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कक्षा 12 · इतिहास

बंधुत्व, जाति तथा वर्ग

अध्याय 3

भरत चौधरी और वनिता कुमारी ने बनाया · marushala.com

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अध्याय 3 — बंधुत्व, जाति तथा वर्ग · भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1 · कक्षा 12

कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1) · पृष्ठ — 53 से 81

यह पन्ना किसलिए — स्लाइड शो कक्षा में चलाने से पहले एक बार पढ़ लेने के लिए। यहाँ सारी स्लाइड एक के नीचे एक हैं। उद्धरण-चिह्नों के भीतर सिर्फ़ किताब के शब्द हैं, और स्लाइड के ऊपर किताब का पृष्ठ लिखा है। जो बात हमारी है, उसके आगे “हमारी ओर से” लिखा है। प्रोजेक्टर न हो, तो यही पन्ना हाथ में रखकर बोर्ड से पढ़ाइए; हर स्लाइड की बात पाठ योजना के बोर्ड-कार्य में भी है।

बच्चों की आम भूलें शिक्षक संदर्शिका में हैं, और अध्याय की सारी तालिकाएँ रिवीजन नोट्स में। बच्चे ख़ुद पढ़ें, तो उन्हें इंटरैक्टिव अध्याय दीजिए।

कौन-सी स्लाइड किस कालांश में — पाठ योजना के हिसाब से:

पहले यह पढ़िए — ग्रंथ किसने लिखा?

पृष्ठ 53

?

हमारी ओर से: किसी पुराने ग्रंथ में लिखा हो कि लोगों को कैसे रहना चाहिए, तो उस पर भरोसा करने से पहले आप ग्रंथ के बारे में कौन-से सवाल पूछेंगे?

किताब पृष्ठ 53 पर ही याद दिलाती है कि हर ग्रंथ के बारे में पूछिए कि ये ग्रंथ “किसने लिखे, क्या लिखा गया और किनके लिए इनकी रचना हुई”। बच्चों के सवाल बोर्ड पर लिखिए; अभी जाँचने नहीं हैं। कालांश 7 में, जब किताब ग्रंथ को परखने के अपने सवाल रखेगी, इन्हीं से मिलाइए।

कोई ग्रंथ लिख दे कि समाज में ऐसा होना चाहिए, तो क्या हम मान लें कि लोग सचमुच वैसा ही करते थे? पर्ची पर दो पंक्तियाँ लिखिए, और अपना नाम भी लिखिए।

अध्याय का नक्शा

पृष्ठ 53 से 81 · पढ़ाने का क्रम हमारी ओर से

  • पहले महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण: इतिहासकारों ने एक बड़े ग्रंथ का पाठ कैसे तैयार किया
  • फिर परिवार और विवाह: ग्रंथों के नियम, और सातवाहन रानियों जैसे उदाहरण
  • फिर वर्ण और जाति: शास्त्रों में तय ‘जीविका’, अक्षत्रिय राजा, श्रेणियाँ, और चार वर्णों के परे के लोग
  • फिर संपत्ति और प्रतिष्ठा: स्त्री और पुरुष, बौद्ध और तमिल परंपराओं का दूसरा नज़रिया
  • आख़िर में इतिहासकार महाभारत को कैसे पढ़ते हैं, और यह ग्रंथ आज तक कैसे बदलता रहा

हमारी ओर से: पहले दिन की पर्चियाँ लिफ़ाफ़े में सँभालकर रखिए। कालांश 10 में, पूरा अध्याय पढ़ने के बाद, वे हर बच्चे को लौटाई जाएँगी।

1 | शुरुआत: आरंभिक समाज; महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण

एक ही कहानी देश के अलग-अलग भागों में, अलग-अलग लिपियों में लिखी मिले, तो आप कैसे तय करेंगे कि उसका साझा पाठ कौन-सा है?

लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी

पृष्ठ 53

  • परिवार और विवाह
  • वर्ण और जाति
  • संपत्ति और प्रतिष्ठा

यह अध्याय लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी के आरंभिक समाज की बात करता है। हर हिस्से में किताब दो बातें आमने-सामने रखती है: ग्रंथों में तय किए गए मानदंड, और दूसरे साक्ष्य, जो दिखाते हैं कि लोग असल में क्या करते थे। दूसरी कड़ी यह है कि इतिहासकार एक बड़े ग्रंथ, महाभारत, को कैसे पढ़ते हैं।

मानदंड और व्यवहार

पृष्ठ 53, 58

ग्रंथों में तय मानदंड

  • लगभग 500 ई.पू. से ब्राह्मणों ने धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र नाम के संस्कृत ग्रंथों में समाज के लिए आचार संहिताएँ संकलित कीं
  • इनमें सबसे महत्वपूर्ण मनुस्मृति थी, जिसका संकलन लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच हुआ

दूसरे साक्ष्य

  • अभिलेख
  • पालि और तमिल ग्रंथ
  • चीन से आए यात्रियों के विवरण
  • महाभारत की अपनी कहानियाँ

ये दूसरे साक्ष्य दिखाते हैं कि नियमों का पालन हर जगह नहीं होता था। यही दो खाने, “ग्रंथों के अनुसार” और “दूसरे साक्ष्य”, पूरे अध्याय में चार्ट पेपर पर और बच्चों की कॉपी में चलेंगे। हर नया स्रोत बच्चे किसी एक खाने में रखें।

महाभारत: एक लाख श्लोकों से अधिक

पृष्ठ 53

  • अपने वर्तमान रूप में एक लाख श्लोकों से अधिक का महाकाव्य
  • इसकी रचना लगभग 500 ई.पू. से एक हज़ार वर्ष तक होती रही
  • इतिहासकार इसे इसकी भाषा, विषयवस्तु, लेखकों, तिथियों और पुरातत्व के साक्ष्य के साथ मिलाकर पढ़ते हैं

इस अध्याय के बहुत से स्रोत महाभारत से हैं। कालांश 7 और 8 में बच्चे देखेंगे कि इतिहासकार महाभारत को कैसे परखते हैं; आज केवल यह देखिए कि इतना बड़ा ग्रंथ पढ़ने लायक़ एक पाठ में कैसे आया।

समालोचनात्मक संस्करण: 1919 से

पृष्ठ 54

  • 1919 में प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में अनेक विद्वानों ने यह ज़िम्मा उठाया
  • देश के विभिन्न भागों से विभिन्न लिपियों में लिखी महाभारत की संस्कृत पांडुलिपियाँ इकट्ठी की गईं
  • सभी पांडुलिपियों के श्लोकों की तुलना की गई, और वे श्लोक चुने गए जो लगभग सभी पांडुलिपियों में मिले

नतीजा: 13,000 पृष्ठों में फैले अनेक ग्रंथ खंड। परियोजना पूरी होने में सैंतालीस वर्ष लगे। बच्चों से पूछिए कि सैंतालीस वर्ष क्यों लगे होंगे; उत्तर (हमारी ओर से): पांडुलिपियाँ देश भर में बिखरी थीं, अलग-अलग लिपियों में थीं, और हर श्लोक का मिलान करना था।

पांडुलिपियों से दो बातें उभरीं

पृष्ठ 54

बातकिताब में
समानताउत्तर में कश्मीर और नेपाल से दक्षिण में केरल और तमिलनाडु तक की सभी पांडुलिपियों के अनेक अंशों में समानता थी
क्षेत्रीय प्रभेदकुछ शताब्दियों में महाभारत के प्रेषण में अनेक क्षेत्रीय प्रभेद (अलग-अलग पाठ) उभरे; ये मुख्य पाठ की पादटिप्पणियों और परिशिष्टों में रखे गए

13,000 पृष्ठों में से आधे से भी अधिक इन्हीं प्रभेदों का ब्योरा देते हैं। किताब के अनुसार ये प्रभेद प्रभावशाली परंपराओं और लचीले स्थानीय विचार और आचरण के बीच संवाद दिखाते हैं, जिसमें “द्वंद्व और मतैक्य” दोनों हैं।

हमारी समझ किन ग्रंथों पर टिकी है

“जो संस्कृत में ब्राह्मणों द्वारा उन्हीं के लिए लिखे गए”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 54

इन प्रक्रियाओं की हमारी समझ मुख्यत: ऐसे ही ग्रंथों पर टिकी है। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों ने पहले मान लिया कि जो लिखा है, वैसा ही व्यवहार में होता होगा। बाद में पालि, प्राकृत और तमिल ग्रंथों के अध्ययन से पता चला कि इन आदर्शों पर प्रश्न भी उठते थे और “यदा-कदा इनकी अवहेलना भी की जाती थी”। यहीं पहले दिन की पर्ची वाला सवाल लौटता है; अभी उत्तर मत बताइए।

2 | बंधुता एवं विवाह: परिवार और पितृवंशिक व्यवस्था (2.1-2.2)

परिवार में किसे अपना संबंधी माना जाए, क्या यह हर समाज में एक जैसा होता है?

परिवारों के बारे में कैसे जानें

पृष्ठ 55

  • परिवार एक बड़े समूह का हिस्सा होते हैं, जिन्हें हम संबंधी कहते हैं
  • पारिवारिक रिश्ते ‘नैसर्गिक’ और रक्त संबद्ध माने जाते हैं, पर इनकी परिभाषा हर समाज में अलग है
  • कुछ समाजों में चचेरे, मौसेरे भाई-बहन से खून का रिश्ता माना जाता है, कुछ में नहीं

आरंभिक समाजों में विशिष्ट परिवारों की जानकारी आसानी से मिल जाती है, पर सामान्य लोगों के पारिवारिक संबंधों को पुनर्निर्मित करना मुश्किल है। इसलिए इतिहासकार परिवार और बंधुता के विचारों का भी अध्ययन करते हैं, क्योंकि इनसे लोगों की सोच का पता चलता है।

ज़रूरी शब्द

पृष्ठ 55

शब्दमतलब
कुलसंस्कृत ग्रंथों में परिवार के लिए शब्द
ज्ञातिबांधवों का बड़ा समूह
वंशकिसी कुल के पीढ़ी-दर-पीढ़ी के पूर्वज, जो इकट्ठे रूप में एक ही वंश के माने जाते हैं
पितृवंशिकतावह वंश परंपरा जो पिता से पुत्र, फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि से चलती है
मातृवंशिकतावह वंश परंपरा जो माँ से जुड़ी होती है

हिंदी किताब के बॉक्स में यहाँ ‘जाति’ छपा है; यह शब्द ज्ञाति (बांधवों का बड़ा समूह) है, वर्ण व्यवस्था वाली जाति नहीं। बोर्ड पर ज्ञाति ही लिखिए, ताकि बच्चे इसे भाग 3 वाली जाति से न मिलाएँ।

