अध्याय 7 — एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर · भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2 · कक्षा 12
कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 170 से 195
यह पन्ना किसलिए — स्लाइड शो कक्षा में चलाने से पहले एक बार पढ़ लेने के लिए। यहाँ सारी स्लाइड एक के बाद एक लिखी हैं, हर एक के नीचे शिक्षक के लिए एक टिप्पणी के साथ। उद्धरण-चिह्न में सिर्फ़ किताब के शब्द हैं; जहाँ हमारी ओर से लिखा है, वह बात हमारी अपनी है। प्रोजेक्टर न हो तो यही पाठ पढ़कर, बोर्ड और चार्ट पेपर से कक्षा चल सकती है; हर कालांश का पूरा क्रम पाठ योजना में है।
बच्चों की आम भूलें शिक्षक संदर्शिका में हैं, और अध्याय की सारी तालिकाएँ रिवीजन नोट्स में। बच्चे ख़ुद पढ़ें, तो उन्हें इंटरैक्टिव अध्याय दीजिए।
कौन-सी स्लाइड किस कालांश में — पाठ योजना के हिसाब से:
- कालांश 1 — शुरू की तीन स्लाइड, फिर भाग 1: शुरुआत; 1. हम्पी की खोज
- कालांश 2 — भाग 2: 2. राय, नायक तथा सुलतान; 2.1 शासक और व्यापारी
- कालांश 3 — भाग 3: 2.2 राज्य का चरमोत्कर्ष तथा पतन; 2.3 राय तथा नायक; मानचित्र 1
- कालांश 4 — भाग 4: 3. विजयनगर : राजधानी तथा उसके परिप्रदेश; 3.1 जल–संपदा; 3.2 क़िलेबंदियाँ तथा सड़कें
- कालांश 5 — भाग 5: 3.3 शहरी केंद्र; 4. राजकीय केंद्र
- कालांश 6 — भाग 6: 4.1 महानवमी डिब्बा; 4.2 राजकीय केंद्र में स्थित अन्य भवन
- कालांश 7 — भाग 7: 5. धार्मिक केंद्र; 5.1 राजधानी का चयन; 5.2 गोपुरम् और मण्डप
- कालांश 8 — भाग 8: 6. महलों, मन्दिरों तथा बाज़ारों का अंकन
- कालांश 9 — भाग 9: 7. उत्तरों की खोज में प्रश्न
- कालांश 10 — भाग 10: काल-रेखा 1 और 2, मानचित्र कार्य, और पहले दिन की पर्चियाँ
- कालांश 11 — आख़िरी भाग: मूल्यांकन, अभ्यास के 12 प्रश्न
पहले यह पढ़िए — खंडहर, अभिलेख और यात्री
पृष्ठ 170
हमारी ओर से: खंडहर, अभिलेख और यात्रियों के वृत्तांत मिलकर विजयनगर के बारे में क्या-क्या बताते हैं, और क्या नहीं बताते? यह सवाल पूरे अध्याय में साथ चलेगा।
किताब पृष्ठ 170 पर कहती है, “इन मौखिक परंपराओं के साथ–साथ पुरातात्विक खोजों, स्थापत्य के नमूनों, अभिलेखों तथा अन्य दस्तावेज़ों ने विजयनगर साम्राज्य को पुन: खोजने में विद्वानों की सहायता की।” पहले दिन बच्चे इस सवाल पर अपनी समझ से दो पंक्तियाँ लिखेंगे; अभी किसी उत्तर को ग़लत मत कहिए।
खंडहर, अभिलेख और यात्रियों के वृत्तांत मिलकर विजयनगर के बारे में क्या-क्या बताते हैं, और क्या नहीं बताते? पर्ची पर दो पंक्तियाँ लिखिए, और अपना नाम भी लिखिए।
अध्याय का नक्शा
पृष्ठ 170 से 195 · पढ़ाने का क्रम हमारी ओर से
- पहले नाम और खोज: विजयनगर, हम्पी, और मैकेन्ज़ी का सर्वेक्षण
- फिर साम्राज्य: राय, नायक और सुलतान; घोड़ों का व्यापार; चार राजवंश; 1565 का युद्ध; अमर–नायक
- फिर राजधानी: पानी, क़िलेबंदी, सड़कें और शहरी केंद्र
- फिर राजकीय केंद्र: महानवमी डिब्बा, कमल महल, हाथियों का अस्तबल, हज़ार राम मन्दिर
- फिर धार्मिक केंद्र: विरुपाक्ष, गोपुरम् और मण्डप, विट्ठल मन्दिर
- आख़िर में यह कि खंडहरों का नक्शा कैसे बना, और इमारतें क्या बताती हैं, क्या नहीं; फिर काल-रेखा
हमारी ओर से: पहले दिन की पर्चियाँ लिफ़ाफ़े में सँभालकर रखिए। कालांश 10 में, पूरा अध्याय पढ़ने के बाद, वे लौटाई जाएँगी।
1 | शुरुआत; 1. हम्पी की खोज
जो शहर उजड़ गया, उसका नाम लोगों को सैकड़ों साल बाद तक कैसे याद रह सकता है?
विजय का शहर
पृष्ठ 170
- विजयनगर अथवा “विजय का शहर”: एक शहर और एक साम्राज्य, दोनों का नाम
- साम्राज्य की स्थापना चौदहवीं शताब्दी में; अपने चरमोत्कर्ष पर यह उत्तर में कृष्णा नदी से प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण तक फैला था
- 1565 में इस पर आक्रमण हुआ, इसे लूटा गया, और बाद में यह उजड़ गया
- सत्रहवीं–अठारहवीं शताब्दियों तक यह पूरी तरह विनष्ट हो गया, फिर भी कृष्णा–तुंगभद्रा दोआब के निवासियों ने इसे हम्पी नाम से याद रखा
हम्पी नाम यहाँ की स्थानीय मातृदेवी पम्पादेवी के नाम से आया। चित्र 7.1 दिखाइए: शहर के चारों ओर बनी पत्थर की दीवार का एक भाग। बच्चों से कहिए कि आगे जहाँ भी “विजयनगर” आए, वे देखें कि बात शहर की है या साम्राज्य की।
खंडहर कैसे सामने आए
पृष्ठ 170
- 1800: अभियंता और पुराविद कर्नल कॉलिन मैकेन्ज़ी, जो ईस्ट इण्डिया कंपनी में काम करते थे, हम्पी के भग्नावशेष प्रकाश में लाए और पहला सर्वेक्षण मानचित्र बनाया
- उनकी शुरुआती जानकारी विरुपाक्ष मंदिर और पम्पादेवी के पूजास्थल के पुरोहितों की स्मृतियों पर आधारित थी
- 1836 से अभिलेखकर्ता यहाँ और हम्पी के दूसरे मंदिरों से कई दर्जन अभिलेख इकट्ठा करने लगे
- 1856 से छाया चित्रकार भवनों के चित्र लेने लगे
- इतिहासकारों ने इनका मिलान विदेशी यात्रियों के वृत्तांतों से, और तेलुगु, कन्नड़, तमिल और संस्कृत साहित्य से किया
पूछिए: इतिहासकारों ने पुरोहितों की बताई बातों पर ही भरोसा क्यों नहीं किया, उनका मिलान दूसरे स्रोतों से क्यों किया? यह सवाल हमारी ओर से है।
नमूना उत्तर — क्योंकि हर स्रोत अधूरा है, और कई स्रोत मिलकर ही पक्की तस्वीर बनाते हैं।
- स्मृति: मैकेन्ज़ी की शुरुआती जानकारियाँ विरुपाक्ष मन्दिर और पम्पादेवी के पूजास्थल के पुरोहितों की स्मृतियों पर आधारित थीं (पृष्ठ 170)।
- दूसरे स्रोत: अभिलेख, भवनों के छाया चित्र, विदेशी यात्रियों के वृत्तांत, और चार भाषाओं का साहित्य; हर एक कुछ ऐसा बताता है जो बाक़ी नहीं बताते।
1836 और 1856 बोर्ड पर उनके काम के साथ लिखवाइए, अकेले नहीं: 1836 से अभिलेख, 1856 से छाया चित्र।
स्रोत 1: मैकेन्ज़ी का सर्वेक्षण किसलिए
“भारत के अतीत को बेहतर ढंग से समझने और उपनिवेश के प्रशासन को आसान बनाने के लिए”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 171 (स्रोत 1)
स्रोत 1 के अनुसार 1754 में जन्मे मैकेन्ज़ी अभियंता, सर्वेक्षक और मानचित्रकार के रूप में प्रसिद्ध हुए; 1815 में उन्हें भारत का पहला सर्वेयर जनरल बनाया गया, और 1821 में अपनी मृत्यु तक वे इसी पद पर रहे। उनका अपना मत भी स्रोत में है: “ब्रिटिश प्रशासन के सुप्रभाव में आने से पहले दक्षिण भारत खराब प्रबंधन की दुर्गति से लंबे समय तक जूझता रहा।” फिर पूछिए: क्या मैकेन्ज़ी यह जानकारी केवल इतिहास जानने के लिए इकट्ठा कर रहे थे? यह सवाल हमारी ओर से है।
नमूना उत्तर — नहीं, उनके दो उद्देश्य थे, और दूसरा शासन से जुड़ा था।
- अतीत समझना: पहला उद्देश्य भारत के अतीत को बेहतर ढंग से समझना था।
- प्रशासन: दूसरा उद्देश्य उपनिवेश का प्रशासन आसान बनाना था।
इसलिए स्रोत पढ़ते समय यह भी देखिए कि लिखने वाला कौन है और किसके लिए काम कर रहा है।
चित्र 7.2: मैकेन्ज़ी और उनके सहायक
पृष्ठ 171
- थॉमस हिकी के बनाए तैलचित्र का किसी अज्ञात चित्रकार का बनाया प्रतिरूप, लगभग 1825
- मैकेन्ज़ी के बायीं ओर दूरबीन थामे उनका चपरासी
- दायीं ओर उनके ब्राह्मण सहायक: एक जैन पंडित, और उनके पीछे तेलुगु ब्राह्मण कावलेरी वेन्तक लच्छमैया
पृष्ठ 171 के किनारे का प्रश्न पूछिए: चित्रकार ने मैकेन्ज़ी और उनके देशज सूचनादाताओं को किस प्रकार दिखाया है, और दर्शकों के मन में उनके बारे में कैसे विचार डालने का प्रयास किया गया है?
नमूना उत्तर — बच्चे चित्र 7.2 ध्यान से देखकर अपनी राय लिखें; किताब से ये बातें काम आएँगी।
- क्या देखें: किसे बीच में और प्रमुख दिखाया गया है, और सूचनादाता किस मुद्रा में खड़े हैं।
- चित्र का शीर्षक: “मैकेन्ज़ी और उनके सहायक”; कैप्शन में दायीं ओर दो ब्राह्मण सहायक (एक जैन पंडित और कावलेरी वेन्तक लच्छमैया) और बायीं ओर दूरबीन थामे उनका चपरासी है।
- मैकेन्ज़ी का नज़रिया: स्रोत 1 में वे ब्रिटिश प्रशासन से पहले के दक्षिण भारत को “खराब प्रबंधन की दुर्गति” में बताते हैं। हमारी ओर से: सोचिए कि क्या चित्र भी यही संदेश देता है कि ज्ञान का श्रेय अंग्रेज़ अधिकारी का है और भारतीय जानकार केवल सहायक हैं।
हर राय ठीक है, अगर वह चित्र या स्रोत 1 की किसी बात से जुड़ी हो।
2 | 2. राय, नायक तथा सुलतान; 2.1 शासक और व्यापारी
अगर किसी राज्य की सेना घोड़ों पर टिकी हो, और घोड़े दूर देशों से आते हों, तो उस राज्य के लिए घोड़ों के व्यापारी कितने ज़रूरी होंगे?
