कक्षा 10 · अर्थशास्त्र · अध्याय 5
उपभोक्ता अधिकार
कम तौल, मिलावट, छपे दाम से ज़्यादा वसूली, ज़बरदस्ती साथ में बेचा गया सामान: बाज़ार में अकेला खरीदार अक्सर कमज़ोर पड़ता है। यह अध्याय बताता है कि उपभोक्ता आंदोलन कैसे उठा, कानून ने हमें कौन-से अधिकार दिए, और ठगे जाने पर न्याय कहाँ और कैसे मिलता है। नौ पड़ावों में चलिए।

किताब रोज़ के बाज़ार से शुरू होती है: हम उत्पादक भी हैं और उपभोक्ता भी। उपभोक्ता के रूप में हमारी सुरक्षा के लिए नियम क्यों चाहिए, यही अध्याय का सवाल है। इसके तीन हिस्से हैं।
बाज़ार और आंदोलन
शोषण के तरीके, नियम क्यों चाहिए, आंदोलन और कोपरा
अधिकार और न्याय
सुरक्षा, सूचना, चयन, निवारण, और तीन स्तर के आयोग
जागरूकता और आगे
गुणवत्ता के चिह्न, आंदोलन की प्रगति और कमियाँ
इस्तेमाल कैसे करें
- हर पड़ाव एक सवाल से शुरू होता है। पहले उस पर ख़ुद सोचिए, फिर आगे पढ़िए।
- छाँटिए, क्रम लगाइए, जोड़ियाँ मिलाइए, सही-ग़लत चुनिए: हर काम किताब के अपने उदाहरण पर बना है।
- किताब के हर प्रश्न और गतिविधि के नीचे "जवाब देखिए" दबाइए।
- हर पड़ाव के अंत में छोटी जाँच है। सब पूरी होने पर ऊपर की पट्टी भर जाती है।
नौ पड़ाव, नौ सवाल
- बाज़ार में उपभोक्ता · बाज़ार में उपभोक्ता का शोषण किन तरीकों से होता है, और उसकी सुरक्षा के लिए नियम क्यों चाहिए?
- उपभोक्ता आंदोलन · भारत में उपभोक्ता आंदोलन क्यों और कैसे उठा, और उससे कौन-सा कानून बना?
- सुरक्षा का अधिकार · खतरनाक वस्तुओं और सेवाओं से बचने का अधिकार क्या है, और रेजी के मामले में क्या हुआ?
- सूचना का अधिकार · पैकेट पर छपी जानकारी और अवयव कैसे पढ़ें, MRP का मतलब क्या है, और RTI कानून क्या देता है?
- चयन का अधिकार · चुनने का अधिकार कब टूटता है, और अबिरामी को आयोग से क्या मिला?
- न्याय कहाँ मिले · ठगे जाने पर उपभोक्ता क्षतिपूर्ति कैसे माँगे, और प्रकाश ने न्याय के लिए कौन-से कदम उठाए?
- तीन स्तर के आयोग · उपभोक्ता के मुकदमे कौन-से आयोग सुनते हैं, और अपील कहाँ होती है?
- जागरूक उपभोक्ता · जागरूक उपभोक्ता किसे कहते हैं, और गुणवत्ता के चिह्न उसकी कैसे मदद करते हैं?
- आंदोलन आगे कैसे बढ़े · भारत में उपभोक्ता आंदोलन कितना आगे बढ़ा, कहाँ कमज़ोर है, और आगे क्या चाहिए?
1बाज़ार में उपभोक्ता
इस पड़ाव का सवालपृ. 75–77
बाज़ार में उपभोक्ता का शोषण किन तरीकों से होता है, और उसकी सुरक्षा के लिए नियम क्यों चाहिए?
पिछली बात से कड़ी पिछले अध्यायों में आपने देखा कि साहूकार कर्ज़दार को कैसे बाँधते हैं और असंगठित क्षेत्र के मज़दूर किन हालात में काम करते हैं। वहाँ भी नियम चाहिए थे। अब बाज़ार की बारी।
बाज़ार में हम दो रूपों में आते हैं। किताब कहती है: "बाज़ार में हमारी भागीदारी उत्पादक और उपभोक्ता दोनों रूपों में होती है।" जब हम अपनी ज़रूरत की वस्तुएँ या सेवाएँ खरीदते हैं, तब हम उपभोक्ता हैं।
शिकायत होने पर विक्रेता अक्सर सारी ज़िम्मेदारी खरीदने वाले पर डाल देता है: "आपने जो खरीदा है अगर वह पसंद नहीं है तो कहीं और जाइए।" मानो बेचने के बाद उसकी कोई ज़िम्मेदारी ही नहीं रही।
"बाज़ार में भी उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए नियम एवं विनियमों की आवश्यकता होती है, क्योंकि अकेला उपभोक्ता प्राय: स्वयं को कमजोर स्थिति में पाता है।"
बाज़ार कब ठीक से काम नहीं करता
जब उत्पादक थोड़े और शक्तिशाली हों, और उपभोक्ता कम मात्रा में खरीदते हों और बिखरे हुए हों। अधिक पूँजी वाली बड़ी कंपनियाँ चालाकी से बाज़ार को प्रभावित कर सकती हैं और उपभोक्ताओं को लुभाने के लिए समय-समय पर गलत सूचना देती हैं।

तराज़ू: मदुरै (तमिलनाडु) में तराज़ू पर टमाटर तौलते एक विक्रेता। सही तौल हर उपभोक्ता का हक़ है; किताब कम तौलने को शोषण का एक तरीका गिनाती है (पृ. 76)।
Photograph by எஸ்ஸார், 15 December 2011; Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0.
किताब का कार्टून (पृ. 76) एक और रूप दिखाता है: लड़के को लगता है कि उसका सामान जानबूझकर ऐसा बनाया गया कि कुछ महीनों में बेकार हो जाए और उसे नया खरीदना पड़े।
किताब का निष्कर्ष: "अत: उपभोक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नियम और विनियमों की आवश्यकता है।"
आओ–इन पर विचार करें (पृ. 77)
1बाज़ार में लोगों का शोषण किन-किन तरीकों से हो सकता है?
जवाब देखिए
- कम तौलना; पहले न बताए गए शुल्क जोड़ना; मिलावटी या दोषपूर्ण वस्तुएँ बेचना (पृ. 76); बड़ी कंपनियों का मीडिया से गलत सूचना देना और झूठे दावे करना, जैसे शिशुओं का दूध पाउडर (पृ. 76–77); सामान ऐसा बनाना कि जल्दी बेकार हो जाए (पृ. 76 का कार्टून)।
2अपने अनुभव से कोई उदाहरण लीजिए, जहाँ आपको लगा हो कि बाज़ार में "धोखा" दिया जा रहा था, और कक्षा में चर्चा कीजिए।
एक संभावित जवाब देखिए
- हर किसी का अनुभव अलग होगा। किताब से मिलते-जुलते उदाहरण: पैकेट पर छपे मूल्य से अधिक लेना (पृ. 80), सब्ज़ी वाले का बाट की जगह पत्थर से तौलना (पृ. 89), दंतमंजन के साथ ज़बरदस्ती ब्रश बेचना (पृ. 81)।
- चर्चा में यह भी देखिए कि आपके पास रसीद थी या नहीं, और आपने शिकायत की या नहीं।
3आपकी राय में उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए सरकार की क्या भूमिका होनी चाहिए?
एक संभावित जवाब देखिए
- उपभोक्ता की सुरक्षा के लिए नियम और विनियम बनाना (पृ. 77); कोपरा जैसा कानून (पृ. 78); शिकायत के लिए तीन स्तर के आयोग (पृ. 84); उपभोक्ता मामलों के अलग विभाग और विज्ञापनों से जागरूकता, और कुछ वस्तुओं के लिए प्रमाण अनिवार्य करना (पृ. 85)।
- साथ ही नियमों का ठीक पर्यवेक्षण, क्योंकि उसकी कमी से बाज़ार में निम्न गुणवत्ता के उत्पाद बिकते हैं (पृ. 79)।
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1किताब के अनुसार बाज़ार में अकेला उपभोक्ता कब कमज़ोर पड़ता है?
उपभोक्ता कम मात्रा में खरीदते हैं और बिखरे हुए हैं, जबकि उत्पादक थोड़े और शक्तिशाली हैं (पृ. 76)।
2शिशुओं के दूध के पाउडर वाली कंपनी ने क्या झूठा दावा किया था?
कई वर्षों तक पूरी दुनिया में यही बताकर बेचा; लंबे संघर्ष के बाद कंपनी को मानना पड़ा कि दावे झूठे थे।
3पहले, असंतुष्ट उपभोक्ता आम तौर पर क्या करता था?
तब शोषण से बचाने की कोई कानूनी व्यवस्था नहीं थी, और सावधानी की ज़िम्मेदारी खरीदने वाले की मानी जाती थी (पृ. 77)।
2उपभोक्ता आंदोलन
इस पड़ाव का सवालपृ. 77–78
भारत में उपभोक्ता आंदोलन क्यों और कैसे उठा, और उससे कौन-सा कानून बना?
पिछली बात से कड़ी पिछले पड़ाव में देखा कि अकेला उपभोक्ता कमज़ोर है। जब बहुत से उपभोक्ता मिलकर आवाज़ उठाते हैं, तो वह आंदोलन बनता है।
विक्रेता कई अनुचित व्यवहारों में शामिल थे, और "बाज़ार में उपभोक्ता को शोषण से बचाने के लिए कोई कानूनी व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी।" असंतुष्ट उपभोक्ता बस उस ब्रांड या दुकान से खरीदना बंद कर देता था, और सावधानी बरतना खरीदने वाले की ज़िम्मेदारी मानी जाती थी।
भारत में उपभोक्ता आंदोलन का जन्म एक "सामाजिक बल" के रूप में हुआ, ताकि उपभोक्ता के हितों को अनैतिक और अनुचित व्यवसाय से बचाया जा सके। आंदोलन ने वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता की ज़िम्मेदारी विक्रेताओं पर भी डाल दी।
"अत्यधिक खाद्य कमी, जमाखोरी, कालाबाजारी, खाद्य पदार्थों एवं खाद्य तेल में मिलावट की वजह से 1960 के दशक में व्यवस्थित रूप में उपभोक्ता आंदोलन का उदय हुआ।"
उपभोक्ता इंटरनेशनल (पृ. 78)
1985 के संयुक्त राष्ट्र के दिशा–निर्देश राष्ट्रों के लिए और उपभोक्ता की वकालत करने वाले समूहों के लिए एक हथियार थे, ताकि वे अपनी सरकारों पर उपभोक्ता सुरक्षा के लिए दबाव डाल सकें। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यही आंदोलन का आधार बना। उपभोक्ता इंटरनेशनल 100 से अधिक देशों की 200 संस्थाओं की संरक्षक संस्था है।
हाल में भारत में उपभोक्ता दलों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। आंदोलन कंपनियों और सरकार, दोनों पर दबाव डालने में सफल हुआ, और 1986 में उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम बना, जो कोपरा (COPRA) के नाम से प्रसिद्ध है।
आओ–इन पर विचार करें (पृ. 78)
1उपभोक्ता दल कौन-कौन से उपाय अपना सकते हैं?