महाभारत: बंधुता के रिश्तों में बदलाव की कहानी

पृष्ठ 55

  • कुरु वंश के बांधवों के दो दल, कौरव और पांडव, भूमि और सत्ता के लिए लड़े
  • युद्ध में पांडव जीते, और उसके बाद पितृवंशिक उत्तराधिकार उद्घोषित किया गया
  • पितृवंशिकता महाकाव्य की रचना से पहले भी थी, पर महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इस आदर्श को और सुदृढ़ किया

इस आदर्श में पुत्र पिता की मृत्यु के बाद उनके संसाधनों पर, और राजाओं के मामले में सिंहासन पर भी, अधिकार जमा सकते थे।

पितृवंशिकता में विभिन्नता

पृष्ठ 55

  • अधिकतर राजवंश, लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से, पितृवंशिकता का अनुसरण करते थे
  • पुत्र न होने पर कभी एक भाई दूसरे का उत्तराधिकारी बनता
  • कभी बंधु-बांधव सिंहासन पर अधिकार जमाते
  • कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियाँ सत्ता का उपभोग करती थीं

यह झुकाव केवल शासक परिवारों का नहीं था। ऋग्वेद जैसे कर्मकांडीय ग्रंथ के मंत्रों में भी यह दिखता है, और संभव है कि धनी वर्ग के पुरुष भी यही दृष्टिकोण रखते थे। अगली स्लाइड वही मंत्र है।

स्रोत 1: ऋग्वेद का एक मंत्र

“उत्तम पुत्र हों”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 56 (स्रोत 1)

यह मंत्र संभवत: लगभग 1000 ई.पू. में ऋग्वेद में जोड़ा गया। विवाह संस्कार में पुरोहित इसे पढ़ता था, और आज भी अनेक हिंदू विवाह संस्कारों में इसका प्रयोग होता है। इसमें कामना है कि इंद्र के अनुग्रह से वधू के उत्तम पुत्र हों। मंत्र में ‘यहाँ’ और ‘वहाँ’ से मतलब पिता और पति के घर से है।

पृष्ठ 56 का प्रश्न पूछिए: इस मंत्र में विवाह का वधू और वर के लिए क्या अभिप्राय है; क्या दोनों के लिए अर्थ समान है या भिन्न? उत्तर (हमारी ओर से): दोनों के लिए अर्थ अलग है।

  • वधू के लिए: उसे ‘यहाँ’ (पिता के घर) से मुक्त करके ‘वहाँ’ (पति के घर) मज़बूती से स्थापित किया जाता है, यानी पिता का घर छोड़कर पति के घर जाना। उसके लिए पति के प्रेम के सौभाग्य की कामना भी है।
  • वर के लिए: कामना है कि वधू के उत्तम पुत्र हों, यानी वर का वंश आगे बढ़े।

दोनों अभिप्राय समान नहीं: वधू का घर और जीवन बदलता है, जबकि वर के लिए विवाह पुत्र और वंश से जुड़ा है।

स्रोत 2: दुर्योधन का तर्क

“उनके बाद उनके पुत्र, पौत्र और फिर प्रपौत्र इस पैतृक संपत्ति के अधिकारी हो जाएँगे”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 57 (स्रोत 2, आदिपर्वन् से)

दुर्योधन यह बात अपने पिता धृतराष्ट्र से कहता है: अगर पांडव पांडु से विरासत पाते हैं, तो गद्दी आगे उन्हीं के वंश में जाएगी। किताब कहती है कि ऐसे उद्धरण अक्षरश: सत्य न भी हों, तो भी बताते हैं कि ग्रंथ लिखने वाले क्या सोचते थे; कभी-कभी इनमें परस्पर विरोधी विचार भी मिलते हैं।

पृष्ठ 57 का प्रश्न पूछिए: स्रोत 2 के अनुसार राजा बनने के मूल तत्व क्या थे, और कुल में जन्म का कितना महत्व था? उत्तर (हमारी ओर से): स्रोत 2 में ये आधार दिखते हैं।

  • शारीरिक पूर्णता: धृतराष्ट्र नेत्रहीन थे, इसलिए अनुज पांडु सिंहासन पर बैठे; दुर्योधन भी पिता की “अपूर्णता” की बात करता है।
  • उम्र: पांडु की मृत्यु के बाद धृतराष्ट्र राजा बने, क्योंकि सब राजकुमार अल्पवयस्क थे।
  • योग्यता और जनता का समर्थन: नागरिक पांडवों को चाहते थे, क्योंकि वे “अधिक योग्य और सदाचारी” थे।
  • पिता से विरासत: दुर्योधन का तर्क कि गद्दी पिता से पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र को जाती है।

सारे दावेदार कुरु वंश के हैं, इसलिए उस कुल में जन्म पहली शर्त थी; झगड़ा इस पर है कि कुल की कौन-सी शाखा राज करे। कौन-सा आधार उचित लगता है, यह बच्चे कारण के साथ ख़ुद लिखें।

2 | बंधुता एवं विवाह: विवाह के नियम, स्त्री का गोत्र, माताएँ (2.3-2.5)

विवाह का निर्णय कौन ले, यह नियम किसी ग्रंथ में लिखा हो, तो क्या सब लोग उसे मानते होंगे?

बहिर्विवाह और कन्यादान

पृष्ठ 57

  • पितृवंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्र महत्वपूर्ण थे
  • पुत्रियों का विवाह अपने गोत्र से बाहर करना अपेक्षित था; इसे बहिर्विवाह पद्धति कहते हैं
  • ऊँची प्रतिष्ठा वाले परिवारों की कम उम्र की कन्याओं और स्त्रियों का जीवन बहुत सावधानी से नियमित किया जाता था, ताकि ‘उचित’ समय पर ‘उचित’ व्यक्ति से उनका विवाह हो
  • कन्यादान को पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया

बोर्ड पर चार शब्द साथ में लिखिए: बहिर्विवाह (गोत्र से बाहर विवाह), अंतर्विवाह (समूह के भीतर ही विवाह), बहुपत्नी प्रथा और बहुपति प्रथा। ये चारों किताब के पृष्ठ 57 पर हैं।

नियम क्यों लिखे गए

पृष्ठ 58

  • नए नगरों के उद्भव से सामाजिक जीवन जटिल हुआ और विचारों का आदान-प्रदान बढ़ा
  • संभवत: इस वजह से आरंभिक विश्वासों और व्यवहारों पर प्रश्न उठे
  • जवाब में ब्राह्मणों ने विस्तृत आचार संहिताएँ बनाईं: लगभग 500 ई.पू. से धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र
  • इनमें सबसे महत्वपूर्ण मनुस्मृति, जो लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच संकलित हुई

किताब “संभवत:” लिखती है; बच्चे भी उत्तर में यही शब्द रखें।

ब्राह्मणों का प्रभाव कितना था

“सार्वभौमिक कदापि नहीं था”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 58

ब्राह्मण लेखक मानते थे कि उनका दृष्टिकोण सार्वभौमिक है, पर वास्तविक सामाजिक संबंध कहीं अधिक जटिल थे। क्षेत्रीय विभिन्नता और संचार की बाधाओं के कारण उनका प्रभाव हर जगह नहीं था। यह वाक्य बोर्ड के कोने में लिख दीजिए; अध्याय के अंत तक इसके कई उदाहरण आएँगे।

विवाह के आठ प्रकार

पृष्ठ 58

पहले चार: ‘उत्तम’ माने गए

  • स्रोत 3 की पहली पद्धति: पिता सजी हुई कन्या का दान उस वेदज्ञ वर को करता है जिसे उसने स्वयं बुलाया हो
  • चौथी पद्धति: पिता वर-वधू को साथ मिलकर दायित्व निभाने को कहकर कन्या का दान करता है

बाकी चार: निंदित माने गए

  • पाँचवीं पद्धति: वर, वधू के बांधवों को और वधू को यथेष्ट धन देकर वधू पाता है
  • छठी पद्धति: स्त्री और पुरुष अपनी इच्छा से मिलते हैं

धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र आठों प्रकारों को स्वीकृति देते हैं। संभव है कि निंदित पद्धतियाँ उन लोगों में चलती थीं जो ब्राह्मणीय नियमों को नहीं मानते थे।

पृष्ठ 58 का प्रश्न पूछिए: हर पद्धति में विवाह का निर्णय किसने लिया? उत्तर (हमारी ओर से): स्रोत 3 की चारों पद्धतियाँ देखिए।

  • पहली: वधू का पिता; वह स्वयं वेदज्ञ वर को आमंत्रित करके कन्या का दान करता है।
  • चौथी: वधू का पिता; वह वर-वधू को संबोधित करके और वर का सम्मान करके कन्या का दान करता है।
  • पाँचवीं: वर; वह वधू के बांधवों को और स्वयं वधू को यथेष्ट धन देकर वधू प्राप्त करता है। धन वधू के बांधवों को भी जाता है, इसलिए वे भी इसमें शामिल हैं।
  • छठी: वधू और वर दोनों; यह स्त्री और पुरुष का अपनी इच्छा से संयोग है।

किसी भी पद्धति में वर के पिता का नाम नहीं आता।

स्त्री का गोत्र: नियम और सातवाहन रानियाँ

पृष्ठ 58–60

ब्राह्मणीय नियम

  • लगभग 1000 ई.पू. के बाद से लोगों को, खासतौर से ब्राह्मणों को, गोत्रों में बाँटने की पद्धति चली
  • हर गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर था, और उसके सदस्य उस ऋषि के वंशज माने जाते थे
  • विवाह के बाद स्त्री पिता के नहीं, पति के गोत्र की मानी जाती थी
  • एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं कर सकते थे

सातवाहन रानियाँ

  • रानियों के नाम गौतम और वसिष्ठ गोत्रों से बने थे, जो उनके पिता के गोत्र थे
  • विवाह के बाद भी उन्होंने पति कुल का गोत्र अपनाने के बजाय पिता का गोत्र नाम ही रखा
  • कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं, जो बहिर्विवाह के नियम के विरुद्ध था

सातवाहन पश्चिमी भारत और दक्कन के कुछ भागों के शासक थे, लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ईसवी तक। इनके कई अभिलेखों से इतिहासकारों ने पारिवारिक और वैवाहिक रिश्तों का खाका बनाया है। रानियों का उदाहरण अंतर्विवाह, यानी बंधुओं में विवाह, का है, जिसका प्रचलन किताब के अनुसार दक्षिण भारत के कई समुदायों में भी है; ममेरे, चचेरे भाई-बहनों से विवाह के कारण एक सुगठित समुदाय उभर पाता था।