स्थापना और लोग
पृष्ठ 171–172
- “परंपरा और अभिलेखीय साक्ष्यों के अनुसार” साम्राज्य की स्थापना दो भाइयों, हरिहर और बुक्का, ने 1336 में की
- इसकी अस्थिर सीमाओं में अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले और अलग-अलग धार्मिक परंपराएँ मानने वाले लोग रहते थे
- शासक स्वयं को राय कहते थे; इतिहासकार “विजयनगर साम्राज्य” कहते हैं, पर समकालीन लोगों के लिए यह कर्नाटक साम्राज्यमु था
पूछिए: किताब यहाँ “परंपरा और अभिलेखीय साक्ष्यों के अनुसार” क्यों लिखती है? यह सवाल हमारी ओर से है।
नमूना उत्तर — क्योंकि किताब बताना चाहती है कि यह बात किन स्रोतों से पता चली।
- परंपरा: लोगों में चली आती बात, जैसे विरुपाक्ष मन्दिर और पम्पादेवी के पूजास्थल के पुरोहितों की स्मृतियाँ (पृष्ठ 170)।
- अभिलेखीय साक्ष्य: अभिलेख, जिन्हें 1836 से इकट्ठा किया जाने लगा था।
इतिहास में स्रोत बताना उतना ही ज़रूरी है जितना साल बताना।
पड़ोसी, संघर्ष और पुरानी परंपराएँ
पृष्ठ 171–172
- उत्तरी सीमाओं पर विजयनगर के शासकों का संघर्ष दक्कन के सुलतानों और उड़ीसा के गजपति शासकों से था
- यह संघर्ष “उर्वर नदी घाटियों तथा लाभकारी विदेशी व्यापार से उत्पन्न संपदा पर अधिकार के लिए” था
- इन राज्यों के संपर्क से विचारों का आदान-प्रदान भी हुआ, “विशेष रूप से स्थापत्य के क्षेत्र में”
- पहले के राज्य: तमिलनाडु में चोल, कर्नाटक में होयसाल; इनके शासक वर्ग ने विशाल मंदिरों को संरक्षण दिया, जैसे तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर और बेलूर के चन्नकेशव मंदिर को
- राय इन परंपराओं को आगे बढ़ाकर नयी ऊँचाइयों तक ले गए
बोर्ड पर दो खाने बनाइए: किस पर संघर्ष और किसका आदान-प्रदान। बच्चे इस स्लाइड की बातें सही खाने में लिखें। यह याद दिलाइए कि संघर्ष और आदान-प्रदान, दोनों साथ-साथ चलते थे; यही बात पृष्ठ 174 पर सुलतानों और रायों के संबंधों में भी दिखती है।
घोड़े, व्यापारी और बाज़ार
पृष्ठ 172
घोड़े
- चौदहवीं से सोलहवीं सदी में युद्धकला “प्रभावशाली अश्वसेना पर आधारित” थी
- इसलिए अरब और मध्य एशिया से घोड़ों का आयात बहुत ज़रूरी था
- आरंभ में यह व्यापार अरब व्यापारियों के हाथ में था; स्थानीय व्यापारियों के समूह कुदिरई चेट्टी अथवा घोड़ों के व्यापारी भी इसमें भाग लेते थे
पुर्तगाली और बाज़ार
- 1498 से पुर्तगाली उपमहाद्वीप के पश्चिमी तट पर आए और व्यापारिक और सामरिक केंद्र स्थापित करने का प्रयास करने लगे
- उनकी बेहतर सामरिक तकनीक, विशेषकर बंदूकों के प्रयोग, ने उन्हें 1498 के बाद की उलझी हुई राजनीति में एक महत्त्वपूर्ण शक्ति बनने में मदद की
- विजयनगर मसालों, वस्त्रों और रत्नों के बाज़ारों के लिए प्रसिद्ध था; ऐसे शहरों के लिए व्यापार “एक प्रतिष्ठा का मानक” था
यह चित्र चार्ट पेपर पर बनाइए: बाईं ओर घोड़े और उनके व्यापारी, दाईं ओर पुर्तगाली और बाज़ार, नीचे एक तीर, जिस पर लिखिए: व्यापार का राजस्व राज्य की समृद्धि बढ़ाता था। फिर पूछिए: व्यापार को “प्रतिष्ठा का मानक” क्यों कहा गया होगा? यह सवाल हमारी ओर से है।
नमूना उत्तर — क्योंकि व्यापार से शहर और राज्य, दोनों की शान दिखती थी।
- जनता: किताब के अनुसार समृद्ध जनता मँहगी विदेशी वस्तुएँ चाहती थी, विशेषकर रत्न और आभूषण।
- राज्य: व्यापार से मिलने वाला राजस्व राज्य की समृद्धि बढ़ाता था।
यानी जिस शहर के बाज़ार भरे हों, वह शहर और उसका राजा, दोनों धनी और प्रतिष्ठित माने जाते थे।
हाथी, घोड़े और लोग
पृष्ठ 172
- गजपति: हाथियों का स्वामी; पंद्रहवीं शताब्दी में उड़ीसा के एक शक्तिशाली शासक वंश का नाम
- अश्वपति: घोड़ों का स्वामी; दक्कन के सुल्तानों के लिए
- नरपति: लोगों का स्वामी; विजयनगर के रायों के लिए
पृष्ठ 172 का बॉक्स पढ़िए। फिर पूछिए: इन तीन नामों से हर शासक की किस ताक़त का पता चलता है? यह सवाल हमारी ओर से है।
नमूना उत्तर — हर नाम शासक को एक चीज़ का स्वामी बताता है।
- गजपति: हाथियों का।
- अश्वपति: घोड़ों का।
- नरपति: लोगों का।
गजपति पंद्रहवीं शताब्दी में उड़ीसा के एक शक्तिशाली शासक वंश का नाम भी था; अश्वपति और नरपति के नाम विजयनगर की लोक प्रचलित परंपराओं में मिलते हैं।
3 | 2.2 राज्य का चरमोत्कर्ष तथा पतन; 2.3 राय तथा नायक; मानचित्र 1
क्या अलग-अलग धर्मों को मानने वाले शासक हमेशा एक-दूसरे के शत्रु ही रहे होंगे?
चार राजवंश
पृष्ठ 173
| राजवंश | किताब में |
|---|---|
| संगम | पहला राजवंश; 1485 तक नियंत्रण |
| सुलुव | सैनिक कमांडर; 1503 तक सत्ता में |
| तुलुव | कृष्णदेव राय इसी वंश के; उनका शासनकाल 1509–29 |
| अराविदु | 1542 तक केंद्र पर नियंत्रण इनके हाथ में; सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक सत्ता में |
कृष्णदेव राय के शासन की विशेषता “विस्तार और दृढ़ीकरण” थी: 1512 में तुंगभद्रा और कृष्णा के बीच का रायचूर दोआब हासिल हुआ, 1514 में उड़ीसा के शासकों का दमन हुआ, और 1520 में बीजापुर के सुल्तान की करारी हार हुई। राज्य हमेशा सामरिक रूप से तैयार रहता था, फिर भी यह “अतुलनीय शांति और समृद्धि की स्थितियों में फला–फूला”। कई दक्षिण भारतीय मंदिरों में भव्य गोपुरम जोड़ने का श्रेय कृष्णदेव को जाता है, और उन्होंने अपनी माँ के नाम पर विजयनगर के पास नगलपुरम् नाम का उपनगर भी बसाया। बच्चे तीन साल और तीन घटनाएँ कॉपी में जोड़कर लिखें।
स्रोत 2: राजा और व्यापारी
“एक राजा को अपने बन्दरगाहों को सुधारना चाहिए और वाणिज्य को इस प्रकार प्रोत्साहित करना चाहिए कि घोड़ों, हाथियों, रत्नों, चंदन, मोती तथा अन्य वस्तुओं का खुले तौर पर आयात किया जा सके”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 173 (स्रोत 2)
यह कृष्णदेव राय की तेलुगु में लिखी शासनकला की कृति अमुक्तमल्यद से है। स्रोत का आख़िरी वाक्य भी पढ़िए: “ऐसा करने पर ये वस्तुएँ कभी भी तुम्हारे दुश्मनों तक नहीं पहुँचेंगी।” फिर पृष्ठ 173 के किनारे का प्रश्न पूछिए: “आपके विचार में राजा व्यापार को प्रोत्साहित करने का इच्छुक क्यों था? इन विनिमयों से किन समूहों को लाभ पहुँचा होगा?”
नमूना उत्तर — राजा को घोड़े, हाथी और राजस्व चाहिए थे, और वह नहीं चाहता था कि ये चीज़ें उसके दुश्मनों तक पहुँचें।
- क्यों: युद्धकला अश्वसेना पर आधारित थी; व्यापार प्रतिष्ठा का मानक था और उसका राजस्व राज्य की समृद्धि बढ़ाता था; और व्यापारियों को अपने साथ जोड़ने पर ये वस्तुएँ दुश्मनों तक नहीं पहुँचतीं।
- किन्हें लाभ: राजा और राज्य को घोड़े, हाथी और राजस्व; दूर देशों के व्यापारियों को तोहफ़े और उचित मुनाफ़ा; और समृद्ध जनता को रत्न और आभूषण जैसी विदेशी वस्तुएँ।
यह स्रोत पृष्ठ 172 की घोड़ों के आयात वाली बात को राजा के अपने शब्दों में कहता है।
1529 से 1565 तक
पृष्ठ 173–174
केंद्र में तनाव
- 1529 में कृष्णदेव की मृत्यु के बाद राजकीय ढाँचे में तनाव आया
- उत्तराधिकारियों को विद्रोही नायकों या सेनापतियों की चुनौती मिली
- 1542 तक केंद्र पर अराविदु वंश का नियंत्रण हो गया
1565 का युद्ध
- राक्षसी–तांगड़ी (तालीकोटा) का युद्ध
- विजयनगर की सेना प्रधानमंत्री रामराय के नेतृत्व में; बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुण्डा की संयुक्त सेनाओं से करारी हार
- विजयी सेनाओं ने विजयनगर शहर को लूटा; कुछ ही वर्षों में शहर उजड़ गया
- साम्राज्य का केंद्र पूर्व की ओर गया: अराविदु वंश ने पेनुकोण्डा से, और बाद में चन्द्रगिरी (तिरुपति के समीप) से शासन किया
किताब पृष्ठ 174 पर कहती है कि सुलतान और राय “धार्मिक भिन्नताएँ होने पर भी हमेशा या अपरिहार्य रूप से शत्रुतापूर्ण नहीं रहते थे।” उदाहरण पढ़िए: कृष्णदेव राय ने सल्तनतों में सत्ता के कई दावेदारों का समर्थन किया और “यवन राज्य की स्थापना करने वाला” विरुद धारण किया; बीजापुर के सुल्तान ने कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर में उत्तराधिकार का विवाद सुलझाने के लिए हस्तक्षेप किया। फिर पूछिए: पृष्ठ 173–174 के अनुसार 1565 की हार तक बात कैसे पहुँची?
नमूना उत्तर — दो बातें मिलकर।
- सल्तनतों का मैत्री–समझौता (पृष्ठ 173): सामरिक महत्त्वाकांक्षाओं के चलते समीकरण बदलते रहे, और अंतत: दक्कन सल्तनतों के बीच विजयनगर के विरुद्ध मैत्री–समझौता हुआ।
- रामराय की जोखिम भरी नीति (पृष्ठ 174): उसने एक सुलतान को दूसरे के विरुद्ध करने की कोशिश की, किंतु सुल्तान एक हो गए और उन्होंने उसे निर्णायक रूप से पराजित किया।
यानी किताब इस हार के पीछे दोनों बातें रखती है, और साथ ही कहती है कि धार्मिक भिन्नताएँ होने पर भी संबंध हमेशा शत्रुतापूर्ण नहीं थे। यवन का अर्थ भी पृष्ठ 174 के बॉक्स से पढ़िए: यह संस्कृत का शब्द है, जो यूनानियों और उत्तर–पश्चिम से उपमहाद्वीप में आने वाले दूसरे लोगों के लिए प्रयोग होता था।
नायक और अमर–नायक
पृष्ठ 175
- नायक सेना प्रमुख थे, जो आम तौर पर किलों पर नियंत्रण रखते थे और जिनके पास सशस्त्र समर्थक होते थे; वे आम तौर पर तेलुगु या कन्नड़ बोलते थे
- “अमर–नायक प्रणाली विजयनगर साम्राज्य की एक प्रमुख राजनीतिक खोज थी।”
- अमर–नायक सैनिक कमांडर थे, जिन्हें राय प्रशासन के लिए राज्य–क्षेत्र देते थे
- वे किसानों, शिल्पकर्मियों और व्यापारियों से भू राजस्व और दूसरे कर वसूलते थे; कुछ भाग अपने उपयोग और घोड़ों–हाथियों के दल के लिए रखते थे, और कुछ भाग मन्दिरों और सिंचाई के साधनों के रख–रखाव पर ख़र्च होता था
- वे वर्ष में एक बार राजा को भेंट भेजते थे; ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रणाली के कई तत्त्व दिल्ली सल्तनत की इक्ता प्रणाली से लिए गए थे
- सत्रहवीं शताब्दी में इनमें से कई नायकों ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए
मानचित्र 1 (पृष्ठ 174) खोलिए और किनारे का प्रश्न पूछिए: “उन आधुनिक राज्यों को चिह्नित कीजिए जो विजयनगर साम्राज्य का भाग थे।”
नमूना उत्तर — मानचित्र 1 को आज के भारत के राजनीतिक मानचित्र से मिलाकर।
- किताब क्या देती है: पृष्ठ 170 का पाठ: साम्राज्य अपने चरमोत्कर्ष पर उत्तर में कृष्णा नदी से लेकर प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण तक फैला था। मानचित्र 1 एक रेखाचित्र है (“पैमाना नहीं दिया गया है”), जिस पर शहरों के बिंदु हैं, साम्राज्य की सीमा-रेखा नहीं।
- बच्चे क्या करें: आज के राजनीतिक मानचित्र पर कृष्णा नदी से सुदूर दक्षिण तक के राज्य पहचानें, और मानचित्र 1 के शहरों से मिलाएँ।
फिर पृष्ठ 175 की चर्चा का पहला काम करवाइए: मानचित्र 1 पर चन्द्रगिरी, मदुरई, इक्केरी, तंजावुर और मैसूर ढूँढिए, जो नायक शक्ति के केंद्र थे। मानचित्र पर इक्केरी “केरी” और चन्द्रगिरी “चंद्रगिरि” नाम से छपे हैं। गुलाबी बॉक्स से: अमर संस्कृत के समर (लड़ाई या युद्ध) से आया माना जाता है, और फ़ारसी अमीर (ऊँचे पद का कुलीन व्यक्ति) से मिलता–जुलता है।
4 | 3. विजयनगर : राजधानी तथा उसके परिप्रदेश; 3.1 जल–संपदा; 3.2 क़िलेबंदियाँ तथा सड़कें
अगर कोई शहर देश के सबसे सूखे इलाक़ों में से एक में बसा हो, तो वहाँ के राजा को सबसे पहले किस चीज़ का इंतज़ाम करना पड़ेगा?