जवाब देखिए
- उपभोक्ता अधिकार पर लेख लिखना और प्रदर्शनी लगाना; सड़क यात्री परिवहन और राशन दुकानों पर नज़र रखना (पृ. 77); कंपनियों और सरकार पर दबाव डालना (पृ. 78); लोगों को मुकदमा दर्ज करने का रास्ता बताना, आयोग में उनका प्रतिनिधित्व करना, और जागरूकता फैलाना (पृ. 84)।
2नियम और कानून होने पर भी उनका पालन क्यों नहीं होता?
जवाब देखिए
- नियमों का पर्यवेक्षण ठीक से नहीं होता और उपभोक्ता आंदोलन बहुत मज़बूत नहीं है (पृ. 79); शिकायत की प्रक्रिया जटिल, खर्चीली और लंबी है, रसीद नहीं मिलती, और ज़्यादातर खरीद छोटी दुकानों से होती है (पृ. 86); उपभोक्ता ज्ञान धीरे फैल रहा है (पृ. 87)।
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1भारत में उपभोक्ता आंदोलन व्यवस्थित रूप में कब उभरा?
खाद्य कमी, जमाखोरी, कालाबाज़ारी और मिलावट ने 1960 के दशक में आंदोलन को व्यवस्थित रूप दिया (पृ. 77)।
2संयुक्त राष्ट्र ने उपभोक्ता सुरक्षा के दिशा–निर्देश कब अपनाए?
संयुक्त राष्ट्र ने 1985 में ये दिशा–निर्देश अपनाए (पृ. 78)।
3उपभोक्ता इंटरनेशनल क्या है?
यह 100 से अधिक देशों की 200 संस्थाओं की संरक्षक संस्था है (पृ. 78)।
3सुरक्षा का अधिकार
इस पड़ाव का सवालपृ. 79
खतरनाक वस्तुओं और सेवाओं से बचने का अधिकार क्या है, और रेजी के मामले में क्या हुआ?
पिछली बात से कड़ी कोपरा ने उपभोक्ता को कई अधिकार दिए। पहला अधिकार जान और माल की सुरक्षा का है।
कई वस्तुएँ और सेवाएँ जीवन और संपत्ति के लिए खतरनाक हो सकती हैं। उपभोक्ता को इनसे सुरक्षित रहने का अधिकार है, और उत्पादकों के लिए सुरक्षा नियमों और विनियमों का पालन ज़रूरी है।
किताब का उदाहरण: प्रेशर कूकर का सेफ्टी वॉल्व खराब हो, तो भयंकर दुर्घटना हो सकती है। इसलिए उसके निर्माता को वॉल्व की उच्च गुणवत्ता पक्की करनी चाहिए।
किताब का उदाहरण: रेजी का कष्ट
रेजी मेथ्यू कक्षा 9 का एक स्वस्थ लड़का था। केरल के एक निजी चिकित्सालय में उसके टॉन्सिल का ऑपरेशन हुआ। अनुचित बेहोशी की वजह से उसमें दिमागी असामान्यता के लक्षण आ गए, और वह जीवन भर के लिए अपंग हो गया। यह सेवा में लापरवाही का मामला था, यानी कोपरा सामान के साथ सेवाओं पर भी लागू होता है।
नियम होने पर भी बाज़ार में निम्न गुणवत्ता वाले उत्पाद मिलते हैं, क्योंकि "इन नियमों का पर्यवेक्षण उचित रूप से नहीं हो रहा है और उपभोक्ता आंदोलन भी बहुत ज्यादा मजबूत नहीं है।"
आओ–इन पर विचार करें (पृ. 79)
1इन उत्पादों और सेवाओं में उत्पादकों को किन सुरक्षा नियमों का पालन करना चाहिए: (क) एल.पी.जी. सिलेंडर (ख) सिनेमा थिएटर (ग) सर्कस (घ) दवाइयाँ (च) खाद्य तेल (छ) विवाह पंडाल (ज) एक बहुमंजिली इमारत?
एक संभावित जवाब देखिए
- (क) एल.पी.जी. सिलेंडर: इसके लिए प्रमाण लेना अनिवार्य है; उपभोक्ता को इसका वज़न भी जाँचना चाहिए (पृ. 85, 89)।
- (घ) दवाइयाँ: उचित प्रयोग के निर्देश, दूसरे प्रभावों और खतरों की जानकारी, और अंतिम तिथि छपी हो; अंतिम तिथि निकल चुकी दवाएँ बेचने वालों के ख़िलाफ़ कार्यवाही हो सकती है (पृ. 80)।
- (च) खाद्य तेल: मिलावट न हो; एगमार्क अनाजों और खाद्य तेल का प्रमाण है (पृ. 77, 87)।
- (ख), (ग), (छ), (ज) में एक साथ बहुत लोग होते हैं। कक्षा में चर्चा कीजिए कि आग, बिजली और भीड़ से बचाव के लिए वहाँ क्या इंतज़ाम होने चाहिए, और प्रेशर कूकर के सेफ्टी वॉल्व की तरह किस हिस्से की खराबी दुर्घटना बन सकती है।
2आसपास किसी दुर्घटना या लापरवाही का पता कीजिए, जिसके लिए आपको उत्पादक ज़िम्मेदार लगे, और उस पर चर्चा कीजिए।
एक संभावित जवाब देखिए
- उदाहरण आपके आसपास से आएगा। उसे रेजी के मामले की तरह परखिए: गलती किसकी थी, कौन-सा अधिकार टूटा (सुरक्षा का), और पीड़ित किस आयोग में जा सकता था (दावे की रकम के हिसाब से, पृ. 84)।
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1रेजी का मामला किस अधिकार का उदाहरण है?
अस्पताल की लापरवाही से रेजी जीवन भर के लिए अपंग हुआ; यह खतरनाक सेवा से सुरक्षा का मामला है (पृ. 79)।
2राज्य आयोग ने मामला खारिज किया, तो रेजी के पिता ने क्या किया?
राष्ट्रीय आयोग ने अस्पताल को लापरवाही का दोषी पाया और हर्जाना देने का निर्देश दिया।
3किताब में सुरक्षा नियम का कौन-सा उदाहरण है?
सेफ्टी वॉल्व खराब हो तो भयंकर दुर्घटना हो सकती है; इसलिए उत्पादकों को सुरक्षा नियम मानने चाहिए (पृ. 79)।
4सूचना का अधिकार
इस पड़ाव का सवालपृ. 80–81
पैकेट पर छपी जानकारी और अवयव कैसे पढ़ें, MRP का मतलब क्या है, और RTI कानून क्या देता है?
पिछली बात से कड़ी सुरक्षा के लिए यह जानना भी ज़रूरी है कि हम क्या खरीद रहे हैं। यहीं से सूचना का अधिकार आता है।
पैकेट पर वस्तु के अवयव, मूल्य, बैच संख्या, निर्माण की तारीख, खराब होने की अंतिम तिथि और बनाने वाले का पता छपा होता है। दवा पर उचित प्रयोग के निर्देश और उसके दूसरे प्रभावों और खतरों की जानकारी होती है; कपड़ों पर धुलाई के निर्देश।
ये नियम इसलिए हैं कि उपभोक्ता को, जो वस्तुएँ और सेवाएँ वह खरीदता है, उनके बारे में सूचना पाने का अधिकार है। जानकारी हो, तो वह खराबी पर शिकायत कर सकता है और मुआवज़ा या वस्तु बदलने की माँग कर सकता है।
पैकेट के पीछे: एक नमूना
यह एक नमूना है, किसी असली कंपनी का पैकेट नहीं। किताब (पृ. 80) अवयव, मूल्य, बैच संख्या, निर्माण की तारीख, अंतिम तिथि और बनाने वाले का पता गिनाती है; आज के नियमों में इकाई बिक्री मूल्य, सभी करों सहित MRP, शाकाहारी या मांसाहारी का निशान और एलर्जी वाले अवयव भी लिखने होते हैं। अगली बार कोई भी पैकेट उठाइए और ये बातें ढूँढिए। कौन-सी नहीं मिली?

असली पैकेट पर: लाल खाने में बैच नंबर, बनने का महीना-साल, MRP ₹200 और इकाई बिक्री मूल्य (USP) ₹1 प्रति ग्राम है। नीचे पैकेट ख़ुद बताता है कि कौन-सी संख्या क्या है; ऊपर हरा शाकाहारी निशान है।
Photograph by Sgroey, 2 November 2025; Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0.
