यह पन्ना परीक्षा से पहले दोहराने के लिए है। हर हिस्से की शुरुआत में किताब के पृष्ठ लिखे हैं, ताकि शक हो तो वहीं खोलकर देख लीजिए। पृष्ठ संख्याएँ 2026-27 में छपी किताब की हैं। आँकड़े किताब के हैं।
तारों का मतलब: ★★किताब की प्रश्नावली (प्रश्न 1–13) में सीधे पूछा गया · ★उन उत्तरों में काम आता है · बिना तारे के: पृष्ठभूमि या किताब की गतिविधि।
1. अध्याय एक नज़र में
अध्याय एक सवाल से शुरू होता है: आज हमारे बाज़ारों में इतने विकल्प कहाँ से आए? किताब कहती है कि दो दशक पहले भारत के बाज़ारों में वस्तुओं की ऐसी विविधता नहीं थी (पृष्ठ 55)। जवाब है वैश्वीकरण।
अध्याय की कहानी
अध्याय की तीन बड़ी बातें:
- उत्पादन अब देशों में फैल गया है: बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ एक से अधिक देशों में उत्पादन पर नियंत्रण रखती हैं। वे साझेदारी, खरीद, छोटे उत्पादकों को ऑर्डर और प्रतिस्पर्धा के ज़रिए दूर-दूर के उत्पादन को आपस में जोड़ देती हैं।
- व्यापार और निवेश से बाज़ार जुड़ते हैं: विदेश व्यापार और विदेशी निवेश बढ़ने से अलग-अलग देशों के बाज़ार और उत्पादन एक-दूसरे से जुड़ रहे हैं। इसी तेज़ जुड़ाव को वैश्वीकरण कहते हैं। इसे प्रौद्योगिकी, उदारीकरण और विश्व व्यापार संगठन ने तेज़ किया।
- लाभ बराबर नहीं बँटा: धनी उपभोक्ताओं और बड़ी कंपनियों को लाभ मिला; छोटे उत्पादकों और श्रमिकों पर प्रतिस्पर्धा की मार पड़ी। इसलिए किताब न्यायसंगत वैश्वीकरण की बात करती है, जिसमें सरकार और जनता दोनों की भूमिका है।
2. ज़रूरी शब्द★
| शब्द | मतलब (हमारे शब्दों में) | पृष्ठ |
|---|---|---|
| बहुराष्ट्रीय कंपनी | ऐसी कंपनी जो एक से अधिक देशों में उत्पादन पर नियंत्रण या स्वामित्व रखती है | 56 |
| निवेश | भूमि, भवन, मशीन और दूसरे उपकरण जैसी परिसंपत्तियाँ खरीदने में खर्च किया गया पैसा | 57 |
| विदेशी निवेश | बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किया गया निवेश | 57 |
| संयुक्त उत्पादन | बहुराष्ट्रीय कंपनी का किसी देश की स्थानीय कंपनी के साथ मिलकर उत्पादन करना | 57 |
| विदेश व्यापार | देश के बाहर के बाज़ारों में बेचना और दूसरे देशों में बनी वस्तुएँ खरीदना | 59 |
| बाज़ारों का एकीकरण | व्यापार से अलग-अलग देशों के बाज़ारों का आपस में जुड़ जाना; एक ही वस्तु का दाम दोनों बाज़ारों में बराबर होने लगता है | 61 |
| वैश्वीकरण | विभिन्न देशों के बीच परस्पर संबंध और तीव्र एकीकरण की प्रक्रिया | 62 |
| सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी | दूरसंचार, कंप्यूटर और इंटरनेट से जुड़ी तकनीक, जिससे दूर बैठे लोग तुरंत जानकारी भेज और पा सकते हैं | 63 |
| व्यापार अवरोधक | विदेश व्यापार पर सरकार की लगाई रोक, जैसे आयात पर कर | 64 |
| कोटा | आयात होने वाली वस्तुओं की संख्या की सीमा | 64 |
| उदारीकरण | सरकार द्वारा व्यापार और निवेश पर लगे अवरोध या प्रतिबंध हटाना | 64 |
| विश्व व्यापार संगठन | अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को उदार बनाने के लिए बना संगठन; व्यापार के नियम बनाता है और उनका पालन देखता है | 65 |
| विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज़) | विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने के लिए बनाए गए औद्योगिक क्षेत्र, जहाँ विश्वस्तरीय सुविधाएँ उपलब्ध होनी चाहिए | 67 |
| श्रम कानूनों में लचीलापन | कंपनियों को श्रमिकों को कम समय के लिए रखने की छूट, ताकि श्रम लागत घटे | 67 |
| न्यायसंगत वैश्वीकरण | ऐसा वैश्वीकरण जो सबको अवसर दे और जिसके लाभों में सबकी बेहतर हिस्सेदारी हो | 70 |
3. बहुराष्ट्रीय कंपनी: कई देशों में फैला उत्पादन★★
पृष्ठ 56–57 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 4
- पहले: बीसवीं शताब्दी के मध्य तक उत्पादन मुख्यतः देशों की सीमाओं के अंदर ही था। सीमा पार करने वाली वस्तुएँ थीं कच्चा माल, खाद्य पदार्थ और तैयार उत्पाद। देशों को जोड़ने का मुख्य ज़रिया व्यापार था।
- परिभाषा: “एक बहुराष्ट्रीय कंपनी वह है, जो एक से अधिक देशों में उत्पादन पर नियंत्रण अथवा स्वामित्व रखती है।”
- कहाँ जाती हैं: जहाँ उन्हें सस्ता श्रम और दूसरे संसाधन मिल सकें, ताकि उत्पादन लागत कम हो और लाभ अधिक हो।
किताब का उदाहरण, औद्योगिक उपकरण बनाने वाली एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी:
एक कंपनी, कई देश
यही देश क्यों? (पृष्ठ 57)
| देश | कंपनी को क्या मिलता है |
|---|---|
| चीन | सस्ता विनिर्माण स्थल |
| मेक्सिको और पूर्वी यूरोप | अमेरिका और यूरोप के बाज़ारों से निकटता |
| भारत | अत्यंत कुशल इंजीनियर, और अंग्रेज़ी बोलने वाले शिक्षित युवक जो ग्राहक देखभाल सेवा दे सकते हैं |
किताब कहती है कि इन सबसे बहुराष्ट्रीय कंपनी की लागत में लगभग 50–60 प्रतिशत बचत हो सकती है।
बहुराष्ट्रीय कंपनी जगह कैसे चुनती है: बाज़ार के नज़दीक; जहाँ कम लागत पर कुशल और अकुशल श्रम मिले; जहाँ उत्पादन के दूसरे कारक उपलब्ध हों; और जहाँ सरकारी नीतियाँ उसके हितों का ध्यान रखें।
निवेश और विदेशी निवेश: भूमि, भवन, मशीन और दूसरे उपकरणों की खरीद में खर्च किया गया पैसा निवेश है। “बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किए गए निवेश को विदेशी निवेश कहते हैं।” कोई भी निवेश इस आशा से किया जाता है कि परिसंपत्तियाँ लाभ कमाएँगी।
4. उत्पादन फैलाने के तरीके★★
पृष्ठ 57–59 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 4, 12 (क), 13 (आ)
बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ दूर के उत्पादन से कैसे जुड़ती हैं
- संयुक्त उत्पादन (पृष्ठ 57): स्थानीय कंपनी को दोहरा लाभ होता है। पहला, बहुराष्ट्रीय कंपनी अतिरिक्त निवेश के लिए धन दे सकती है, जैसे तेज़ उत्पादन के लिए मशीनें खरीदने के लिए। दूसरा, वह उत्पादन की नवीनतम प्रौद्योगिकी साथ ला सकती है।