शहर का नक्शा (चित्र 7.4)
पृष्ठ 176
- किताब के अनुसार विजयनगर, अधिकांश राजधानियों की तरह, “एक विशिष्ट भौतिक रूपरेखा तथा स्थापत्य शैली से अभिलक्षित” था
- चित्र 7.4 पर छपे नाम: तुंगभद्रा, अनेगंदी, हम्पी, पवित्र केंद्र, शाही केंद्र, केंद्रीय भाग
- नक्शे पर पैमाना (0, 0.5 और 1.0 किलोमीटर) और उत्तर दिशा का तीर भी है
नक्शा बोर्ड पर मोटी रेखाओं में बनाइए: ऊपर नदी, फिर तीन अंचल। फिर पृष्ठ 176 के किनारे का प्रश्न पूछिए: “नक्शे पर बने तीन अंचलों को पहचानिए। मध्यभाग को ध्यान से देखिए। क्या आप नदियों से जुड़ती हुई नहरों को देख सकते हैं? आप कितनी किलेबन्द दीवारों को देख सकते हैं। क्या धार्मिक केंद्र किलेबन्द था?”
नमूना उत्तर — नक्शा और पृष्ठ 177–178 का पाठ साथ रखकर।
- तीन अंचल: नक्शे पर पवित्र केंद्र, शाही केंद्र और केंद्रीय भाग छपे हैं; पाठ में धार्मिक केंद्र, राजकीय केंद्र और शहरी केंद्र की बात है; नक्शे के नामों को पाठ के नामों से जोड़ना हमारी ओर से है।
- नहरें: पृष्ठ 177 के अनुसार हिरिया नहर में तुंगभद्रा पर बने बाँध से पानी आता था, और कमलपुरम् जलाशय का पानी एक नहर से “राजकीय केंद्र” तक जाता था।
- दीवारें: पृष्ठ 177–178 तीन क़िलेबंदियाँ बताते हैं: सबसे बाहरी दीवार शहर के चारों ओर बनी पहाड़ियों को आपस में जोड़ती थी (पृष्ठ 177), दूसरी नगरीय केंद्र के आंतरिक भाग के चारों ओर थी, और तीसरी शासकीय केंद्र के चारों ओर।
- धार्मिक केंद्र: बच्चे नक्शे में देखकर बताएँ कि उसके चारों ओर कोई दीवार दिखती है या नहीं।
शहर के बारे में खोज: अभिलेख और यात्री
पृष्ठ 176
- विजयनगर के राजाओं और उनके नायकों के बड़ी संख्या में अभिलेख मिले हैं, जिनमें मन्दिरों को दिए दानों और महत्त्वपूर्ण घटनाओं का विवरण है
- पंद्रहवीं शताब्दी में आए: निकोलो दे कॉन्ती (इतालवी व्यापारी), अब्दुर रज़्ज़ाक (फ़ारस के राजा का दूत), अफ़ानासी निकितिन (रूस का एक व्यापारी)
- सोलहवीं शताब्दी में आए: दुआर्ते बरबोसा, डोमिंगो पेस, और पुर्तगाल का फर्नाओ नूनिज़
बोर्ड पर दो खानों की तालिका बनवाइए: पंद्रहवीं शताब्दी और सोलहवीं शताब्दी, हर नाम के आगे वह जिस देश से आया। पृष्ठ 176 पर कॉन्ती (इतालवी), रज़्ज़ाक (फ़ारस), निकितिन (रूस) और नूनिज़ (पुर्तगाल) के देश लिखे हैं; पृष्ठ 179 पर बरबोसा को “पुर्तगाली यात्री” कहा गया है; पेस का खाना ख़ाली रहने दीजिए। यह तालिका कालांश 10 के मानचित्र कार्य (प्रश्न 10) में फिर काम आएगी, इसलिए बच्चे इसे कॉपी में सँभालकर रखें।
स्रोत 3: विशाल, फैला हुआ शहर
“वहाँ से मैंने जो देखा वह मुझे रोम जितना विशाल प्रतीत हुआ, और देखने में अत्यंत सुन्दर”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 176 (स्रोत 3)
यह डोमिंगो पेस का वर्णन है। वे लिखते हैं कि शहर एक जगह से पूरा नहीं दिखता, क्योंकि यह कई पर्वत शृंखलाओं के बीच है; उन्होंने पेड़ों के उपवन, आवासों के बगीचे, पानी की नालियाँ, झीलें, और राजा के महल के पास खजूर के पेड़ों का बगीचा देखा। फिर पृष्ठ 176 के किनारे का प्रश्न पूछिए: “क्या आप आज किसी शहर में ये अभिलक्षण देख सकते हैं? आपके विचार में पेस ने उद्यानों तथा जल–स्रोतों को विशेष–उल्लेख के लिए क्यों चुना?”
नमूना उत्तर — पहले भाग का उत्तर बच्चे अपने देखे शहरों से दें; दूसरे भाग का उत्तर किताब से जुड़ता है।
- आज के शहर: बगीचे, झीलें या पानी की नालियाँ जहाँ भी दिखें, बच्चे उनके नाम लें।
- पेस ने क्यों चुना: पृष्ठ 177 बताता है कि यह इलाक़ा “प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक” था। ऐसी जगह इतना पानी और इतने बगीचे देखना किसी भी यात्री को चौंकाता।
उत्तर के दूसरे भाग में यह जोड़ हमारी ओर से है; बच्चे इसे पृष्ठ 177 की उसी पंक्ति से जोड़कर लिखें।
जल–संपदा
पृष्ठ 177
- तुंगभद्रा नदी यहाँ एक प्राकृतिक कुण्ड बनाती है और उत्तर–पूर्व दिशा में बहती है
- ग्रेनाइट की पहाड़ियाँ शहर के चारों ओर “करधनी” जैसी लगती हैं; उनसे कई जल–धाराएँ आकर नदी में मिलती हैं
- लगभग सभी धाराओं पर बाँध बनाकर अलग–अलग आकार के हौज़ बनाए गए, क्योंकि यह “प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक” था
- कमलपुरम् जलाशय: सबसे महत्त्वपूर्ण हौज़ों में से एक, पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों का; इससे खेत सींचे जाते थे और एक नहर से पानी “राजकीय केंद्र” तक जाता था
- हिरिया नहर: तुंगभद्रा पर बने बाँध से पानी लाती थी, और “धार्मिक केंद्र” को “शहरी केंद्र” से अलग करने वाली घाटी को सींचती थी; संभवत: संगम वंश के राजाओं ने बनवाई
चित्र 7.5 दिखाइए: राजकीय केंद्र की ओर जाती एक कृत्रिम जल प्रणाली। बोर्ड पर पानी का रास्ता तीरों से बनवाइए: पहाड़ियाँ, धाराएँ, बाँध, हौज़, नहर, खेत और राजकीय केंद्र। यही रास्ता अभ्यास के प्रश्न 2 (“विजयनगर की जल–आवश्यकताओं को किस प्रकार पूरा किया जाता था?”) का ढाँचा है।
स्रोत 4: हौज़ कैसे बनते थे
“जलाशय में मैंने इतने लोगों को कार्य करते देखा कि वहाँ पन्द्रह से बीस हज़ार आदमी थे, चीटियों की तरह…”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 177 (स्रोत 4)
यह कृष्णदेव राय के बनवाए जलाशय के बारे में पेस का वर्णन है। उसके अनुसार जलाशय दो पहाड़ियों के बीच बना, पानी 9 मील (लगभग 15 किमी) से भी अधिक दूर से पाइपों में आता था, जलाशय में चित्र उकेरे तीन विशाल स्तंभ थे, और इसे बनाने के लिए राजा ने एक पूरी पहाड़ी तुड़वा दी। फिर पूछिए: इस वर्णन से राजा के बारे में क्या पता चलता है? यह सवाल हमारी ओर से है।
नमूना उत्तर — कि राजा पानी के काम पर बहुत बड़े साधन लगा सकता था।
- लोग: पेस ने वहाँ पन्द्रह से बीस हज़ार आदमी काम करते देखे।
- काम का आकार: दूर से पाइपों में पानी लाना, और एक पूरी पहाड़ी तुड़वाना।
- किसलिए: पेस के अनुसार इसी पानी से बगीचों और धान के खेतों की सिंचाई होती थी।
सूखे इलाक़े में पानी का इंतज़ाम ही शहर और खेतों, दोनों को चलाता था।
क़िलेबंदी: दुर्गों की सात पंक्तियाँ
पृष्ठ 177–178
अब्दुर रज़्ज़ाक ने क्या देखा
- पंद्रहवीं शताब्दी में फ़ारस के शासक का दूत, जिसे कालीकट (कोज़ीकोड) भेजा गया था
- उसने “दुर्गों की सात पंक्तियों” का उल्लेख किया
- इनसे शहर के साथ आसपास की खेती की ज़मीन और जंगल भी घिरे थे
दीवार कैसे बनी
- सबसे बाहरी दीवार शहर के चारों ओर की पहाड़ियों को जोड़ती थी
- गारा या जोड़ने की कोई वस्तु नहीं; पत्थर के टुकड़े फानाकार थे, इसलिए अपनी जगह टिके रहते थे
- अंदर का भाग मिट्टी और मलबे से भरा; वर्गाकार और आयताकार बुर्ज़ बाहर निकले हुए
पृष्ठ 178 के अनुसार दूसरी क़िलेबंदी नगरीय केंद्र के आंतरिक भाग के चारों ओर थी, और तीसरी शासकीय केंद्र के चारों ओर, जहाँ महत्त्वपूर्ण इमारतों के हर समूह की अपनी ऊँची दीवारें थीं। बोर्ड पर तीन घेरे बनवाइए, एक के भीतर एक, और हर घेरे पर लिखवाइए कि वह किसे घेरता है।
खेत भी दीवारों के भीतर
पृष्ठ 178
- अब्दुर रज़्ज़ाक के अनुसार पहली, दूसरी और तीसरी दीवारों के बीच जुते हुए खेत, बग़ीचे और आवास थे
- पेस: “इस पहली परिधि से शहर में प्रवेश करने तक की दूरी बहुत है, जिसमें खेत हैं जहाँ वे धान उगाते हैं और कई उद्यान हैं और बहुत जल जो दो झीलों से लाया जाता है।”
- आज के पुरातत्त्वविदों ने धार्मिक केंद्र और नगरीय केंद्र के बीच एक कृषि क्षेत्र के साक्ष्य खोजे हैं, जो तुंगभद्रा के पानी वाली एक व्यापक नहर प्रणाली से सींचा जाता था
किताब ख़ुद पूछती है: “आपके विचार में कृषि–क्षेत्रों को क़िलेबंद भूभाग में क्यों समाहित किया जाता था?” यही अभ्यास का प्रश्न 3 है: “शहर के क़िलेबंद क्षेत्र में कृषि क्षेत्र को रखने के आपके विचार में क्या फ़ायदे और नुकसान थे?”
नमूना उत्तर — फ़ायदा घेराबंदी से बचाव था, और नुकसान उसका ख़र्च।
- घेराबंदी: किताब के अनुसार अक्सर मध्यकालीन घेराबंदियों का मुख्य उद्देश्य प्रतिपक्ष को खाद्य सामग्री से वंचित कर समर्पण के लिए बाध्य करना होता था, और ये कई महीनों, यहाँ तक कि वर्षों, तक चल सकती थीं।
- दूसरे शासक: आम तौर पर वे क़िलेबंद क्षेत्र के भीतर विशाल अन्नागार बनवाते थे।
- विजयनगर: यहाँ के शासकों ने पूरे कृषि भूभाग को बचाने के लिए “एक अधिक मँहगी तथा व्यापक नीति” अपनाई।
नुकसान के रूप में किताब का अपना शब्द “मँहगी” ही काफ़ी है; बच्चे इसमें जो और नुकसान जोड़ें, जैसे इतनी लंबी दीवारों की रखवाली, वह उनकी अपनी सोच है और उत्तर में ऐसा लिखा भी जाए।
5 | 3.3 शहरी केंद्र; 4. राजकीय केंद्र
किसी पुराने शहर में आम लोगों के घर क्यों नहीं बचते, जबकि पत्थर के मन्दिर बच जाते हैं?
