ये प्रश्न रटकर हल नहीं होते। इनमें आपको किताब के मामले पढ़ना, उनसे नतीजा निकालना, तुलना करना, पक्ष लेना और कारण देना है। पहले अपना उत्तर ख़ुद लिखिए, फिर नीचे दिया उत्तर खोलकर मिलाइए। अंक सिर्फ़ यह अंदाज़ा देते हैं कि उत्तर कितना लंबा हो।
तारों का मतलब: ★वाली पंक्ति उत्तर की मुख्य बात है; दोहराते समय पहले वही पढ़िए।
भाग क — केस-आधारित प्रश्न
केस 1 — रेजी का कष्ट (पृष्ठ 79)
किताब का उदाहरण: कक्षा 9 का एक स्वस्थ लड़का रेजी मेथ्यू टॉन्सिल निकलवाने के लिए केरल के एक निजी चिकित्सालय में भर्ती हुआ। ई.एन.टी. सर्जन ने सामान्य बेहोशी की दवा देकर ऑपरेशन किया। अनुचित बेहोशी से रेजी में दिमागी असामान्यता के लक्षण आ गए और वह जीवन भर के लिए अपंग हो गया। उसके पिता ने सेवा में चिकित्सा की गलती और लापरवाही के लिए राज्य आयोग में 5,00,000 रुपये के मुआवज़े का दावा किया। राज्य आयोग ने यह कहकर मामला खारिज कर दिया कि सबूत पर्याप्त नहीं है। तब पिता ने दिल्ली के राष्ट्रीय आयोग में अपील की। जाँच के बाद राष्ट्रीय आयोग ने अस्पताल को चिकित्सा में लापरवाही का दोषी पाया और हर्जाना देने का निर्देश दिया।
किताब के इस बॉक्स में इन्हें “राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण समिति” और राष्ट्रीय समिति लिखा है; अध्याय में आगे यही आयोग कहलाते हैं (पृष्ठ 84)।
1रेजी के मामले में उपभोक्ता का कौन-सा अधिकार टूटा? किताब इस अधिकार के बारे में क्या कहती है? 2 अंक
उत्तर देखिए
सुरक्षा का अधिकार। किताब के शब्दों में, हमें वस्तुओं और सेवाओं से “सुरक्षित रहने का अधिकार होता है, क्योंकि ये जीवन और संपत्ति के लिए खतरनाक होते हैं।” (पृष्ठ 79)
★यह अधिकार उत्पादक पर ज़िम्मेदारी डालता है: “उत्पादकों के लिए आवश्यक है कि वे सुरक्षा नियमों और विनियमों का पालन करें।” (पृष्ठ 79) रेजी के मामले में सेवा देने वाले चिकित्सालय ने यह सावधानी नहीं बरती।
2राज्य आयोग ने रेजी का मामला खारिज कर दिया, फिर भी अंत में न्याय मिला। कैसे? इससे आयोगों की व्यवस्था के बारे में क्या पता चलता है? 3 अंक
उत्तर देखिए
राज्य आयोग ने कहा कि सबूत पर्याप्त नहीं है, और मामला खारिज कर दिया।
पिता ने हार नहीं मानी और दिल्ली के राष्ट्रीय आयोग में अपील की। वहाँ जाँच के बाद अस्पताल दोषी पाया गया और उसे हर्जाना देने का निर्देश मिला।
★आयोग तीन स्तरों पर हैं: ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय। नीचे के स्तर पर मामला खारिज हो, तो उपभोक्ता ऊपर के स्तर पर अपील कर सकता है (पृष्ठ 84)। पहला फ़ैसला आख़िरी नहीं होता।
3रेजी के पिता ने कोई वस्तु नहीं खरीदी थी। फिर यह उपभोक्ता का मामला कैसे बना? किताब की प्रश्नावली के प्रश्न 13 (क) का उत्तर इससे कैसे मिलता है? 2 अंक
उत्तर देखिए
रेजी के पिता ने चिकित्सालय से इलाज की सेवा ली थी। वस्तु की तरह सेवा खरीदने वाला भी उपभोक्ता है, इसलिए यह मामला “सेवा में चिकित्सा की गलती और लापरवाही” का बना (पृष्ठ 79)।
★इसलिए प्रश्न 13 (क) का कथन “कोपरा केवल सामानों पर लागू होता है” ग़लत है। 2019 के संशोधन में सेवा में कमी होने पर सेवा प्रदाता को भी ज़िम्मेदार ठहराया जाता है (पृष्ठ 87)।
केस 2 — अमृता का इंतज़ार और पैकेट की जानकारी (पृष्ठ 80)
किताब के दो उदाहरण:
पैकेट: किसी वस्तु के पैकेट पर उसके अवयव, मूल्य, बैच संख्या, निर्माण की तारीख, खराब होने की अंतिम तिथि और बनाने वाले का पता छपा होता है। दवा पर उचित प्रयोग के निर्देश और उसके दूसरे प्रभावों और खतरों की जानकारी होती है, और कपड़ों पर धुलाई के निर्देश।
अमृता: इंजीनियरिंग स्नातक अमृता ने एक सरकारी विभाग में नौकरी के लिए सारे प्रमाणपत्र जमा किए और इंटरव्यू दिया, पर कोई परिणाम नहीं मिला। कर्मचारियों ने भी उसके सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया। तब उसने सूचना पाने के अधिकार कानून के तहत प्रार्थना-पत्र दिया। उसे देरी के कारण बताए गए, और नियुक्ति के लिए बुलावे का पत्र भी मिला, क्योंकि उसने इंटरव्यू अच्छा दिया था।
1अमृता ने किस कानून का सहारा लिया? यह कानून नागरिकों को क्या देता है? 2 अंक
उत्तर देखिए
सूचना पाने का अधिकार कानून, जो भारत सरकार ने “सन् 2005 के अक्टूबर में” लागू किया (पृष्ठ 80)।
★यह कानून नागरिकों को सरकारी विभागों के कामकाज की सूचना पाने का अधिकार देता है। इसीलिए अमृता को देरी के कारण जानने का हक़ था, ताकि वह अपने भविष्य की योजना बना सके।
2पैकेट पर छपी जानकारी और अमृता का कानून, दोनों सूचना से जुड़े हैं। दोनों में फ़र्क क्या है? 2 अंक
उत्तर देखिए
पैकेट की जानकारी: यह उपभोक्ता के सूचना पाने के अधिकार से आती है। खरीदने वाला जान पाता है कि वस्तु में क्या है, वह कब बनी, कब तक ठीक रहेगी और उसका अधिकतम मूल्य क्या है; खराबी हो तो वह शिकायत कर सकता है (पृष्ठ 80)।
★2005 का कानून: यह सरकारी विभागों के कामकाज की सूचना माँगने का कानून है। दोनों को एक मान लेना आम ग़लती है।
3किताब की एक गतिविधि कहती है: “जब हम वस्तुएँ खरीदते हैं तो पाते हैं कि कभी-कभी पैकेट पर छपे मूल्य से अधिक या कम मूल्य लिया जाता है।” (पृष्ठ 81) मान लीजिए (काल्पनिक) एक दुकानदार पैकेट पर छपे मूल्य से ज़्यादा माँगता है, और दूसरा मोल-भाव के बाद छपे मूल्य से कम में दे देता है। इनमें से कौन-सा सौदा नियम के ख़िलाफ़ है, और उपभोक्ता क्या कर सकता है? 3 अंक
उत्तर देखिए
पैकेट पर छपा मूल्य अधिकतम खुदरा मूल्य है, यानी वह सबसे ऊँची क़ीमत जो ली जा सकती है।
पहला सौदा नियम के ख़िलाफ़ है। किताब कहती है कि छपे मूल्य से अधिक पर बेचने का कोई भी विरोध और शिकायत कर सकता है (पृष्ठ 80)।
★दूसरा सौदा ठीक है: उपभोक्ता अधिकतम खुदरा मूल्य से कम दाम के लिए मोल-भाव कर सकते हैं (पृष्ठ 80)। छपा मूल्य ऊपर की सीमा है, तय दाम नहीं।
केस 3 — अबिरामी के पैसे लौटाए गए (पृष्ठ 81)
किताब का उदाहरण: अंसारी नगर की छात्रा अबिरामी ने दिल्ली के एक कोचिंग संस्थान के दो वर्षीय पाठ्यक्रम में नामांकन कराया और पूरे दो वर्ष के लिए “करीब 61,020 रुपये” जमा किए। पढ़ाई का स्तर ठीक न लगने पर उसने साल के अंत में पाठ्यक्रम छोड़ने का निश्चय किया। उसने एक साल का पैसा वापस माँगा, तो संस्थान ने मना कर दिया।
ज़िला आयोग: संस्थान को 28,000 रुपये लौटाने का आदेश दिया, यह कहते हुए कि “छात्रा को चुनने का अधिकार है।“
राज्य आयोग: संस्थान ने अपील की। राज्य आयोग ने ज़िला आयोग का आदेश बनाए रखा, बेकार की अपील के लिए संस्थान पर 25,000 का दंड लगाया, और छात्रा को मुआवज़े और याचिका खर्च के रूप में 7,000 रुपये देने को कहा।
1संस्थान ने अबिरामी का कौन-सा अधिकार छीना? किताब इस अधिकार को कैसे समझाती है? 2 अंक
उत्तर देखिए