- स्थानीय कंपनियों को खरीदना (पृष्ठ 58): किताब के शब्दों में, “बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश का सबसे आम रास्ता स्थानीय कंपनियों को खरीदना और उसके बाद उत्पादन का प्रसार करना है।” उदाहरण: अमेरिकी कंपनी कारगिल फूड्स ने परख फूड्स जैसी छोटी भारतीय कंपनियाँ खरीदीं। परख फूड्स के चार तेल शोधक केन्द्र अब कारगिल के नियंत्रण में हैं। अब कारगिल 50 लाख पैकेट प्रतिदिन की निर्माण क्षमता के साथ भारत में खाद्य तेलों की सबसे बड़ी उत्पादक कंपनी है।
- कितनी बड़ी: कई शीर्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों की संपत्ति विकासशील देशों की सरकारों के पूरे बजट से भी अधिक है।
- छोटे उत्पादकों को ऑर्डर (पृष्ठ 58): विकसित देशों की बड़ी कंपनियाँ वस्त्र, जूते-चप्पल और खेल के सामान जैसे उद्योगों में छोटे उत्पादकों को ऑर्डर देती हैं और माल अपने ब्राण्ड नाम से बेचती हैं। मूल्य, गुणवत्ता, आपूर्ति और श्रम-शर्तें तय करने की इनकी “प्रचण्ड क्षमता” होती है। किताब की तस्वीरें: लुधियाना के एक घर में बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए फुटबाल बनाते लोग, और विकासशील देशों में बनी जीन्स जो अमेरिका में 6500 रु. में बिक रही है।
फोर्ड मोटर्स (पृष्ठ 59, किताब का उदाहरण)
- अमेरिकी कंपनी, विश्व के 26 देशों में फैली, विश्व की सबसे बड़ी मोटरगाड़ी निर्माता।
- 1995 में भारत आई; चेन्नई के निकट 1,700 करोड़ रुपए का निवेश करके महिन्द्रा एंड महिन्द्रा के सहयोग से विशाल संयंत्र लगाया।
- वर्ष 2017 तक भारतीय बाज़ारों में 88,000 कारें बेच रही थी, और 1,81,000 कारें भारत से दक्षिण अफ्रीका, मेक्सिको, ब्राज़ील और संयुक्त राज्य अमेरिका को निर्यात हुईं।
- किताब आगे बताती है कि हाल के वर्षों में फोर्ड ने भारत में बेचने के लिए कारों का उत्पादन बंद कर दिया है, लेकिन कारों और कार के इंजनों का छोटे स्तर पर निर्यात करती है।
5. विदेश व्यापार और बाज़ारों का एकीकरण★★
पृष्ठ 59–61 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 8, 11
- पुराना रिश्ता: लंबे समय से विदेश व्यापार ही देशों को जोड़ने का मुख्य माध्यम रहा है। ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी व्यापारिक कंपनियाँ व्यापारिक हितों के कारण ही भारत आई थीं।
- उत्पादक को लाभ: विदेश व्यापार उत्पादक को अपने देश के बाज़ार से बाहर के बाज़ारों तक पहुँचने का अवसर देता है।
- खरीदार को लाभ: दूसरे देशों में बनी वस्तुएँ आने से खरीदारों के विकल्प अपने देश में बनी वस्तुओं से आगे बढ़ जाते हैं।
भारत में चीन के खिलौने (पृष्ठ 60): चीनी विनिर्माताओं ने देखा कि भारत में खिलौने अधिक मूल्य पर बिक रहे हैं, और उन्होंने भारत को खिलौने निर्यात करना शुरू किया। सस्ते दाम और नये डिज़ाइनों के कारण किताब के अनुसार एक वर्ष में ही खिलौने की 70–80 प्रतिशत दुकानों में चीनी खिलौनों ने भारतीय खिलौनों की जगह ले ली।
भारत में चीन के खिलौने
एकीकरण कैसे होता है (पृष्ठ 61): व्यापार खुलने से वस्तुएँ एक बाज़ार से दूसरे बाज़ार में जाती हैं, बाज़ार में विकल्प बढ़ते हैं, और दो बाज़ारों में एक ही वस्तु का मूल्य एक समान होने लगता है। हज़ारों मील दूर बैठे दो देशों के उत्पादक भी एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं। किताब का निष्कर्ष: “इस प्रकार, विदेश व्यापार विभिन्न देशों के बाज़ारों को जोड़ने या एकीकरण में सहायक होता है।”
6. वैश्वीकरण क्या है?★★
पृष्ठ 61–62 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 1, 11, 13 (अ)
- बीते दो-तीन दशकों में: बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ऐसी जगहें खोज रही हैं जहाँ उत्पादन सस्ता हो। विदेशी निवेश बढ़ा है, और विदेश व्यापार का बड़ा हिस्सा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में है। जैसे भारत में फोर्ड मोटर्स का संयंत्र केवल भारत के लिए कारें नहीं बनाता; वह दूसरे विकासशील देशों को कारें और विश्व भर में अपने कारखानों के लिए कार-पुर्ज़े भी निर्यात करता है।
- परिभाषा: “विभिन्न देशों के बीच परस्पर संबंध और तीव्र एकीकरण की प्रक्रिया ही वैश्वीकरण है।” इसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ मुख्य भूमिका निभा रही हैं।
- क्या-क्या आता-जाता है: विभिन्न देशों के बीच अधिक से अधिक वस्तुओं और सेवाओं, निवेश और प्रौद्योगिकी का आदान-प्रदान हो रहा है।
- लोगों का आवागमन: लोग बेहतर आय, रोज़गार और शिक्षा के लिए एक देश से दूसरे देश जाते हैं, पर बीते कुछ दशकों में अनेक प्रतिबंधों के कारण लोगों के आवागमन में अधिक वृद्धि नहीं हुई है। ! इसलिए वैश्वीकरण में तेज़ आवागमन वस्तुओं, सेवाओं और निवेश का है, लोगों का नहीं।
7. वैश्वीकरण को संभव बनाने वाला कारक: प्रौद्योगिकी★★
पृष्ठ 62–63 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 9, 12 (घ)
- मुख्य कारक: किताब के अनुसार प्रौद्योगिकी में तीव्र उन्नति वह मुख्य कारक है जिसने वैश्वीकरण की प्रक्रिया को तेज़ किया।
- परिवहन प्रौद्योगिकी: बीते पचास वर्षों में परिवहन प्रौद्योगिकी में बहुत उन्नति हुई है। इससे लंबी दूरियों तक वस्तुएँ कम लागत पर और जल्दी पहुँचने लगीं।
- कंटेनर (पृष्ठ 62): वस्तुएँ कंटेनरों में रखकर जहाज़ों, रेलों, वायुयानों और ट्रकों पर बिना क्षति के लादी जाती हैं। इससे ढुलाई-लागत में भारी बचत हुई और माल बाज़ार तक जल्दी पहुँचता है। वायु यातायात की लागत भी घटी है।
- सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (पृष्ठ 63): दूरसंचार सुविधाओं (टेलीग्राफ, टेलीफोन, मोबाइल फोन, फैक्स) से विश्व भर में एक-दूसरे से संपर्क करना, सूचनाएँ तुरंत पाना और दूर के क्षेत्रों से संवाद करना आसान हुआ है; संचार उपग्रहों ने ये सुविधाएँ सुगम बनाई हैं। जीवन के लगभग हर क्षेत्र में कंप्यूटर पहुँच गए हैं, और इंटरनेट, ई-मेल और वॉयस-मेल ने जुड़ना और आसान किया है।