प्रवेशद्वार और सड़कें
पृष्ठ 178
- दुर्ग के प्रवेशद्वार अच्छी तरह सुरक्षित थे और शहर को मुख्य सड़कों से जोड़ते थे
- क़िलेबंद बस्ती के प्रवेशद्वार की मेहराब और द्वार के ऊपर की गुंबद (चित्र 7.6) तुर्की सुल्तानों द्वारा प्रवर्तित स्थापत्य के चारित्रिक तत्त्व माने जाते हैं; कला–इतिहासकार इस शैली को इंडो–इस्लामिक (हिंद–इस्लामी) कहते हैं
- सड़कें सामान्यत: पहाड़ी भूभाग से बचकर घाटियों से होकर जाती थीं; सबसे महत्त्वपूर्ण सड़कों में से कई मंदिर के प्रवेशद्वारों से आगे बढ़ी हुई थीं, और उनके दोनों ओर बाज़ार थे
चित्र 7.6 (क़िलेबंद दीवार में बना एक प्रवेशद्वार) और चित्र 7.7 (एक गोपुरम्) साथ दिखाइए, फिर पृष्ठ 178 के किनारे का प्रश्न पूछिए: “इन दो प्रवेश–द्वारों के बीच समानताओं तथा विभिन्नताओं का वर्णन कीजिए। आपके विचार में विजयनगर के शासकों ने इण्डो–इस्लामी स्थापत्य के तत्त्वों को क्यों अपनाया?”
नमूना उत्तर — दोनों प्रवेश के रास्ते हैं, पर बनावट अलग है।
- समानता: दोनों प्रवेश को नियंत्रित करते हैं; किताब कहती है कि प्रवेशद्वार अकसर उन संरचनाओं को परिभाषित करते थे जिनमें प्रवेश को वे नियंत्रित करते थे।
- विभिन्नता: चित्र 7.6 में मेहराब और ऊपर गुंबद है; चित्र 7.7 का गोपुरम् एक ऊँचा, कई तलों वाला मीनारनुमा प्रवेशद्वार है।
- क्यों अपनाया: पृष्ठ 171 बताता है कि पड़ोसी राज्यों के संपर्क से विचारों का आदान-प्रदान हुआ, “विशेष रूप से स्थापत्य के क्षेत्र में”, और विजयनगर के शासकों ने अवधारणाएँ और भवन निर्माण की तकनीकें ग्रहण करके उन्हें आगे विकसित किया।
तीसरी बात को इस प्रश्न से जोड़ना हमारी ओर से है।
शहरी केंद्र
पृष्ठ 178–179
- सामान्य लोगों के आवासों के अपेक्षाकृत कम पुरातात्विक साक्ष्य हैं
- कुछ स्थानों पर, जिनमें शहरी केंद्र का उत्तर–पूर्वी कोना भी है, परिष्कृत चीनी मिट्टी मिली है; पुरातत्त्वविदों का सुझाव है कि हो सकता है वहाँ अमीर व्यापारी रहते हों
- यह मुस्लिम रिहायशी मुहल्ला भी था; यहाँ के मक़बरों और मस्ज़िदों का स्थापत्य हम्पी के मन्दिरों के मण्डपों से मिलता–जुलता है
- बरबोसा: “लोगों के अन्य आवास छप्पर के हैं, पर फिर भी सुदृढ़ हैं, और व्यवसाय के आधार पर कई खुले स्थानों वाली लंबी गलियों में व्यवस्थित हैं।”
- क्षेत्र–सर्वेक्षणों के अनुसार यहाँ बहुत से पूजा स्थल और छोटे मन्दिर थे; कुएँ, बरसात के पानी वाले जलाशय और मन्दिरों के जलाशय संभवत: सामान्य नगर निवासियों के लिए पानी के स्रोत थे
हुक का उत्तर यहीं है: पृष्ठ 179 के अनुसार सामान्य लोगों के आवास “अब अस्तित्व में नहीं हैं”, और बरबोसा के वर्णन में वे छप्पर के थे; पृष्ठ 180 के अनुसार मन्दिर पूरी तरह राजगिरी से बने थे, जबकि धर्मेतर भवनों की अधिरचना विकारी वस्तुओं से। छप्पर को कारण मानना हमारी ओर से है। चित्र 7.9 (चीनी मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े) और चित्र 7.10 (विजयनगर में एक मस्जिद) दिखाकर पृष्ठ 179 के दोनों प्रश्न पूछिए: “आपके विचार में ये टुकड़े मूलत: किस प्रकार के बर्तनों का हिस्सा थे?” और “क्या इस मस्जिद में इण्डो–इस्लामी स्थापत्य के चारित्रिक तत्त्व विद्यमान हैं?”
नमूना उत्तर — दोनों उत्तर चित्र देखकर और किताब की बातों से जोड़कर बनते हैं।
- टुकड़े: किताब इन्हें “परिष्कृत चीनी मिट्टी” कहती है और अमीर व्यापारियों से जोड़ती है; बच्चे टुकड़ों के आकार और किनारे देखकर अंदाज़ा लगाएँ कि वे कटोरे, प्याले या थाली जैसे बर्तनों के रहे होंगे। यह अंदाज़ा उनका अपना है।
- मस्जिद: पृष्ठ 178 के अनुसार मेहराब और गुंबद इण्डो–इस्लामी शैली के चारित्रिक तत्त्व हैं; बच्चे चित्र 7.10 में इन्हें ढूँढें। पृष्ठ 179 यह भी कहता है कि यहाँ के मक़बरों और मस्ज़िदों का स्थापत्य मन्दिरों के मण्डपों से मिलता–जुलता है।
पृष्ठ 179 की चर्चा भी करवाइए: “विजयनगर की रूपरेखा की तुलना अपने नगर या गाँव की रूपरेखा से कीजिए।”
राजकीय केंद्र
पृष्ठ 179–180
- राजकीय केंद्र बस्ती के दक्षिण–पश्चिमी भाग में था
- “हालाँकि इसे राजकीय केंद्र की संज्ञा दी गई है, पर इसमें 60 से भी अधिक मन्दिर सम्मिलित थे।”
- शासक इन मन्दिरों के देवी–देवताओं से संबंध के माध्यम से अपनी सत्ता स्थापित करने और उसे वैधता देने का प्रयास कर रहे थे
- लगभग तीस संरचनाओं की पहचान महलों के रूप में हुई है: अपेक्षाकृत बड़ी संरचनाएँ, जो आनुष्ठानिक कार्यों से संबद्ध नहीं होतीं
- इनमें और मन्दिरों में एक अंतर: मन्दिर पूरी तरह राजगिरी (चिनाई) से बने थे, जबकि धर्मेतर भवनों की अधिरचना विकारी, यानी नष्ट हो जाने वाली, वस्तुओं से बनी थी
पूछिए: जिस भाग में 60 से भी अधिक मन्दिर हों, उसे “राजकीय केंद्र” कहना कितना ठीक है? यह सवाल अभ्यास के प्रश्न 6 से जुड़ता है, जो पूछता है कि “शाही केंद्र” शब्द शहर के इस भाग का सही वर्णन करता है या नहीं। अभी बच्चे सिर्फ़ अपनी पहली राय लिखें; पूरा उत्तर महानवमी डिब्बा और महल (पृष्ठ 180–183) पढ़ने के बाद बनेगा।
6 | 4.1 महानवमी डिब्बा; 4.2 राजकीय केंद्र में स्थित अन्य भवन
अगर किसी पुरानी इमारत पर कोई नाम न लिखा हो, तो हम कैसे जानें कि वह किस काम के लिए बनी थी?
राजा का भवन और सभा मंडप
पृष्ठ 180
- इस क्षेत्र की कुछ अधिक विशिष्ट संरचनाओं का नामकरण भवनों के आकार और साथ ही उनके कार्यों के आधार पर किया गया है
- “राजा का भवन” अंत:क्षेत्र में सबसे विशाल है, पर इसके राजकीय आवास होने का कोई निश्चित साक्ष्य नहीं मिला है
- इसके दो सबसे प्रभावशाली मंच “सभा मंडप” और “महानवमी डिब्बा” कहलाते हैं; पूरा क्षेत्र ऊँची दोहरी दीवारों से घिरा है, जिनके बीच एक गली है
- सभा मंडप एक ऊँचा मंच है, जिसमें लकड़ी के स्तंभों के लिए पास–पास छेद हैं; स्तंभ इतने पास थे कि खुला स्थान बहुत कम बचता होगा, इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि मंडप किस प्रयोजन के लिए बना था
हुक का पहला उत्तर यहीं मिलता है: पृष्ठ 180 के अनुसार कुछ अधिक विशिष्ट संरचनाओं के नाम भवनों के आकार और उनके कार्यों के आधार पर रखे गए हैं। बोर्ड पर दो खाने बनवाइए, नाम और क्या पक्का पता है, और इस कालांश की हर इमारत उनमें लिखवाइए।
महानवमी डिब्बा: मंच और त्यौहार
पृष्ठ 180–181
मंच
- शहर के सबसे ऊँचे स्थानों में से एक पर बना विशालकाय मंच
- लगभग 11000 वर्ग फीट के आधार से 40 फीट की ऊँचाई तक
- साक्ष्य बताते हैं कि इस पर लकड़ी की एक संरचना बनी थी; आधार उभारदार उत्कीर्णन से पटा है (चित्र 7.12)
त्यौहार
- इससे जुड़े अनुष्ठान संभवत: सितंबर–अक्टूबर के दस दिन के हिंदू त्यौहार के महानवमी दिवस पर होते थे; इस त्यौहार को दशहरा, दुर्गा पूजा और नवरात्री या महानवमी नामों से जाना जाता है
- इस अवसर पर शासक “अपने रुतबे, ताक़त तथा अधिराज्य का प्रदर्शन करते थे।”
- मूर्ति की पूजा, राज्य के अश्व की पूजा, भैंसों और अन्य जानवरों की बलि; नृत्य, कुश्ती, शोभायात्राएँ, और नायकों की भेंट
- अंतिम दिन राजा अपनी और नायकों की सेना का खुले मैदान में निरीक्षण करता था; नायक बड़ी भेंट और नियत कर भी लाते थे
पृष्ठ 180 के बॉक्स में पेस सभा मंडप और महानवमी डिब्बा को मिलाकर “विजय का भवन” कहता है, और ऊपरी मंच पर कपड़े से बने कमरे, मूर्ति के पूजा स्थल और राज्य के सिंहासन का वर्णन करता है। फिर चित्र 7.12 दिखाकर पृष्ठ 180 का प्रश्न पूछिए: “क्या आप इन चित्रों के विषयों को पहचान सकते हैं?”
नमूना उत्तर — बच्चे चित्र में जो देखें, वह कहें, और उसे त्यौहार के वर्णन से मिलाएँ।
- चित्र में: उत्कीर्णन की पट्टियों में लोग, घोड़े और सैनिक दिखते हैं।
- पाठ से मिलान: पृष्ठ 181 घोड़ों, हाथियों, रथों और सैनिकों की शोभायात्रा, नृत्य और कुश्ती की बात करता है।
चित्र को पाठ से मिलाना हमारी ओर से है।
क्या यही अनुष्ठान का केंद्र था?
“राजकीय केंद्र में स्थित कई और संरचनाओं की तरह यह भी एक पहेली बना हुआ है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 181
किताब पूछती है कि क्या आज का “महानवमी डिब्बा” ही इस विस्तृत अनुष्ठान का केंद्र था। फिर पूछिए: किताब इसे पहेली क्यों कहती है?
नमूना उत्तर — क्योंकि मंच का नाम और उसका कार्य, दोनों पक्के नहीं हैं।
- जगह: विद्वानों का मानना है कि संरचना के चारों ओर का स्थान सशस्त्र आदमियों, औरतों और बड़ी संख्या में जानवरों की शोभायात्रा के लिए पर्याप्त नहीं था।
- नाम: पृष्ठ 180 के अनुसार कुछ अधिक विशिष्ट संरचनाओं के नाम भवनों के आकार और साथ ही उनके कार्यों के आधार पर रखे गए हैं।
इतिहास में “पता नहीं” कहना भी एक सही उत्तर हो सकता है, अगर उसके कारण बताए जाएँ।
अनुष्ठानों का महत्त्व
पृष्ठ 181
- किताब कहती है: “इन उत्सवों के गहन सांकेतिक अर्थ थे।”
- राजा ने सबके सामने अपनी ताक़त दिखाई, नायकों ने भेंट और कर दिए, और अंतिम दिन सेना का निरीक्षण हुआ
अभ्यास का प्रश्न 4 पूछिए: “आपके विचार में महानवमी डिब्बा से संबद्ध अनुष्ठानों का क्या महत्त्व था?”