अवयव कैसे पढ़ें
पैकेट पर अवयव ज़्यादा से कम मात्रा के क्रम में लिखे जाते हैं: बनाते समय जिसका वज़न (या आयतन) सबसे ज़्यादा था, वह सबसे पहले। इसलिए पहले दो-तीन अवयव बता देते हैं कि खाने में ज़्यादातर क्या है।
| ऊर्जा | 562 kcal |
|---|---|
| प्रोटीन | 15 ग्राम |
| कार्बोहाइड्रेट | 40 ग्राम |
| कुल चीनी | 3 ग्राम |
| जोड़ी गई चीनीबनाते समय ऊपर से मिलाई गई | 1 ग्राम |
| कुल वसा | 38 ग्राम |
| संतृप्त वसा | 14 ग्राम |
| ट्रांस वसा | 0.1 ग्राम |
| सोडियमनमक में सोडियम होता है | 900 मिलीग्राम |
- पहला अवयव देखिए: वही सबसे ज़्यादा है।
- "इसमें है" वाली पंक्ति देखिए। दूध, अंडा, मछली, मूँगफली और दूसरे मेवे, सोया या गेहूँ जैसी चीज़ें, जिनसे कुछ लोगों को एलर्जी होती है, यहाँ अलग से लिखी जाती हैं।
- निशान देखिए: हरे चौखटे में हरा गोला शाकाहारी, भूरे चौखटे में भूरा त्रिकोण मांसाहारी।
- दो पैकेट मिलाने हों, तो पोषण तालिका का "प्रति 100 ग्राम" (पेय पर "प्रति 100 मिली") वाला खाना मिलाइए।
- तारीखें देखिए: "बेस्ट बिफ़ोर" के बाद स्वाद और गुणवत्ता घट सकती है; "यूज़ बाय" या "एक्सपायरी" के बाद खाना सुरक्षित न रहे, इसलिए उसके बाद उसे बेचा नहीं जा सकता।
पैकेट पर लिखने के नियम: FSSAI (अंग्रेज़ी में) · MRP और इकाई बिक्री मूल्य का नियम: PIB (अंग्रेज़ी में)
ध्यान रखिए: "वस्तुत: उपभोक्ता, विक्रेता से अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) से कम दाम पर वस्तु देने के लिए मोल–भाव कर सकते हैं।"
सरकार की दी हुई सेवाओं को उपयोगी बनाने के लिए सूचना पाने के अधिकार को बढ़ाया गया है। "सन् 2005 के अक्टूबर में" भारत सरकार ने RTI (राइट टू इनफॉरमेशन) या सूचना पाने का अधिकार कानून लागू किया। यह नागरिकों को सरकारी विभागों के कामकाज की सभी सूचनाएँ पाने का अधिकार देता है।
किताब का उदाहरण: इंतज़ार …
इंजीनियरिंग स्नातक अमृता ने एक सरकारी विभाग में नौकरी के लिए सारे प्रमाणपत्र जमा किए और इंटरव्यू दिया, पर कोई परिणाम नहीं मिला। कर्मचारियों ने भी उसके सवालों का जवाब नहीं दिया। तब उसने RTI कानून के तहत प्रार्थना-पत्र दिया कि उचित समय में परिणाम जानना उसका अधिकार है, ताकि वह अपने भविष्य की योजना बना सके। उसे देरी के कारण बताए गए, और नियुक्ति के लिए बुलावे का पत्र भी मिला, क्योंकि उसने इंटरव्यू अच्छा दिया था।
आओ–इन पर विचार करें (पृ. 81)
1कभी पैकेट पर छपे मूल्य से अधिक और कभी कम दाम क्यों लिया जाता है? क्या उपभोक्ता समूह इसमें कुछ कर सकते हैं?
एक संभावित जवाब देखिए
- छपा मूल्य अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) है। अधिक दाम तब लिया जाता है, जब विक्रेता शोषण करे और खरीदार जागरूक न हो; यह गलत है, और कोई भी इसका विरोध और शिकायत कर सकता है। कम दाम इसलिए हो सकता है कि MRP से कम पर मोल-भाव किया जा सकता है (पृ. 80)।
- उपभोक्ता समूह लोगों को जागरूक कर सकते हैं और शिकायत दर्ज कराने में मदद कर सकते हैं (पृ. 84)।
2कुछ डिब्बाबंद वस्तुओं के पैकेट लेकर उन पर दी गई जानकारी जाँचिए। वे कैसे उपयोगी हैं, और कौन-सी जानकारी और होनी चाहिए?
एक संभावित जवाब देखिए
- पैकेट पर अवयव, मूल्य, बैच संख्या, निर्माण की तारीख, अंतिम तिथि और बनाने वाले का पता देखिए (पृ. 80)। इनसे खराब या पुरानी वस्तु पहचानी जा सकती है, वस्तु बदलने या मुआवज़े की माँग की जा सकती है, और MRP से अधिक देने से बचा जा सकता है। कौन-सी जानकारी कम है, यह अपने पैकेटों को देखकर लिखिए।
3खराब सड़क, दूषित पानी और स्वास्थ्य सुविधाओं की शिकायतें कोई नहीं सुनता; अब RTI कानून आपको प्रश्न पूछने का अधिकार देता है। क्या आप इससे सहमत हैं?
एक संभावित जवाब देखिए
- हाँ। सन् 2005 के अक्टूबर में लागू RTI कानून नागरिकों को सरकारी विभागों के कामकाज की सभी सूचनाएँ पाने का अधिकार देता है। अमृता ने इसी कानून से अपने परिणाम की देरी का कारण जाना और नियुक्ति का बुलावा पाया (पृ. 80)। इसी तरह सड़क या पानी के काम के बारे में भी सूचना माँगी जा सकती है।
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1पैकेट पर अवयव किस क्रम में लिखे जाते हैं?
बनाते समय जिस अवयव का वज़न या आयतन सबसे ज़्यादा था, वह सबसे पहले लिखा जाता है।
2RTI कानून कब लागू हुआ?
सन् 2005 के अक्टूबर में; यह सरकारी विभागों के कामकाज की सूचना पाने का कानून है (पृ. 80)।
3दुकानदार MRP से अधिक दाम माँगे, तो?
MRP से अधिक लेना गलत है; MRP से कम दाम के लिए मोल-भाव किया जा सकता है (पृ. 80)।
4अमृता को RTI से क्या मिला?
प्रार्थना-पत्र के बाद देरी के कारण भी बताए गए और नियुक्ति का बुलावा भी मिला (पृ. 80)।
5चयन का अधिकार
इस पड़ाव का सवालपृ. 81
चुनने का अधिकार कब टूटता है, और अबिरामी को आयोग से क्या मिला?
पिछली बात से कड़ी जानकारी मिल गई, पर खरीदना है या नहीं, और क्या खरीदना है, यह फ़ैसला भी उपभोक्ता का होना चाहिए।
कोई भी उपभोक्ता, किसी भी आयु या लिंग का, कोई भी सेवा ले रहा हो, उसे हमेशा चुनने का अधिकार है।
किताब के रोज़ के उदाहरण: दुकानदार कहे कि दंतमंजन तभी मिलेगा जब साथ में ब्रश भी खरीदेंगे, और आप ब्रश नहीं लेना चाहते, तो आपके चुनने के अधिकार का उल्लंघन हुआ। इसी तरह नया गैस कनेक्शन लेते समय डीलर साथ में चूल्हा लेने का दबाव डालता है। ऐसे में हमें वह खरीदना पड़ता है, जिसे खरीदने की हमारी इच्छा नहीं होती।
किताब का उदाहरण: पैसे लौटाए गए
अंसारी नगर की छात्रा अबिरामी ने दिल्ली में व्यावसायिक पाठ्यक्रम के लिए एक कोचिंग संस्थान के दो वर्षीय पाठ्यक्रम में नामांकन कराया, और पूरे दो वर्ष के लिए "करीब 61,020 रुपये" जमा किए। पढ़ाई का स्तर ठीक न लगने पर उसने साल के अंत में पाठ्यक्रम छोड़ने का निश्चय किया, और एक साल का पैसा वापस माँगा। संस्थान ने मना कर दिया।
राज्य आयोग ने छात्रा को मुआवज़े और याचिका खर्च के रूप में "7,000 रूपये" देने को कहा, और सभी शिक्षा संस्थानों और व्यावसायिक संस्थाओं को विद्यार्थियों से पूरे साल की फ़ीस एडवांस में लेने से मना किया। आदेश न मानने पर दंड शुल्क और जेल भी हो सकती है।
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1इनमें से चुनने के अधिकार का उल्लंघन कौन-सा है?
किसी पर बिना चाही वस्तु नहीं थोपी जा सकती (पृ. 81)।
2ज़िला आयोग ने अबिरामी को कितने रुपये लौटाने का आदेश दिया?
करीब 61,020 रुपये दो साल की पढ़ाई के लिए जमा थे; ज़िला आयोग ने 28,000 रुपये लौटाने को कहा (पृ. 81)।
3संस्थान की अपील पर राज्य आयोग ने क्या किया?
और छात्रा को मुआवज़े और याचिका खर्च के रूप में 7,000 रुपये दिलाए (पृ. 81)।
6न्याय कहाँ मिले
इस पड़ाव का सवालपृ. 82–83
ठगे जाने पर उपभोक्ता क्षतिपूर्ति कैसे माँगे, और प्रकाश ने न्याय के लिए कौन-से कदम उठाए?
पिछली बात से कड़ी अबिरामी को पैसे आयोग के आदेश से लौटे। अब देखिए कि शिकायत से फ़ैसले तक का रास्ता कैसा होता है।
उपभोक्ताओं को अनुचित सौदेबाज़ी और शोषण के विरुद्ध क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार है। इसके लिए एक आसान और प्रभावी जन-प्रणाली चाहिए।
उपभोक्ता उपयुक्त उपभोक्ता केन्द्र के सामने अपनी शिकायत ख़ुद दर्ज करा सकता है, वकील के साथ भी और वकील के बिना भी।
"यदि एक उपभोक्ता को कोई क्षति पहुँचाई जाती है, तो क्षति की मात्रा के आधार पर उसे क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार होता है।"
किताब का उदाहरण: प्रकाश का मनीऑर्डर
प्रकाश ने बेटी की शादी के लिए अपने गाँव मनीऑर्डर भेजा। बेटी को ज़रूरत के समय पैसे नहीं मिले, महीनों बाद भी नहीं। तब प्रकाश ने नयी दिल्ली के एक ज़िला स्तर के उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में मुकदमा दर्ज किया। किताब नौ चित्रों में उनके कदम दिखाती है।
आजकल उपभोक्ता एक व्यक्ति के रूप में या एक समूह के रूप में (जिसे क्लास एक्शन सूट कहते हैं), ख़ुद जाकर या इंटरनेट से शिकायत दर्ज करा सकते हैं, और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से अपने मुकदमों की कार्यवाही करा सकते हैं।
आओ–इन पर विचार करें (पृ. 82)
किताब के इन विज्ञापनों में से कौन-सा सचमुच उपभोक्ता को लाभ पहुँचाता है: 500 ग्राम पर 15 ग्राम अतिरिक्त; अखबार के ग्राहक बनने पर साल के अंत में उपहार; खुरचकर 10 लाख तक का इनाम; 500 ग्राम ग्लूकोज़ के डिब्बे में दूध की चॉकलेट; पैकेट में सोने का सिक्का; 2000 रुपये तक के जूते पर 500 रुपये तक का एक जोड़ी जूता मुफ़्त?