स्रोत 4: माँ के नाम से पहचाने गए राजा

पृष्ठ 59

  • सातवाहन राजाओं के नामों में राजा की एक जैसी पदवी है
  • अगला शब्द पुत्त (प्राकृत में ‘पुत्र’) पर खत्म होता है
  • गोतमी–पुत्त का अर्थ है ‘गोतमी का पुत्र’
  • गोतमी और वसिथि, गौतम और वशिष्ठ के स्त्रीवाची नाम हैं; ये दोनों वैदिक ऋषि थे जिनके नाम से गोत्र हैं

पृष्ठ 59 का प्रश्न पूछिए: सूची में कितने गोतमी–पुत्त हैं और कितने वसिथि–पुत्त? उत्तर (हमारी ओर से):

  • गोतमी–पुत्त 3 हैं: पहली, तीसरी और सातवीं पंक्ति
  • वसिथि/वसथि–पुत्त 2 हैं: दूसरी और पाँचवीं पंक्ति
  • ये नाम माता के नाम से बने हैं

छपी हिंदी किताब की सूची की पाँचवीं पंक्ति में ‘हरिति–पुत्त’ छपा है; किताब के अंग्रेज़ी संस्करण में यह राजा वसथि–पुत्त चत्तरपन–सातकनि है। हिंदी सूची से गिनें तो वसिथि–पुत्त एक ही आता है।

स्रोत 5: गांधारी की सलाह

“युद्ध में कुछ भी शुभ नहीं होता”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 60 (स्रोत 5)

जब कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध अवश्यंभावी हो गया, तब गांधारी ने अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन से युद्ध न करने की विनती की। दुर्योधन ने माँ की सलाह नहीं मानी, वह युद्ध में लड़ा और हार गया।

पृष्ठ 60 का प्रश्न पूछिए: क्या यह उद्धरण बताता है कि माँ को किस दृष्टि से देखा जाता था? उत्तर (हमारी ओर से): कुछ हद तक।

  • माँ की सलाह: गांधारी कहती है कि संधि करके दुर्योधन पिता, माता और शुभेच्छुकों का सम्मान करेगा। यहाँ माँ एक समझदार सलाहकार के रूप में दिखती है।
  • निर्णय पुत्र का: दुर्योधन ने सलाह नहीं मानी।
  • सावधानी: सातवाहन राजा मातृनाम से जाने जाते थे, फिर भी उनके यहाँ सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक था।

यानी माँ की बात का आदर था, पर अंतिम निर्णय पुत्र का ही रहा; एक उद्धरण से निष्कर्ष सावधानी से निकालिए।

पृष्ठ 60 की चर्चा (आजकल बच्चों का नामकरण कैसे होता है) गृहकार्य में दीजिए: हर बच्चा अपने ही परिवार के पाँच-छह नाम देखे और उनकी तुलना सातवाहन नामों से करे। उपनाम, गोत्र या किसी समुदाय का नाम बोर्ड पर मत लिखवाइए; यह सावधानी हमारी ओर से है।

3 | सामाजिक विषमताएँ: ‘उचित’ जीविका, अक्षत्रिय राजा, जाति और सामाजिक गतिशीलता (3.1-3.3)

किसी ग्रंथ में हर समूह का काम तय लिख दिया जाए, तो क्या लोग सचमुच वही काम करते रहेंगे?

वर्ण: ग्रंथ क्या कहते हैं

पृष्ठ 61

  • धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में एक व्यवस्था का उल्लेख है, जिसमें वर्णों को उनकी योग्यता, कार्य और व्यवसाय, क्षमताओं और रुचियों के आधार पर निर्धारित किया गया था
  • श्रीमद्भगवद् गीता जैसे ग्रंथ भी संकेत करते हैं कि चार वर्णों की व्यवस्था “गुण अथवा विशेषताएँ और कर्म अथवा कार्य” पर आधारित थी, जन्म से तय कोई कठोर व्यवस्था नहीं
  • ऐसे उल्लेख बौद्ध परंपराओं में भी मिलते हैं

इस भाग की हर बात “ग्रंथों के अनुसार” कहकर बोलिए, क्योंकि यह ग्रंथों में लिखा मानदंड है। अगली स्लाइड में यही ग्रंथ हर वर्ण की ‘जीविका’ बताते हैं।

धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में चार वर्णों की ‘जीविका’

पृष्ठ 61

वर्णग्रंथों के अनुसार जीविका
ब्राह्मणवेदों और अन्य शास्त्रों का अध्ययन और अध्यापन, यज्ञ करना और कराना, दान देना और ग्रहण करना
क्षत्रिययुद्ध करना, लोगों की रक्षा, न्याय संचालन; साथ ही वेदों और शास्त्रों का अध्ययन, यज्ञ कराना, दान देना और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना
वैश्यकृषि, पशुपालन और व्यापार; साथ ही वेदों और शास्त्रों का अध्ययन, यज्ञ करना और कराना, दान देना
शूद्रसमाज के सुचारु संचालन में बाकी तीन वर्णों की सहायता

यह तालिका बोर्ड पर “ग्रंथों के अनुसार” वाले खाने में जाती है। आगे की हर स्लाइड में बच्चे देखें कि दूसरे साक्ष्य इससे मेल खाते हैं या नहीं।

स्रोत 6: एक परिवार, तीन काम

पृष्ठ 61

  • ऋग्वेद के एक सूक्त का वक्ता कहता है कि वह स्वयं कवि है
  • उसके पिता वैद्य हैं
  • उसकी माता अन्न पीसने का काम करती हैं

किताब के अनुसार प्रारम्भिक वैदिक समाज में व्यवसायों में लचीलापन दिखता है। बच्चों से पूछिए कि एक ही परिवार में तीन अलग काम होना इस भाग की पहली स्लाइड से कैसे जुड़ता है।

समय के साथ बदलाव: वर्ण और जन्म

पृष्ठ 61, 69, 70

  • ऋग्वेद में चारों वर्णों के नाम एक साथ केवल पुरुषसूक्त में आते हैं, जो सबसे बाद में रचे गए हिस्सों में से एक, दसवें मंडल, में है
  • उत्तर वैदिक काल में ब्राह्मण माने जाने के लिए जन्म ज़रूरी माना जाने लगा, पर ऐसा लगता है कि अकेला जन्म काफ़ी नहीं था: वैदिक कर्मकांड की परंपरा (श्रुति) का ज्ञान भी चाहिए था
  • ब्राह्मण स्वयं को “ब्रह्मा के मुख से जन्मे” और सबसे श्रेष्ठ बताते थे (स्रोत 13, पृष्ठ 70)
  • लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से बौद्धों ने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया (पृष्ठ 69)

बच्चे पूछें कि वर्ण जन्म से तय था या नहीं, तो यह क्रम दिखाइए। उत्तर वैदिक काल वाली बात का स्रोत: IGNOU, इकाई 4।

स्रोत 7: एकलव्य

“कोई भी अर्जुन से बेहतर धनुर्धारी नहीं रहा।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 62 (स्रोत 7, आदिपर्वन् से)

ब्राह्मण द्रोण ने वनवासी निषाद एकलव्य को शिष्य बनाने से मना किया। एकलव्य ने मिट्टी की द्रोण-प्रतिमा को गुरु मानकर अभ्यास किया और तीर चलाने में सिद्धहस्त हो गया। अर्जुन को दिया वचन निभाने के लिए द्रोण ने गुरु दक्षिणा में एकलव्य के दाहिने हाथ का अँगूठा माँग लिया।

पृष्ठ 62 का प्रश्न पूछिए: इस कथा से निषादों और क्षत्रियों को क्या संदेश मिला; क्या द्रोण धर्मसूत्र का अनुसरण कर रहे थे? उत्तर (हमारी ओर से): कथा से ये संदेश निकलते दिखते हैं।

  • निषादों के लिए: राजकुमारों वाली विद्या उनके लिए नहीं है, और अपने अभ्यास से महारत पा लें, तब भी वह छीनी जा सकती है, जैसे एकलव्य का अँगूठा।
  • क्षत्रियों के लिए: उनका स्थान सुरक्षित रखा जाएगा; द्रोण ने अर्जुन को दिया वचन निभाया।
  • द्रोण और धर्मसूत्र: धर्मसूत्रों में ब्राह्मण का मुख्य कर्तव्य वेदों और शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ करना-कराना और दान देना-लेना है, जबकि युद्ध करना क्षत्रियों का कार्य है। लगता है कि धनुर्विद्या सिखाकर द्रोण स्वयं उस नियम से बाहर जा रहे थे जिसे वे एकलव्य पर लागू कर रहे थे।

यानी कथा ग्रंथों में बताए वर्ण-कर्तव्य को एकलव्य पर सख्ती से लागू करती है, जबकि स्वयं द्रोण उससे बाहर थे। कथा पर कोई अभिनय मत कराइए; दोनों खानों में बात स्रोत की हो, बच्चों की नहीं।

राजा कौन हो सकता था

“केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 62

यह शास्त्रों का नियम है। अगली स्लाइड दिखाती है कि अनेक महत्वपूर्ण राजवंश दूसरे वर्णों से निकले। राजनीतिक सत्ता हर वह व्यक्ति पा सकता था जो समर्थन और संसाधन जुटा सके।

अक्षत्रिय राजा

पृष्ठ 62–63

राजवंशकिताब में
मौर्यबाद के बौद्ध ग्रंथ उन्हें क्षत्रिय बताते हैं, जबकि ब्राह्मणीय शास्त्र उन्हें ‘निम्न’ कुल का मानते हैं; उनके उद्भव पर बहस होती रही है
शुंग और कण्वमौर्यों के उत्तराधिकारी, जो ब्राह्मण थे
शकमध्य एशिया से आए; ब्राह्मण उन्हें मलेच्छ, बर्बर या अन्यदेशीय मानते थे; फिर भी शक राजा रुद्रदामन (लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी) ने सुदर्शन सरोवर का जीर्णोद्धार करवाया, जिसका वर्णन संस्कृत के संभवत: आरंभिक अभिलेखों में से एक में है
सातवाहनगोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को “अनूठा ब्राह्मण” और क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया

किताब का निष्कर्ष: राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर “शायद ही निर्भर करता था”। प्रश्नावली का प्रश्न 2 (क्या शासक क्षत्रिय ही होते थे) इसी तालिका से लिखवाइए; हर राजवंश के साथ यह भी लिखें कि ग्रंथ उसे क्या मानते थे।