चुनने का अधिकार। पढ़ाई का स्तर ठीक न लगे, तो दूसरा साल पढ़ना है या नहीं, यह चुनना अबिरामी का हक़ था। पूरे दो साल की फ़ीस पहले लेकर और लौटाने से मना करके संस्थान ने उससे यह चुनाव छीन लिया।
★किताब के अनुसार सेवा लेने वाले हर उपभोक्ता को, “चाहे वह किसी भी आयु या लिंग का हो और किसी भी तरह की सेवा प्राप्त करता हो,” हमेशा चुनने का अधिकार होगा (पृष्ठ 81)।
2राज्य आयोग ने संस्थान पर 25,000 का दंड क्यों लगाया? उसका फ़ैसला सिर्फ़ अबिरामी तक क्यों नहीं रुका? 3 अंक
उत्तर देखिए
ज़िला आयोग का आदेश ठीक था, फिर भी संस्थान ने अपील की। राज्य आयोग ने इसे बेकार की अपील माना और 25,000 का दंड लगाया।
अबिरामी को अलग से 7,000 रुपये मुआवज़े और याचिका खर्च के रूप में देने को कहा गया।
★राज्य आयोग ने सभी शिक्षा संस्थानों और व्यावसायिक संस्थाओं को विद्यार्थियों से पूरे साल की फ़ीस एडवांस में लेने से मना किया; आदेश तोड़ने पर दंड शुल्क और जेल भी हो सकती है (पृष्ठ 81)। एक छात्रा की शिकायत से बाकी विद्यार्थियों का चुनने का अधिकार भी बचा।
3आपका एक दोस्त कहता है कि थोड़े-से पैसों के लिए आयोग जाना बेकार है। अबिरामी का मामला और प्रश्नावली का प्रश्न 13 (घ) इस बारे में क्या कहते हैं? 2 अंक
उत्तर देखिए
अबिरामी को 28,000 रुपये लौटाने का आदेश ज़िला आयोग से ही मिला। किताब के अनुसार ज़िला आयोग 1 करोड़ तक के दावे सुनता है (पृष्ठ 84), यानी छोटे दावे के लिए भी जगह है।
★इसलिए प्रश्न 13 (घ) का कथन, कि अधिक मूल्य का नुकसान हो तभी आयोग जाना लाभप्रद है, ग़लत है।
केस 4 — प्रकाश का मनीऑर्डर (पृष्ठ 82–83)
किताब का उदाहरण: प्रकाश ने बेटी की शादी के लिए अपने गाँव मनीऑर्डर भेजा। बेटी को ज़रूरत के समय पैसे नहीं मिले, महीनों बाद भी नहीं। प्रकाश ने डाकघर में पूछताछ की, पर संतोषजनक जवाब नहीं मिला। फिर उसने क्षेत्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद् से सलाह ली, और नयी दिल्ली के एक ज़िला स्तर के उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में मुकदमा दर्ज किया। दूसरे पक्ष को नोटिस गया। सुनवाई में प्रकाश ने ख़ुद बहस की; जज ने दस्तावेज़ जाँचे और दोनों पक्षों की दलीलें सुनीं, फिर आयोग का फ़ैसला सुनाया।
1प्रकाश सीधे आयोग नहीं गया। उससे पहले उसने कौन-से दो क़दम उठाए? इससे प्रश्नावली के प्रश्न 13 (ग) का उत्तर कैसे मिलता है? 2 अंक
उत्तर देखिए
पहले डाकघर में पूछताछ की, यानी सेवा देने वाले से ही बात की। फिर उपभोक्ता संरक्षण परिषद् से सलाह ली।
★प्रश्न 13 (ग) कहता है कि शोषण लगे तो ज़िला आयोग में निश्चित रूप से मुकदमा करना चाहिए। यह ग़लत है: पहले सेवा देने वाले से शिकायत और परिषद् से सलाह का रास्ता भी है, और कौन-सा आयोग सुनेगा, यह किताब के अनुसार दावे की रकम पर निर्भर है (पृष्ठ 84)।
2क्या आयोग में शिकायत के लिए वकील ज़रूरी है? प्रकाश के मामले से उत्तर दीजिए। 2 अंक
उत्तर देखिए
नहीं। किताब कहती है: “उपभोक्ता, उपयुक्त उपभोक्ता केन्द्र के सम्मुख अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है, स्वयं किसी वकील के साथ अथवा वकील की सेवा के बिना।” (पृष्ठ 82) प्रकाश ने सुनवाई में ख़ुद बहस की।
★पर किताब यह भी मानती है: “कई बार उपभोक्ताओं को वकीलों का सहारा लेना पड़ता है।” (पृष्ठ 86) यानी वकील ज़रूरी नहीं है, पर कई मामलों में लेना पड़ता है।
3प्रकाश किस अधिकार के सहारे आयोग गया? किताब शिकायत के कौन-से आसान रास्ते बताती है? 3 अंक