नमूना उत्तर — ये अनुष्ठान राजा की शक्ति को सबके सामने दिखाने का अवसर थे।
- प्रदर्शन: शासक इस अवसर पर अपने रुतबे, ताक़त और अधिराज्य का प्रदर्शन करते थे।
- धर्म से जुड़ाव: मूर्ति की पूजा, राज्य के अश्व की पूजा और बलि के साथ राजा का यह उत्सव धर्मानुष्ठानों से जुड़ा था।
- नायकों की निष्ठा: प्रमुख नायक और अधीनस्थ राजा औपचारिक भेंट देते थे; अंतिम दिन नायक बड़ी मात्रा में भेंट और नियत कर भी लाते थे।
- सेना: अंतिम दिन राजा अपनी और अपने नायकों की सेना का खुले मैदान में भव्य समारोह में निरीक्षण करता था।
कालांश 3 की बात यहाँ जोड़िए: अमर–नायक भी वर्ष में एक बार राजा को भेंट भेजते थे। उत्तर के अंत में पहेली भी लिखिए: यह मंच ही अनुष्ठान का केंद्र था या नहीं, यह पक्का नहीं है।
कमल महल
पृष्ठ 181–182
- राजकीय केंद्र के सबसे सुंदर भवनों में से एक; यह नाम उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों ने रखा
- इतिहासकार निश्चित नहीं हैं कि यह भवन किस कार्य के लिए बना था
- मैकेन्ज़ी के बनाए मानचित्र से मिलने वाला एक सुझाव: यह परिषदीय सदन था, जहाँ राजा अपने परामर्शदाताओं से मिलता था
- चित्र 7.13 एक खड़ा रेखाचित्र है, यानी किसी संरचना का ऊर्ध्व अवलोकन; इसकी मेहराबें संभवत: इण्डो–इस्लामी तकनीकों से प्रभावित थीं
पृष्ठ 181 के किनारे का प्रश्न कई काम देता है: चित्र 7.13 और 7.15 के अभिलक्षणों की सूची, चित्र 7.14 की मेहराब की चित्र 7.6 से तुलना, फोटो और रेखाचित्र में मीनारें गिनना, और कमल महल का नया नाम। किताब बताती है: “कमल महल में नौ मीनारें थीं– बीच में एक ऊँची, तथा आठ उसकी भुजाओं के साथ–साथ।”
नमूना उत्तर — हर काम का उत्तर चित्रों को साथ रखकर बनता है।
- मीनारें: फोटो एक कोने से लिया गया है, इसलिए उसमें सब मीनारें एक साथ नहीं दिख सकतीं; रेखाचित्र में बच्चे ख़ुद गिनें।
- मेहराब: चित्र 7.14 की मेहराब पर फूल-पत्तियों और गुँथी हुई पट्टियों की बारीक सजावट है; बच्चे इसे चित्र 7.6 की मेहराब के पास रखकर दोनों का फ़र्क़ अपने शब्दों में लिखें।
- नया नाम: परिषदीय सदन वाले सुझाव से कोई भी नाम चल सकता है, जैसे “परामर्श भवन”; यह बच्चे का अपना नाम होगा।
उत्तर के ये तीनों बिंदु हमारी ओर से हैं।
हाथियों का अस्तबल
पृष्ठ 182
- चित्र 7.16(क): “हाथियों के अस्तबल” का खड़ा रेखाचित्र
- चित्र 7.16(ख): उसका नक्शा; किताब कहती है, “नक्शा एक संरचना का समस्तरी अवलोकन देता है।”
- चित्र 7.17: कमल महल के समीप स्थित “हाथियों का अस्तबल” की तसवीर
पृष्ठ 182 के किनारे का प्रश्न पूछिए: “चित्र 7.16(क) तथा 7.16(ख) की तुलना चित्र 7.17 से कीजिए। प्रत्येक में दिखाई देने वाले अभिलक्षणों की सूची बनाइए। क्या आपको लगता है कि ये वास्तव में हाथियों के अस्तबल थे?”
नमूना उत्तर — सूची चित्रों से बनेगी, और आख़िरी सवाल पर बच्चे कारण के साथ अपनी राय दें।
- रेखाचित्र और तसवीर: नीचे बड़ी मेहराबों की एक पंक्ति, और ऊपर गुंबद।
- नक्शा: एक कतार में बने कमरे, जो रेखाचित्र या तसवीर में नहीं दिखते।
- क्या सचमुच अस्तबल: किताब नाम को उद्धरण-चिह्न में लिखती है, और पृष्ठ 180 कहता है कि कुछ अधिक विशिष्ट संरचनाओं के नाम आकार और कार्यों के आधार पर रखे गए हैं। बच्चे देखें कि मेहराबें हाथी के निकलने लायक़ बड़ी लगती हैं या नहीं।
हर वह राय ठीक है जिसके साथ बच्चा चित्र या पाठ से कारण दे।
भवन शासकों के बारे में क्या बताते हैं
पृष्ठ 181–182
- कमल महल: नौ मीनारें, सजी हुई मेहराबें, जो “संभवत: इण्डो–इस्लामी तकनीकों से प्रभावित थीं।”
- “हाथियों का अस्तबल”: कमल महल के समीप, मेहराबों की लंबी पंक्ति और ऊपर गुंबद
- दोनों राजकीय केंद्र में हैं, और दोनों का असली काम निश्चित नहीं है
अभ्यास का प्रश्न 7 पूछिए: “कमल महल और हाथियों के अस्तबल जैसे भवनों का स्थापत्य हमें उनके बनवाने वाले शासकों के विषय में क्या बताता है?”
नमूना उत्तर — ये भवन बताते हैं कि शासक भव्य इमारतें बनवा सकते थे और दूसरी शैलियाँ अपनाने से नहीं हिचकते थे।
- दूसरी शैलियाँ: मेहराबों पर इण्डो–इस्लामी तकनीकों का संभावित प्रभाव (पृष्ठ 181); पृष्ठ 178 के अनुसार प्रवेशद्वारों की मेहराब और गुंबद भी इंडो–इस्लामिक शैली के थे।
- भव्यता: किताब कमल महल को राजकीय केंद्र के सबसे सुंदर भवनों में एक कहती है।
- सावधानी: कमल महल नाम अंग्रेज़ यात्रियों का है, और अस्तबल का नाम किताब उद्धरण-चिह्न में लिखती है; इसलिए उत्तर में “संभवत:” और “शायद” ज़रूर आएँ।
भवनों से शासकों के बारे में निष्कर्ष निकालना हमारी ओर से है; उत्तर के तथ्य किताब के हैं।
हज़ार राम मन्दिर
पृष्ठ 182–183
- राजकीय केंद्र में भी कई मन्दिर थे; इनमें एक अत्यंत दर्शनीय मन्दिर हज़ार राम मन्दिर कहलाता है
- संभवत: इसका प्रयोग केवल राजा और उनके परिवार द्वारा किया जाता था
- बीच के देवस्थल की मूर्तियाँ अब नहीं हैं, पर दीवारों के पटल सुरक्षित हैं, जिनमें आंतरिक दीवारों पर रामायण के कुछ दृश्यांश भी हैं
चित्र 7.18 दिखाइए और पृष्ठ 183 का प्रश्न पूछिए: “आपके विचार में हाथियों और घोड़ों को पटलों पर क्यों चित्रित किया गया था?” पहले बच्चे पटलों में नृत्य के दृश्य ढूँढें।
नमूना उत्तर — क्योंकि हाथी और घोड़े राजा की ताक़त से जुड़े थे।
- घोड़े: पृष्ठ 172 के अनुसार युद्धकला “प्रभावशाली अश्वसेना पर आधारित” थी।
- शोभायात्रा: पृष्ठ 181 के अनुसार महानवमी पर साज़ लगे घोड़ों, हाथियों और रथों की शोभायात्रा होती थी।
यह जोड़ हमारी ओर से है।
नायकों ने परंपरा जारी रखी
पृष्ठ 183
- शहर पर आक्रमण के बाद विजयनगर की कई संरचनाएँ विनष्ट हो गईं, पर नायकों ने महलनुमा संरचनाएँ बनाने की परंपरा जारी रखी
- इनमें से कई भवन आज भी अस्तित्व में हैं
- चित्र 7.19: मदुरई के सभा मण्डप का आंतरिक भाग; किताब कहती है, “मेहराबों को ध्यान से देखिए।”
पृष्ठ 183 की चर्चा पूछती है कि नायकों ने विजयनगर के शासकों की भवन निर्माण परंपराओं को क्यों जारी रखा।
नमूना उत्तर — क्योंकि बड़े भवन शासक की ताक़त दिखाते थे, और नायक भी अपनी शक्ति दिखाना चाहते होंगे।
- ताक़त की याद: पृष्ठ 185–186 के अनुसार ऊँचे गोपुरम् संभवत: शासकों की ताकत की याद दिलाते थे।
- नायकों की परंपरा: पृष्ठ 188 के अनुसार नायकों ने मन्दिर निर्माण की परंपराएँ भी जारी रखीं और उन्हें और व्यापक बनाया।
- नए राज्य: पृष्ठ 175 के अनुसार सत्रहवीं शताब्दी में कई नायकों ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए।
यह उत्तर हमारी ओर से है, इसलिए बच्चे “होंगे”, “शायद” जैसे शब्दों के साथ लिखें।
7 | 5. धार्मिक केंद्र: 5.1 राजधानी का चयन; 5.2 गोपुरम् और मण्डप
किसी राजधानी के लिए जगह चुनते समय शासक क्या-क्या देखते होंगे?
पहाड़ियाँ और मान्यताएँ
“स्थानीय मान्यताओं के अनुसार ये पहाड़ियाँ रामायण में उल्लिखित बाली और सुग्रीव के वानर राज्य की रक्षा करती थीं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 184
यह तुंगभद्रा नदी के तट से लगा शहर का चट्टानी उत्तरी भाग है। किताब एक और मान्यता बताती है: स्थानीय मातृदेवी पम्पादेवी ने इन पहाड़ियों में विरुपाक्ष से विवाह के लिए तप किया था, जो राज्य के संरक्षक देवता “तथा शिव का एक रूप माने जाते हैं”; यह विवाह आज तक विरुपाक्ष मन्दिर में हर वर्ष धूम–धाम से आयोजित होता है। इन पहाड़ियों में विजयनगर साम्राज्य से पहले के जैन मन्दिर भी मिले हैं।
किताब का निष्कर्ष: “यह क्षेत्र कई–धार्मिक मान्यताओं से संबद्ध था।” दोनों मान्यताएँ किताब के शब्दों में, “मान्यताओं के अनुसार” के साथ पढ़ाइए; इन्हें घटना की तरह मत लिखवाइए।
मन्दिर निर्माण का लंबा इतिहास
पृष्ठ 184
- इस क्षेत्र में मन्दिर निर्माण का इतिहास पल्लव, चालुक्य, होयसाल और चोल वंशों तक जाता है
- आमतौर पर शासक अपने आप को ईश्वर से जोड़ने के लिए मन्दिर निर्माण को प्रोत्साहन देते थे
- मन्दिर शिक्षा के केंद्र भी थे; शासक और दूसरे लोग उनके रख–रखाव के लिए भूमि या अन्य संपदा दान में देते थे
- इसलिए मन्दिर धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र बने
किताब शासकों का नज़रिया भी बताती है: “शासकों के दृष्टिकोण से मन्दिरों का निर्माण, मरम्मत तथा रखरखाव, अपनी सत्ता, संपत्ति तथा निष्ठा के लिए समर्थन तथा मान्यता के महत्त्वपूर्ण माध्यम थे।” बोर्ड पर चार शब्द लिखवाइए: धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक; हर एक के आगे बच्चे पृष्ठ 184 से एक बात भरें।
राजधानी के लिए यही जगह क्यों
“यह संभव है कि विजयनगर के स्थान का चयन वहाँ विरुपाक्ष तथा पम्पादेवी के मन्दिरों के अस्तित्व से प्रेरित था।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 184
पृष्ठ 184 की बाक़ी बातें:
- विजयनगर के शासक भगवान विरुपाक्ष की ओर से शासन करने का दावा करते थे।
- सभी राजकीय आदेशों पर सामान्यतया कन्नड़ लिपि में “श्री विरुपाक्ष” शब्द अंकित होता था।
- शासक विरुद “हिन्दू सूरतराणा” का प्रयोग करते थे; किताब के अनुसार यह अरबी शब्द सुल्तान (अर्थ राजा) का संस्कृत अनुवाद था, और इसका शाब्दिक अर्थ हिंदू सुलतान था।
- राजकीय प्रतिकृति मूर्तियाँ मन्दिरों में प्रदर्शित की जाने लगीं, और राजा की मन्दिर-यात्राएँ महत्त्वपूर्ण राजकीय अवसर बन गईं, जिनमें साम्राज्य के महत्त्वपूर्ण नायक भी साथ जाते थे।
फिर पूछिए: किताब “यह संभव है” क्यों लिखती है? यह सवाल हमारी ओर से है।
नमूना उत्तर — क्योंकि यह इतिहासकारों का अनुमान है।
- अनुमान का आधार: वहाँ पहले से विरुपाक्ष और पम्पादेवी के मन्दिर थे, और शासक विरुपाक्ष की ओर से शासन का दावा करते थे।
- पक्का क्यों नहीं: किताब यहाँ “यह संभव है कि” लिखती है, यानी यह अनुमान है।
“हिन्दू सूरतराणा” का अर्थ बच्चे वही लिखें जो किताब देती है, अपने मन से नहीं।
गोपुरम् और मण्डप
पृष्ठ 185–186
राय गोपुरम्
- विशाल स्तर पर बनी संरचनाएँ, जो राजकीय सत्ता की द्योतक थीं; सबसे अच्छा उदाहरण राय गोपुरम् या राजकीय प्रवेशद्वार (चित्र 7.7)
- ये अकसर केंद्रीय देवालयों की मीनारों को बौना प्रतीत कराते थे, और लंबी दूरी से ही मन्दिर के होने का संकेत देते थे
- ये संभवत: शासकों की ताकत की याद भी दिलाते थे, जो इतनी ऊँची मीनारों के लिए साधन, तकनीक और कौशल जुटा सकते थे
मण्डप और गलियारे
- मण्डप और लंबे स्तंभों वाले गलियारे, जो अकसर मन्दिर परिसर के देवस्थलों के चारों ओर बने थे
- चित्र 7.20: आकाश से लिया गया विरुपाक्ष मन्दिर का दृश्य
- चित्र 7.21: विरुपाक्ष मन्दिर का नक्शा; किताब के अनुसार “प्रत्येक छोटा बिंदु एक स्तंभ को दर्शाता है।”
चित्र 7.21 पर पृष्ठ 185 के किनारे का प्रश्न करवाइए: “नक्शे में दिए गए स्केल का प्रयोग कर मुख्य गोपुरम् से केंद्रीय देवालय की दूरी नापिए। जलाशय से देवालय तक जाने के लिए सबसे आसान मार्ग कौन सा रहा होगा?”