सातवाहन: दावा और व्यवहार

पृष्ठ 63

  • गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने दावा किया कि उसने चार वर्णों के बीच विवाह संबंधों पर रोक लगाई
  • फिर भी उसने रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध बनाए
  • सातवाहन स्वयं को ब्राह्मण बताते थे, जबकि शास्त्र के अनुसार राजा को क्षत्रिय होना चाहिए
  • वे वर्ण व्यवस्था की मर्यादा का दावा करते थे, पर उससे बाहर के लोगों से विवाह करते थे और अंतर्विवाह का पालन करते थे

किताब के शब्दों में जाति प्रथा के भीतर आत्मसात होना “बहुधा एक जटिल सामाजिक प्रक्रिया थी”। कालांश 3 की सातवाहन रानियों वाली स्लाइड याद दिलाइए।

जाति: वर्ण चार, जातियाँ अनगिनत

पृष्ठ 63

  • वर्ण केवल चार थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी
  • नए सामाजिक समूहों और नए व्यवसायों से संपर्क के साथ जातियों की संख्या बढ़ती रही
  • एक ही जीविका वाली जातियाँ कभी-कभी श्रेणियों में संगठित होती थीं

यहाँ “जाति” किताब का शब्द है, आरंभिक समाज के लिए। आज की किसी जाति का नाम उदाहरण के रूप में कक्षा में मत लीजिए; उदाहरण केवल किताब के स्रोतों से दीजिए। यह सावधानी हमारी ओर से है।

मंदसौर का अभिलेख: रेशम के बुनकरों की श्रेणी

पृष्ठ 63–64

  • मंदसौर (मध्य प्रदेश) का अभिलेख, लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी
  • रेशम के बुनकरों की एक श्रेणी, जो मूलतः लाट (गुजरात) की निवासी थी, अपने बच्चों और बांधवों के साथ मंदसौर गई, जिसे उस समय दशपुर कहा जाता था
  • श्रेणी की सदस्यता शिल्प की विशेषज्ञता पर निर्भर थी, पर कुछ सदस्य दूसरी जीविका भी अपना लेते थे
  • सबने मिलकर शिल्प से कमाया धन सूर्य देवता के सम्मान में मंदिर बनवाने पर खर्च किया

पृष्ठ 64 का प्रश्न पूछिए: क्या रेशम के बुनकर शास्त्रों में तय जीविका का पालन कर रहे थे? उत्तर (हमारी ओर से): पूरी तरह नहीं।

  • स्रोत 8 के अनुसार इस श्रेणी के सदस्य संगीत, जीवनियों और कथाओं, धार्मिक व्याख्यानों, अनुष्ठानों, (वैदिक) खगोल शास्त्र और युद्ध में भी लगे थे।
  • श्रेणी की सदस्यता शिल्प की विशेषज्ञता पर निर्भर थी, फिर भी कुछ सदस्यों ने दूसरी जीविका अपनाई।

यानी एक श्रेणी के भीतर भी अनेक जीविकाएँ थीं, जो ग्रंथों की तय तालिका से मेल नहीं खातीं।

वणिक: शास्त्र और दूसरे स्रोत

पृष्ठ 64

शास्त्रों के अनुसार

  • व्यापार वैश्यों की जीविका है

दूसरे स्रोत

  • शूद्रक के नाटक मृच्छकटिकम् (लगभग चौथी शताब्दी ईसवी) में नायक चारुदत्त को ब्राह्मण–वणिक बताया गया है
  • पाँचवीं शताब्दी ईसवी के एक अभिलेख में मंदिर के निर्माण के लिए धन देने वाले दो भाइयों को क्षत्रिय–वणिक कहा गया है

किताब के अनुसार दूसरे स्रोत अधिक जटिल तस्वीर दिखाते हैं। बोर्ड के दोनों खानों में ये उदाहरण जोड़िए।

3 | सामाजिक विषमताएँ: चार वर्णों के परे, एकीकरण, अधीनता और संघर्ष (3.4-3.5)

किसी ग्रंथ में कुछ लोगों को असभ्य लिखा हो, तो उन लोगों के अपने जीवन के बारे में हमें कैसे पता चलेगा?

चार वर्णों के परे

“विचित्र, असभ्य और पशुवत”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 64

उपमहाद्वीप में हमेशा से ऐसे समुदाय रहे जिन पर ब्राह्मणीय विचारों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, और संस्कृत साहित्य उन्हें कई बार ऐसा चित्रित करता है। उदाहरण: वन में रहने वाले लोग, जिनके लिए शिकार और कंद-मूल संग्रह जीवन-निर्वाह का महत्वपूर्ण साधन था, जैसे निषाद। यायावर पशुपालकों को भी शंका से देखा जाता था, और कभी-कभी असंस्कृत भाषा बोलने वालों को मलेच्छ कहा जाता था। फिर भी इन लोगों के बीच विचारों और मतों का आदान-प्रदान होता था, जिसका पता महाभारत की कथाओं से चलता है।

स्रोत 9: हिडिम्बा और भीम

पृष्ठ 65

  • नरभक्षी राक्षस की बहन हिडिम्बा ने भीम से विवाह का प्रस्ताव रखा
  • युधिष्ठिर इस शर्त पर माने कि भीम दिन भर हिडिम्बा के साथ रहें और रात को लौट आएँ
  • उनका पुत्र घटोत्कच हुआ, जिसने प्रण किया कि पांडवों को ज़रूरत होगी तो वह आ जाएगा

कुछ इतिहासकारों का मत है कि राक्षस उन लोगों को कहा जाता था जिनके आचार-व्यवहार ब्राह्मणीय ग्रंथों के मानदंडों से भिन्न थे।

पृष्ठ 65 का प्रश्न पूछिए: स्रोत 9 में कौन-से व्यवहार अब्राह्मणीय लगते हैं? उत्तर (हमारी ओर से): ये व्यवहार ब्राह्मणीय मानदंडों से अलग दिखते हैं।

  • स्त्री का प्रस्ताव: हिडिम्बा ने स्वयं विवाह का प्रस्ताव रखा और अपना पति स्वयं चुना; स्रोत 3 की पहली और चौथी पद्धति में यह निर्णय वधू का पिता लेता है।
  • धर्म और बांधवों का त्याग: उसने कहा कि उसने मित्र, बांधव और अपने धर्म का भी परित्याग कर दिया है।
  • शर्त वाला विवाह: भीम दिन भर हिडिम्बा के साथ रहते और रात में लौट आते।
  • संतान माँ के साथ: घटोत्कच के जन्म के बाद माँ और पुत्र पांडवों को छोड़कर वन में चले गए।

यानी कथा में विवाह, परिवार और निवास, तीनों ब्राह्मणीय मानदंडों से अलग हैं।

अस्पृश्य और चाण्डाल

पृष्ठ 65–66

  • कुछ लोगों को वर्ण व्यवस्था के बाहर माना गया और ‘अस्पृश्य’ के रूप में वर्गीकृत किया गया, जिससे सामाजिक भेदभाव और गहरा हुआ
  • अनुष्ठानों से जुड़े कर्म ‘पवित्र’ माने जाते थे, और अपने को पवित्र मानने वाले अस्पृश्यों से भोजन नहीं लेते थे
  • शवों की अंत्येष्टि करने और मृत पशुओं को छूने वालों को चाण्डाल कहा गया और वर्ण व्यवस्था वाले समाज में सबसे निम्न कोटि में रखा गया

यह सब ग्रंथों के अनुसार है; हर वाक्य “ग्रंथों के अनुसार” से शुरू कीजिए। हमारी ओर से: भारत के संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध करता है। बच्चों को किसी समूह में मत बाँटिए, और किसी से अपने परिवार का अनुभव कक्षा में मत पूछिए।

मनुस्मृति में चाण्डालों के ‘कर्तव्य’

पृष्ठ 66

ग्रंथ का नियमकिताब में
रहनागाँव के बाहर
चीज़ेंफेंके हुए बर्तन, मरे हुए लोगों के वस्त्र और लोहे के आभूषण
आना-जानारात में गाँव और नगरों में चल-फिर नहीं सकते थे
कामसंबंधियों से विहीन मृतकों की अंत्येष्टि, और वधिक का काम

‘कर्तव्य’ शब्द किताब ने उद्धरण-चिह्नों में रखा है: यह मनुस्मृति का बनाया नियम है। अगली स्लाइड दिखाती है कि चीन से आए यात्रियों ने क्या देखा।

चीन से आए यात्रियों ने क्या लिखा

पृष्ठ 66

  • बौद्ध भिक्षु फा-शिएन (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी) के अनुसार अस्पृश्यों को सड़क पर करताल बजाकर अपने होने की सूचना देनी पड़ती थी
  • चीनी तीर्थयात्री श्वैन-त्सांग (लगभग सातवीं शताब्दी ईसवी) के अनुसार वधिक और सफ़ाई करने वाले नगर से बाहर रहते थे

अब्राह्मणीय ग्रंथों में चाण्डालों का चित्रण कभी ब्राह्मणीय ग्रंथों जैसा है, पर कभी एक भिन्न सामाजिक वास्तविकता का संकेत देता है। अगली स्लाइड वही दूसरी तस्वीर है।

स्रोत 10: मातंग जातक

“जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं वे भेंट के पात्र नहीं हैं।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 67 (स्रोत 10, मातंग जातक से, पालि)

बोधिसत्त ने बनारस के बाहर एक चाण्डाल के पुत्र मातंग के रूप में जन्म लिया। व्यापारी की पुत्री दिथ्थ मांगलिक उन्हें देखकर चिल्लाई, “मैंने कुछ अशुभ देख लिया है।” और उसके सेवकों ने मातंग को पीटा। मातंग विरोध में उसके घर के बाहर लेट गए; सातवें रोज़ घरवालों ने दिथ्थ को उन्हें सौंप दिया। बाद में उनका पुत्र माण्डव्यकुमार तीन वेद पढ़कर रोज़ 16,000 ब्राह्मणों को भोजन कराता था, पर भिक्षा माँगने आए पिता को उसने लौटा दिया। ऊपर का वाक्य मातंग का उत्तर है।

पृष्ठ 67 का प्रश्न पूछिए: कथा के कौन-से तत्व दिखाते हैं कि वह मातंग के नज़रिए से लिखी गई? उत्तर (हमारी ओर से): कथा का नायक मातंग है।

  • नायक बोधिसत्त: चाण्डाल के रूप में जन्मे मातंग ही बोधिसत्त हैं।
  • विरोध की जीत: पिटाई के बाद वे घर के बाहर लेट गए, और सातवें दिन घरवालों ने दिथ्थ को उन्हें सौंप दिया।
  • नैतिक बात उन्हीं के मुँह से: ऊपर वाला वाक्य।
  • अलौकिक शक्ति: बेटे के घर से निकाले जाने पर वे आकाश में जाकर अदृश्य हो जाते हैं।

कथा में जीत, नैतिक बात और अलौकिक शक्ति, तीनों मातंग की हैं; इसलिए यह उन्हीं के नज़रिए से कही लगती है।

पृष्ठ 67 की चर्चा के लिए बोर्ड के दो खाने भरवाइए। नियम मानने के संकेत: स्रोत 7, मनुस्मृति में चाण्डालों के ‘कर्तव्य’, फा-शिएन और श्वैन-त्सांग। अलग संभावनाएँ: स्रोत 6, स्रोत 8, वणिक, अक्षत्रिय राजा, स्रोत 9, और स्रोत 10, जिसमें मातंग का पुत्र माण्डव्यकुमार तीन वेद पढ़ता है। दूसरा खाना कहीं लंबा बनता है।

4 | जन्म के परे: संसाधन और प्रतिष्ठा (4.1-4.3)

समाज में किसी की प्रतिष्ठा किस बात से बनती है: परिवार से, धन से, या दान देने से?