एक संभावित जवाब देखिए
- ये विज्ञापन लुभाने के लिए हैं। हर एक के बारे में पूछिए: क्या दाम वही है, क्या इनाम पक्का है या किस्मत पर है, और क्या "मुफ्त" चीज़ की कीमत पहले ही दाम में जुड़ी है?
- 500 ग्राम पर 15 ग्राम अतिरिक्त का लाभ नापा जा सकता है, अगर दाम न बढ़ा हो; इनाम और सिक्के वाले प्रस्ताव किस्मत पर टिके हैं।
- पृ. 89 की प्रश्नावली में आकर्षक प्रस्तावों पर बेहिचक प्रतिक्रिया करना जागरूकता की कमी माना गया है।
Checkpoint✓ Stop complete
1उपभोक्ताओं का एक समूह के रूप में शिकायत करना क्या कहलाता है?
उपभोक्ता अकेले भी और समूह में भी शिकायत कर सकते हैं (पृ. 82)।
2क्या आयोग में शिकायत के लिए वकील ज़रूरी है?
प्रकाश ने आयोग में अपने मुकदमे पर ख़ुद बहस की (पृ. 82–83)।
3निवारण के अधिकार में क्षतिपूर्ति किस पर निर्भर है?
क्षति की मात्रा के आधार पर क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार है (पृ. 82)।
7तीन स्तर के आयोग
इस पड़ाव का सवालपृ. 84
उपभोक्ता के मुकदमे कौन-से आयोग सुनते हैं, और अपील कहाँ होती है?
पिछली बात से कड़ी प्रकाश ज़िला स्तर के आयोग में गए थे। ऐसे आयोग तीन स्तरों पर हैं।
भारत में उपभोक्ता आंदोलन से कई संगठन बने, जिन्हें आम तौर पर उपभोक्ता अदालत या उपभोक्ता संरक्षण परिषद् कहते हैं। ये बताते हैं कि उपभोक्ता अदालत में मुकदमा कैसे दर्ज कराएँ, कई बार आयोग में उपभोक्ता का प्रतिनिधित्व भी करते हैं, और जनता में जागरूकता के लिए सरकार से वित्तीय सहयोग पाते हैं।
आवासीय कॉलोनी का निवासी कल्याण संघ भी अपने किसी सदस्य के साथ हुई अनुचित व्यावसायिक कार्रवाई का मामला देखता है।
किताब के अनुसार तीन स्तर
कोपरा के अंतर्गत ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर एक त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र बना है। ज़िला स्तर के आयोग में मुकदमा खारिज हो जाए, तो उपभोक्ता राज्य स्तर के आयोग में और उसके बाद राष्ट्रीय स्तर के आयोग में अपील कर सकता है।
पीछे के उदाहरण याद कीजिए: रेजी के पिता ने राज्य आयोग में मामला खारिज होने पर राष्ट्रीय आयोग में अपील की (पृ. 79), और अबिरामी के मामले में संस्थान ने ज़िला आयोग के आदेश के ख़िलाफ़ राज्य आयोग में अपील की (पृ. 81)।
किताब का निष्कर्ष: "इस प्रकार, अधिनियम ने उपभोक्ता के रूप में उपभोक्ता न्यायालय में प्रतिनिधित्व का अधिकार देकर हमें समर्थ बनाया है।"
आओ–इन पर विचार करें (पृ. 84, 86)
पृ. 84अरिता के मामले के कदमों को सही क्रम में रखिए।
जवाब देखिए
- (छ) दीवार घड़ी खरीदी → (ग) लगा कि घड़ी दोषयुक्त है → (ड.) शाखा कार्यालय में डीलर के ख़िलाफ़ शिकायत, कोई असर नहीं → (ख) शिकायत के लिए पेशेवर व्यक्ति से मिली → (क) ज़िला आयोग में मुकदमा दायर किया → (च) आयोग ने पहले बिल और वारंटी माँगे → (घ) आयोग की कार्यवाही में भाग लिया → (ज) कुछ महीनों में आयोग ने नई घड़ी देने का आदेश दिया।
पृ. 86, 2अपने क्षेत्र के सबसे नज़दीकी उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का पता कीजिए।
एक संभावित जवाब देखिए
- यह आपके ज़िले पर निर्भर है। किताब के अनुसार ज़िला स्तर का आयोग 1 करोड़ तक के दावे सुनता है (पृ. 84)। उसका पता लिखकर कक्षा में साझा कीजिए।
पृ. 86, 3उपभोक्ता संरक्षण परिषद् और उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में क्या अंतर है?
जवाब देखिए
- उपभोक्ता संरक्षण परिषद्: उपभोक्ता आंदोलन से बना स्वयंसेवी संगठन। सलाह देता है कि मुकदमा कैसे दर्ज करें, कई बार आयोग में उपभोक्ता का प्रतिनिधित्व करता है, और जागरूकता के लिए सरकार से वित्तीय सहयोग पाता है। प्रकाश यहाँ सलाह लेने गए थे (पृ. 83–84)।
- उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग: कोपरा के तहत बना त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र (ज़िला, राज्य, राष्ट्रीय)। यहाँ मुकदमा दर्ज होता है, जज दस्तावेज़ जाँचते हैं, दोनों पक्षों को सुनते हैं और फ़ैसला सुनाते हैं (पृ. 83–84)।
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11 करोड़ तक के दावे कौन-सा आयोग सुनता है?
ज़िला 1 करोड़ तक, राज्य 1 करोड़ से 10 करोड़ तक, राष्ट्रीय 10 करोड़ से ऊपर (पृ. 84)।
2उपभोक्ता संरक्षण परिषद् क्या है?
परिषद् रास्ता बताती है और आयोग में प्रतिनिधित्व करती है; फ़ैसला आयोग सुनाता है (पृ. 83–84)।
3राज्य आयोग के फ़ैसले से असंतुष्ट उपभोक्ता क्या कर सकता है?
त्रिस्तरीय व्यवस्था में ऊपर के आयोग में अपील हो सकती है, जैसे रेजी के पिता ने की (पृ. 79, 84)।
8जागरूक उपभोक्ता
इस पड़ाव का सवालपृ. 84–86
जागरूक उपभोक्ता किसे कहते हैं, और गुणवत्ता के चिह्न उसकी कैसे मदद करते हैं?
पिछली बात से कड़ी आयोग तक जाना तभी संभव है, जब उपभोक्ता अपने अधिकार जानता हो। इसके लिए ज्ञान और निपुणता चाहिए।
खरीदते समय अपने अधिकारों के प्रति सचेत होंगे, तभी अच्छे और बुरे में फ़र्क कर पाएँगे और सबसे अच्छा चुनाव कर पाएँगे। किताब उपभोक्ता के अधिकारों में उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार भी गिनाती है (पृ. 86)।
कोपरा ने केंद्र और राज्य सरकारों में उपभोक्ता मामलों के अलग विभाग बनवाने में मुख्य भूमिका निभाई। पृ. 84 और 85 के पोस्टर जैसे विज्ञापनों से, और टेलीविज़न के विज्ञापनों से, सरकार नागरिकों को कानूनी प्रक्रिया के बारे में बताती है।
"एक जागरूक उपभोक्ता बनने के लिए निपुणता और ज्ञान प्राप्त करने की जरूरत होती है।"
आई.एस.आई. और एगमार्क (पृ. 85)
- आई.एस.आई., एगमार्क, हॉलमार्क जैसे शब्दचिह्न (लोगो) और प्रमाणक चिह्न अच्छी गुणवत्ता का भरोसा दिलाते हैं।
- जाँच करके प्रमाणपत्र देने वाले संगठन उत्पादक को लोगो तभी लगाने देते हैं, जब वह श्रेष्ठ गुणवत्ता का पालन करे।
- ये संगठन बहुत-से उत्पादों के लिए गुणवत्ता के मानदंड बनाते हैं, पर "सभी उत्पादकों का इन मानदण्डों का पालन करना जरूरी नहीं होता।"
- जो उत्पाद उपभोक्ता की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर असर डालते हैं या बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होते हैं, उनके लिए प्रमाण लेना अनिवार्य है। किताब के उदाहरण: एल.पी.जी. सिलिंडर, खाने के रंग और उनमें डाली जाने वाली सामग्री, सीमेंट, बोतलबंद पेयजल।

सिलेंडर: हैदराबाद में गैस सिलेंडर ले जाता एक वाहन
Photograph by Jay.Jarosz, 22 January 2016; Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0.
घर-घर पहुँचने वाला एल.पी.जी. सिलिंडर ठीक वैसी वस्तु है, जिसके लिए किताब प्रमाण को अनिवार्य बताती है: वह सुरक्षा पर असर डालता है और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है।
आओ–इन पर विचार करें (पृ. 86)
1इस अध्याय के पोस्टर और कार्टून देखकर किसी एक वस्तु पर उपभोक्ता की नज़र से पोस्टर बनाइए।
एक संभावित जवाब देखिए
- एक वस्तु चुनिए, जैसे प्रेशर कूकर या दवा, और पोस्टर में उसकी सुरक्षा, पैकेट की जानकारी, MRP, गुणवत्ता का चिह्न और शिकायत का रास्ता दिखाइए (पृ. 79–85)। पृ. 84 और 85 के सरकारी पोस्टर नमूने का काम करेंगे।
5अगर मानकीकरण गुणवत्ता पक्की करता है, तो बाज़ार में बहुत-सी वस्तुएँ बिना आई.एस.आई. या एगमार्क के क्यों मिलती हैं?
जवाब देखिए
- क्योंकि सभी उत्पादकों के लिए इन मानदंडों का पालन ज़रूरी नहीं है। फिर भी कुछ वस्तुओं के लिए प्रमाण अनिवार्य है, जो उपभोक्ता की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर असर डालती हैं या बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होती हैं, जैसे एल.पी.जी. सिलिंडर, खाद्य रंग, सीमेंट, बोतलबंद पेयजल (पृ. 85)। बाकी वस्तुओं के लिए यह ज़रूरी नहीं है।
6हॉलमार्क या आई.एस.ओ. प्रमाणन देने वालों के बारे में जानकारी इकट्ठा कीजिए।
एक संभावित जवाब देखिए
- अपने आसपास के सुनार या दुकानदार से पूछिए कि उनके सामान पर कौन-सा चिह्न है और वह किस संस्था से मिला। पृ. 85 बताता है कि ऐसे संगठन जाँच करके प्रमाणपत्र देते हैं, और उत्पादक को लोगो तभी लगाने देते हैं, जब वह श्रेष्ठ गुणवत्ता का पालन करे।
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1किन वस्तुओं के उत्पादकों के लिए प्रमाण लेना अनिवार्य है?