उत्तर देखिए
क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार: “यदि एक उपभोक्ता को कोई क्षति पहुँचाई जाती है, तो क्षति की मात्रा के आधार पर उसे क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार होता है।” (पृष्ठ 82) प्रश्नावली के प्रश्न 13 (छ) का कथन इसी कारण सही है।
किताब कहती है कि इस अधिकार के लिए एक आसान और प्रभावी जन-प्रणाली की ज़रूरत है (पृष्ठ 82)।
★आजकल उपभोक्ता अकेले या समूह में (इसे क्लास एक्शन सूट कहते हैं), ख़ुद जाकर या इंटरनेट से शिकायत दर्ज करा सकते हैं, और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से मुकदमे की कार्यवाही करा सकते हैं (पृष्ठ 82)।
केस 5 — अरिता की दीवार घड़ी (पृष्ठ 84)
किताब का उदाहरण (किताब की गतिविधि में ये क़दम उलटे-पुलटे क्रम में हैं; यहाँ सही क्रम में दिए हैं): अरिता ने एक खुदरा विक्रेता से दीवार घड़ी खरीदी। उसे लगा कि दुकानदार ने उसे दोषयुक्त सामान दिया है। वह शाखा कार्यालय गई और डीलर के विरुद्ध शिकायत दर्ज की, पर कोई असर नहीं पड़ा। फिर वह शिकायत के लिए एक पेशेवर व्यक्ति से मिली और ज़िला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में मुकदमा दायर किया। आयोग के सामने उससे पहले बिल और वारंटी माँगे गए। वह आयोग की कार्यवाहियों में भाग लेने लगी। कुछ ही महीनों के भीतर आयोग ने खुदरा विक्रेता को आदेश दिया कि अरिता की पुरानी घड़ी की जगह बिना कोई अतिरिक्त मूल्य लिए उसे नयी घड़ी दी जाए।
1आयोग ने अरिता से बिल और वारंटी क्यों माँगे? किताब इससे जुड़ी कौन-सी कमी बताती है? 2 अंक
उत्तर देखिए
बिल और वारंटी अरिता के सबूत थे: घड़ी किससे खरीदी गई, और विक्रेता ने उसके ठीक चलने की क्या ज़िम्मेदारी ली थी।
★किताब की कमी: “अधिकांश खरीददारियों के समय रसीद नहीं दी जाती हैं, ऐसी स्थिति में प्रमाण जुटाना आसान नहीं होता है।” (पृष्ठ 86) इसलिए हर खरीद पर रसीद माँगिए और सँभालकर रखिए; पृष्ठ 89 की प्रश्नावली भी यही पूछती है।
2अरिता के मामले में उपभोक्ता के कौन-से दो अधिकार काम आए? 2 अंक
उत्तर देखिए
निवारण का अधिकार: दोषयुक्त घड़ी से हुई क्षति की भरपाई के रूप में उसे बिना अतिरिक्त मूल्य के नयी घड़ी मिली।
★प्रतिनिधित्व का अधिकार: वह ख़ुद आयोग में गई और कार्यवाहियों में भाग लेकर अपनी बात रखी। किताब के शब्दों में, “अधिनियम ने उपभोक्ता के रूप में उपभोक्ता न्यायालय में प्रतिनिधित्व का अधिकार देकर हमें समर्थ बनाया है।” (पृष्ठ 84)
3पुराने समय में अरिता जैसा असंतुष्ट उपभोक्ता क्या करता? अरिता के रास्ते से बाज़ार में क्या बदलता है? 3 अंक
उत्तर देखिए
किताब बताती है कि लंबे समय तक असंतुष्ट उपभोक्ता बस उस ब्रांड या दुकान से खरीदना बंद कर देता था, और सावधानी बरतना खरीदने वाले की ज़िम्मेदारी मानी जाती थी (पृष्ठ 77)।
ऐसे में खराब घड़ी का नुकसान अरिता का ही रहता, और विक्रेता पर कोई असर न पड़ता।
★आयोग के आदेश से नयी घड़ी देने की ज़िम्मेदारी विक्रेता पर आई। उपभोक्ता आंदोलन के बारे में किताब यही कहती है: “इसने वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी विक्रेताओं पर भी डाल दिया।” (पृष्ठ 77)
भाग ख — तर्क और मूल्यांकन
1“1986 में कानून बन गया, इसलिए अब बाज़ार में उपभोक्ता का शोषण नहीं होता।” (यह कथन काल्पनिक है। किताब की प्रश्नावली का प्रश्न 11 इसी से जुड़ा है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है।