सामाजिक स्थान और संसाधन

पृष्ठ 68

  • दास, भूमिहीन खेतिहर मज़दूर, शिकारी, मछुआरे, पशुपालक
  • किसान, ग्राममुखिया, शिल्पकार, वणिक और राजा

किताब के अनुसार इन सबका सामाजिक स्थान इस बात पर निर्भर करता था कि आर्थिक संसाधनों पर उनका कितना नियंत्रण है। इस भाग में तीन बातें आएँगी: स्त्री और पुरुष के संपत्ति अधिकार, वर्ण और संपत्ति, और तमिलकम् का दूसरा आदर्श।

द्यूत का प्रकरण

पृष्ठ 68

  • दुर्योधन ने युधिष्ठिर को द्यूत क्रीड़ा के लिए बुलाया
  • धोखे के कारण युधिष्ठिर स्वर्ण, हस्ति, रथ, दास, सेना, कोष, राज्य, प्रजा की संपत्ति, अपने अनुजों और फिर स्वयं को भी हार गए
  • इसके बाद उन्होंने पांडवों की सहपत्नी द्रौपदी को भी दाँव पर लगाया और हार गए

सूची को धीरे पढ़िए और बच्चों से पूछिए कि द्रौपदी का नाम किन चीज़ों के बाद आता है। यही अगली स्लाइड का प्रश्न है।

स्रोत 11: द्रौपदी का प्रश्न

“पत्नी पर पति का नियंत्रण सदैव रहता है”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 68 (स्रोत 11)

माना जाता है कि द्रौपदी ने पूछा कि क्या युधिष्ठिर उसे दाँव पर लगाने से पहले स्वयं को हार चुके थे। दो मत सामने आए: पहला, ऊपर वाला, जिसके अनुसार यह अनुचित नहीं था; दूसरा, कि दासत्व स्वीकार कर चुका पुरुष किसी और को दाँव पर नहीं लगा सकता। कोई निष्कर्ष नहीं निकला; अंत में धृतराष्ट्र ने सभी पांडवों और द्रौपदी की निजी स्वतंत्रता लौटा दी।

पृष्ठ 68 का प्रश्न पूछिए: क्या यह प्रकरण बताता है कि पत्नियों को पतियों की निजी संपत्ति माना जाए? उत्तर (हमारी ओर से): यह प्रकरण बताता है कि ऐसा विचार मौजूद था, पर उस पर विवाद भी था।

  • हाँ की ओर: द्रौपदी को उन्हीं चीज़ों के बाद दाँव पर लगाया गया, मानो वह भी संपत्ति हो; और एक मत यह था कि पत्नी पर पति का नियंत्रण सदैव रहता है।
  • नहीं की ओर: दूसरा मत था कि दासत्व स्वीकार करने वाला पुरुष किसी और को दाँव पर नहीं लगा सकता; द्रौपदी ने स्वयं प्रश्न उठाया; और अंत में सबकी स्वतंत्रता लौटा दी गई।

यानी ग्रंथ में दोनों मत हैं; किसी एक को अंतिम सच मत बनाइए।

स्त्री और संपत्ति: नियम और व्यवहार

पृष्ठ 68–69

स्मृति परंपरा के नियम

  • माता-पिता की मृत्यु के बाद पैतृक संपत्ति संतानों में बराबर बाँटी जाती थी, और ज्येष्ठ पुत्र विशेष भाग का अधिकारी था
  • स्त्रीधन: विवाह के समय मिले उपहारों पर स्त्री का स्वामित्व माना जाता था; उसकी संतान इसे विरासत में पा सकती थी, और पति का इस पर कोई अधिकार नहीं था
  • फिर भी मनुस्मृति स्त्रियों को पति की आज्ञा के विरुद्ध पारिवारिक संपत्ति या अपने बहुमूल्य धन का गुप्त संचय के विरुद्ध चेतावनी देती है

असल स्थिति

  • वाकाटक महिषी प्रभावती गुप्त धनाढ्य थीं, और उच्च वर्ग की महिलाएँ संसाधनों पर पैठ रखती थीं
  • पर अधिकतर अभिलेखीय और साहित्यिक साक्ष्य बताते हैं कि सामान्यत: भूमि, पशु और धन पर पुरुषों का ही नियंत्रण था

किताब का निष्कर्ष: संसाधनों पर नियंत्रण की भिन्नता के कारण स्त्री और पुरुष के बीच सामाजिक हैसियत की भिन्नता “अधिक प्रखर हुई”। प्रश्नावली का प्रश्न 8 इसी स्लाइड और भाग 2 से लिखवाइए।

स्रोत 12: मनुस्मृति के अनुसार धन कैसे मिले

पृष्ठ 69

पुरुष: सात तरीकेस्त्री: छ: तरीके
विरासत, खोज, खरीदवैवाहिक अग्नि के सामने मिली भेंट; वधूगमन के समय मिली भेंट
विजित करके, निवेशस्नेह के प्रतीक के रूप में मिली भेंट
कार्य द्वाराभ्राता, माता और पिता के उपहार; परवर्ती काल में मिली भेंट
सज्जनों की दी गई भेंट स्वीकार करके“अनुरागी” पति से मिला सब कुछ

पृष्ठ 69 का प्रश्न पूछिए: स्त्री और पुरुष किस प्रकार धन प्राप्त कर सकते थे; दोनों की तुलना कीजिए और अंतर बताइए। उत्तर (हमारी ओर से): अंतर साफ़ है।

  • पुरुष: विरासत और अपनी मेहनत, खरीद, निवेश या विजय से धन पा सकते थे।
  • स्त्री: सारे तरीके भेंट और उपहार हैं।

यानी स्त्री का धन दूसरों के दिए पर टिका था।

वर्ण और संपत्ति

पृष्ठ 69

  • ब्राह्मणीय ग्रंथों के अनुसार संपत्ति के अधिकार का एक और आधार, लिंग के अलावा, वर्ण था
  • शूद्रों के लिए एकमात्र ‘जीविका’ सेवा थी, जिसमें हमेशा उनकी इच्छा शामिल नहीं होती थी; तीन उच्च वर्णों के पुरुषों के लिए कई जीविकाओं की संभावना थी
  • ये विधान सचमुच लागू होते तो ब्राह्मण और क्षत्रिय सबसे धनी होते, और यह बात कुछ हद तक सामाजिक वास्तविकता से मेल खाती थी

साहित्यिक परंपरा में राजा अधिकतर धनी और पुरोहित भी सामान्यत: धनी दिखाए जाते हैं, पर कभी-कभी निर्धन ब्राह्मण का चित्रण भी मिलता है। “ग्रंथों के अनुसार” यहाँ भी बोलिए।

बौद्धों की आलोचना

“न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 69

वर्ण व्यवस्था की सबसे जानी-मानी आलोचनाएँ प्रारंभिक बौद्ध धर्म (लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से) में विकसित हुईं। बौद्धों ने माना कि समाज में विषमता थी, पर उनके अनुसार ये भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”। उन्होंने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया।

स्रोत 13: एक धनाढ्य शूद्र

“यदि ऐसा है, तो क्या फिर यह चारों वर्ण एकदम समान नहीं हैं?”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 70 (स्रोत 13, मज्झिमनिकाय से, पालि)

राजा अवन्तिपुत्र ने बुद्ध के अनुयायी कच्चन से ब्राह्मणों के इस दावे पर राय पूछी कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं और ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं। कच्चन के प्रश्नों पर अवन्तिपुत्र ने माना कि धनी शूद्र दूसरे शूद्र को, और क्षत्रिय, ब्राह्मण या वैश्य को भी, अपना सेवक बना सकता था। तब कच्चन ने ऊपर वाला प्रश्न पूछा, और अवन्तिपुत्र ने स्वीकार किया कि इस आधार पर चारों वर्णों में कोई भेद नहीं है।

पृष्ठ 70 का प्रश्न पूछिए: अवन्तिपुत्र के पहले वक्तव्य में कौन-से ब्राह्मणीय विचार हैं, उनका स्रोत क्या हो सकता है, और कथा असमानता को कैसे समझाती है? उत्तर (हमारी ओर से): तीन बातें।

  • ब्राह्मणीय विचार: ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ हैं, केवल वे पवित्र हैं, वे ब्रह्मा के पुत्र हैं और “ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं”।
  • स्रोत की पहचान: यह बात ऋग्वेद के पुरुषसूक्त (मंडल 10, सूक्त 90) से मिलती-जुलती है, जिसके मंत्र 12 में ब्राह्मण को आदि-पुरुष का मुख कहा गया है।
  • असमानता का स्पष्टीकरण: इस कथा में असमानता धन से आती है, क्योंकि धनी व्यक्ति किसी भी वर्ण के व्यक्ति को सेवक बना सकता था।

किताब कहती है कि यह कहानी अक्षरश: सत्य नहीं थी, पर बौद्धों के वर्ण संबंधी रवैये को दिखाती है।

तमिलकम्: दानशील सरदार

पृष्ठ 70

  • कुछ समाजों में दानशील आदमी का सम्मान होता था, और कंजूस या अपने लिए संपत्ति जमा करने वाला घृणा का पात्र
  • प्राचीन तमिलकम् ऐसा ही क्षेत्र था, जहाँ 2000 वर्ष पहले अनेक सरदारियाँ थीं
  • सरदार अपनी प्रशंसा गाने वाले चारणों और कवियों के आश्रयदाता थे

तमिल संगम साहित्य दिखाता है कि धनी और निर्धन में विषमता थी, पर संसाधनों पर नियंत्रण रखने वालों से अपेक्षा थी कि वे उन्हें मिल-बाँटकर इस्तेमाल करेंगे।

स्रोत 14: निर्धन दानी सरदार

“वह चारणों की क्षुधा का शत्रु है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 71 (स्रोत 14, पुरनानूरु से)