जैसे एल.पी.जी. सिलिंडर, खाद्य रंग, सीमेंट, बोतलबंद पेयजल (पृ. 85)।
2हॉलमार्क किसका प्रमाण है?
अनाज और खाद्य तेल के लिए एगमार्क है, पोषक तत्व मिलाने के लिए +F।
3जागरूक उपभोक्ता बनने के लिए किताब किस चीज़ को ज़रूरी बताती है?
अधिकारों के प्रति सचेत उपभोक्ता ही अच्छे और बुरे में फ़र्क करके अच्छा चुनाव कर पाता है (पृ. 84)।
9आंदोलन आगे कैसे बढ़े
इस पड़ाव का सवालपृ. 86–87
भारत में उपभोक्ता आंदोलन कितना आगे बढ़ा, कहाँ कमज़ोर है, और आगे क्या चाहिए?
पिछली बात से कड़ी अधिकार, आयोग और चिह्न, सब मौजूद हैं। फिर भी किताब पूछती है: क्या यह सब काफ़ी है?
24 दिसंबर को भारत में राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है, क्योंकि 1986 में इसी दिन भारतीय संसद ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया था। भारत उन देशों में से एक है, जहाँ उपभोक्ता समस्याओं के निवारण के लिए विशिष्ट न्यायालय हैं।
किताब बताती है कि देश में 2000 से अधिक उपभोक्ता संगठन हैं, पर इनमें से केवल 50–60 ही अपने कामों के लिए पूर्ण संगठित और मान्यता प्राप्त हैं।
2019 का संशोधन (पृ. 87)
- अब इंटरनेट से खरीद भी कोपरा में शामिल है।
- सेवा में कमी या दोषपूर्ण उत्पाद होने पर सेवा प्रदाता और निर्माता को भी ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा और दंड मिलेगा; जेल भी हो सकती है।
- आयोग के बाहर तटस्थ मध्यस्थ की मदद से विवाद निपटाने को अब आयोग के तीनों स्तरों पर बढ़ावा दिया गया है।
और कमियाँ: बाज़ार में ज़्यादातर खरीद छोटी फुटकर दुकानों से होती है। श्रमिकों की रक्षा के कानून हैं, पर ख़ासकर असंगठित क्षेत्र में वे कमज़ोर हैं, और बाज़ारों के कामकाज के नियमों और विनियमों का अक्सर पालन नहीं होता।
आज की हेल्पलाइन और शिकायत का तरीका देखिए
किताब का आख़िरी संदेश: उपभोक्ताओं को अपनी भूमिका और अपना महत्त्व समझना होगा। "यह अक्सर कहा जाता है कि उपभोक्ताओं की सक्रिय भागीदारी से ही उपभोक्ता आंदोलन प्रभावी हो सकता है। इसके लिए स्वैच्छिक प्रयास और सबकी साझेदारी से युक्त संघर्ष की जरूरत है।"
आओ–इन पर विचार करें (पृ. 86)
4कोपरा के छह अधिकार हैं: (क) चयन (ख) सूचना (ग) निवारण (घ) प्रतिनिधित्व (च) सुरक्षा (छ) उपभोक्ता शिक्षा। ऊपर के मामलों को सही अधिकार के खाने में रखिए।
एक संभावित जवाब देखिए
- लता: सुरक्षा का अधिकार; झटके के नुकसान की भरपाई माँगे, तो यह निवारण से भी जुड़ता है।
- जॉन: प्रतिनिधित्व का अधिकार (उपभोक्ता न्यायालय में अपनी बात रखना); यह निवारण से भी जुड़ता है।
- मित्र की दवा: उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार (आप मित्र को उसका अधिकार बता रहे हैं); शिकायत के कारण यह निवारण से भी जुड़ता है।
- इकबाल: सूचना का अधिकार।
- केबल ऑपरेटर: चयन का अधिकार।
- खराब कैमरा: निवारण का अधिकार।
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1राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस किस दिन मनाया जाता है?
1986 में इसी दिन संसद ने अधिनियम पारित किया था (पृ. 86)।
2देश के 2000 से अधिक उपभोक्ता संगठनों में कितने पूर्ण संगठित और मान्यता प्राप्त हैं?
यह आंदोलन की एक कमी है (पृ. 86)।
3किताब निवारण प्रक्रिया को कैसा बताती है?
वकील चाहिए होते हैं और मुकदमों में काफ़ी समय लगता है (पृ. 86)।
सार
अध्याय का सार: बाज़ार में अकेला उपभोक्ता कमज़ोर पड़ता है। विक्रेता कम तौलते हैं, बिना बताए शुल्क जोड़ते हैं, मिलावटी या दोषपूर्ण माल बेचते हैं, और बड़ी कंपनियाँ झूठी सूचना फैलाती हैं। इसी असंतोष से उपभोक्ता आंदोलन खड़ा हुआ, और उसके दबाव में 1986 में उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम (कोपरा) बना, जिसका 2019 में संशोधन हुआ। कोपरा उपभोक्ता को छह अधिकार देता है और शिकायत के लिए ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर आयोग बनाता है। फिर भी उपभोक्ता ज्ञान बहुत धीरे फैल रहा है, इसलिए उपभोक्ताओं की सक्रिय भागीदारी ज़रूरी है।
समस्या
अकेला और बिखरा उपभोक्ता, थोड़े और शक्तिशाली उत्पादक; इसलिए बाज़ार में भी नियम चाहिए।
आंदोलन से कानून
1960 के दशक में आंदोलन का व्यवस्थित उदय; 1986 में कोपरा; 2019 में संशोधन।
अधिकार और आयोग
छह अधिकार; ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय आयोग, अपील की सुविधा के साथ।
आगे का रास्ता
जागरूकता धीमी है; स्वैच्छिक प्रयास और सबकी साझेदारी चाहिए।
अअभ्यास
पृ. 87–88 · प्रश्न 12 और 13 में सही विकल्प दबाइए; कारण वहीं खुल जाएगा। बाकी उत्तर पहले ख़ुद सोचिए, फिर खोलकर मिलाइए।
प्रश्नावली
1बाज़ार में नियमों तथा विनियमों की आवश्यकता क्यों पड़ती है? कुछ उदाहरणों के द्वारा समझाएँ।
जवाब देखिए
- बाज़ार में अकेला उपभोक्ता अक्सर कमज़ोर हालत में होता है। शिकायत होने पर विक्रेता सारी ज़िम्मेदारी खरीदने वाले पर डालने की कोशिश करता है। जब उत्पादक थोड़े और शक्तिशाली हों और उपभोक्ता कम मात्रा में खरीदते हों और बिखरे हुए हों, तो बाज़ार ठीक से काम नहीं करता।
- उदाहरण: दुकानदार उचित वज़न से कम तौलते हैं, व्यापारी पहले न बताए गए शुल्क जोड़ देते हैं, मिलावटी या दोषपूर्ण वस्तुएँ बेची जाती हैं।
- उदाहरण: एक कंपनी ने शिशुओं के दूध का पाउडर माँ के दूध से बेहतर बताकर कई वर्षों तक पूरी दुनिया में बेचा; लंबे संघर्ष के बाद उसे मानना पड़ा कि उसके दावे झूठे थे।
- उदाहरण: सिगरेट कंपनियों से यह मनवाने के लिए कि उनका उत्पाद कैंसर का कारण हो सकता है, न्यायालय में लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।
- इसलिए उपभोक्ताओं की सुरक्षा पक्की करने के लिए नियम और विनियम चाहिए (पृ. 76–77)।
2भारत में उपभोक्ता आंदोलन की शुरुआत किन कारणों से हुई? इसके विकास के बारे में पता लगाएँ।
जवाब देखिए
- कारण: विक्रेता कई अनुचित व्यावसायिक व्यवहारों में शामिल थे, जिससे उपभोक्ताओं में असंतोष था, और शोषण से बचाने की कोई कानूनी व्यवस्था नहीं थी। सावधानी की पूरी ज़िम्मेदारी खरीदने वाले पर मानी जाती थी। 1960 के दशक में अत्यधिक खाद्य कमी, जमाखोरी, कालाबाज़ारी और खाद्य पदार्थों व खाद्य तेल में मिलावट ने आंदोलन को व्यवस्थित रूप दिया।
- विकास: आंदोलन का जन्म एक सामाजिक बल के रूप में हुआ। 1970 के दशक तक उपभोक्ता संस्थाएँ उपभोक्ता अधिकार पर लेख लिखने और प्रदर्शनी लगाने लगीं, और सड़क यात्री परिवहन व राशन दुकानों पर नज़र रखने के लिए उपभोक्ता दल बने।
- हाल में उपभोक्ता दलों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। आंदोलन ने व्यावसायिक कंपनियों और सरकार, दोनों पर दबाव डाला; नतीजा 1986 में उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम (कोपरा) था, जिसका 2019 में संशोधन हुआ (पृ. 77–78)।
3दो उदाहरण देकर उपभोक्ता जागरूकता की ज़रूरत का वर्णन करें।
जवाब देखिए
- खरीदते समय अपने अधिकारों के प्रति सचेत उपभोक्ता ही अच्छे और बुरे में फ़र्क करके सबसे अच्छा चुनाव कर पाता है; इसके लिए निपुणता और ज्ञान चाहिए (पृ. 84)।
- अमृता (पृ. 80): सरकारी विभाग ने इंटरव्यू का परिणाम नहीं बताया। उसने RTI कानून का प्रयोग करते हुए प्रार्थना-पत्र दिया, तो देरी के कारण भी बताए गए और नियुक्ति का बुलावा भी मिला।
- अबिरामी (पृ. 81): कोचिंग संस्थान ने एक साल की फ़ीस लौटाने से मना किया। उसने ज़िला आयोग में मुकदमा किया और 28,000 रुपये लौटाने का आदेश मिला।
- जागरूकता न हो तो लोग ठगे जाने को अपना दुर्भाग्य मानकर चुप रह जाते हैं (पृ. 89, प्रश्नावली का प्रश्न 5)। किताब के अनुसार भारत में उपभोक्ता ज्ञान अब भी बहुत धीरे फैल रहा है (पृ. 87), इसलिए जागरूकता ज़रूरी है।
4कुछ ऐसे कारकों की चर्चा करें, जिनसे उपभोक्ताओं का शोषण होता है?
