले सभागार और गलियारे, जलाशय, और पूरे परिसर में छोटा-सा केंद्रीय देवालय।
  • हर भाग के आगे लिखिए कि उसका प्रयोग किस काम के लिए होता है (पूजा, उत्सव, सभा, भोजन या कुछ और); यह वहाँ के लोगों से पूछकर पता कीजिए।
  • इतिहास के लिए पुजारी, प्रबंधक या बुज़ुर्गों से पूछिए, और कोई शिलालेख या स्थापना-पट्ट हो तो उसे पढ़कर लिखिए।

परियोजना कार्य (कोई एक)

और पढ़ना चाहें तो (पृष्ठ 195)

  • बसुंधरा फिलियोजट, विजयनगर; नेशनल बुक ट्रस्ट, न्यू दिल्ली (2006, पुनर्मुद्रण)।
  • जॉर्ज मिशेल, ऑर्किटैक्चर एंड आर्ट ऑफ सदर्न इंडिया; कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, कैम्ब्रिज (1995)।
  • के.ए. नीलकंठ शास्त्री, ए हिस्ट्री ऑफ साउथ इंडिया; ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यू दिल्ली (1955)।
  • बर्टन स्टीन, विजयनगर (द न्यू कैम्ब्रिज हिस्ट्री ऑफ इंडिया, वॉल्यूम 1, पार्ट 2); फाउंडेशन बुक्स, न्यू दिल्ली (1989)।

आख़िरी जाँच

  1. 1पृष्ठ 193 की पहली काल-रेखा में विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की तिथि "1336?" के साथ प्रश्नचिह्न क्यों लगा है?

  2. 2विजयनगर आने वाले इन यात्रियों में से कौन रूस का व्यापारी था?

  3. 31565 में राक्षसी–तांगड़ी (तालीकोटा) के युद्ध में विजयनगर की सेना किसके नेतृत्व में लड़ी?

  4. 4अमर–नायक प्रणाली के बारे में किताब क्या कहती है?