पुरनानूरु तमिल संगम साहित्य की पद्यावली है, लगभग प्रथम शताब्दी ईसवी की। एक चारण अपने आश्रयदाता के बारे में कहता है कि उसके पास रोज़ दूसरों पर खर्च करने को धन नहीं, फिर भी वह दान देने से मना नहीं करता। वह इरंतई में रहता है। किताब में इस संग्रह का नाम ‘पुरुनारुरू’ छपा है; सही नाम पुरनानूरु है।

पृष्ठ 71 का प्रश्न पूछिए: चारण किन दाँव-पेंचों से सरदार से दान चाहता है, और सरदार धन कैसे जुटाता था? उत्तर (हमारी ओर से): दो बातें।

  • चारण के दाँव-पेंच: वह मान लेता है कि सरदार के पास रोज़ खर्च करने को धन नहीं, फिर भी उसे चारणों की भूख का शत्रु बताता है, और कहता है कि भूख से क्षीण पसलियाँ देखकर सरदार लोहार से युद्ध के लिए लंबा भाला बनवाएगा।
  • सरदार का धन: भाले वाली बात से लगता है कि सरदार युद्ध करके धन लाता था, ताकि उसका अंश चारणों को दे सके।

प्राचीन तमिलकम् में दानशील व्यक्ति का सम्मान होता था; चारण इसी आदर्श से सरदार की प्रशंसा करता है।

चित्र 3.7: सरदार और उसका अनुयायी

पृष्ठ 71

  • पत्थर की मूर्ति, अमरावती (आंध्र प्रदेश), लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी
  • आकार: सरदार बहुत बड़ा बनाया गया है; अनुयायी उससे बहुत छोटा है, लगभग उसकी कमर तक
  • सजावट: सरदार के सिर पर ऊँची पगड़ी, गले में कई हार और कमर पर सजा हुआ वस्त्र; अनुयायी के वस्त्र और गहने कम
  • मुद्रा: सरदार का एक हाथ ऊपर उठा है और दूसरा हाथ अनुयायी के सिर पर रखा है

पृष्ठ 71 का दूसरा प्रश्न यही है: मूर्तिकार ने सरदार और अनुयायी का अंतर कैसे दिखाया? पहले बच्चे किताब का चित्र देखकर ख़ुद बताएँ, फिर यह स्लाइड खोलिए। पृष्ठ 71 की चर्चा (आज के सामाजिक रिश्ते अतीत से कितने मिलते-जुलते हैं) गृहकार्य में दीजिए; बच्चे बड़ों से पूछकर लिखें, कक्षा में किसी का निजी अनुभव मत पूछिए।

5 | सामाजिक विषमताओं की व्याख्या: एक सामाजिक अनुबंध

अगर समाज की व्यवस्था मनुष्यों ने ख़ुद बनाई हो, तो क्या वे उसे बदल भी सकते हैं?

सुत्तपिटक का मिथक

पृष्ठ 72

  • शुरुआत: मनुष्य और वनस्पति जगत पूरी तरह विकसित नहीं थे; सभी जीव शांति से रहते थे और प्रकृति से उतना ही लेते थे जितना एक समय के भोजन के लिए चाहिए
  • पतन: यह व्यवस्था धीरे-धीरे बिगड़ी; मनुष्य अधिकाधिक लालची, प्रतिहिंसक और कपटी हो गए
  • चयन: तब लोगों ने एक ऐसे मनुष्य को चुनने की सोची जो उचित बात पर क्रोधित हो और दंड दे सके

यह मिथक बौद्ध ग्रंथ सुत्तपिटक का है। अगली स्लाइड में चुने गए मनुष्य की उपाधि है।

महासम्मत्त

“सब लोगों द्वारा चुने जाने के कारण उसे महासम्मत्त की उपाधि प्राप्त होगी।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 72

बदले में उसे चावल का अंश मिलेगा। किताब इसके अर्थ बताती है: राजा का पद लोगों द्वारा चुने जाने पर निर्भर था; ‘कर’ वह मूल्य था जो लोग राजा की इस सेवा के बदले देते थे; आर्थिक और सामाजिक संबंध बनाने में मनुष्य के अपने कर्म का बड़ा हाथ था; और यदि मनुष्य स्वयं किसी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार थे, तो भविष्य में वे उसमें परिवर्तन भी ला सकते थे।

समाज की उत्पत्ति: दो दृष्टिकोण

पृष्ठ 62, 69, 70, 72 · तुलना हमारी ओर से

ब्राह्मणीय दृष्टिकोण

  • ब्राह्मणों का दावा कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं और “ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं” (स्रोत 13)
  • शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे

बौद्ध मिथक

  • व्यवस्था मनुष्यों के अपने कर्म से बनी
  • राजा महासम्मत्त, यानी सब लोगों द्वारा चुना गया; ‘कर’ उसकी सेवा का मूल्य
  • बौद्धों की आलोचना (पृष्ठ 69): भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”

यही प्रश्नावली का प्रश्न 4 है। उत्तर (हमारी ओर से): प्रश्न ‘पुरुषसूक्त’ का नाम लेता है। ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 90) के इस सूक्त में चारों वर्ण एक ही आदि-पुरुष के अंगों से जोड़े गए हैं, इसलिए वर्णों का क्रम सृष्टि की कथा का हिस्सा बन जाता है।

  • उत्पत्ति: ब्राह्मणीय दावे में ऊँचा स्थान ब्रह्मा से उत्पत्ति पर टिका है; बौद्ध मिथक में व्यवस्था मनुष्यों के अपने कर्म से बनी।
  • राजा: एक ओर केवल क्षत्रिय, दूसरी ओर लोगों का चुना हुआ महासम्मत्त।
  • बदलाव: बौद्ध मिथक के अनुसार मनुष्य अपनी बनाई व्यवस्था बदल भी सकते थे।

यानी ब्राह्मणीय दृष्टिकोण ऊँच-नीच को उत्पत्ति से जोड़ता है, और बौद्ध मिथक उसे मनुष्यों के बनाए समझौते से।

6 | साहित्यिक स्रोतों का इस्तेमाल: भाषा एवं विषयवस्तु (6.1)

कोई ग्रंथ किसने, किस भाषा में और किसके लिए लिखा, यह जानना उसकी बातों पर भरोसा करने के लिए क्यों ज़रूरी है?

ग्रंथ से पूछे जाने वाले प्रश्न

पृष्ठ 72–73

प्रश्नकिताब में
भाषापालि, प्राकृत या तमिल, जो आम लोग बोलते थे, या संस्कृत, जो खासकर पुरोहितों और खास वर्ग के प्रयोग की भाषा थी
प्रकार‘मंत्र’, जो अनुष्ठान करने वाले पढ़ते और बोलते थे, या ‘कथा’, जिसे लोग पढ़ और सुन सकते थे
लेखक और श्रोतालेखकों के दृष्टिकोण ने ग्रंथ को रूप दिया; लेखकों ने श्रोताओं की रुचि का भी ध्यान रखा होगा
काल और स्थानग्रंथ का संभावित संकलन या रचना काल, और उसकी रचनाभूमि

इन सबको परखने के बाद ही इतिहासकार ग्रंथ की विषयवस्तु को इतिहास के लिए इस्तेमाल करते हैं। पहले कालांश की [big] स्लाइड पर बच्चों ने जो सवाल लिखे थे, उन्हें इस तालिका से मिलाइए।

महाभारत की भाषा

पृष्ठ 73

  • जो पाठ किताब इस्तेमाल करती है, वह संस्कृत में है
  • पर उसकी संस्कृत वेदों या प्रशस्तियों की संस्कृत से कहीं अधिक सरल है

इसलिए संभव है कि इसे व्यापक स्तर पर समझा जाता था। बच्चों से पूछिए कि सरल भाषा श्रोताओं के बारे में क्या बताती है।

विषयवस्तु के दो भाग

पृष्ठ 73

आख्यान

  • कहानियों का संग्रह
  • बहुधा आख्यानों में भी समाज के लिए एक सबक होता है

उपदेशात्मक

  • सामाजिक आचार-विचार के मानदंड
  • उपदेशात्मक अंशों में भी कहानियाँ होती हैं

किताब के अनुसार यह बँटवारा पूरी तरह अलग-अलग खानों वाला नहीं है।

अधिकतर इतिहासकारों का मत

“अधिकतर इतिहासकार इस बात पर एकमत हैं कि महाभारत वस्तुत: एक भाग में नाटकीय कथानक था जिसमें उपदेशात्मक अंश बाद में जोड़े गए।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 73

चित्र 3.8, अठारहवीं शताब्दी का एक चित्र, महाभारत का सबसे महत्वपूर्ण उपदेशात्मक अंश दिखाता है: भगवद्गीता, जहाँ कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं।

‘इतिहास’: ऐसा ही था

पृष्ठ 74

  • आरंभिक संस्कृत परंपरा में महाभारत ‘इतिहास’ की श्रेणी में रखा गया, जिसका अर्थ है ‘ऐसा ही था’
  • कुछ इतिहासकार मानते हैं कि स्वजनों के बीच हुए युद्ध की स्मृति ही मुख्य कथानक है
  • दूसरे कहते हैं कि युद्ध की पुष्टि किसी और साक्ष्य से नहीं होती

यानी क्या सचमुच कोई युद्ध हुआ था, यह निश्चित नहीं। बच्चे दोनों मत लिखें, और कोई एक पक्का न करें।

प्रश्न 5: युधिष्ठिर के संदेश में किसे पहले नमन

पृष्ठ 80 · आधार हमारी ओर से

आधारअवतरण में
भेद (वर्ण और हैसियत)सबसे पहले धृतराष्ट्र के घर के ब्राह्मण और मुख्य पुरोहित; लगभग अंत में दासियाँ और उनकी संतानें
गुरुब्राह्मणों के ठीक बाद गुरु द्रोण और कृपाचार्य
उम्रभीष्म और वृद्ध राजा धृतराष्ट्र, दुर्योधन और युवा कुरु योद्धाओं से पहले; वृद्धा स्त्रियाँ पत्नियों और बेटियों से पहले
लिंगपहले सारे पुरुष, फिर स्त्रियाँ; पत्नियों के लिए बस कुशल-क्षेम का संदेश
बंधुत्वदुर्योधन और उसके अनुज, फिर युवा कुरु योद्धा, फिर माताएँ, पत्नियाँ, कुलवधुएँ और पुत्रियाँ

पहले एक बच्चा पृष्ठ 80 का अवतरण धीरे-धीरे पढ़े, फिर समूह यह तालिका ख़ुद भरें; यह स्लाइड उसके बाद खोलिए। अभिवादन का क्रम ही बता देता है कि किसे कितना ऊँचा माना गया।

6 | इतिहासकार और महाभारत: लेखक और तिथियाँ, सदृशता की खोज (6.2-6.3)

एक ग्रंथ के कई लेखक हों और वह सैकड़ों वर्षों में बना हो, तो आप उसकी तिथि कैसे बताएँगे?