प्रगति सच है: कोपरा 1986 में बना और 2019 में उसका संशोधन हुआ; भारत उन देशों में है जहाँ उपभोक्ता समस्याओं के लिए विशिष्ट न्यायालय हैं; देश में 2000 से अधिक उपभोक्ता संगठन हैं (पृष्ठ 78, 86–87)।
पर कमियाँ भी हैं: इनमें से केवल 50–60 संगठन पूर्ण संगठित और मान्यता प्राप्त हैं; निवारण प्रक्रिया “जटिल, खर्चीली और समय साध्य” है; ज़्यादातर खरीद पर रसीद नहीं मिलती; और कोपरा के 35 वर्ष बाद भी उपभोक्ता ज्ञान बहुत धीरे फैल रहा है (पृष्ठ 86–87)।
★कानून होना और उसका पालन होना अलग बातें हैं। किताब के अनुसार बाज़ार में निम्न गुणवत्ता वाले उत्पाद इसलिए मिलते हैं, “क्योंकि इन नियमों का पर्यवेक्षण उचित रूप से नहीं हो रहा है और उपभोक्ता आंदोलन भी बहुत ज्यादा मजबूत नहीं है।” (पृष्ठ 79)
2“जिस वस्तु पर आई.एस.आई. या एगमार्क का चिह्न न हो, उसे बेचना ग़ैरक़ानूनी है।” (यह कथन काल्पनिक है। किताब के पृष्ठ 86 की गतिविधि 5 इसी से जुड़ी है।) क्या आप सहमत हैं? 3 अंक
उत्तर देखिए
नहीं।
आई.एस.आई., एगमार्क और हॉलमार्क जैसे चिह्न अच्छी गुणवत्ता का भरोसा दिलाते हैं। प्रमाण देने वाले संगठन उत्पादक को चिह्न तभी लगाने देते हैं, जब वह श्रेष्ठ गुणवत्ता का पालन करे (पृष्ठ 85)।
पर किताब साफ़ कहती है: “सभी उत्पादकों का इन मानदण्डों का पालन करना जरूरी नहीं होता।” (पृष्ठ 85) इसीलिए बाज़ार में बहुत-सी वस्तुएँ बिना चिह्न के मिलती हैं, और यही पृष्ठ 86 की गतिविधि 5 का उत्तर है।
★कुछ वस्तुओं के लिए प्रमाण अनिवार्य है, जो उपभोक्ता की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर असर डालती हैं या बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होती हैं, जैसे एल.पी.जी. सिलिंडर, खाने के रंग और उनमें डाली जाने वाली सामग्री, सीमेंट और बोतलबंद पेयजल (पृष्ठ 85)।
3“उपभोक्ता आयोग जाना उन्हीं का काम है जिनका बड़ा नुकसान हुआ हो और जो वकील रख सकें।” (यह कथन काल्पनिक है। किताब की प्रश्नावली का प्रश्न 13 (घ) भी ऐसा ही कथन जाँचने को कहता है।) अपनी राय दीजिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ज़्यादातर ग़लत है, पर उसकी चिंता सच्ची है।
बड़ा नुकसान ज़रूरी नहीं: अबिरामी को 28,000 रुपये लौटाने का आदेश ज़िला आयोग से मिला, और किताब के अनुसार ज़िला आयोग 1 करोड़ तक के दावे सुनता है (पृष्ठ 81, 84)।
वकील ज़रूरी नहीं: शिकायत वकील के साथ भी और वकील के बिना भी दर्ज हो सकती है, और प्रकाश ने आयोग में ख़ुद बहस की (पृष्ठ 82–83)।
★चिंता सच्ची है, क्योंकि किताब मानती है कि प्रक्रिया “जटिल, खर्चीली और समय साध्य” है और कई बार वकीलों का सहारा लेना पड़ता है (पृष्ठ 86)। इसका रास्ता साथ आना है: उपभोक्ता संरक्षण परिषद् मुकदमा दर्ज करने का रास्ता बताती है और कई बार आयोग में प्रतिनिधित्व भी करती है (पृष्ठ 84), और उपभोक्ता समूह में भी शिकायत कर सकते हैं (पृष्ठ 82)।
4किताब पूछती है (पृष्ठ 77): “आपकी राय में उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए सरकार की क्या भूमिका होनी चाहिए?” सरकार अब तक क्या करती है और उसकी सीमा क्या है, दोनों लिखिए, और फिर अपनी राय दीजिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