- किताब का उदाहरण: लंदन के पाठकों के लिए छपने वाली पत्रिका का डिज़ाइन और छपाई दिल्ली में होती है। पाठ इंटरनेट से दिल्ली आता है, डिज़ाइन कंप्यूटर पर बनता है, छपी पत्रिकाएँ वायुमार्ग से लंदन जाती हैं, और भुगतान इंटरनेट (ई-बैंकिंग) से लंदन के बैंक से दिल्ली के बैंक को तुरंत हो जाता है।
- सेवाएँ भी फैलीं (पृष्ठ 67): कॉल सेंटर, आँकड़ा प्रविष्टि (डाटा एन्ट्री), लेखाकरण, प्रशासनिक कार्य और इंजीनियरिंग जैसी सेवाएँ भारत जैसे देशों में सस्ते में उपलब्ध हैं और विकसित देशों को निर्यात की जाती हैं।
8. उदारीकरण: व्यापार अवरोधक हटाना★★
पृष्ठ 64 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 2, 7, 12 (ख)
- व्यापार अवरोधक: आयात पर कर इसका एक उदाहरण है। इसे अवरोधक इसलिए कहते हैं क्योंकि यह कुछ प्रतिबंध लगाता है। सरकार इससे विदेश व्यापार बढ़ा या घटा सकती है, और तय कर सकती है कि कौन-सी वस्तुएँ कितनी मात्रा में आयात हों। आयात होने वाली वस्तुओं की संख्या की सीमा कोटा कहलाती है।
- आज़ादी के बाद अवरोध क्यों: उत्पादकों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचाना था। 1950 और 1960 के दशकों में उद्योग अभी उभर ही रहे थे, और आयात से प्रतिस्पर्धा उन्हें पनपने नहीं देती। इसलिए केवल ज़रूरी चीज़ों, जैसे मशीनरी, उर्वरक और पेट्रोलियम, के आयात की अनुमति थी। किताब याद दिलाती है कि सभी विकसित देशों ने भी विकास के शुरुआती चरणों में घरेलू उत्पादकों को संरक्षण दिया था।
- 1991 के आसपास बदलाव: करीब सन् 1991 के प्रारंभ से नीतियों में दूरगामी बदलाव हुए। सरकार ने तय किया कि अब भारतीय उत्पादकों के लिए विश्व के उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा करने का समय आ गया है; प्रतिस्पर्धा से उत्पादकों का प्रदर्शन सुधरेगा। प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों ने भी इसका समर्थन किया। विदेश व्यापार और विदेशी निवेश पर से अवरोध काफ़ी हद तक हटा दिए गए।
- परिभाषा: “सरकार द्वारा अवरोधों अथवा प्रतिबंधों को हटाने की प्रक्रिया उदारीकरण के नाम से जानी जाती है।” उदारीकरण से व्यवसायी मुक्त रूप से तय कर सकते हैं कि क्या आयात या निर्यात करें। सरकार पहले से कम नियंत्रण करती है, इसलिए उसे अधिक उदार कहा जाता है।
9. विश्व व्यापार संगठन★★
पृष्ठ 65–66 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 5
- सोच: कुछ बहुत प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का मानना है कि विदेश व्यापार और विदेशी निवेश पर सभी अवरोधक हानिकारक हैं, देशों के बीच मुक्त व्यापार होना चाहिए और विश्व के सभी देशों को अपनी नीतियाँ उदार बनानी चाहिए।
- परिचय: “विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यू. टी. ओ.) एक ऐसा संगठन है, जिसका ध्येय अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को उदार बनाना है।” यह विकसित देशों की पहल पर शुरू हुआ। यह अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के नियम तय करता है और देखता है कि उनका पालन हो। किताब के अनुसार विश्व के लगभग 160 देश इसके सदस्य हैं।
- व्यवहार में: विकसित देशों ने अनुचित ढंग से अपने व्यापार अवरोधक बनाए रखे, जबकि विश्व व्यापार संगठन के नियमों ने विकासशील देशों को अवरोधक हटाने के लिए विवश किया।
- किताब का उदाहरण, कृषि व्यापार पर बहस (पृष्ठ 65): भारत में अधिकांश रोज़गार और जी.डी.पी. का महत्त्वपूर्ण भाग कृषि से आता है। अमेरिका के जी.डी.पी. में कृषि का हिस्सा केवल एक प्रतिशत और कुल रोज़गार में केवल 0.5 प्रतिशत है। फिर भी इन थोड़े से अमेरिकी किसानों को सरकार से उत्पादन और निर्यात के लिए बहुत अधिक धन राशि मिलती है। इसलिए वे अपनी उपज बहुत कम कीमत पर बेच पाते हैं, और अधिशेष उपज दूसरे देशों के बाज़ारों में कम कीमत पर बिकती है, जिससे उन देशों के किसानों पर बुरा असर पड़ता है। विकासशील देश पूछते हैं: हमने नियमों के अनुसार अवरोधक घटाए, आपने नियमों को नज़रअंदाज़ करके अपने किसानों को भारी धन देना जारी रखा; हमसे सहायता बंद करने को कहा और ख़ुद वही कर रहे हैं; क्या यह मुक्त और न्यायसंगत व्यापार है?
10. भारत पर वैश्वीकरण का असर: किसे लाभ मिला★★
पृष्ठ 66–67 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 3, 6, 10, 11, 12 (ग, ङ)
- उपभोक्ता: वैश्वीकरण और उत्पादकों (स्थानीय और विदेशी दोनों) के बीच बढ़ी प्रतिस्पर्धा से उपभोक्ताओं, ख़ासकर शहरों के धनी वर्ग को लाभ हुआ है। उनके पास पहले से अधिक विकल्प हैं, कई उत्पाद उत्कृष्ट गुणवत्ता के और सस्ते हैं, और वे पहले से ऊँचे जीवन स्तर का आनंद ले रहे हैं।
- पर सबके लिए नहीं: “उत्पादकों और श्रमिकों पर वैश्वीकरण का एक समान प्रभाव नहीं पड़ा है।”
- पहला, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ: बीते 20 वर्षों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में अपना निवेश बढ़ाया है, यानी भारत में निवेश करना उनके लिए लाभप्रद रहा है। उनकी रुचि शहरी इलाकों के उद्योगों में रही: सेलफोन, मोटर गाड़ियाँ, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, ठंडे पेय पदार्थ, जंक खाद्य पदार्थ, और बैंकिंग जैसी सेवाएँ। इनके अधिकतर खरीदार संपन्न वर्ग के हैं। इन उद्योगों में नये रोज़गार बने, और इन्हें कच्चा माल आदि देने वाली स्थानीय कंपनियाँ समृद्ध हुईं।
- दूसरा, शीर्ष भारतीय कंपनियाँ: बढ़ी प्रतिस्पर्धा से इन्हें लाभ हुआ। इन्होंने नवीनतम प्रौद्योगिकी और उत्पादन प्रणाली में निवेश किया और अपने उत्पादन-मानक ऊँचे किए। कुछ ने विदेशी कंपनियों के साथ सफलतापूर्वक सहयोग करके लाभ कमाया।
- भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (पृष्ठ 67): वैश्वीकरण ने कुछ बड़ी भारतीय कंपनियों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के रूप में उभरने के योग्य बनाया। किताब के उदाहरण: टाटा मोटर्स (मोटरगाड़ियाँ), इंफोसिस (आई.टी.), रैनबैक्सी (दवाइयाँ), एशियन पेंट्स (पेंट), सुंदरम फास्टनर्स (नट और बोल्ट)। ये विश्व स्तर पर अपने क्रियाकलाप फैला रही हैं।
- सेवा कंपनियाँ: सेवा देने वाली कंपनियों, ख़ासकर सूचना और संचार प्रौद्योगिकी वाली कंपनियों के लिए नये अवसर बने (देखिए हिस्सा 7)।
विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए उठाए गए कदम (पृष्ठ 67, किताब का बॉक्स)
| कदम | किताब क्या कहती है |
|---|---|
| विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज़) | केन्द्र और राज्य सरकारें ऐसे औद्योगिक क्षेत्र बना रही हैं, जिनमें बिजली, पानी, सड़क, परिवहन, भण्डारण, मनोरंजन और शैक्षिक जैसी विश्व स्तरीय सुविधाएँ होनी चाहिए |
| कर से छूट | सेज़ में उत्पादन इकाई लगाने वाली कंपनियों को आरंभिक पाँच वर्षों तक कोई कर नहीं देना पड़ता |
| श्रम कानूनों में लचीलापन | सरकार ने कंपनियों को अनेक नियमों से छूट लेने की अनुमति दी है। अब कंपनियाँ श्रमिकों को नियमित आधार पर रखने के बजाय, काम का दबाव अधिक होने पर, छोटी अवधि के लिए रखती हैं; इससे श्रम लागत घटती है। फिर भी विदेशी कंपनियाँ और अधिक लचीलापन माँग रही हैं |
वैश्वीकरण का असर सब पर एक जैसा नहीं
- शहरों के धनी उपभोक्ता: अधिक विकल्प, अच्छी गुणवत्ता, कम कीमत
- बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और उनके स्थानीय आपूर्तिकर्ता
- शीर्ष भारतीय कंपनियाँ; कुछ बहुराष्ट्रीय बनीं
- सूचना और संचार प्रौद्योगिकी वाली सेवा कंपनियाँ
- छोटे उत्पादक: बैटरी, संधारित्र, प्लास्टिक, खिलौने, टायर, डेयरी उत्पाद, खाद्य तेल
- कई इकाइयाँ बंद, अनेक श्रमिक बेरोज़गार
- श्रमिक: रोज़गार अब सुनिश्चित नहीं
11. छोटे उत्पादक और श्रमिक: प्रतिस्पर्धा की मार★★
पृष्ठ 68–70 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 3, 6, 10
रवि, छोटा उत्पादक (पृष्ठ 68)
- सन् 1992 में रवि ने तमिलनाडु के औद्योगिक शहर होसुर में संधारित्र बनाने की कंपनी शुरू करने के लिए बैंक से ऋण लिया। संधारित्र ट्यूबलाइट, टेलीविज़न समेत अनेक घरेलू इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में लगते हैं। तीन वर्षों में उसका उत्पादन बढ़ा और कंपनी में 20 कर्मचारी काम करने लगे।
- सन् 2001 में सरकार ने विश्व व्यापार संगठन के समझौते के अनुसार संधारित्रों के आयात पर से प्रतिबंध हटा दिए।
- उसके मुख्य ग्राहक टेलीविज़न कंपनियाँ थीं। बहुराष्ट्रीय ब्रांडों की प्रतिस्पर्धा ने भारतीय टेलीविज़न कंपनियों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए संयोजन-कार्य करने के लिए विवश कर दिया। उनमें से कुछ संधारित्र आयात करना पसंद करती थीं, क्योंकि आयातित माल की कीमत रवि जैसे लोगों की कीमत से आधी थी।
- अब रवि वर्ष 2000 के उत्पादन के आधे से भी कम संधारित्र बनाता है और उसके पास केवल सात श्रमिक हैं। हैदराबाद और चेन्नई में इसी व्यवसाय वाले उसके कई दोस्तों ने अपनी इकाइयाँ बंद कर दीं।
किन उद्योगों पर मार पड़ी: बैटरी, संधारित्र, प्लास्टिक, खिलौने, टायर, डेयरी उत्पाद और खाद्य तेल। कई इकाइयाँ बंद हुईं और अनेक श्रमिक बेरोज़गार हुए। भारत में कृषि के बाद सबसे अधिक श्रमिक (11 करोड़) लघु और मध्यम उद्योगों में काम करते हैं।
श्रमिक: अनिश्चित रोज़गार (पृष्ठ 69–70)
- बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण अधिकतर नियोक्ता श्रमिकों को रोज़गार देने में लचीलापन पसंद करते हैं। “इसका अर्थ है कि श्रमिकों का रोज़गार अब सुनिश्चित नहीं है।”
- वस्त्र निर्यात की कड़ी: अमेरिका और यूरोप की वस्त्र उद्योग की बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारतीय निर्यातकों को ऑर्डर देती हैं और लाभ बढ़ाने के लिए सबसे सस्ता माल खोजती हैं। बड़े ऑर्डर पाने के लिए निर्यातक लागत घटाने की कड़ी कोशिश करते हैं। कच्चे माल की लागत नहीं घट सकती, इसलिए वे श्रम-लागत घटाते हैं: स्थायी के बजाय अस्थायी रोज़गार देते हैं, ताकि पूरे वर्ष वेतन न देना पड़े। श्रमिकों को बहुत लंबे घंटे और माँग ज़्यादा होने पर रात में भी काम करना पड़ता है, और मज़दूरी काफ़ी कम होती है। प्रतिस्पर्धा से बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अधिक लाभ कमाने में मदद मिली, पर श्रमिकों को लाभ में न्यायसंगत हिस्सा नहीं मिला।
- सुशीला की कहानी: 35 वर्ष की सुशीला ने दिल्ली के एक वस्त्र निर्यातक उद्योग में कई वर्ष काम किया। स्थायी श्रमिक के रूप में उसे स्वास्थ्य बीमा, भविष्य निधि और अतिरिक्त समय के काम की दुगुनी मज़दूरी मिलती थी। 1990 के दशक के अंतिम वर्षों में फैक्ट्री बंद हो गई। छह माह खोजने के बाद उसे घर से 30 कि.मी. दूर काम मिला। कई वर्ष वहाँ काम करने के बावजूद वह अस्थायी श्रमिक है और पहले से आधे से भी कम कमाती है। वह सप्ताह के सातों दिन सुबह 7.30 बजे घर से निकलती है और शाम 10 बजे लौटती है। एक दिन काम नहीं, तो उस दिन की मज़दूरी नहीं।
- बड़ी तस्वीर: आज अधिकतर श्रमिक असंगठित क्षेत्र में हैं, और संगठित क्षेत्र में भी काम की परिस्थितियाँ धीरे-धीरे असंगठित क्षेत्र जैसी होती जा रही हैं। सुशीला जैसे श्रमिकों को अब वह संरक्षण और लाभ नहीं मिलते जो पहले मिलते थे।
12. न्यायसंगत वैश्वीकरण के लिए संघर्ष★★
पृष्ठ 70–71 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 9, 10, 13 (इ)
- सबको लाभ नहीं: “शिक्षित, कुशल और संपन्न लोगों ने वैश्वीकरण से मिले नये अवसरों का सर्वोत्तम उपयोग किया है। दूसरी ओर, अनेक लोगों को लाभ में हिस्सा नहीं मिला है।”
- लक्ष्य: “न्यायसंगत वैश्वीकरण सभी के लिए अवसर प्रदान करेगा और यह सुनिश्चित भी करेगा कि वैश्वीकरण के लाभों में सबकी बेहतर हिस्सेदारी हो।”
- सरकार क्या कर सकती है:
- उसकी नीतियाँ केवल धनी और प्रभावशाली लोगों के नहीं, देश के सभी लोगों के हितों की रक्षा करें।
- श्रमिक कानूनों का उचित कार्यान्वयन हो और श्रमिकों को उनके अधिकार मिलें।
- छोटे उत्पादकों की तब तक मदद करे, जब तक वे प्रतिस्पर्धा के लिए सक्षम न हो जाएँ।
- ज़रूरी हो तो व्यापार और निवेश अवरोधकों का उपयोग करे।
- विश्व व्यापार संगठन से न्यायसंगत नियमों के लिए समझौते करे। विकसित देशों के वर्चस्व के विरुद्ध समान हितों वाले विकासशील देशों को मिलकर लड़ना होगा।
- जनता भी: बीते कुछ वर्षों में बड़े अभियानों और जनसंगठनों के प्रतिनिधियों ने विश्व व्यापार संगठन के व्यापार और निवेश से जुड़े महत्त्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित किया है। यानी न्यायसंगत वैश्वीकरण के संघर्ष में जनता भी बड़ी भूमिका निभा सकती है। किताब में हांगकांग में विश्व व्यापार संगठन के खिलाफ़ 2005 के प्रदर्शन की तस्वीर है (पृष्ठ 71)।
13. आँकड़े और साल एक जगह★
| आँकड़ा या साल | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| दो दशक पहले | बाज़ारों में वस्तुओं की ऐसी विविधता नहीं थी | 55 |
| बीसवीं शताब्दी के मध्य तक | उत्पादन मुख्यतः देशों की सीमाओं के अंदर | 56 |
| लगभग 50–60 प्रतिशत | देशों में उत्पादन फैलाने से बहुराष्ट्रीय कंपनी की लागत में बचत | 57 |
| चार | परख फूड्स के तेल शोधक केन्द्र, अब कारगिल के नियंत्रण में | 58 |
| 50 लाख पैकेट प्रतिदिन | कारगिल की निर्माण क्षमता | 58 |
| 6500 रु. | विकासशील देशों में बनी जीन्स की अमेरिका में कीमत (किताब की तस्वीर) | 58 |
| 26 देश | जिनमें फोर्ड मोटर्स फैली है | 59 |
| 1995 | फोर्ड मोटर्स भारत आई | 59 |
| 1,700 करोड़ रुपए | चेन्नई के निकट फोर्ड का निवेश | 59 |
| वर्ष 2017 तक 88,000 | भारत में बिक रही फोर्ड की कारें | 59 |
| 1,81,000 | भारत से निर्यात हुई फोर्ड की कारें | 59 |
| 70–80 प्रतिशत | खिलौने की दुकानें, जिनमें एक वर्ष में चीनी खिलौनों ने भारतीय खिलौनों की जगह ली | 60 |
| दो-तीन दशक | जब से बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ उत्पादन के लिए सस्ती जगहें खोज रही हैं | 61 |
| पचास वर्ष | जिनमें परिवहन प्रौद्योगिकी में बहुत उन्नति हुई | 62 |
| 1950 और 1960 के दशक | उद्योगों का उदय; आयात पर प्रतिबंध | 64 |
| सन् 1991 | करीब इसके प्रारंभ से नीतियों में दूरगामी परिवर्तन | 64 |
| लगभग 160 | विश्व व्यापार संगठन के सदस्य देश | 65 |
| एक प्रतिशत और 0.5 प्रतिशत | अमेरिका के जी.डी.पी. और कुल रोज़गार में कृषि का हिस्सा | 65 |
| 20 वर्ष | जिनमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में निवेश बढ़ाया | 66 |
| पाँच वर्ष | सेज़ में कंपनियों को आरंभ में कोई कर नहीं | 67 |
| 1992 | रवि ने होसुर में संधारित्र की कंपनी शुरू की | 68 |
| 20 | तीन वर्षों में रवि की कंपनी के कर्मचारी | 68 |
| 2001 | विश्व व्यापार संगठन के समझौते के अनुसार संधारित्रों के आयात से प्रतिबंध हटे | 68 |
| सात | रवि के पास अब श्रमिक; उत्पादन वर्ष 2000 के आधे से भी कम | 68 |
| 11 करोड़ | लघु और मध्यम उद्योगों के श्रमिक (कृषि के बाद सबसे अधिक) | 68 |
| 35 वर्ष | सुशीला की उम्र | 69 |
| 1990 के दशक के अंतिम वर्ष | सुशीला की फैक्ट्री बंद हुई | 69 |
| 30 कि.मी. | सुशीला का नया काम घर से इतनी दूर | 69 |
| सुबह 7.30 से शाम 10 बजे | सुशीला का दिन, सप्ताह के सातों दिन | 69 |
| 2005 | हांगकांग में विश्व व्यापार संगठन के खिलाफ़ प्रदर्शन (किताब की तस्वीर) | 71 |
14. ये ग़लतियाँ मत कीजिएध्यान
| ग़लती | सही बात | पृष्ठ |
|---|---|---|
| वैश्वीकरण में लोगों का आवागमन तेज़ी से बढ़ा है। | प्रतिबंधों के कारण लोगों का आवागमन ज़्यादा नहीं बढ़ा। तेज़ आवागमन वस्तुओं, सेवाओं, निवेश और प्रौद्योगिकी का है। | 62 |
| बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ज़्यादातर नये कारखाने लगाकर निवेश करती हैं। | निवेश का सबसे आम रास्ता स्थानीय कंपनियों को खरीदना और फिर उत्पादन फैलाना है। | 58 |
| विदेश व्यापार और विदेशी निवेश एक ही बात है। | विदेश व्यापार में वस्तुएँ देशों के बीच खरीदी-बेची जाती हैं; विदेशी निवेश बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा भूमि, भवन, मशीन जैसी परिसंपत्तियों में लगाया गया पैसा है। | 57, 59 |
| कोटा का मतलब आयात पर कर है। | कोटा आयात होने वाली वस्तुओं की संख्या की सीमा है। आयात पर कर एक अलग व्यापार अवरोधक है। | 64 |
| उदारीकरण में सरकार सारा नियंत्रण छोड़ देती है। | उदारीकरण का मतलब अवरोध और प्रतिबंध हटाना है; सरकार पहले की तुलना में कम नियंत्रण करती है। | 64 |
| विकसित देशों ने कभी अपने उत्पादकों को संरक्षण नहीं दिया। | सभी विकसित देशों ने विकास के प्रारंभिक चरणों में घरेलू उत्पादकों को संरक्षण दिया था। | 64 |
| विश्व व्यापार संगठन विकासशील देशों की पहल पर बना। | यह विकसित देशों की पहल पर शुरू हुआ, और व्यवहार में विकसित देशों ने अपने अवरोधक बनाए रखे। | 65 |
| सेज़ में कंपनियों को कभी कर नहीं देना पड़ता। | छूट आरंभिक पाँच वर्षों तक की है। | 67 |
| श्रम कानूनों में लचीलापन श्रमिकों के फ़ायदे के लिए है। | लचीलापन कंपनियों की श्रम लागत घटाने के लिए है; इससे श्रमिकों का रोज़गार सुनिश्चित नहीं रहा। | 67, 69 |
| वैश्वीकरण से सबका जीवन स्तर सुधरा है। | लाभ धनी उपभोक्ताओं और कुशल, शिक्षित, धनी उत्पादकों को मिला; अनेक छोटे उत्पादक और श्रमिक प्रभावित हुए। | 66, 71 |
15. अपने को जाँचिए: किताब के प्रश्न और उत्तर★★
हर उत्तर पहले ख़ुद सोचिए, फिर खोलकर मिलाइए। प्रश्नावली किताब के पृष्ठ 72–73 पर है।