लेखक और तिथियाँ: रचना के चरण

पृष्ठ 74–75

कबक्या हुआ
शुरू मेंसंभवत: भाट सारथी, जिन्हें ‘सूत’ कहा जाता था, मूल कथा के रचयिता थे; वे योद्धाओं की विजय पर कविताएँ लिखते थे, जो मौखिक रूप में आगे बढ़ीं
पाँचवीं शताब्दी ई.पू. सेब्राह्मणों ने इस कथा परंपरा पर अधिकार कर लिया और इसे लिखा
लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवीविष्णु की आराधना प्रभावी हो रही थी, और श्रीकृष्ण को विष्णु का रूप बताया जा रहा था
लगभग 200-400 ईसवीमनुस्मृति से मिलते-जुलते बड़े उपदेशात्मक प्रकरण जोड़े गए

नतीजा: जो ग्रंथ शुरू में संभवत: 10,000 श्लोकों से भी कम का था, वह बढ़कर एक लाख श्लोकों वाला हो गया। साहित्यिक परंपरा ऋषि व्यास को इसका रचयिता मानती है; चित्र 3.9 (महाभारत के फारसी अनुवाद से, लगभग 1740-50) में परंपरा के अनुसार व्यास श्रीगणेश को ग्रंथ लिखवा रहे हैं। प्रश्नावली का प्रश्न 7 (क्या महाभारत का एक ही रचयिता था) इसी तालिका से लिखवाइए।

कुरु और पांचाल: सरदारी से राजतंत्र

पृष्ठ 74–75

  • पाँचवीं शताब्दी ई.पू. में कुरु और पांचाल, जिनके इर्द-गिर्द कथा घूमती है, सरदारी से राजतंत्र बन रहे थे
  • संभव है कि नए राज्यों की उथल-पुथल में पुराने सामाजिक मूल्यों की जगह नए मानदंड आए
  • इनका वर्णन कहानी के कुछ भागों में मिलता है

“संभव है” शब्द बोर्ड पर भी लिखिए; यह किताब का अनुमान है, पक्की बात नहीं।

हस्तिनापुर का उत्खनन

पृष्ठ 75

  • 1951-52 में पुरातत्ववेत्ता बी.बी. लाल ने मेरठ ज़िले (उ.प्र.) के हस्तिनापुर नाम के गाँव में उत्खनन किया
  • नामों की समानता संयोग हो सकती है
  • पर गंगा के ऊपरी दोआब में, जहाँ कुरु राज्य था, इस पुरास्थल का होना बताता है कि यह कुरुओं की राजधानी हस्तिनापुर हो सकती थी

लाल को आबादी के पाँच स्तर मिले। अगली स्लाइड में दूसरा और तीसरा स्तर है। पृष्ठ 56 का मानचित्र 1 साथ में खोलिए और हस्तिनापुर दिखाइए।

हस्तिनापुर: दूसरा और तीसरा स्तर

पृष्ठ 75

दूसरा स्तर (लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ई.पू.)

  • उत्खनन वाले सीमित क्षेत्र में घरों की कोई निश्चित योजना नहीं मिली
  • मिट्टी की दीवारें और कच्ची मिट्टी की ईंटें
  • सरकंडे की छाप वाला पलस्तर: कुछ घरों की दीवारें सरकंडों की थीं, जिन पर मिट्टी चढ़ाई जाती थी

तीसरा स्तर (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू.)

  • घर कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के
  • गंदे पानी के निकास के लिए शोषक-घट और ईंटों के नाले
  • वलय-कूप, जो कुओं और मल निकासी के गर्तों, दोनों रूपों में काम आते थे

अगली स्लाइड में महाकाव्य का हस्तिनापुर है। बच्चे पहले इन दोनों खानों को ध्यान से देख लें।

स्रोत 15: महाकाव्य का हस्तिनापुर

पृष्ठ 76

  • समुद्र की भाँति भरा हुआ नगर
  • सैकड़ों प्रासादों वाला
  • इंद्र की नगरी के समान

पृष्ठ 76 का पहला प्रश्न पूछिए: क्या लाल की खोज और महाकाव्य के हस्तिनापुर में समानता है? उत्तर (हमारी ओर से): बहुत कम।

  • महाकाव्य में: सैकड़ों प्रासादों वाला, इंद्र की नगरी जैसा नगर।
  • लाल की खोज में: दूसरे स्तर पर मिट्टी और सरकंडे के साधारण घर; तीसरे स्तर पर ईंटों के घर, नाले और वलय-कूप।

लाल के विवरण में साधारण घर हैं, प्रासादों वाला नगर नहीं; हाँ, उत्खनन सीमित क्षेत्र में ही हुआ था। इसलिए किताब पूछती है कि क्या यह चित्रण बाद में (ईसा पूर्व छठी शताब्दी के पश्चात) जोड़ा गया, जब इस क्षेत्र में नगर बने, या यह कवियों की कल्पना थी।

स्रोत 16: द्रौपदी का विवाह, तीन स्पष्टीकरण

पृष्ठ 76

  • कुंती की आज्ञा: पांचाल नरेश द्रुपद के स्वयंवर में अर्जुन जीते; कुंती ने बिना देखे कहा कि लाई गई वस्तु आपस में बाँट लो, और उनकी आज्ञा टाली नहीं जा सकती थी
  • व्यास का पहला कथन: पांडव इंद्र के अवतार थे, और उनकी पत्नी ने ही द्रौपदी के रूप में जन्म लिया था
  • व्यास का दूसरा कथन: एक युवा स्त्री ने शिव की आराधना में एक के बजाय पाँच बार पति का वर माँग लिया था, और उसी स्त्री ने द्रौपदी के रूप में जन्म लिया

इन कहानियों से संतुष्ट होकर द्रुपद ने विवाह की सहमति दी।

पृष्ठ 76 का दूसरा प्रश्न पूछिए: लेखक(कों) ने एक ही प्रकरण के लिए तीन स्पष्टीकरण क्यों दिए? उत्तर (हमारी ओर से): इतिहासकारों के सुझाव से।

  • बहुपति प्रथा संभवत: शासकों के विशिष्ट वर्ग में मौजूद थी।
  • पर इतने स्पष्टीकरण बताते हैं कि समय के साथ यह प्रथा लोगों में अमान्य होती गई; ब्राह्मणों की दृष्टि में भी यह अमान्य और अवांछित थी।

इसलिए लगता है कि लेखकों को इसे उचित ठहराने के लिए एक से अधिक कारण देने पड़े।

कथा की अपनी ज़रूरतें

“सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 77

कुछ इतिहासकार ध्यान दिलाते हैं कि बहुपति प्रथा हिमालय क्षेत्र में प्रचलित थी (और आज भी है), और यह भी कहा जाता है कि युद्ध के समय स्त्रियों की कमी के कारण इसे अपनाया गया। पर कुछ आरंभिक स्रोत बताते हैं कि बहुपति प्रथा न एकमात्र विवाह पद्धति थी, न सबसे अधिक प्रचलित। प्रश्नावली का प्रश्न 9 (ब्राह्मणीय नियमों का सर्वत्र अनुसरण नहीं होता था) के लिए यह उदाहरण भी काम आएगा।

7 | एक गतिशील ग्रंथ

एक पुरानी कहानी को कोई किसी दूसरे पात्र की नज़र से फिर से कहे, तो कहानी में क्या बदल जाता है?

संस्कृत पाठ के बाद भी

पृष्ठ 77

  • सदियों में महाभारत के अनेक पाठान्तर भिन्न-भिन्न भाषाओं में लिखे गए
  • किसी क्षेत्र में जन्मी कहानियाँ इसमें जुड़ती गईं, और मुख्य कथा की कई पुनर्व्याख्याएँ हुईं
  • इसके प्रसंग मूर्तिकला और चित्रों में दिखाए गए, और इसने नाटकों और नृत्य कलाओं को विषय-वस्तु दी

किताब कहती है कि महाभारत का विकास संस्कृत पाठ के साथ खत्म नहीं हुआ। अगली स्लाइड एक उदाहरण है।

लाक्षागृह: दो पाठ

पृष्ठ 77–78

संस्कृत पाठ

  • दुर्योधन पांडवों को लाक्षागृह में जलाकर मारना चाहता है; पांडव सुरंग खोदकर निकल जाते हैं
  • कुंती के भोज में आई एक निषादी अपने पाँच पुत्रों के साथ वहीं सो जाती है और पांडवों की लगाई आग में भस्म हो जाती है
  • उनके शव देखकर लोग समझते हैं कि पांडव मर गए

महाश्वेता देवी, “कुंती ओ निषादी”

  • कहानी वहाँ से शुरू होती है जहाँ यह प्रसंग खत्म होता है
  • युद्ध के बाद कुंती एक वनप्रांतर में रहती हैं और पृथ्वी से बातें करते हुए अपनी त्रुटियाँ स्वीकार करती हैं
  • एक निषादी, जिसकी सास उस आग में मरी थी, कहती है कि कुंती को उन छ: निर्दोष लोगों की याद एक बार भी नहीं आई

महाश्वेता देवी समसामयिक बांग्ला लेखिका हैं, जो शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए प्रसिद्ध हैं; उन्होंने उन प्रश्नों की ओर ध्यान खींचा है जिन पर संस्कृत पाठ मूक है। कहानी के अंत में आग की लपटें पास आती हैं; निषादी बच निकलती है, कुंती वहीं रह जाती है।

पृष्ठ 77 की चर्चा गृहकार्य में दीजिए: अध्याय के महाभारत वाले अंशों (स्रोत 2, 5, 7, 9, 11, 15, 16) के लिए बच्चे दो बातें लिखें: क्या इसकी पुष्टि किसी और साक्ष्य से होती है, और इससे लेखकों की सोच के बारे में क्या पता चलता है। साथ में प्रश्नावली का प्रश्न 6 (विंटरविट्ज़ का कथन) और प्रश्न 11 की परियोजना आज ही बता दीजिए।

कालरेखा 1-2; मानचित्र कार्य (प्रश्न 10)

अध्याय के सारे ग्रंथ समय की एक रेखा पर रख दें, तो कौन-सा ग्रंथ किस भाषा में मिलेगा?