इसका कोई एक सही उत्तर नहीं है; अंक इस बात के हैं कि सरकार के काम और उनकी सीमा किताब से लिखी गई हो, और अपनी राय का कारण दिया गया हो। एक उत्तर ऐसा हो सकता है:
सरकार क्या करती है: 1986 में कोपरा बनाया और 2019 में उसका संशोधन किया (पृष्ठ 78); ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर आयोग बनाए (पृष्ठ 84); केंद्र और राज्यों में उपभोक्ता मामलों के अलग विभाग बनाए, और विज्ञापनों से लोगों को कानूनी प्रक्रिया बताई (पृष्ठ 84–85)।
सीमा: नियम हैं, पर बाज़ारों के कामकाज के नियमों और विनियमों का अक्सर पालन नहीं होता, और निवारण प्रक्रिया लंबी और खर्चीली है (पृष्ठ 86–87)।
★एक संतुलित राय: सरकार का काम सिर्फ़ नियम बनाना नहीं, उनका पालन कराना भी है, जैसे रेजी के मामले में सुरक्षा के नियम। पर अकेली सरकार काफ़ी नहीं। किताब कहती है: “यह अक्सर कहा जाता है कि उपभोक्ताओं की सक्रिय भागीदारी से ही उपभोक्ता आंदोलन प्रभावी हो सकता है।” (पृष्ठ 87)
भाग ग — तुलना और वर्गीकरण
1इन मामलों में उपभोक्ता का कौन-सा अधिकार जुड़ा है? कारण लिखिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
| मामला | अधिकार | कारण |
|---|---|---|
| प्रेशर कूकर का सेफ्टी वॉल्व (पृष्ठ 79) | सुरक्षा का अधिकार | वॉल्व खराब हो तो भयंकर दुर्घटना हो सकती है; निर्माता को उसकी उच्च गुणवत्ता पक्की करनी चाहिए |
| दवा पर उचित प्रयोग के निर्देश और ख़तरों की जानकारी (पृष्ठ 80) | सूचना का अधिकार | खरीदने वाले को जानना चाहिए कि वह क्या ले रहा है और उसे कैसे बरतना है |
| दंतमंजन तभी मिलेगा जब साथ में ब्रश खरीदें (पृष्ठ 81) | चुनने का अधिकार | बिना चाही वस्तु ज़बरदस्ती थोपी जा रही है |
| नये गैस कनेक्शन के साथ चूल्हा लेने का दबाव (पृष्ठ 81) | चुनने का अधिकार | यहाँ भी उपभोक्ता के पास चुनाव का विकल्प नहीं बचता |
| प्रकाश का आयोग में मुकदमा (पृष्ठ 82–83) | निवारण का अधिकार | मनीऑर्डर न पहुँचने से हुई क्षति की भरपाई माँगी |
| अरिता का ख़ुद आयोग की कार्यवाहियों में भाग लेना (पृष्ठ 84) | प्रतिनिधित्व का अधिकार | कोपरा ने उपभोक्ता को उपभोक्ता न्यायालय में अपनी बात रखने का अधिकार दिया है |
★कसौटी: ख़तरा हो तो सुरक्षा; जानकारी न मिले तो सूचना; ज़बरदस्ती हो तो चुनना; क्षति की भरपाई चाहिए तो निवारण; आयोग में अपनी बात रखनी हो तो प्रतिनिधित्व। पृष्ठ 86 की सूची में छठा अधिकार उपभोक्ता शिक्षा का है।
एक मामले में दो अधिकार भी हो सकते हैं: रेजी का मामला सुरक्षा का है, पर न्याय उसे निवारण और प्रतिनिधित्व के अधिकार से मिला।
2किताब पूछती है (पृष्ठ 86): “उपभोक्ता संरक्षण परिषद् एवं उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में क्या अंतर है।” इन दोनों के साथ तीन और संस्थाएँ रखकर तालिका पूरी कीजिए। 3 अंक
| संस्था | यह क्या है | यह क्या करती है |
|---|---|---|
| उपभोक्ता संरक्षण परिषद् (पृष्ठ 84) | ||
| उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (पृष्ठ 84) | ||
| निवासी कल्याण संघ (पृष्ठ 84) | ||
| उपभोक्ता इंटरनेशनल (पृष्ठ 78) | ||
| भारतीय मानक ब्यूरो (पृष्ठ 87, प्रश्न 12) |
उत्तर देखिए
| संस्था | यह क्या है | यह क्या करती है |
|---|---|---|
| उपभोक्ता संरक्षण परिषद् (पृष्ठ 84) | उपभोक्ता आंदोलन से बना स्वयंसेवी संगठन | मुकदमा दर्ज करने का रास्ता बताती है, कई बार आयोग में उपभोक्ता का प्रतिनिधित्व करती है; प्रकाश ने यहीं से सलाह ली |
| उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (पृष्ठ 84) | कोपरा के अंतर्गत ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर बना न्यायिक तंत्र | मुकदमा सुनता है और फ़ैसला देता है, जैसे अबिरामी और अरिता के मामलों में |
| निवासी कल्याण संघ (पृष्ठ 84) | आवासीय कॉलोनी की संस्था | अपने किसी सदस्य के साथ हुई अनुचित व्यावसायिक कार्रवाई का मामला उठाता है |
| उपभोक्ता इंटरनेशनल (पृष्ठ 78) | उपभोक्ता कल्याण संगठनों की अंतर्राष्ट्रीय संस्था | 100 से अधिक देशों की 200 संस्थाओं की संरक्षक संस्था है |
| भारतीय मानक ब्यूरो (पृष्ठ 87, प्रश्न 12) | वस्तुओं और सेवाओं के लिए मानक विकसित करने वाली एजेंसी | गुणवत्ता के मानदंड तय करता है |
★कसौटी: फ़ैसला सिर्फ़ आयोग सुनाता है। बाकी संस्थाएँ उपभोक्ता का साथ देती हैं, रास्ता बताती हैं या मानक बनाती हैं।
प्रकाश के मामले में यह फ़र्क साफ़ दिखता है: सलाह परिषद् से मिली, फ़ैसला आयोग ने सुनाया (पृष्ठ 82–83)।
3उपभोक्ता आंदोलन से पहले और बाद में क्या बदला? तालिका पूरी कीजिए। 3 अंक
| बात | आंदोलन से पहले | आंदोलन और कोपरा के बाद |
|---|---|---|
| कानूनी व्यवस्था | ||
| सावधानी किसकी ज़िम्मेदारी | ||
| असंतुष्ट उपभोक्ता क्या करता | ||
| उपभोक्ता अकेला या साथ |
उत्तर देखिए
| बात | आंदोलन से पहले | आंदोलन और कोपरा के बाद |
|---|---|---|
| कानूनी व्यवस्था | उपभोक्ता को शोषण से बचाने की कोई कानूनी व्यवस्था नहीं थी (पृष्ठ 77) | 1986 में कोपरा बना, 2019 में उसका संशोधन हुआ (पृष्ठ 78) |
| सावधानी किसकी ज़िम्मेदारी | सिर्फ़ खरीदने वाले की मानी जाती थी (पृष्ठ 77) | गुणवत्ता की ज़िम्मेदारी विक्रेताओं पर भी आई (पृष्ठ 77) |
| असंतुष्ट उपभोक्ता क्या करता | उस ब्रांड या दुकान से खरीदना बंद कर देता था (पृष्ठ 77) | आयोग में शिकायत कर सकता है, जैसे अबिरामी और अरिता ने की (पृष्ठ 81, 84) |
| उपभोक्ता अकेला या साथ | कम मात्रा में खरीदने वाला और बिखरा हुआ (पृष्ठ 76) | उपभोक्ता दल, परिषदें और देश में 2000 से अधिक संगठन (पृष्ठ 77, 84, 86) |
★कसौटी: पहले सावधानी उपभोक्ता का अकेला बोझ थी; आंदोलन ने कानून, आयोग और संगठन बनवाकर ज़िम्मेदारी विक्रेता और उत्पादक पर भी डाली।
पर बदलाव अधूरा है: किताब के अनुसार नियमों का अक्सर पालन नहीं होता (पृष्ठ 87)। भाग ख का प्रश्न 1 फिर से देखिए।
भाग घ — प्रोजेक्ट और गतिविधि
1. श्रीमती कृष्णा का टेलीविज़न (किताब की अतिरिक्त परियोजना, पृष्ठ 88)
श्रीमती कृष्णा ने 6 महीने की वारंटी वाला रंगीन टेलीविज़न खरीदा। तीन महीने बाद वह बंद हो गया। दुकान ने एक इंजीनियर भेजा, फिर भी टी.वी. बार-बार खराब होता रहा, और दुकानदार ने उनकी शिकायतों का कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने अपने क्षेत्र के उपभोक्ता आयोग से शिकायत करने का निर्णय लिया। उनके लिए आयोग को पत्र लिखिए, जिसमें ये बातें हों: क्या, कब और कहाँ से खरीदा; क्या खराबी आई और दुकानदार ने क्या किया; उपभोक्ता का कौन-सा अधिकार टूटा; और वे आयोग से क्या चाहती हैं। पत्र के साथ लगने वाले काग़ज़ों की सूची भी लिखिए; अरिता से आयोग ने क्या माँगा था, याद कीजिए। रिवीजन नोट्स में एक नमूना पत्र है; पहले ख़ुद लिखिए, फिर मिलाइए।