जवाब देखिए
- अकेला और बिखरा हुआ उपभोक्ता: उपभोक्ता कम मात्रा में खरीदते हैं और बिखरे हुए हैं, जबकि उत्पादक थोड़े और शक्तिशाली हैं (पृ. 76)।
- बड़ी कंपनियों की ताक़त: अधिक पूँजी वाली कंपनियाँ बाज़ार को प्रभावित करती हैं और मीडिया व दूसरे स्रोतों से गलत सूचना देती हैं (पृ. 76)।
- अनुचित व्यापार: कम तौलना, बिना बताए शुल्क जोड़ना, मिलावटी या दोषपूर्ण वस्तुएँ बेचना (पृ. 76)।
- कमज़ोर निगरानी: सुरक्षा नियमों का पर्यवेक्षण ठीक से नहीं होता और उपभोक्ता आंदोलन बहुत मज़बूत नहीं है (पृ. 79)।
- सबूत की कमी: ज़्यादातर खरीद के समय रसीद नहीं मिलती, और ज़्यादातर खरीद छोटी फुटकर दुकानों से होती है (पृ. 86)।
- कम जानकारी: उपभोक्ता ज्ञान बहुत धीरे फैल रहा है (पृ. 87)।
5उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986 के निर्माण की ज़रूरत क्यों पड़ी?
जवाब देखिए
- पहले बाज़ार में उपभोक्ता को शोषण से बचाने की कोई कानूनी व्यवस्था नहीं थी। असंतुष्ट उपभोक्ता बस उस ब्रांड या दुकान से खरीदना बंद कर देता था, और सावधानी की ज़िम्मेदारी उसी की मानी जाती थी (पृ. 77)।
- कम तौल, मिलावट, झूठे दावे जैसे शोषण आम थे (पृ. 76–77)। उपभोक्ता आंदोलन ने कंपनियों और सरकार पर दबाव डाला, और 1986 में भारत सरकार ने कोपरा बनाकर बड़ा कदम उठाया (पृ. 78)।
- इस कानून से उपभोक्ता को अधिकार मिले (पृ. 86) और शिकायत निपटाने के लिए ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर आयोग बने (पृ. 84)।
6अपने क्षेत्र के बाज़ार में जाने पर उपभोक्ता के रूप में अपने कुछ कर्त्तव्यों का वर्णन करें।
जवाब देखिए
- खरीदने पर रसीद माँगिए और सँभालकर रखिए, क्योंकि बिना रसीद सबूत जुटाना कठिन होता है (पृ. 86, 89)।
- पैकेट पर अवयव, निर्माण की तारीख, अंतिम तिथि और MRP देखिए; MRP से अधिक मत दीजिए (पृ. 80)।
- आई.एस.आई. जैसे गुणवत्ता के चिह्न और समाप्ति तिथि देखिए (पृ. 85, 89)।
- गैस सिलेंडर या पुराने अखबार खरीदते-बेचते समय वज़न ख़ुद देखिए; बाट की जगह पत्थर से तौलने का विरोध कीजिए (पृ. 89)।
- दाम की तुलना कीजिए और लुभाने वाले प्रस्तावों पर तुरंत मत रीझिए (पृ. 82, 89)।
- ठगे जाने पर चुप मत रहिए; विक्रेता से शिकायत कीजिए और ज़रूरत हो तो उपभोक्ता आयोग जाइए (पृ. 82, 89)।
7मान लीजिए, आप शहद की एक बोतल और बिस्कुट का एक पैकेट खरीदते हैं। खरीदते समय आप कौन–सा लोगो या शब्द चिह्न देखेंगे और क्यों?
जवाब देखिए
- बोतल और पैकेट पर गुणवत्ता का प्रमाणक चिह्न देखिए, जैसे खाने की चीज़ों के लिए एगमार्क (किताब इसे अनाजों और खाद्य तेल का प्रमाण कहती है, प्रश्न 12) या आई.एस.आई.। पोषक तत्व मिलाए गए हों, तो +F का चिह्न होता है (पृ. 85, प्रश्न 12)।
- क्यों: प्रमाणपत्र देने वाले संगठन उत्पादक को लोगो लगाने की अनुमति तभी देते हैं, जब वह श्रेष्ठ गुणवत्ता का पालन करे; इसलिए ये चिह्न अच्छी गुणवत्ता का भरोसा दिलाते हैं (पृ. 85)।
- साथ ही पैकेट पर अवयव, निर्माण की तारीख, अंतिम तिथि, MRP और बनाने वाले का पता भी देखिए (पृ. 80)।
8भारत में उपभोक्ताओं को समर्थ बनाने के लिए सरकार द्वारा किन कानूनी मानदंडों को लागू करना चाहिए?
जवाब देखिए
- किताब सरकार के ये कानूनी उपाय बताती है; उपभोक्ता तभी समर्थ बनेंगे जब इन्हें ठीक से लागू किया जाए, क्योंकि किताब के अनुसार नियमों का अक्सर पालन नहीं होता (पृ. 79, 87):
- उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986 (कोपरा) और 2019 में उसका संशोधन (पृ. 78)।
- त्रिस्तरीय आयोग: ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर, अपील की सुविधा के साथ; इससे उपभोक्ता न्यायालय में प्रतिनिधित्व का अधिकार मिला (पृ. 84)।
- 2019 का संशोधन: इंटरनेट से खरीद भी शामिल; सेवा प्रदाता और निर्माता ज़िम्मेदार, जेल तक हो सकती है; तटस्थ मध्यस्थ से निपटारे को बढ़ावा (पृ. 87)।
- सूचना के नियम: पैकेट पर अवयव, तिथि, MRP छापना; और सन् 2005 के अक्टूबर से RTI कानून (पृ. 80)।
- अनिवार्य प्रमाण: एल.पी.जी. सिलिंडर, खाद्य रंग, सीमेंट, बोतलबंद पेयजल जैसी वस्तुओं के लिए (पृ. 85)।
- उपभोक्ता मामलों के अलग विभाग केंद्र और राज्यों में, और विज्ञापनों से जागरूकता (पृ. 85)।
- आसान शिकायत: समूह में (क्लास एक्शन सूट), इंटरनेट से, और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई (पृ. 82)।
9उपभोक्ताओं के कुछ अधिकारों को बताएँ और प्रत्येक अधिकार पर कुछ पंक्तियाँ लिखें।
जवाब देखिए
- पृ. 86 पर कोपरा के छह अधिकार गिनाए गए हैं:
- सुरक्षा का अधिकार: जीवन और संपत्ति के लिए खतरनाक वस्तुओं और सेवाओं से सुरक्षित रहने का अधिकार। उत्पादकों को सुरक्षा नियम मानने चाहिए, जैसे प्रेशर कूकर का सेफ्टी वॉल्व। उदाहरण: रेजी (पृ. 79)।
- सूचना का अधिकार: वस्तु के अवयव, मूल्य, बैच संख्या, निर्माण और अंतिम तिथि, बनाने वाले का पता जानने का अधिकार; MRP से अधिक लेने पर शिकायत (पृ. 80)।
- चयन (चुनने) का अधिकार: किसी पर बिना चाही वस्तु नहीं थोपी जा सकती, जैसे दंतमंजन के साथ ब्रश या गैस कनेक्शन के साथ चूल्हा। उदाहरण: अबिरामी (पृ. 81)।
- निवारण का अधिकार: अनुचित सौदेबाज़ी और शोषण से हुई क्षति की मात्रा के आधार पर क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार। उदाहरण: प्रकाश (पृ. 82–83)।
- प्रतिनिधित्व का अधिकार: उपभोक्ता न्यायालय में अपनी बात रखने का अधिकार; त्रिस्तरीय आयोग इसी के लिए हैं (पृ. 84)।
- उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार: जागरूक उपभोक्ता बनने के लिए निपुणता और ज्ञान चाहिए; सरकार विज्ञापनों से लोगों को कानूनी प्रक्रिया बताती है (पृ. 84–85)।
10उपभोक्ता अपनी एकजुटता का प्रदर्शन कैसे कर सकते हैं?