प्रश्न 1. वैश्वीकरण से आप क्या समझते हैं? अपने शब्दों में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: वैश्वीकरण का मतलब है अलग-अलग देशों का आपस में तेज़ी से जुड़ना और एक होते जाना। यह जुड़ाव बहुराष्ट्रीय कंपनियों के कई देशों में फैले उत्पादन, विदेश व्यापार और विदेशी निवेश से होता है; बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ इसमें मुख्य भूमिका निभा रही हैं। इससे देशों के बीच वस्तुओं, सेवाओं, निवेश और प्रौद्योगिकी का आदान-प्रदान बढ़ता है। लोगों का आवागमन प्रतिबंधों के कारण ज़्यादा नहीं बढ़ा। उदाहरण: भारत के बाज़ारों में चीन के खिलौने, और भारत में बनी फोर्ड की कारों का दूसरे देशों को निर्यात। (पृष्ठ 61–62)
प्रश्न 2. भारत सरकार द्वारा विदेश व्यापार एवं विदेशी निवेश पर अवरोधक लगाने के क्या कारण थे? इन अवरोधकों को सरकार क्यों हटाना चाहती थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: अवरोधक लगाने के कारण: स्वतंत्रता के बाद सरकार ने विदेश व्यापार और विदेशी निवेश पर प्रतिबंध लगाए, ताकि देश के उत्पादकों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से संरक्षण मिले। 1950 और 1960 के दशकों में उद्योग उभर ही रहे थे; उस अवस्था में आयात से प्रतिस्पर्धा उन्हें बढ़ने नहीं देती। इसलिए केवल ज़रूरी चीज़ों, जैसे मशीनरी, उर्वरक और पेट्रोलियम, के आयात की अनुमति थी। हटाने के कारण: करीब सन् 1991 के प्रारंभ से सरकार ने तय किया कि अब भारतीय उत्पादकों के लिए विश्व के उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा करने का समय आ गया है। माना गया कि प्रतिस्पर्धा से उत्पादकों का प्रदर्शन सुधरेगा, क्योंकि उन्हें अपनी गुणवत्ता सुधारनी होगी। प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों ने भी इस निर्णय का समर्थन किया। (पृष्ठ 64)
प्रश्न 3. श्रम कानूनों में लचीलापन कंपनियों को कैसे मदद करेगा?
उत्तर देखिए
उत्तर: लचीलेपन से कंपनियाँ श्रमिकों को नियमित आधार पर रखने के बजाय, जब काम का दबाव अधिक हो, तब छोटी अवधि के लिए रख सकती हैं। उन्हें पूरे वर्ष वेतन नहीं देना पड़ता, इसलिए श्रम लागत घटती है। कच्चे माल की लागत घटाई नहीं जा सकती, तो श्रम लागत घटाकर ही निर्यातक विदेशी खरीदारों के बड़े ऑर्डर पाने की प्रतिस्पर्धा में टिकते हैं। इसी कारण सरकार ने विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए यह छूट दी है, और विदेशी कंपनियाँ और अधिक लचीलापन माँग रही हैं। ध्यान रखिए: श्रमिक के लिए इसका मतलब है कि उसका रोज़गार अब सुनिश्चित नहीं है। (पृष्ठ 67, 69)
प्रश्न 4. दूसरे देशों में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ किस प्रकार उत्पादन या उत्पादन पर नियंत्रण स्थापित करती हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ऐसी जगहें चुनती हैं जो बाज़ार के पास हों, जहाँ कम लागत पर कुशल और अकुशल श्रम मिले, उत्पादन के दूसरे कारक उपलब्ध हों और सरकारी नीतियाँ उनके हितों का ध्यान रखें। फिर वे इन तरीकों से उत्पादन पर नियंत्रण जमाती हैं:
- कार्यालय और कारखाने लगाकर, जैसे फोर्ड मोटर्स ने चेन्नई के निकट संयंत्र लगाया।
- स्थानीय कंपनियों के साथ साझेदारी (संयुक्त उत्पादन): बहुराष्ट्रीय कंपनी अतिरिक्त निवेश के लिए धन और उत्पादन की नवीनतम प्रौद्योगिकी देती है।
- स्थानीय कंपनियों को खरीदकर, फिर उत्पादन फैलाकर। यह सबसे आम रास्ता है; जैसे कारगिल ने परख फूड्स को खरीदा।
- छोटे उत्पादकों को ऑर्डर देकर: वस्त्र, जूते-चप्पल, खेल के सामान जैसे उद्योगों में वे छोटे उत्पादकों से माल बनवाकर अपने ब्राण्ड नाम से बेचती हैं, और मूल्य, गुणवत्ता, आपूर्ति और श्रम-शर्तें तय करती हैं।
इस तरह दूर-दूर फैला उत्पादन आपस में जुड़ जाता है। (पृष्ठ 56–59)
प्रश्न 5. विकसित देश, विकासशील देशों से उनके व्यापार और निवेश का उदारीकरण क्यों चाहते हैं? क्या आप मानते हैं कि विकासशील देशों को भी बदले में ऐसी माँग करनी चाहिए?
उत्तर देखिए
उत्तर: विकसित देश क्यों चाहते हैं: उनकी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ऐसी जगहें खोजती हैं जहाँ उत्पादन सस्ता हो और बड़े बाज़ार हों। अवरोध हटें तो वे विकासशील देशों में आसानी से निवेश कर सकती हैं, स्थानीय कंपनियाँ खरीद सकती हैं और अपना माल वहाँ बेच सकती हैं। विश्व व्यापार संगठन भी विकसित देशों की पहल पर बना और मुक्त व्यापार के नियम बनाता है। विकासशील देशों की माँग: हाँ, उन्हें माँग करनी चाहिए। व्यवहार में विकसित देशों ने अनुचित ढंग से अपने व्यापार अवरोधक बनाए रखे हैं। जैसे, अमेरिका अपने किसानों को उत्पादन और निर्यात के लिए भारी धन राशि देता है, जिससे उनकी सस्ती अधिशेष उपज दूसरे देशों के किसानों को नुकसान पहुँचाती है। इसलिए विकासशील देश माँग कर सकते हैं कि नियम सब पर बराबर लागू हों, और समान हितों वाले विकासशील देश मिलकर विश्व व्यापार संगठन में न्यायसंगत नियमों के लिए लड़ें। (पृष्ठ 61, 65, 70)
प्रश्न 6. ‘वैश्वीकरण का प्रभाव एक समान नहीं है’। इस कथन की अपने शब्दों में व्याख्या कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: वैश्वीकरण से कुछ लोगों को बहुत लाभ हुआ, तो कुछ पर मार पड़ी। जिन्हें लाभ हुआ: शहरों के धनी उपभोक्ता (अधिक विकल्प, अच्छी गुणवत्ता, कम कीमत, ऊँचा जीवन स्तर); बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और उन्हें कच्चा माल देने वाली स्थानीय कंपनियाँ; शीर्ष भारतीय कंपनियाँ, जिनमें से कुछ खुद बहुराष्ट्रीय बन गईं; सूचना और संचार प्रौद्योगिकी वाली सेवा कंपनियाँ। जिन पर मार पड़ी: छोटे उत्पादक, जैसे होसुर के रवि, जिनकी कंपनी सस्ते आयात के बाद 20 से सात श्रमिकों पर आ गई; बैटरी, संधारित्र, प्लास्टिक, खिलौने, टायर, डेयरी उत्पाद और खाद्य तेल के कई छोटे उद्योग बंद हुए। श्रमिक, जैसे सुशीला, स्थायी से अस्थायी हो गए, उनकी कमाई घटी और संरक्षण छिन गया। इसलिए किताब कहती है कि शिक्षित, कुशल और संपन्न लोगों ने नये अवसरों का सबसे अच्छा उपयोग किया, जबकि अनेक लोगों को लाभ में हिस्सा नहीं मिला। (पृष्ठ 66–70)