कालरेखा 1: प्रमुख साहित्यिक परंपराएँ

पृष्ठ 79

लगभग कबक्या
लगभग 500 ई.पू.पाणिनि की अष्टाध्यायी, संस्कृत व्याकरण
लगभग 500-200 ई.पू.प्रमुख धर्मसूत्र (संस्कृत में)
लगभग 500-100 ई.पू.आरंभिक बौद्ध ग्रंथ, त्रिपिटक सहित (पालि में)
लगभग 500 ई.पू.-400 ईसवीरामायण और महाभारत (संस्कृत में)
लगभग 200 ई.पू.-200 ईसवीमनुस्मृति (संस्कृत में); तमिल संगम साहित्य की रचना और संकलन
लगभग 100 ईसवीचरक और सुश्रुत संहिता, आयुर्वेद के ग्रंथ (संस्कृत में)
लगभग 200 ईसवी सेपुराणों का संकलन (संस्कृत में)
लगभग 300 ईसवीभरतमुनि का नाट्यशास्त्र (संस्कृत में)
लगभग 300-600 ईसवीअन्य धर्मशास्त्र (संस्कृत में)
लगभग 400-500 ईसवीकालिदास के साहित्य सहित संस्कृत नाटक; खगोल व गणित शास्त्र पर आर्यभट्ट और वराहमिहिर के ग्रंथ (संस्कृत में); जैन ग्रंथों का संग्रहण (प्राकृत में)

हर पंक्ति की भाषा पर गोला लगवाइए। बच्चे देखें कि अध्याय के “दूसरे साक्ष्य” वाले कितने ग्रंथ संस्कृत के बाहर की भाषाओं में हैं: पालि के बौद्ध ग्रंथ, तमिल संगम साहित्य, प्राकृत के जैन ग्रंथ।

कालरेखा 2: महाभारत के अध्ययन में प्रमुख कीर्तिमान

पृष्ठ 79

कबक्या हुआ
1919-66महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण की परिकल्पना और प्रकाशन
1973जे.ए.बी. वैन बियुटेनेन ने समालोचनात्मक संस्करण का अंग्रेज़ी अनुवाद शुरू किया; 1979 में उनकी मृत्यु के बाद यह परियोजना अधूरी रह गई

किताब की कालरेखा में उनकी मृत्यु का साल 1978 छपा है; सही साल 1979 है। पहली पंक्ति को कालांश 1 की समालोचनात्मक संस्करण वाली स्लाइड से जोड़िए।

प्रश्न 10: दो मानचित्र

पृष्ठ 56 (इस अध्याय का मानचित्र 1) · मिलान हमारी ओर से

कहाँ मिलेनाम
दोनों मानचित्रों पर, क्षेत्रकुरु, शूरसेन, मत्स्य, अवन्ति, वत्स, मल्ल, और कोसल (अध्याय 2 के मानचित्र पर “कोशल”)
दोनों मानचित्रों पर, नगरइंद्रप्रस्थ (अध्याय 2 में “इन्द्रप्रस्थ”), मथुरा, उज्जयिनी, श्रावस्ती, कुशीनगर, वैशाली, कौशाम्बी, वाराणसी
केवल इस अध्याय के मानचित्र परक्षेत्र शाक्य; नगर हस्तिनापुर, विराट, अयोध्या, कपिलवस्तु, लुंबिनी, पावा, पाटलिपुत्र, सारनाथ, बोधगया
केवल अध्याय 2 के मानचित्र परमहाजनपद कंबोज, गांधार, पांचाल, काशी, वज्जि (वृजि), मगध, अंग, वंग, चेदि, अश्मक; नगर पुष्कलावती, तक्षशिला, अहिच्छत्र, चंपा, राजगीर

पहले बच्चे दोनों मानचित्र साथ खोलकर ख़ुद मिलान करें; यह स्लाइड जाँचने के लिए है। फिर कुरु और पांचाल के ठीक आसपास जो महाजनपद और नगर दिखें, उनकी सूची बनवाइए, और हर नाम के आगे लिखवाइए कि वह किस मानचित्र पर मिला।

पूरा अध्याय, एक नज़र में

पृष्ठ 53 से 81 · सार हमारी ओर से

कालांशमुख्य बात
1मानदंड और दूसरे साक्ष्य; महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण, 1919 से, 13,000 पृष्ठ, समानता और क्षेत्रीय प्रभेद
2कुल, ज्ञाति, वंश; पितृवंशिकता, स्रोत 1 और 2
3बहिर्विवाह, विवाह के आठ प्रकार, गोत्र के दो नियम; सातवाहन रानियाँ और मातृनाम
4ग्रंथों के अनुसार वर्णों की ‘जीविका’; अक्षत्रिय राजा; जातियाँ, श्रेणी और वणिक
5निषाद और हिडिम्बा; अस्पृश्य और चाण्डाल; चीनी यात्री; मातंग जातक
6द्रौपदी का प्रश्न, स्त्रीधन, मनुस्मृति के तरीके; बौद्ध आलोचना; तमिलकम् के दानी सरदार
7सुत्तपिटक और महासम्मत्त; ग्रंथ से पूछे जाने वाले प्रश्न; आख्यान और उपदेशात्मक
8सूत से ब्राह्मण तक, 10,000 से कम से एक लाख श्लोक; हस्तिनापुर; द्रौपदी का विवाह
9पाठान्तर और कलाएँ; “कुंती ओ निषादी”
10कालरेखा 1 और 2; दो मानचित्र
11अभ्यास के 12 प्रश्न

यह तालिका बोर्ड पर बनवाकर बच्चों से हर कालांश के आगे अपना एक शब्द जुड़वाइए।

और अब पहले दिन की पर्चियाँ

पृष्ठ 53, 58

?

हमारी ओर से: पहले दिन आपने लिखा था कि ग्रंथ में लिखी बात को लोगों का असल व्यवहार मानें या नहीं। अब आप उसमें क्या जोड़ेंगे?

लिफ़ाफ़ा खोलिए और हर बच्चे को उसकी पर्ची लौटाइए। हर बच्चा पर्ची के नीचे एक पंक्ति जोड़े कि अब वह क्या सोचता है, और अध्याय का कम से कम एक स्रोत लिखे जिसमें लोग ग्रंथ के नियम से अलग चलते दिखे। दो-तीन बच्चे अपनी पुरानी और नयी पंक्ति, दोनों पढ़कर सुनाएँ।

मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न

इन बारह प्रश्नों में से कौन-सा आपको सबसे कठिन लगता है, और उसका उत्तर अध्याय के किस भाग में मिलेगा?

अभ्यास के प्रश्न और उत्तर की मुख्य बात

पृष्ठ 80–81 · मुख्य बात हमारी ओर से

प्रश्नउत्तर की मुख्य बात
1. विशिष्ट परिवारों में पितृवंशिकताविरासत और सिंहासन पुत्रों को; अधिकतर राजवंश इसी पर; लचीलापन भी, जैसे प्रभावती गुप्त (पृष्ठ 55–57)
2. क्या शासक क्षत्रिय ही होते थेनहीं: मौर्य (बहस), शुंग और कण्व ब्राह्मण, शक, सातवाहन; राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर “शायद ही निर्भर करता था” (पृष्ठ 62–63)
3. द्रोण, हिडिम्बा और मातंगमानदंड लागू, समझौता, नकार; तीसरी कथा पालि बौद्ध ग्रंथ से (पृष्ठ 61–62, 65, 67)
4. बौद्ध सामाजिक अनुबंध और ‘पुरुषसूक्त’उत्पत्ति ब्रह्मा से, या मनुष्यों के अपने कर्म से; राजा क्षत्रिय, या महासम्मत्त (पृष्ठ 62, 69, 70, 72)
5. युधिष्ठिर के संदेश की सूचीभेद, गुरु, उम्र, लिंग, बंधुत्व (पृष्ठ 80)
6. विंटरविट्ज़ का कथनअनेक प्रकार की सामग्री, कई सदियाँ और कई हाथ, पूरा उपमहाद्वीप; पर सावधानी से पढ़ें (पृष्ठ 72–78)
7. एक ही रचयिता?परंपरा व्यास का नाम लेती है; रचना के चरण और 10,000 से कम से एक लाख श्लोक बताते हैं: नहीं (पृष्ठ 74–75)
8. स्त्री-पुरुष की विषमताएँवंश, विवाह और संपत्ति के नियम पुरुषों के पक्ष में; स्त्रीधन, द्रौपदी, प्रभावती गुप्त (पृष्ठ 55–60, 68–69)
9. ब्राह्मणीय नियम सर्वत्र नहींसातवाहन रानियों के गोत्र, बहुपति प्रथा, हिडिम्बा, मातंग; प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था” (पृष्ठ 58–60, 65, 67, 76–77)
10. मानचित्रदोनों मानचित्रों पर कुरु, मत्स्य, शूरसेन; इंद्रप्रस्थ, मथुरा (पृष्ठ 56)
11. दूसरी भाषाओं में पुनर्व्याख्यादो प्रसंग, दो पाठ, समानता और अंतर की तालिका (पृष्ठ 77–78)
12. एकलव्य अपने दृष्टिकोण सेघटनाएँ स्रोत 7 वाली, नज़रिया चुने हुए पात्र का (पृष्ठ 62)

पूरे नमूना उत्तर शिक्षक संदर्शिका और रिवीजन नोट्स में हैं। लिखित परख के लिए प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 1 लीजिए। उत्तर जाँचते समय देखिए कि स्रोत का नाम और नंबर आया है, और किताब के “संभवत:” या “कुछ इतिहासकार” जैसे शब्द उत्तर में भी बने रहे हैं।

अध्याय का बड़ा विचार

“किसने लिखे, क्या लिखा गया और किनके लिए इनकी रचना हुई”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 53

पहले कालांश में किताब ने कहा था कि हर ग्रंथ के बारे में यह याद रखिए कि ये ग्रंथ किसने लिखे, क्या लिखा गया और किनके लिए इनकी रचना हुई। आख़िरी कालांश में यह वाक्य फिर पढ़िए। अब बच्चे अध्याय से उदाहरण देकर बता सकते हैं: संस्कृत के ब्राह्मणीय ग्रंथ मानदंड बताते हैं, जबकि अभिलेख, पालि और तमिल ग्रंथ, चीनी यात्री और महाभारत की अपनी कहानियाँ दिखाती हैं कि लोग हर जगह उन मानदंडों पर नहीं चलते थे।

मरुशाला की कहानी

दो शिक्षक, एक मरुशाला

  • भरत चौधरीभरत चौधरीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. जेठन्तरी · ब्लॉक समदड़ी, जिला बालोतरा
  • वनिता कुमारीवनिता कुमारीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. रामसीन मूंगड़ा · ब्लॉक एवं जिला बालोतरा

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