नमूना उत्तर — यह नापने का अभ्यास है; हर बच्चे की नाप थोड़ी अलग हो सकती है।
- दूरी: नक्शे की 30 मीटर वाली स्केल पट्टी रूलर से नापिए, फिर काले रंग से भरे दो मुख्य प्रवेशद्वारों में से किसी एक से “देवालय” तक की दूरी नापिए। मीटर = (नापी गई दूरी ÷ पट्टी की लंबाई) × 30। पट्टी को पूरा 30 मीटर मानना हमारी ओर से है।
- मार्ग: “जलाशय” से देवालय तक उँगली से चलकर देखिए कि बीच में कौन-से प्रवेशद्वार और स्तंभों वाले सभागार आते हैं, और सबसे कम रुकावट वाला रास्ता चुनिए।
हर बच्चा अपनी नाप और उसका तरीका लिखे; तरीका सही हो तो उत्तर ठीक है।
विरुपाक्ष मन्दिर
पृष्ठ 186–187
- यह मन्दिर कई शताब्दियों में बना; अभिलेखों से पता चलता है कि सबसे प्राचीन मन्दिर नवीं–दसवीं शताब्दियों का था
- विजयनगर साम्राज्य की स्थापना के बाद इसे कहीं अधिक बड़ा किया गया
- मुख्य मन्दिर के सामने का मण्डप कृष्णदेव राय ने अपने राज्यारोहण के उपलक्ष्य में बनवाया, और इसे सूक्ष्मता से उत्कीर्णित स्तंभों से सजाया; पूर्वी गोपुरम् का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है
- इन परिवर्धनों से केंद्रीय देवालय पूरे परिसर का एक छोटा भाग रह गया
- सभागारों में देवताओं की मूर्तियाँ संगीत, नृत्य और नाटक देखने के लिए रखी जाती थीं; कुछ में देवी–देवताओं के विवाह का उत्सव होता था, कुछ में उन्हें झूला झुलाया जाता था (चित्र 7.22, 7.25)
चित्र 7.23 (मूर्तियों वाले स्तम्भ का एक रेखाचित्र) पर पृष्ठ 186 का प्रश्न करवाइए: “स्तंभ पर आप जो देख रहे हैं उसका वर्णन कीजिए।” बच्चे स्तंभ को ऊपर से नीचे पढ़ें और हर पटल की आकृति लिखें: मनुष्य, जानवर या फूल-पत्ती, और वह क्या कर रही है। उत्तर बच्चे के अपने देखे पर टिका होगा।
फिर अभ्यास का प्रश्न 5 पूछिए: चित्र 7.33 विरुपाक्ष मन्दिर के एक अन्य स्तंभ का रेखाचित्र है; उसमें पुष्प-विषयक रूपांकन, जानवर और मानव आकृतियाँ ढूँढिए, और सोचिए कि उन्हें क्यों बनाया गया।
नमूना उत्तर — फूल, जानवर और आकृतियाँ बच्चे चित्र 7.33 को ध्यान से देखकर पहचानें।
- तुलना: चित्र 7.23 साथ रखिए; दोनों मूर्तियों वाले स्तंभ हैं।
- क्यों: पृष्ठ 186 के अनुसार ऊँचे गोपुरम् “संभवत: शासकों की ताकत की याद भी दिलाते थे”; सजे हुए स्तंभ भी यही दिखाते होंगे, यह हमारी ओर से है।
- मानव आकृतियाँ: हर आकृति के लिए लिखिए कि वह खड़ी है या बैठी, उसके हाथ में क्या है और वह क्या करती दिखती है।
“क्यों” वाला तर्क हमारी ओर से है।
विट्ठल मन्दिर और रथ गलियाँ
पृष्ठ 187–188
- विट्ठल मन्दिर के प्रमुख देवता विट्ठल थे, जो सामान्यत: महाराष्ट्र में पूजे जाने वाले विष्णु के एक रूप हैं
- कर्नाटक में इनकी पूजा आरंभ करना दिखाता है कि विजयनगर के शासकों ने “एक साम्राज्यिक संस्कृति के निर्माण के लिए” अलग-अलग परंपराओं को आत्मसात किया
- इस मन्दिर में कई सभागार और “रथ के आकार का एक अनूठा मन्दिर” है (चित्र 7.24)
- रथ गलियाँ मन्दिर के गोपुरम् से सीधी रेखा में जाती थीं; उनका फर्श पत्थर के टुकड़ों से बना था, और दोनों ओर स्तंभ वाले मण्डपों में व्यापारी अपनी दुकानें लगाते थे
- नायकों ने मन्दिर निर्माण की परंपराएँ जारी रखीं तथा और अधिक व्यापक बनाईं; कुछ सबसे दर्शनीय गोपुरम् स्थानीय नायकों ने बनवाए (चित्र 7.26: मदुरई के नायकों द्वारा बनवाया गया एक गोपुरम्)
चित्र 7.24 दिखाकर पृष्ठ 187 का प्रश्न पूछिए: “क्या आपको लगता है कि वास्तव में इस प्रकार के रथ बनाए जाते होंगे?”
नमूना उत्तर — बच्चे अपनी राय दें, और उसका कारण चित्र या पाठ से बताएँ।
- किताब क्या कहती है: चित्र 7.24 “रथ के आकार का एक अनूठा मन्दिर” है, यानी मन्दिर, चलने वाला रथ नहीं; चित्र में यह पत्थर का दिखता है।
- सोचने का सूत्र: मन्दिर परिसरों में “रथ गलियाँ” थीं; इस नाम से बच्चे अनुमान लगाएँ कि मन्दिरों से जुड़े रथ होते होंगे या नहीं।
यह सूत्र हमारी ओर से है।
पुरानी परंपराएँ, नए रूप
पृष्ठ 184–188
- पुरानी परंपरा: पल्लव, चालुक्य, होयसाल और चोल वंशों तक जाता मन्दिर निर्माण
- नए रूप: विशाल राय गोपुरम्, मण्डप और स्तंभों वाले गलियारे, रथ गलियाँ, मन्दिरों में राजकीय प्रतिकृति मूर्तियाँ
- दूसरे क्षेत्रों से: महाराष्ट्र के विट्ठल की पूजा कर्नाटक में
पृष्ठ 188 की चर्चा पूछती है: “आनुष्ठानिक स्थापत्य की पूर्ववर्ती परंपराओं को विजयनगर के शासकों ने कैसे और क्यों अपनाया तथा रूपान्तरित किया?” यही अभ्यास के प्रश्न 8 का विषय भी है: स्थापत्य की किन परंपराओं ने विजयनगर के वास्तुविदों को प्रेरित किया, और उन्होंने इनमें कैसे बदलाव किए।
नमूना उत्तर — उन्होंने पुरानी परंपराएँ अपनाईं, पड़ोसियों से तत्व लिए, और उन्हें राजकीय सत्ता के हिसाब से बड़ा किया।
- पुरानी परंपराएँ: पल्लव, चालुक्य, होयसाल और चोल वंशों तक जाता मन्दिर निर्माण (पृष्ठ 184)।
- पड़ोसियों से: प्रवेशद्वारों की मेहराब और गुंबद, इंडो–इस्लामिक शैली (पृष्ठ 178)।
- बदलाव: विशाल राय गोपुरम्, जो केंद्रीय देवालयों को बौना प्रतीत कराते थे; मण्डप और लंबे स्तंभों वाले गलियारे; रथ गलियाँ; और मन्दिरों में राजकीय प्रतिकृति मूर्तियाँ (पृष्ठ 184–188)।
- क्यों: शासक मन्दिर निर्माण से अपने को ईश्वर से जोड़ते थे, और मन्दिर उनकी सत्ता के लिए “समर्थन तथा मान्यता के महत्त्वपूर्ण माध्यम थे” (पृष्ठ 184)।
पूरा उत्तर इन्हीं हिस्सों में बाँटकर लिखवाइए; 250–300 शब्दों का उत्तर गृहकार्य में।
8 | 6. महलों, मन्दिरों तथा बाज़ारों का अंकन
अगर आपको अपने पूरे गाँव का नक्शा बनाना हो, ताकि हर घर, कुआँ और रास्ता उसमें आ जाए, तो आप कहाँ से शुरू करेंगे?
खोज से संरक्षण तक
पृष्ठ 188
- मैकेन्ज़ी के आरंभिक सर्वेक्षणों के बाद यात्रा वृत्तांतों और अभिलेखों से मिली जानकारी एक साथ जोड़ी गई
- बीसवीं शताब्दी में इस स्थान का संरक्षण भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण और कर्नाटक पुरातात्विक एवं संग्रहालय विभाग ने किया
- “1976 में हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व के स्थल के रूप में मान्यता मिली।”
- 1980 के दशक के आरंभ में “विजयनगर से मिले भौतिक अवशेषों के सूक्ष्मता से प्रलेखन की एक महत्त्वपूर्ण परियोजना का शुभारंभ किया गया।”
- “लगभग बीस वर्षों के काल में पूरे विश्व के दर्जनों विद्वानों ने इस जानकारी को इकट्ठा और संरक्षित करने का कार्य किया।”
हुक के उत्तर बोर्ड पर रहने दीजिए; पृष्ठ 188–189 का विद्वानों का तरीका उनसे मिलाइए। यहीं एक भूल रोक दीजिए: 1976 में हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व के स्थल की मान्यता मिली; विश्व धरोहर स्थल वाली बात काल-रेखा 2 में 1986 की है (कालांश 10)।
वर्ग के भीतर वर्ग
पृष्ठ 188–189
नक्शा कैसे बना
- पूरे क्षेत्र को “25 वर्गाकार भागों में बाँटा गया और प्रत्येक वर्ग को वर्णमाला के एक अक्षर से इंगित किया गया।”
- फिर हर वर्ग को और छोटे वर्गों में बाँटा गया, और उन छोटे वर्गों को भी और छोटी इकाइयों में
- चित्र 7.27: विजयनगर स्थल का विस्तृत मानचित्र · चित्र 7.28: चित्र 7.27 का वर्ग N · चित्र 7.29: चित्र 7.28 का वर्ग NM
पृष्ठ 189 के किनारे के प्रश्न
- “अंग्रेजी वर्णमाला का कौन सा अक्षर प्रयोग नहीं किया गया था? मानचित्र में दिए गए पैमाने का प्रयोग करते हुए किसी एक छोटे वर्ग की लंबाई नापिए।”
- चित्र 7.28 के लिए: “इस मानचित्र में कौन सा पैमाना प्रयोग किया गया है?”