जवाब देखिए
- उपभोक्ता दल और उपभोक्ता संरक्षण परिषद् बनाकर, जो लोगों को मुकदमा दर्ज करने का रास्ता बताते हैं और आयोगों में उनका प्रतिनिधित्व करते हैं (पृ. 77, 84)।
- आवासीय कॉलोनी के निवासी कल्याण संघ के ज़रिए, जो सदस्य के साथ हुई अनुचित व्यावसायिक कार्रवाई का मामला उठाता है (पृ. 84)।
- समूह के रूप में शिकायत करके, जिसे क्लास एक्शन सूट कहते हैं (पृ. 82)।
- कंपनियों और सरकार पर मिलकर दबाव डालकर, जैसा आंदोलन ने कोपरा से पहले किया (पृ. 78)।
- सक्रिय भागीदारी से: किताब के अनुसार इसके लिए "स्वैच्छिक प्रयास और सबकी साझेदारी से युक्त संघर्ष की जरूरत है।" (पृ. 87)
11भारत में उपभोक्ता आंदोलन की प्रगति की समीक्षा करें।
जवाब देखिए
- प्रगति: 1960 के दशक में व्यवस्थित उदय से 1986 में कोपरा तक, और 2019 में उसका संशोधन (पृ. 77–78, 87)।
- प्रगति: 24 दिसंबर राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस; भारत उन देशों में है जहाँ उपभोक्ता समस्याओं के लिए विशिष्ट न्यायालय हैं; 2000 से अधिक उपभोक्ता संगठन (पृ. 86)।
- प्रगति: इंटरनेट से शिकायत, समूह में शिकायत और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई (पृ. 82)।
- कमी: इनमें से केवल 50–60 संगठन ही पूर्ण संगठित और मान्यता प्राप्त हैं (पृ. 86)।
- कमी: निवारण प्रक्रिया "जटिल, खर्चीली और समय साध्य" है; वकील चाहिए होते हैं, मुकदमे लंबे चलते हैं (पृ. 86)।
- कमी: रसीद न मिलने से सबूत जुटाना कठिन है (पृ. 86)।
- कमी: किताब के अनुसार कोपरा के 35 वर्ष बाद भी उपभोक्ता ज्ञान धीरे फैल रहा है, और नियमों का अक्सर पालन नहीं होता (पृ. 87)।
12निम्नलिखित को सुमेलित करें। हर बाईं बात के लिए दाईं ओर की सही बात दबाइए।
- 1
एक उत्पाद के घटकों का विवरण
(ङ) सूचना का अधिकार: पैकेट पर अवयवों की जानकारी पाना उपभोक्ता का अधिकार है (पृ. 80)।
- 2
एगमार्क
(ग) अनाजों और खाद्य तेल का प्रमाण: एगमार्क गुणवत्ता का प्रमाणक चिह्न है (पृ. 85)।
- 3
स्कूटर में खराब इंजन के कारण हुई दुर्घटना
(क) सुरक्षा का अधिकार: खतरनाक वस्तुओं से सुरक्षित रहने का अधिकार (पृ. 79)।
- 4
ज़िला उपभोक्ता आयोग
(ख) उपभोक्ता मामलों में संबंध: यह ज़िला स्तर पर उपभोक्ता विवाद सुनता है (पृ. 84)।
- 5
फूड फोर्टिफिकेशन
(छ) खाद्य पदार्थ में मुख्य पोषक तत्वों को मिलाना: पृ. 85 पर इसका +F लोगो छपा है।
- 6
उपभोक्ता इंटरनेशनल
(घ) उपभोक्ता कल्याण संगठनों की अंतर्राष्ट्रीय संस्था: 100 से अधिक देशों की 200 संस्थाओं की संरक्षक संस्था (पृ. 78)।
- 7
भारतीय मानक ब्यूरो
(च) वस्तुओं और सेवाओं के लिए मानक विकसित करने वाली एजेंसी (पृ. 85, 87)।
जवाब देखिए
- (1) (ङ) सूचना का अधिकार: पैकेट पर अवयवों की जानकारी पाना उपभोक्ता का अधिकार है (पृ. 80)।
- (2) (ग) अनाजों और खाद्य तेल का प्रमाण: एगमार्क गुणवत्ता का प्रमाणक चिह्न है (पृ. 85)।
- (3) (क) सुरक्षा का अधिकार: खतरनाक वस्तुओं से सुरक्षित रहने का अधिकार (पृ. 79)।
- (4) (ख) उपभोक्ता मामलों में संबंध: यह ज़िला स्तर पर उपभोक्ता विवाद सुनता है (पृ. 84)।
- (5) (छ) खाद्य पदार्थ में मुख्य पोषक तत्वों को मिलाना: पृ. 85 पर इसका +F लोगो छपा है।
- (6) (घ) उपभोक्ता कल्याण संगठनों की अंतर्राष्ट्रीय संस्था: 100 से अधिक देशों की 200 संस्थाओं की संरक्षक संस्था (पृ. 78)।
- (7) (च) वस्तुओं और सेवाओं के लिए मानक विकसित करने वाली एजेंसी (पृ. 85, 87)।
पंक्ति "विकसित करने वाली एजेंसी" किताब में बाएँ खाने में (4) के नीचे छपी है; यह (च) का हिस्सा है।
13सही या गलत बताएँ।
- क
कोपरा केवल सामानों पर लागू होता है।
गलत। यह सेवाओं पर भी लागू है: रेजी का मामला अस्पताल की सेवा का (पृ. 79), अबिरामी का कोचिंग का (पृ. 81), प्रकाश का मनीऑर्डर का था (पृ. 82); 2019 के संशोधन में सेवा प्रदाता भी ज़िम्मेदार है (पृ. 87)।
- ख
भारत विश्व के उन देशों में से एक है, जिसके पास उपभोक्ताओं की समस्याओं के निवारण के लिए विशिष्ट प्राधिकारण हैं।
सही। भारत उन देशों में से एक है जहाँ उपभोक्ता समस्याओं के निवारण के लिए विशिष्ट न्यायालय हैं (पृ. 86)।
- ग
जब उपभोक्ता को ऐसा लगे कि उसका शोषण हुआ है, तो उसे ज़िला उपभोक्ता आयोग में निश्चित रूप से मुकद्दमा दायर करना चाहिए।
गलत। उपभोक्ता पहले विक्रेता से शिकायत कर सकता है और उपभोक्ता संरक्षण परिषद् से सलाह ले सकता है, जैसा प्रकाश ने किया (पृ. 82–83)। कौन-सा आयोग सुनेगा, यह दावे की रकम पर निर्भर है; 1 करोड़ से ऊपर का दावा ज़िला आयोग में नहीं जाता (पृ. 84)।
- घ
जब अधिक मूल्य का नुकसान हो, तभी उपभोक्ता आयोग में जाना लाभप्रद होता है।
गलत। ज़िला आयोग 1 करोड़ तक के दावे सुनता है (पृ. 84); अबिरामी को कोचिंग फ़ीस के मामले में 28,000 रुपये लौटाने का आदेश मिला (पृ. 81)।
- ड.
हॉलमार्क, आभूषणों की गुणवत्ता बनाए रखनेवाला प्रमाण है।
सही। पृ. 85 हॉलमार्क को उन चिह्नों में गिनता है, जो अच्छी गुणवत्ता का भरोसा दिलाते हैं। हॉलमार्क सोने के गहनों पर लगता है।
- च
उपभोक्ता समस्याओं के निवारण की प्रक्रिया अत्यंत सरल और शीघ्र होती है।
गलत। किताब के अनुसार यह प्रक्रिया "जटिल, खर्चीली और समय साध्य" साबित हो रही है (पृ. 86)।
- छ
उपभोक्ता को मुआवजा पाने का अधिकार है, जो क्षति की मात्रा पर निर्भर करती है।
सही। क्षति की मात्रा के आधार पर क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार है (पृ. 82)।
जवाब देखिए
- (क) गलत। यह सेवाओं पर भी लागू है: रेजी का मामला अस्पताल की सेवा का (पृ. 79), अबिरामी का कोचिंग का (पृ. 81), प्रकाश का मनीऑर्डर का था (पृ. 82); 2019 के संशोधन में सेवा प्रदाता भी ज़िम्मेदार है (पृ. 87)।
- (ख) सही। भारत उन देशों में से एक है जहाँ उपभोक्ता समस्याओं के निवारण के लिए विशिष्ट न्यायालय हैं (पृ. 86)।
- (ग) गलत। उपभोक्ता पहले विक्रेता से शिकायत कर सकता है और उपभोक्ता संरक्षण परिषद् से सलाह ले सकता है, जैसा प्रकाश ने किया (पृ. 82–83)। कौन-सा आयोग सुनेगा, यह दावे की रकम पर निर्भर है; 1 करोड़ से ऊपर का दावा ज़िला आयोग में नहीं जाता (पृ. 84)।
- (घ) गलत। ज़िला आयोग 1 करोड़ तक के दावे सुनता है (पृ. 84); अबिरामी को कोचिंग फ़ीस के मामले में 28,000 रुपये लौटाने का आदेश मिला (पृ. 81)।
- (ड.) सही। पृ. 85 हॉलमार्क को उन चिह्नों में गिनता है, जो अच्छी गुणवत्ता का भरोसा दिलाते हैं। हॉलमार्क सोने के गहनों पर लगता है।
- (च) गलत। किताब के अनुसार यह प्रक्रिया "जटिल, खर्चीली और समय साध्य" साबित हो रही है (पृ. 86)।
- (छ) सही। क्षति की मात्रा के आधार पर क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार है (पृ. 82)।
परियोजना
अतिरिक्त परियोजना/कार्यकलाप · पृ. 88–89
ये काम आपको अपने आसपास से करने हैं; इनके नतीजे हर जगह अलग होंगे। हर काम के साथ कुछ सुझाव हैं कि कैसे करें।
1. उपभोक्ता जागरूकता सप्ताह का पोस्टर
उपभोक्ता जागरूकता फोरम के सचिव के रूप में सभी उपभोक्ता अधिकारों वाला पोस्टर बनाइए। पृष्ठ 84 और 85 के विज्ञापनों से विचार लीजिए, और अंग्रेज़ी शिक्षक की मदद लीजिए।
कैसे करें
- पोस्टर को छह खानों में बाँटिए, हर अधिकार के लिए एक खाना (पृ. 86)।
- हर खाने में अधिकार का नाम, एक पंक्ति में उसका मतलब, और किताब का एक उदाहरण लिखिए: रेजी, अमृता, अबिरामी या प्रकाश।
- सबसे ऊपर एक छोटा नारा रखिए, और नीचे लिखिए कि शिकायत कहाँ होती है: ज़िला, राज्य या राष्ट्रीय आयोग।
2. श्रीमती कृष्णा का शिकायत-पत्र
उन्होंने 6 महीने की वारंटी वाला रंगीन टी.वी. खरीदा; तीन महीने बाद वह बंद हो गया; दुकान के भेजे इंजीनियर के बाद भी बार-बार खराब होता रहा, और दुकानदार ने शिकायतों का जवाब नहीं दिया। उनके लिए अपने क्षेत्र के उपभोक्ता आयोग को पत्र लिखिए।
पत्र में क्या-क्या लिखें
- पत्र ज़िला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग को लिखिए: टी.वी. का दावा 1 करोड़ से बहुत कम है, और 1 करोड़ तक के दावे ज़िला आयोग सुनता है (पृ. 84)।
- सबसे ऊपर लिखिए कि पत्र किसे भेजा जा रहा है, फिर एक पंक्ति में कि शिकायत किस बात की है: खराब रंगीन टेलीविज़न।
- फिर बातें क्रम से: कब और किस दुकान से टी.वी. खरीदा, 6 महीने की वारंटी, तीन महीने बाद टी.वी. बंद, दुकान का भेजा इंजीनियर, फिर भी बार-बार खराबी, और दुकानदार का कोई जवाब नहीं।
- साफ़ लिखिए कि टी.वी. वारंटी की अवधि में ही खराब हुआ, यानी यह दोषपूर्ण वस्तु का मामला है।
- माँग लिखिए: टी.वी. बदला जाए या उसकी कीमत लौटाई जाए, और परेशानी का हर्जाना मिले।
- साथ में लगाइए: खरीद का बिल, वारंटी कार्ड और शिकायतों का ब्योरा, तारीख सहित। अरिता के मामले में भी आयोग ने पहले बिल और वारंटी माँगे थे (पृ. 84)।
- आख़िर में श्रीमती कृष्णा का नाम, पता और तारीख।
3. उपभोक्ता क्लब