2. आप कितने जागरूक उपभोक्ता हैं? (किताब की अतिरिक्त परियोजना, पृष्ठ 88–89)
पृष्ठ 89 की प्रश्नावली में 17 प्रश्न हैं, जैसे रसीद माँगना, आई.एस.आई. चिह्न और समाप्ति तिथि जाँचना, वज़न जाँचना और दाम की तुलना करना। हर प्रश्न का उत्तर तीन में से एक है: हमेशा (क), कभी-कभी (ख) या कभी नहीं (ग)। घर और पड़ोस के पाँच लोगों से यह प्रश्नावली भरवाइए, और किसी का नाम मत लिखिए। ध्यान रखिए कि प्रश्न 5, 12, 13, 15 और 16 उलटे गिने जाते हैं: इन पर ‘कभी नहीं’ अच्छा उत्तर है, क्योंकि ये लापरवाही की आदतें हैं। अंत में लिखिए कि सबसे ज़्यादा लोग किस आदत में कच्चे निकले, और उससे बचने के लिए उपभोक्ता का कौन-सा अधिकार जानना ज़रूरी है।
3. आसपास के अनुभव (किताब की अतिरिक्त परियोजना, पृष्ठ 88)
आसपास के चार-पाँच लोगों से बात कीजिए कि क्या कभी बाज़ार में उनके साथ धोखा हुआ, जैसे कम तौल, छपे मूल्य से ज़्यादा दाम, खराब सामान या किसी सेवा में लापरवाही। हर अनुभव के आगे लिखिए: क्या हुआ, उन्होंने क्या किया, और उसमें उपभोक्ता का कौन-सा अधिकार टूटा। किसी का नाम मत लिखिए। अंत में गिनिए कि कितने लोगों ने शिकायत की और कितने चुप रह गए, और चुप रहने के कारण लिखिए।
4. पैकेट की जाँच (किताब की गतिविधि पर आधारित, पृष्ठ 81)
किताब बताती है कि पैकेट पर वस्तु के अवयव, मूल्य, बैच संख्या, निर्माण की तारीख, खराब होने की अंतिम तिथि और बनाने वाले का पता छपा होता है (पृष्ठ 80)। घर के पाँच डिब्बाबंद सामान लीजिए, जैसे बिस्कुट, तेल, मसाला या दवा। हर पैकेट पर इन छह बातों में से जो मिलें, उन पर सही का निशान लगाइए, और देखिए कि उस पर गुणवत्ता का कोई चिह्न है या नहीं। फिर किताब का सवाल अपने से पूछिए: क्या कोई ऐसी जानकारी भी छपनी चाहिए जो अभी नहीं छपी?
5. एक हफ़्ते की रसीदें (किताब के पृष्ठ 86 और 89 पर आधारित)
किताब कहती है कि ज़्यादातर खरीद के समय रसीद नहीं दी जाती, और तब सबूत जुटाना आसान नहीं होता (पृष्ठ 86)। एक हफ़्ते तक घर की हर खरीद लिखिए: क्या खरीदा, कहाँ से, और रसीद मिली या नहीं। हफ़्ते के अंत में गिनिए कि कितनी खरीद पर रसीद मिली। फिर लिखिए कि इनमें से कोई सामान खराब निकले, तो किन मामलों में आप आयोग के सामने सबूत रख पाते।
अपना उत्तर ख़ुद जाँचिए
| आपके उत्तर में | तो |
|---|---|
| किताब का उदाहरण या आँकड़ा सही उठाया, उससे निष्कर्ष निकाला और अपना कारण लिखा | उत्तर पूरा है। |
| उदाहरण लिखा, पर यह नहीं लिखा कि उससे क्या पता चलता है | हर उदाहरण के बाद एक पंक्ति जोड़िए कि उससे अध्याय की कौन-सी बात सिद्ध होती है। |
| उपभोक्ता संरक्षण परिषद् और उपभोक्ता आयोग को एक ही मान लिया | परिषद् स्वयंसेवी संगठन है, जो रास्ता बताती है और साथ देती है; फ़ैसला आयोग सुनाता है। भाग ग का प्रश्न 2 फिर से कीजिए। |
| पैकेट की जानकारी को सन् 2005 वाला कानून समझ लिया | पैकेट की जानकारी उपभोक्ता के सूचना पाने के अधिकार से जुड़ी है; 2005 का कानून सरकारी विभागों के कामकाज की सूचना के लिए है (पृष्ठ 80)। केस 2 का प्रश्न 2 फिर से देखिए। |
| ! लिख दिया कि हर शिकायत ज़िला आयोग से ही शुरू होती है, या कि आयोग में वकील ज़रूरी है | किताब के अनुसार आयोग दावे की रकम से तय होता है: 1 करोड़ तक ज़िला, 1 से 10 करोड़ तक राज्य, 10 करोड़ से ऊपर राष्ट्रीय (पृष्ठ 84)। शिकायत वकील के बिना भी दर्ज हो सकती है (पृष्ठ 82)। केस 4 फिर से देखिए। |