एक रूलर साथ रखिए, और बच्चों से चित्र पर ही नपवाइए।
नमूना उत्तर — ये उत्तर चित्र पढ़कर निकलते हैं।
- छूटा अक्षर: क्षेत्र 25 वर्गों में बँटा है और अंग्रेज़ी वर्णमाला में 26 अक्षर हैं; वर्गों के अक्षर क्रम से पढ़िए: अक्षर ‘आई’ नहीं लगाया गया।
- पैमाना: चित्र 7.28 की पट्टी पर 0, 500 मी. और 1 कि.मी. लिखे हैं; चित्र 7.27 की पट्टी 0 से 5 कि.मी. की है। यानी चित्र 7.28 छोटे क्षेत्र को ज़्यादा विस्तार से दिखाता है।
- नाप: रूलर से एक वर्ग की चौड़ाई नापिए, फिर स्केल की पट्टी से मिलाकर उसे किलोमीटर या मीटर में बदलिए। जिस चित्र का वर्ग नापा, उसी की पट्टी से मिलाइए।
हर बच्चा अपना हिसाब लिखे, सिर्फ़ उत्तर नहीं।
हज़ारों संरचनाएँ
पृष्ठ 189
- गहन सर्वेक्षणों से हज़ारों संरचनाओं के अंश फिर से उजागर हुए और उनका प्रलेखन हुआ: “छोटे देवस्थलों और आवासों से लेकर विशाल मन्दिरों तक”
- सड़कों, रास्तों और बाज़ारों की जगह भी पहचानी गई
- “इन सभी की स्थिति की पहचान स्तंभ आधारों तथा मंचों के माध्यम से की गई है–एक समय जो बाज़ार, जीवंत थे, उनका बस अब यही कुछ बचा है।”
पूछिए: सड़कों और बाज़ारों की जगह कैसे पहचानी गई? उत्तर: स्तंभ आधारों और मंचों से। यह बात स्रोत 5 (बाज़ार, पृष्ठ 191) से जुड़ेगी, जहाँ यात्री उन्हीं बाज़ारों को भरा हुआ देखते हैं।
चित्र 7.29 और 7.30: एक मन्दिर पढ़िए
पृष्ठ 190
- चित्र 7.29: चित्र 7.28 का वर्ग NM
- चित्र 7.30: चित्र 7.29 के मन्दिर का नक्शा
- पहला प्रश्न: “किसी एक मन्दिर को पहचानिए। दीवारों, एक केंद्रीय देवालय, तथा मन्दिर तक जाने वाले रास्तों के अवशेषों को खोजिए। मानचित्र पर उन वर्गों को नाम दीजिए जिनमें मन्दिर का नक्शा स्थित है।”
- दूसरा प्रश्न: “गोपुरम्, सभागारों, स्तंभावलियों तथा केंद्रीय देवालय को पहचानिए। बाहरी प्रवेशद्वार से केंद्रीय देवालय तक पहुँचने के लिए आप किन भागों से होकर गुज़रेंगे।”
नमूना उत्तर — दोनों उत्तर चित्र पढ़कर ही बनेंगे।
- पहला प्रश्न: बच्चे उँगली से दीवारें, देवालय और रास्ता दिखाएँ, और वर्गों के नाम चित्र से पढ़कर बोलें।
- दूसरा प्रश्न: रास्ते का क्रम मोटे तौर पर यह निकलेगा: बाहरी प्रवेशद्वार (गोपुरम्), फिर भीतर का प्रवेशद्वार, फिर स्तंभावलियाँ और सभागार, और अंत में केंद्रीय देवालय।
चित्र 7.29 की संख्याएँ रटवाइए नहीं। जाँचते समय हर वह रास्ता ठीक मानिए जो गोपुरम् से शुरू होकर केंद्रीय देवालय तक पहुँचे।
जो नष्ट हो गया
“विजयनगर के स्मारकों के अपने अध्ययन में हमें नष्ट हो चुकी लकड़ी की वस्तुओं–स्तंभ, टेक (ब्रेकेट), धरन, भीतरी छत, लटकते हुए छज्जों के अंदरूनी भाग तथा मीनारों–की एक पूरी श्रेणी की कल्पना करनी पड़ती है जो प्लास्टर से सजाए और संभवत: चटकीले रंगों से चित्रित थे।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 190
ये शब्द जॉन एम. फ्रिट्ज़, जॉर्ज मिशेल और एम. एस. नागराज राव के हैं, जिन्होंने इस स्थान पर वर्षों तक काम किया। किताब आगे कहती है कि लकड़ी की संरचनाएँ अब नहीं हैं, पर यात्रियों के छोड़े विवरण उस समय के जीवन के कुछ आयामों को फिर से बनाने में मदद करते हैं। अब जोड़ियों में पूछिए: नक्शा, सर्वेक्षण और यात्रियों के वृत्तांत, तीनों को साथ क्यों रखना पड़ता है? यह सवाल हमारी ओर से है।
नमूना उत्तर — क्योंकि हर स्रोत अकेले अधूरा है।
- नक्शा और सर्वेक्षण: बताते हैं कि कौन-सी संरचना कहाँ थी, जैसे हज़ारों संरचनाओं के निशान और सड़कों, बाज़ारों की जगह।
- जो नष्ट हो गया: लकड़ी के स्तंभ, टेक, धरन और छज्जे अब नहीं हैं; विद्वान उनकी कल्पना करते हैं।
- यात्रियों के वृत्तांत: उस जीवन के कुछ पहलुओं को फिर से बनाने में मदद करते हैं, जो खंडहरों में नहीं दिखता।
यही बात कालांश 9 की स्लाइड इमारतें क्या बताती हैं, क्या नहीं में आगे बढ़ेगी।
9 | 7. उत्तरों की खोज में प्रश्न
किसी पुरानी इमारत को देखकर क्या आप बता सकते हैं कि उसे बनाने वाले कारीगर कौन थे, और उन्हें बदले में क्या मिला?
स्रोत 5: शाम का मेला
“फिर हर शाम को आप एक मेला देख सकते हैं जहाँ से कई सामान्य घोड़े तथा टट्टू और कई तुरंज और नींबू और संतरे और अंगूर और उद्यान में उगने वाली हर प्रकार की वस्तुएँ और लकड़ी मिलती है: इस गली में आप हर वस्तु पा सकते हैं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 191 (स्रोत 5)
ये पेस के शब्द हैं। उसी स्रोत में वह एक चौड़ी और सुंदर गली का वर्णन करता है, जिसमें कई व्यापारी रहते हैं और जहाँ माणिक्य, हीरे, पन्ने और मोती से लेकर वस्त्र तक, हर वस्तु मिलती है। जोड़ियों में पूरा स्रोत पढ़वाइए, फिर पूछिए: इस स्रोत से शहर के आम लोगों के जीवन के बारे में क्या पता चलता है? यह सवाल हमारी ओर से है।
नमूना उत्तर — कि शहर के बाज़ार भरे-पूरे थे और खाने-पीने की चीज़ें आसानी से मिलती थीं।
- भरपूर सामान: पेस शहर का वर्णन “विश्व के सबसे अच्छे संभरण वाले शहर” के रूप में करता है।
- सस्ते फल: नूनिज़ के अनुसार फल बहुत सस्ते थे।
- सीमा: यह दो यात्रियों का वर्णन है; बाज़ार में ख़रीदने वाले आम लोग ख़ुद क्या सोचते थे, यह स्रोत नहीं बताता।
भरे हुए बाज़ार
पृष्ठ 191
- पेस के अनुसार बाज़ार “चावल, गेहूँ, अनाज, भारतीय मकई और कुछ मात्रा में जौ तथा सेम, मूँग, दालें, काला चना जैसे खाद्य पदार्थों से भरे रहते थे”
- फर्नाओ नूनिज़ के अनुसार बाज़ार “प्रचुर मात्रा में फलों, अंगूरों और संतरों, नींबू, अनार, कटहल तथा आम से भरे रहते थे और सभी बहुत सस्ते।”
- “बाज़ारों में मांस भी बड़ी मात्रा में बिकता था।”
बोर्ड पर तीन खाने बनवाइए: अनाज और दालें, फल, मांस, और हर खाने में स्रोत की चीज़ें लिखवाइए। उत्तर में पेस के अनुसार या नूनिज़ के अनुसार ज़रूर लिखवाइए; यह यात्रियों का वर्णन है, बाज़ार की कोई सूची नहीं।
इमारतें क्या बताती हैं, क्या नहीं
पृष्ठ 191–192
इमारतें बताती हैं
- “सुरक्षित भवन हमें उन तरीकों के विषय में बताते हैं जिनसे स्थानों को व्यवस्थित किया गया और उन्हें प्रयोग में लाया गया।”
- किन वस्तुओं और तकनीकों से उनका निर्माण हुआ
- किसी शहर की क़िलेबंदी से उसकी प्रतिरक्षण आवश्यकताएँ और सामरिक तैयारी
- दूसरी जगहों के भवनों से तुलना करें, तो विचारों का फैलाव और सांस्कृतिक प्रभाव
- निर्माणकर्ता या प्रश्रयदाता के विचार, जिन्हें साहित्य, अभिलेख और लोकप्रचलित परंपराएँ साथ रखकर समझा जाता है
इमारतें नहीं बतातीं
- शहर और उसके आसपास रहने वाले सामान्य पुरुष, महिलाएँ और बच्चे इन भवनों के बारे में क्या सोचते थे; क्या शाही या धार्मिक केंद्र के किसी भाग तक उनकी पहुँच थी
- जिन्होंने इन निर्माणों पर श्रम किया, वे क्या सोचते थे; भवनों के नक्शे कौन बनाता था
- राजगीर, पत्थर काटने वाले और मूर्तिकार कहाँ से आते थे: “क्या उन्हें युद्ध के दौरान पड़ोसी क्षेत्रों से बंदी बनाया जाता था?”
- उन्हें किस प्रकार के वेतन मिलते थे; निर्माण की देखरेख कौन करता था; कच्चा माल कैसे और कहाँ से आता था
हुक का उत्तर यहीं है: पृष्ठ 192 के अनुसार कारीगर कहाँ से आते थे और उन्हें किस प्रकार के वेतन मिलते थे, ऐसे प्रश्नों के उत्तर “हम भवनों या उनके अवशेषों को देखने मात्र से नहीं दे सकते। संभवत: अन्य स्रोतों के प्रयोग से जारी शोध कुछ और संकेत दे सकें।” निकास-पर्ची: इमारतें हमें कौन-सी दो बातें बताती हैं, और ऐसे दो प्रश्न लिखिए जिनका उत्तर इमारतें नहीं देतीं।
चित्र 7.31: राजा अपने को कैसे दिखाना चाहता था
पृष्ठ 192
- किताब “तमिलनाडु में चिदम्बरम के मन्दिर के गोपुरम् में रखी कृष्णदेव राय की इस सुंदर प्रतिमा” को देखने को कहती है
- “स्वाभाविक है कि शासक इसी रूप में अपने आप को प्रस्तुत करना चाहता था।”
- पेस राजा का वर्णन ऐसे करता है: “मझला कद, गोरा रंग और अच्छी काठी, कुछ मोटा, राजा के चेहरे पर चेचक के दाग़ हैं।”
चित्र 7.31 दिखाकर पूछिए: मूर्ति और पेस का वर्णन, दोनों से क्या सीख मिलती है? यह सवाल हमारी ओर से है।
नमूना उत्तर — कि एक ही व्यक्ति को अलग-अलग स्रोत अलग ढंग से दिखाते हैं।
- मूर्ति: वह रूप दिखाती है जिसमें शासक ख़ुद को प्रस्तुत करना चाहता था।
- पेस: एक देखने वाले का वर्णन है, जिसमें चेचक के दाग़ जैसी बात भी है।
इतिहासकार दोनों को साथ रखकर पढ़ता है; किसी एक को पूरी तस्वीर नहीं मानता।
आम लोगों का जीवन
पृष्ठ 177–179, 191–192
- घर और गलियाँ (पृष्ठ 179)
- पानी और पूजा (पृष्ठ 179)
- बाज़ार (स्रोत 5, पृष्ठ 191)
- श्रम (स्रोत 4, पृष्ठ 177)
- जो पता नहीं (पृष्ठ 178, 192)
अभ्यास का प्रश्न 9 पूछिए: “अध्याय के विभिन्न विवरणों से आप विजयनगर के सामान्य लोगों के जीवन की क्या छवि पाते हैं?”
नमूना उत्तर — छवि अधूरी है, पर अध्याय में कई सुराग बिखरे हैं।
- घर और गलियाँ: बरबोसा के अनुसार आवास छप्पर के पर सुदृढ़, व्यवसाय के आधार पर लंबी गलियों में (पृष्ठ 179)।
- पानी और पूजा: कुएँ और जलाशय, बहुत-से पूजा स्थल और छोटे मन्दिर (पृष्ठ 179)।
- बाज़ार: भरपूर और सस्ते फल, अनाज और मांस (स्रोत 5, पृष्ठ 191)।
- श्रम: स्रोत 4 में जलाशय पर पन्द्रह से बीस हज़ार आदमी (पृष्ठ 177)।
- सीमा: आम लोगों के आवासों के साक्ष्य कम हैं, और वे क्या सोचते थे, यह इमारतें नहीं बतातीं (पृष्ठ 178, 192)।
250–300 शब्दों का उत्तर इन्हीं पाँच हिस्सों में बँट सकता है; पूरा उत्तर गृहकार्य में।
पद्धतियाँ और पुरोहित
पृष्ठ 170, 188
- मैकेन्ज़ी ने पहला सर्वेक्षण मानचित्र बनाया; उनकी शुरुआती जानकारी विरुपाक्ष मंदिर और पम्पादेवी के पूजास्थल के पुरोहितों की स्मृतियों पर आधारित थी (पृष्ठ 170)
- 1856 से छाया चित्रकारों ने भवनों के चित्र संकलित किए; 1836 से अभिलेखकर्ताओं ने कई दर्जन अभिलेख इकट्ठे किए (पृष्ठ 170)
- बीसवीं शताब्दी में संरक्षण, और 1980 के दशक में भौतिक अवशेषों का सूक्ष्म प्रलेखन (पृष्ठ 188)
तेज़ विद्यार्थियों के साथ अभ्यास का प्रश्न 1 पूरा कीजिए: “पिछली दो शताब्दियों में हम्पी के भवनावशेषों के अध्ययन में कौन–सी पद्धतियों का प्रयोग किया गया है? आपके अनुसार यह पद्धतियाँ विरुपाक्ष मन्दिर के पुरोहितों द्वारा प्रदान की गई जानकारी का किस प्रकार पूरक रहीं?”