विद्यालय में उपभोक्ता क्लब बनाइए और उपभोक्ता जागरूकता कार्यशाला का अभ्यास कीजिए, जिसमें विद्यालय के पास की किताब की दुकानों, भोजनालयों और दुकानों के मुद्दे हों।
कैसे करें
- क्लब में कुछ ज़िम्मेदारियाँ बाँटिए: कोई सचिव, कोई पोस्टर, कोई सर्वेक्षण।
- कार्यशाला के लिए आसपास की दुकानों की बातें लीजिए: पैकेट पर MRP और अंतिम तिथि, तौल, और रसीद मिलती है या नहीं।
- किताब के किसी मामले का छोटा नाटक कीजिए, जैसे प्रकाश का मनीऑर्डर या अबिरामी की फ़ीस, और अंत में पूछिए कि कौन-सा अधिकार काम आया।
4. नारों वाले विज्ञापन
किताब के नारे लेकर आकर्षक विज्ञापन बनाइए, और आख़िरी नारा अपने शब्दों में पूरा कीजिए।
किताब के नारे
- सतर्क उपभोक्ता ही सुरक्षित उपभोक्ता है।
- ग्राहक, सावधान
- सचेत उपभोक्ता
- अपने अधिकारों को पहचानो
- उपभोक्ता के रूप में, अपने अधिकारों की रक्षा करें।
- उठो, जागो और तब तक मत रुको …… (पूरा करें)
आख़िरी नारे को किसी अधिकार से जोड़कर पूरा कीजिए, जैसे: जब तक अपना हक़ न मिल जाए।
5. साक्षात्कार
आसपास के चार-पाँच लोगों से पूछिए कि वे कैसे शोषण का शिकार हुए, और उनके अनुभव इकट्ठा कीजिए।
कैसे करें
- पहले सवाल लिख लीजिए: क्या हुआ, कहाँ हुआ, रसीद थी या नहीं, शिकायत की या नहीं, और नतीजा क्या रहा।
- नाम लिखना ज़रूरी नहीं; बस अनुभव लिखिए।
- हर अनुभव के आगे लिखिए कि उसमें कौन-सा अधिकार टूटा, और शिकायत कहाँ हो सकती थी।
नमूना: किताब के मामलों से तालिका ऐसे भरिए
| क्या हुआ | कौन-सा अधिकार | शिकायत कहाँ | नतीजा |
|---|---|---|---|
| ऑपरेशन में लापरवाही से रेजी अपंग हुआ | सुरक्षा | राज्य आयोग, फिर राष्ट्रीय आयोग | अस्पताल दोषी, हर्जाना (पृ. 79) |
| कोचिंग ने फ़ीस नहीं लौटाई | चुनने का | ज़िला आयोग | 28,000 रुपये लौटाने का आदेश (पृ. 81) |
6. सर्वेक्षण
पृष्ठ 89 की प्रश्नावली बाँटकर पता कीजिए कि आपके क्षेत्र के लोग उपभोक्ता के रूप में कितने जागरूक हैं।
कैसे करें
- नीचे की प्रश्नावली पहले ख़ुद भरिए, फिर उसकी प्रतियाँ आसपास के कुछ घरों में दीजिए।
- हर व्यक्ति के क, ख और ग गिनिए, और किताब की टिप्पणी से देखिए कि वह कितना जागरूक है।
- अंत में लिखिए कि किस प्रश्न पर सबसे ज़्यादा लोग चूके।
पृ. 89 की प्रश्नावली: पहले ख़ुद भरिए
हर प्रश्न पर वह जवाब दबाइए जो एक जागरूक उपभोक्ता देगा। कारण वहीं खुल जाएगा।
प्रत्येक प्रश्न के लिए किसी एक पर निशान लगाएँ: हमेशा (क), कभी–कभी (ख), कभी नहीं (ग)।
- 1
जब आपने कोई सामान खरीदा, तो आपने रसीद की माँग की?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा। बिना रसीद सबूत जुटाना कठिन होता है (पृ. 86)।
- 2
क्या आपने रसीद को सुरक्षित रखा?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा। शिकायत के समय रसीद ही सबूत बनती है (पृ. 86)।
- 3
जब आपको ऐसा लगा कि आप दुकानदार द्वारा ठगे गए हैं, तो आपने उसकी शिकायत की?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा। ठगे जाने पर चुप रहने के बजाय शिकायत कीजिए, जैसा प्रकाश ने किया (पृ. 82)।
- 4
क्या आप उसे यह बताने में सफल हुए कि आप छले गए हैं?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा।
- 5
क्या आप खुद को यह समझा कर संतुष्ट हो जाते हैं कि यह आपका दुर्भाग्य है कि अक्सर आप ठगे जाते हैं और इसमें नया कुछ भी नहीं है?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: कभी नहीं। ठगे जाने को अपना दुर्भाग्य मान लेना लापरवाही की आदत है।
- 6
क्या आप आई.एस.आई. चिह्न, समाप्ति तिथि आदि की जाँच करते हैं?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा। गुणवत्ता का चिह्न और अंतिम तिथि जाँचना सूचना के अधिकार का इस्तेमाल है (पृ. 80, 85)।
- 7
अगर समाप्ति तिथि मात्र एक महीना या उसके आसपास हो तो क्या आप ताजे पैकेट की माँग करते हैं?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा।
- 8
क्या आप नये गैस सिलेंडर या पुराने अखबारों को खरीदने/बेचने से पहले खुद वजन की जाँच करते हैं?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा। कम तौलना शोषण का एक तरीका है (पृ. 76)।
- 9
जब सब्ज़ी विक्रेता वास्तविक बाट के स्थान पर पत्थरों का उपयोग करता है, तो क्या आप विरोध करते हैं?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा। कम तौल का विरोध कीजिए (पृ. 76)।
- 10
क्या अत्यधिक चटकीले रंगों वाली सब्ज़ियाँ आपके संदेह को बढ़ाती हैं?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा। मिलावट भी शोषण का एक तरीका है (पृ. 76)।
- 11
क्या आप ब्रांड की जानकारी रखते हैं?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा।
- 12
क्या आप अधिक कीमत को उच्च गुणवत्ता का मानक मानते हैं। (इससे आपको लगता है कि अंतत: आपने बहुत ज़्यादा भुगतान नहीं किया)?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: कभी नहीं। ऊँची कीमत को ऊँची गुणवत्ता मान लेना लापरवाही की आदत है।
- 13
क्या आप आकर्षक प्रस्तावों पर बेहिचक प्रतिक्रिया करते हैं?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: कभी नहीं। आकर्षक प्रस्तावों पर बेहिचक दौड़ पड़ना लापरवाही की आदत है; पृ. 82 के लुभाने वाले प्रस्ताव याद कीजिए।
- 14
आपने किसी वस्तु के लिए जो मूल्य दिया, उसकी तुलना दूसरों के द्वारा उसके लिए दिए गए मूल्य से करते हैं?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा।
- 15
क्या आपको पूरा यकीन है कि आपका दुकानदार आप जैसे स्थाई ग्राहकों को कभी नहीं ठगता?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: कभी नहीं। नियमित दुकानदार पर भी आँख मूँदकर भरोसा ठीक नहीं।
- 16
क्या आप उचित भार आदि की किसी शंका के बगैर प्रस्तावित सामान की होम डिलिवरी की व्यवस्था का समर्थन करते हैं?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: कभी नहीं। वज़न की शंका के बिना होम डिलिवरी को मान लेना लापरवाही की आदत है।
- 17
आटो से यात्रा करते समय आप ‘मीटर से चलने’ की माँग करते हैं?
किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा।
जवाब देखिए
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा। बिना रसीद सबूत जुटाना कठिन होता है (पृ. 86)।
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा। शिकायत के समय रसीद ही सबूत बनती है (पृ. 86)।
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा। ठगे जाने पर चुप रहने के बजाय शिकायत कीजिए, जैसा प्रकाश ने किया (पृ. 82)।
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा।
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: कभी नहीं। ठगे जाने को अपना दुर्भाग्य मान लेना लापरवाही की आदत है।
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा। गुणवत्ता का चिह्न और अंतिम तिथि जाँचना सूचना के अधिकार का इस्तेमाल है (पृ. 80, 85)।
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा।
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा। कम तौलना शोषण का एक तरीका है (पृ. 76)।
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा। कम तौल का विरोध कीजिए (पृ. 76)।
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा। मिलावट भी शोषण का एक तरीका है (पृ. 76)।
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा।
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: कभी नहीं। ऊँची कीमत को ऊँची गुणवत्ता मान लेना लापरवाही की आदत है।
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: कभी नहीं। आकर्षक प्रस्तावों पर बेहिचक दौड़ पड़ना लापरवाही की आदत है; पृ. 82 के लुभाने वाले प्रस्ताव याद कीजिए।
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा।
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: कभी नहीं। नियमित दुकानदार पर भी आँख मूँदकर भरोसा ठीक नहीं।
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: कभी नहीं। वज़न की शंका के बिना होम डिलिवरी को मान लेना लापरवाही की आदत है।
- किताब की टिप्पणी के अनुसार पूरी तरह जागरूक उपभोक्ता का जवाब है: हमेशा।
नतीजा कैसे निकालें (किताब की टिप्पणी)
- प्रश्न 5, 12, 13, 15 और 16 पर ग और बाकी सब पर क: उपभोक्ता के रूप में पूरी तरह जागरूक।
- प्रश्न 5, 12, 13, 15 और 16 पर क और बाकी सब पर ग: जागरूक होने की ज़रूरत है।
- सभी प्रश्नों पर ख: आंशिक रूप से जागरूक।
ये पाँच प्रश्न उल्टे क्यों गिने जाते हैं? क्योंकि इनमें लापरवाही की आदतें पूछी गई हैं: ठगे जाने को दुर्भाग्य मानना, ऊँची कीमत को ऊँची गुणवत्ता मानना, आकर्षक प्रस्तावों पर बेहिचक दौड़ना, नियमित दुकानदार पर आँख मूँदकर भरोसा, और वज़न की शंका के बिना होम डिलिवरी।
आपने नौ के नौ पड़ाव पूरे कर लिए। अब अभ्यास के प्रश्न और नीचे की परियोजना आपकी है।