प्रश्न 7. व्यापार और निवेश नीतियों का उदारीकरण वैश्वीकरण प्रक्रिया में कैसे सहायता पहुँचाता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: उदारीकरण में सरकार व्यापार और निवेश पर लगे अवरोध हटाती है। इससे वस्तुओं का आयात-निर्यात आसान होता है, और विदेशी कंपनियाँ देश में अपने कार्यालय और कारखाने लगा सकती हैं। व्यवसायी खुद तय करते हैं कि क्या आयात या निर्यात करें। इससे विदेश व्यापार और विदेशी निवेश बढ़ते हैं, और यही दोनों देशों को जोड़ते हैं। उल्टा उदाहरण: अगर सरकार चीनी खिलौनों के आयात पर कर लगाए, तो वे भारत में सस्ते नहीं रहेंगे और उनका आयात अपने आप घट जाएगा। किताब का सार: व्यापार और निवेश के उदारीकरण ने अवरोधक हटाकर वैश्वीकरण को सुगम बनाया है। (पृष्ठ 64, 71)
प्रश्न 8. विदेश व्यापार विभिन्न देशों के बाज़ारों के एकीकरण में किस प्रकार मदद करता है? यहाँ दिए गए उदाहरण से भिन्न उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: व्यापार खुलने से वस्तुएँ एक देश के बाज़ार से दूसरे देश के बाज़ार में जाती हैं। उत्पादक को अपने देश से बाहर के बाज़ार मिलते हैं, खरीदारों के विकल्प बढ़ते हैं, दोनों देशों के उत्पादक एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं, और दोनों बाज़ारों में एक ही वस्तु का मूल्य एक समान होने लगता है। यही बाज़ारों का एकीकरण है। दूसरा उदाहरण (खिलौनों के बजाय इस्पात): किताब बताती है कि हाल के वर्षों में चीन भारत से इस्पात आयात कर रहा है। इससे भारत की इस्पात कंपनियों को चीन का बाज़ार मिलता है; चीन में इस्पात खरीदने वाले उद्योगों के पास चीनी और भारतीय इस्पात में से चुनने का विकल्प होता है; चीन की इस्पात कंपनियों को भारतीय इस्पात से प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है; और दोनों देशों में इस्पात का मूल्य एक जैसा होने लगता है। इस तरह दोनों देशों के इस्पात बाज़ार जुड़ जाते हैं। (पृष्ठ 59–61)
प्रश्न 9. वैश्वीकरण भविष्य में जारी रहेगा। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि आज से बीस वर्ष बाद विश्व कैसा होगा? अपने उत्तर का कारण दीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह आपकी अपनी कल्पना का प्रश्न है; उत्तर में अध्याय के कारण जोड़िए। एक संभव उत्तर: जिन कारकों ने वैश्वीकरण को आगे बढ़ाया (प्रौद्योगिकी में तीव्र उन्नति, व्यापार और निवेश का उदारीकरण, और विश्व व्यापार संगठन के नियम), वे चलते रहे तो बीस वर्ष बाद देश और अधिक जुड़े होंगे। वस्तुओं, सेवाओं, निवेश और प्रौद्योगिकी का आदान-प्रदान बढ़ेगा; सूचना प्रौद्योगिकी से और ज़्यादा सेवाएँ दूर देशों से दी जाएँगी; बाज़ारों में विकल्प बढ़ेंगे और उत्पादकों में प्रतिस्पर्धा तेज़ होगी। पर यह दुनिया सबके लिए अच्छी होगी या नहीं, यह इस पर निर्भर करेगा कि वैश्वीकरण कितना न्यायसंगत बनता है: सरकारें सबके हितों की रक्षा करें, श्रम कानूनों का पालन हो, छोटे उत्पादकों को मदद मिले, और जनता न्यायसंगत नियमों के लिए आवाज़ उठाए। (पृष्ठ 62–64, 70)
प्रश्न 10. मान लीजिए कि आप दो लोगों को तर्क करते हुए पाते हैं: एक कह रहा है कि वैश्वीकरण ने हमारे देश के विकास को क्षति पहुँचाई है, दूसरा कह रहा है कि वैश्वीकरण ने भारत के विकास में सहायता की है। इन लोगों को आप कैसे जवाब देंगे?
उत्तर देखिए
उत्तर: दोनों की बात आधी सही है, क्योंकि वैश्वीकरण का असर सब पर एक समान नहीं पड़ा। सहायता की बात: उपभोक्ताओं, ख़ासकर शहरों के धनी वर्ग को अधिक विकल्प, अच्छी गुणवत्ता और कम कीमतें मिलीं; बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश से नये रोज़गार बने और स्थानीय आपूर्तिकर्ता समृद्ध हुए; शीर्ष भारतीय कंपनियाँ आगे बढ़ीं और कुछ बहुराष्ट्रीय बनीं; आई.टी. सेवाओं के लिए नये अवसर बने। क्षति की बात: बढ़ी प्रतिस्पर्धा से रवि जैसे अनेक छोटे उत्पादकों की इकाइयाँ बंद हुईं, श्रमिक बेरोज़गार हुए, और सुशीला जैसे श्रमिकों का रोज़गार अस्थायी और असुरक्षित हो गया। मेरा जवाब: वैश्वीकरण को रोकने या आँख मूँदकर अपनाने के बजाय उसे न्यायसंगत बनाइए: सरकार सबके हितों की रक्षा करे, श्रम कानूनों का पालन कराए, छोटे उत्पादकों की तब तक मदद करे जब तक वे प्रतिस्पर्धा में सक्षम न हों, ज़रूरत पर व्यापार अवरोधक लगाए, और विश्व व्यापार संगठन में न्यायसंगत नियमों के लिए लड़े। (पृष्ठ 66–71)
प्रश्न 11. रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए (अनुच्छेद “दो दशक पहले की तुलना में…”, छह खाली स्थान)।
उत्तर देखिए
उत्तर: क्रम से:
- यह वैश्वीकरण की प्रक्रिया से नज़दीक से जुड़ा है।
- अन्य देशों के साथ विदेश व्यापार बढ़ रहा है।
- बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत में निवेश कर रही हैं, क्योंकि भारत में निवेश करना उनके लिए लाभप्रद रहा है।
- और 5. बढ़ते विदेश व्यापार और विदेशी निवेश के प्रभाव का अर्थ है
- उत्पादकों के बीच अधिकतम प्रतिस्पर्धा।
(पृष्ठ 59–61, 66)
प्रश्न 12. निम्नलिखित को सुमेलित कीजिए:
| (क) बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ छोटे उत्पादकों से सस्ते दरों पर खरीदती हैं। | (अ) मोटर गाड़ियों |
| (ख) आयात पर कर और कोटा का उपयोग, व्यापार नियमन के लिए किया जाता है। | (ब) कपड़ा, जूते-चप्पल, खेल के सामान |
| (ग) विदेशों में निवेश करने वाली भारतीय कंपनियाँ | (स) कॉल सेंटर |
| (घ) आई. टी. ने सेवाओं के उत्पादन के प्रसार में सहायता की है। | (द) टाटा मोटर्स, इंफोसिस रैनबैक्सी |
| (ङ) अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ ने उत्पादन करने के लिए निवेश किया है। | (य) व्यापार अवरोधक |
उत्तर देखिए
उत्तर:
- (क) → (ब): छोटे उत्पादकों से कपड़ा, जूते-चप्पल और खेल का सामान बनवाया जाता है। (पृष्ठ 58)