नमूना उत्तर — पुरोहितों से मौखिक परंपराएँ मिलीं; बाक़ी पद्धतियों ने उन्हें खंडहरों और लिखित प्रमाण से जोड़ा।
- पद्धतियाँ: मैकेन्ज़ी का सर्वेक्षण, 1856 से छाया-चित्र, अभिलेखों का संकलन, बीसवीं शताब्दी का संरक्षण, और 1980 के दशक का प्रलेखन।
- पूरक कैसे: सर्वेक्षण, छाया-चित्र और अभिलेख पुरोहितों की स्मृतियों को खंडहरों और लिखित प्रमाण से जोड़ते थे।
- किताब की बात: पृष्ठ 170 के अनुसार इन मौखिक परंपराओं के साथ-साथ पुरातात्विक खोजों, स्थापत्य के नमूनों, अभिलेखों और अन्य दस्तावेज़ों ने साम्राज्य को फिर से खोजने में विद्वानों की मदद की।
100–150 शब्दों में यही तीन हिस्से काफ़ी हैं।
10 | काल-रेखा 1 और 2, मानचित्र कार्य, और पहले दिन की पर्चियाँ
किसी तिथि के आगे प्रश्नचिह्न छपा हो, तो उसका क्या मतलब हो सकता है?
काल-रेखा 1: राजनीतिक परिवर्तन
पृष्ठ 193
| काल | घटनाएँ |
|---|---|
| लगभग 1200–1300 ईसवी | दिल्ली सल्तनत की स्थापना (1206) |
| लगभग 1300–1400 ईसवी | विजयनगर साम्राज्य की स्थापना (1336?); बहमनी राज्य की स्थापना (1347); जौनपुर, कश्मीर और मदुरई में सल्तनतें |
| लगभग 1400–1500 ईसवी | उड़ीसा के गजपति राज्य की स्थापना (1435); गुजरात और मालवा की सल्तनतों की स्थापना; अहमदनगर, बीजापुर और बेरार सल्तनतों का उदय (1490) |
| लगभग 1500–1600 ईसवी | पुर्तगालियों द्वारा गोवा पर विजय (1510); बहमनी राज्य का विनाश; गोलकुंडा की सल्तनत का उदय (1518); बाबर द्वारा मुग़ल साम्राज्य की स्थापना (1526) |
हुक का उत्तर किताब के नोट में है: “प्रश्नचिह्न अनिश्चित तिथि की ओर संकेत करता है।” यानी 1336 पक्की तिथि नहीं है; उत्तर में भी प्रश्नचिह्न या लगभग रखवाइए। किताब की काल-रेखा में यहाँ ‘अहमदाबाद’ छपा है; पृष्ठ 173 का पाठ अहमदनगर बताता है।
काल-रेखा 2: खोज और संरक्षण
पृष्ठ 193
| वर्ष | घटना |
|---|---|
| 1800 | कॉलिन मैकेन्ज़ी विजयनगर आए |
| 1856 | अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ ने हम्पी के पुरातात्विक अवशेषों की पहली विस्तृत तसवीरें लीं |
| 1876 | जे.एफ. फ्लीट ने पुरास्थल के मन्दिरों की दीवारों के अभिलेखों का प्रलेखन शुरू किया |
| 1902 | जॉन मार्शल के अधीन संरक्षण कार्य आरंभ |
| 1986 | यूनेस्को ने हम्पी को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया |
किताब में यहाँ ‘विश्व पुरातत्व स्थल’ छपा है; यूनेस्को की सूची में हम्पी विश्व धरोहर स्थल के रूप में दर्ज है। दोनों काल-रेखाएँ चार्ट पेपर पर एक के नीचे एक बनवाइए। 1976 और 1986 अलग-अलग लिखवाइए: 1976 में राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल (पृष्ठ 188), 1986 में विश्व धरोहर स्थल (पृष्ठ 193)।
मानचित्र कार्य
पृष्ठ 176, 179, 195
- इटली: निकोलो दे कॉन्ती, इतालवी व्यापारी
- ईरान (किताब के पाठ में फ़ारस): अब्दुर रज़्ज़ाक, फ़ारस के राजा का दूत
- रूस: अफ़ानासी निकितिन, रूस का एक व्यापारी
- पुर्तगाल: फर्नाओ नूनिज़, और दुआर्ते बरबोसा (पृष्ठ 179 उसे पुर्तगाली यात्री कहता है)
- डोमिंगो पेस भी सोलहवीं शताब्दी में आया; उसका नाम मानचित्र के हाशिये पर लिखिए
अभ्यास का प्रश्न 10 पढ़िए: विश्व के सीमारेखा मानचित्र पर इटली, पुर्तगाल, ईरान और रूस को सन्निकटता से अंकित करना है, और उन मार्गों को पहचानना है जिनसे पृष्ठ 176 के यात्री विजयनगर पहुँचे। हर बच्चे को विश्व का एक रेखा-मानचित्र दीजिए।
नमूना उत्तर — देश अंकित करना पृष्ठ 176 से हो जाएगा; मार्ग बच्चे एटलस देखकर अनुमान से बनाएँगे।
- किताब क्या देती है: अब्दुर रज़्ज़ाक फ़ारस के शासक का कालीकट (कोज़ीकोड) भेजा दूत था (पृष्ठ 177); काल-रेखा 1 में पुर्तगालियों द्वारा गोवा पर विजय 1510 में है।
- मार्ग: बच्चे एटलस देखकर समुद्र और ज़मीन के संभावित रास्ते पेंसिल की बिंदु-रेखा से बनाएँ, और नीचे लिखें कि यह अनुमानित मार्ग है।
बिंदु-रेखा और अनुमानित शब्द, दोनों ज़रूरी हैं। आख़िर में मानचित्र पर विजयनगर भी अंकित करवाइए।
पूरा अध्याय, एक नज़र में
पृष्ठ 170 से 195 · सार हमारी ओर से
| कालांश | एक पंक्ति में |
|---|---|
| 1 | मैकेन्ज़ी के सर्वेक्षण और पुरोहितों की स्मृतियों से हम्पी फिर सामने आया |
| 2 | राय, नायक और सुलतान; घोड़ों का व्यापार राजाओं के लिए बहुत ज़रूरी था |
| 3 | चार राजवंश, कृष्णदेव राय, 1565 की लड़ाई और पतन; अमर–नायक व्यवस्था |
| 4 | राजधानी: जल–संपदा, क़िलेबंदी, सड़कें, और क़िलेबंद क्षेत्र के भीतर खेत |
| 5 | शहरी केंद्र में आम लोगों के घर और छोटे मन्दिर; राजकीय केंद्र में महल और मन्दिर |
| 6 | महानवमी डिब्बा, कमल महल और हाथियों का अस्तबल: नाम हैं, पर कई भवनों का प्रयोजन अनिश्चित |
| 7 | धार्मिक केंद्र: विरुपाक्ष, राय गोपुरम्, मण्डप, विट्ठल मन्दिर और रथ गलियाँ |
| 8 | 25 वर्गों का नक्शा, हज़ारों संरचनाओं का प्रलेखन, नष्ट हो चुकी लकड़ी की कल्पना |
| 9 | बाज़ार भरे थे, पर इमारतें आम लोगों और कारीगरों के बारे में बहुत कम बताती हैं |
| 10 | दो काल-रेखाएँ: राज्यों का उदय, और खंडहर से विश्व धरोहर स्थल तक |
यह तालिका बोर्ड पर बनवाकर बच्चों से हर कालांश के आगे अपना एक शब्द जुड़वाइए।
और अब पहले दिन की पर्चियाँ
पृष्ठ 170 से 195
हमारी ओर से: खंडहर, अभिलेख और यात्रियों के वृत्तांत मिलकर विजयनगर के बारे में क्या-क्या बताते हैं, और क्या नहीं बताते?
लिफ़ाफ़े से पहले दिन की पर्चियाँ लौटाइए। पाँच-छह पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए, फिर हर बच्चा अपनी पर्ची के नीचे एक नई पंक्ति जोड़े: अब वह क्या जानता है।
नमूना उत्तर — तीनों मिलकर शहर की काफ़ी साफ़ तस्वीर देते हैं, पर उसमें आम लोगों की आवाज़ कम है।
- खंडहर और सर्वेक्षण: पानी के प्रबंध, क़िलेबंदी, राजकीय केंद्र, मन्दिर, गोपुरम् और मण्डप; हज़ारों संरचनाओं के अंश।
- अभिलेख: मन्दिरों को दिए जाने वाले दान और महत्त्वपूर्ण घटनाओं का विवरण; यह भी कि विरुपाक्ष का सबसे प्राचीन मन्दिर नवीं–दसवीं शताब्दियों का था।
- यात्रियों के वृत्तांत: क़िलेबंदी (अब्दुर रज़्ज़ाक), आम लोगों के घर (बरबोसा), बाज़ार और गलियाँ (पेस और नूनिज़)।
- जो नहीं बताते: आम लोग इन भवनों के बारे में क्या सोचते थे, भवनों के नक्शे कौन बनाता था, कारीगरों को किस प्रकार के वेतन मिलते थे।
पुरानी और नई पंक्तियों का अंतर ही बताता है कि बच्चों ने इस अध्याय से क्या सीखा।
मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न
इस अध्याय की कौन-सी एक बात आप अपने किसी साथी को दो वाक्यों में समझा सकते हैं?
अभ्यास के प्रश्न और उत्तर की मुख्य बात
पृष्ठ 194–195 · मुख्य बात हमारी ओर से
| प्रश्न | उत्तर की मुख्य बात |
|---|---|
| 1. हम्पी के अध्ययन की पद्धतियाँ, पुरोहितों की जानकारी की पूरक | सर्वेक्षण, छाया-चित्र, अभिलेख, संरक्षण, प्रलेखन; मौखिक परंपराओं के साथ (कालांश 1, 8 और 9) |
| 2. जल-आवश्यकताएँ | प्राकृतिक कुण्ड, हौज़, कमलपुरम् जलाशय, हिरिया नहर (कालांश 4 और 11) |
| 3. क़िलेबंद क्षेत्र में खेत: फ़ायदे और नुकसान | घेराबंदी में अन्न; “मँहगी तथा व्यापक नीति” (कालांश 4) |
| 4. महानवमी डिब्बा के अनुष्ठानों का महत्त्व | रुतबे, ताक़त तथा अधिराज्य का प्रदर्शन; सेना का निरीक्षण; नायकों की भेंट (कालांश 6) |
| 5. चित्र 7.33 का स्तंभ | पुष्प-विषयक रूपांकन, जानवर, मानव आकृतियाँ; चित्र देखकर (कालांश 7) |
| 6. “शाही केंद्र” नाम कितना सही | लगभग तीस महल, पर 60 से भी अधिक मन्दिर; कई भवनों का प्रयोजन अनिश्चित (कालांश 5 और 6) |
| 7. कमल महल और हाथियों का अस्तबल | मेहराबों पर संभवत: इण्डो–इस्लामी तकनीकों का प्रभाव; कमल महल नाम उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों का, प्रयोजन अनिश्चित (कालांश 6) |
| 8. स्थापत्य की परंपराएँ और उनमें बदलाव | पल्लव, चालुक्य, होयसाल और चोल की मन्दिर परंपरा, इंडो–इस्लामिक तत्व; राय गोपुरम्, मण्डप, रथ गलियाँ (कालांश 2, 5 और 7) |
| 9. आम लोगों के जीवन की छवि | छप्पर के घर, पानी, बाज़ार, श्रम; साक्ष्य कम (कालांश 5 और 9) |
| 10. विश्व मानचित्र और यात्रियों के मार्ग | इटली, पुर्तगाल, ईरान, रूस; मार्ग अनुमानित (कालांश 10) |
| 11. परियोजना (11 और 12 में से कोई एक): लगभग चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी का कोई प्रमुख शहर | स्थापत्य, राजनीतिक केंद्र के लक्षण, आनुष्ठानिक भवन, शहरी भाग को आसपास से अलग करने वाले लक्षण (घर पर) |
| 12. परियोजना (11 और 12 में से कोई एक): आसपास का कोई धार्मिक भवन | छत, स्तंभ, मेहराब, गलियारे, रास्ते, सभागार, प्रवेशद्वार, जलआपूर्ति; विरुपाक्ष से तुलना (घर पर) |
पूरे नमूना उत्तर शिक्षक संदर्शिका और रिवीजन नोट्स में हैं। लिखित परख के लिए प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 2 दीजिए।
अध्याय का बड़ा विचार
“इन मौखिक परंपराओं के साथ–साथ पुरातात्विक खोजों, स्थापत्य के नमूनों, अभिलेखों तथा अन्य दस्तावेज़ों ने विजयनगर साम्राज्य को पुन: खोजने में विद्वानों की सहायता की।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 170
हमारी ओर से: यह वाक्य अध्याय के पहले अनुच्छेद (पृष्ठ 170) में है, और कालांश 10 में हम इसी पर लौटे। कोई एक स्रोत पूरी बात नहीं बताता; खंडहर, अभिलेख और यात्रियों के वृत्तांत साथ रखने पर ही विजयनगर की तस्वीर बनती है, और उसमें भी आम लोगों और कारीगरों की आवाज़ कम है।