- (ख) → (य): आयात पर कर और कोटा व्यापार अवरोधक हैं। (पृष्ठ 64)
- (ग) → (द): टाटा मोटर्स, इंफोसिस, रैनबैक्सी। (पृष्ठ 67)
- (घ) → (स): कॉल सेंटर। (पृष्ठ 56, 67)
- (ङ) → (अ): मोटर गाड़ियाँ, जैसे फोर्ड मोटर्स। (पृष्ठ 59, 66)
प्रश्न 13. सही विकल्प का चयन कीजिए:
(अ) वैश्वीकरण के विगत दो दशकों में द्रुत आवागमन देखा गया है: (क) देशों के बीच वस्तुओं, सेवाओं और लोगों का (ख) देशों के बीच वस्तुओं, सेवाओं और निवेशों का (ग) देशों के बीच वस्तुओं, निवेशों और लोगों का
(आ) विश्व के देशों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा निवेश का सबसे अधिक सामान्य मार्ग है: (क) नये कारखानों की स्थापना (ख) स्थानीय कंपनियों को खरीद लेना (ग) स्थानीय कंपनियों से साझेदारी करना
(इ) वैश्वीकरण ने जीवन-स्तर के सुधार में सहायता पहुँचाई है: (क) सभी लोगों के (ख) विकसित देशों के लोगों के (ग) विकासशील देशों के श्रमिकों के (घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर देखिए
उत्तर:
- (अ) (ख) वस्तुओं, सेवाओं और निवेशों का। लोगों का आवागमन प्रतिबंधों के कारण ज़्यादा नहीं बढ़ा। (पृष्ठ 62)
- (आ) (ख) स्थानीय कंपनियों को खरीद लेना। (पृष्ठ 58)
- (इ) (घ) उपर्युक्त में से कोई नहीं। लाभ सभी को नहीं मिला; विकासशील देशों के श्रमिकों का रोज़गार तो असुरक्षित हुआ; लाभ मुख्यतः धनी उपभोक्ताओं और कुशल, शिक्षित, धनी उत्पादकों को मिला। (पृष्ठ 69–71)
किताब की गतिविधियाँ
ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर अध्याय समझने में मदद करती हैं।
आओ–इस पर विचार करें (पृष्ठ 57). ‘मेड इन थाइलैण्ड’ लेबल वाले कथन की पूर्ति करके दिखाइए कि वस्त्र उद्योग में उत्पादन-प्रक्रिया विश्व भर में कैसे फैली है (”…कंपनी कोरिया से सूत ले सकती है…”)।
उत्तर देखिए
उत्तर: यहाँ कोई एक तय उत्तर नहीं है; बस हर चरण अलग देश में दिखाना है। एक संभव पूर्ति: कंपनी कोरिया से सूत ले सकती है, किसी दूसरे देश में उसकी बुनाई और रंगाई करा सकती है, बटन और ज़िप किसी तीसरे देश से मँगा सकती है, और अंत में सिलाई थाइलैण्ड में कराकर लेबल लगा सकती है। हर चरण वहाँ होता है जहाँ वह सबसे अच्छा और सस्ता हो, इसलिए एक कपड़े का उत्पादन कई देशों में फैल जाता है।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 59), 1. क्या आप मानते हैं कि फोर्ड मोटर्स एक बहुराष्ट्रीय कंपनी है? क्यों?
उत्तर देखिए
उत्तर: हाँ। यह अमेरिकी कंपनी विश्व के 26 देशों में फैली है और भारत में भी इसका संयंत्र है, यानी यह एक से अधिक देशों में उत्पादन पर नियंत्रण अथवा स्वामित्व रखती है।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 59), 2. विदेशी निवेश क्या है? फोर्ड मोटर्स ने भारत में कितना निवेश किया था?
उत्तर देखिए
उत्तर: बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किया गया निवेश विदेशी निवेश कहलाता है। फोर्ड मोटर्स ने चेन्नई के निकट 1,700 करोड़ रुपए का निवेश किया था।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 59), 3. भारत में संयंत्र लगाकर फोर्ड जैसी कंपनियाँ भारत के विशाल बाज़ार और कम उत्पादन लागत, दोनों का लाभ उठाती हैं। कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: बाज़ार: भारत में ख़रीदार बहुत हैं; वर्ष 2017 तक फोर्ड भारतीय बाज़ारों में 88,000 कारें बेच रही थी। कम लागत: बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ वहाँ उत्पादन करती हैं जहाँ कम लागत पर कुशल और अकुशल श्रम और दूसरे संसाधन मिलें, और पुर्ज़े देने वाले स्थानीय विनिर्माता पास हों। इसीलिए फोर्ड ने भारत में बनी 1,81,000 कारें दक्षिण अफ्रीका, मेक्सिको, ब्राज़ील और संयुक्त राज्य अमेरिका को निर्यात कीं। यानी भारत उसका बाज़ार भी है और सस्ता उत्पादन केन्द्र भी।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 59), 4. कंपनी अपने वैश्विक कारोबार के लिए भारत को कार-पुर्ज़ों के विनिर्माण केन्द्र के रूप में क्यों विकसित करना चाहती है?
- अश्रम और अन्य संसाधनों पर लागत,
- बपुर्ज़े देने वाले स्थानीय विनिर्माता,
- सभारत और चीन के ग्राहकों से निकटता।
उत्तर देखिए
उत्तर: (अ) श्रम और दूसरे संसाधन कम लागत पर मिलें तो पुर्ज़े सस्ते बनते हैं। (ब) कल-पुर्ज़े देने वाले कई स्थानीय विनिर्माता पहले से मौजूद हों तो आपूर्ति पास और सस्ती मिलती है, सब कुछ ख़ुद नहीं बनाना पड़ता। (स) भारत और चीन में ग्राहक बहुत बड़ी संख्या में हैं; उनके पास उत्पादन हो तो माल जल्दी और कम ढुलाई में पहुँचता है। तीनों मिलकर लागत घटाते हैं और लाभ बढ़ाते हैं।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 59), 5. भारत में फोर्ड मोटर्स द्वारा कारों के निर्माण से उत्पादन किस प्रकार परस्पर संबंधित होगा?
उत्तर देखिए
उत्तर: फोर्ड का भारतीय संयंत्र महिन्द्रा एंड महिन्द्रा के सहयोग से बना, और स्थानीय विनिर्माता इसे पुर्ज़े देते हैं। यहाँ बनी कारें दूसरे विकासशील देशों को और कार-पुर्ज़े विश्व भर में फोर्ड के कारखानों को जाते हैं। इस तरह भारत का उत्पादन दूसरे देशों के उत्पादन और बाज़ारों से जुड़ जाता है। (पृष्ठ 59, 61)
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 59), 6. बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, अन्य कंपनियों से किस प्रकार अलग हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: साधारण कंपनी प्रायः एक देश में उत्पादन करती है; बहुराष्ट्रीय कंपनी एक से अधिक देशों में उत्पादन पर नियंत्रण या स्वामित्व रखती है। इनके पास अपार संपदा होती है; कई शीर्ष बहुराष्ट्रीय कंपनियों की संपत्ति विकासशील देशों की सरकारों के पूरे बजट से भी अधिक है। ये दूर के उत्पादकों के लिए मूल्य, गुणवत्ता, आपूर्ति और श्रम-शर्तें तय कर सकती हैं।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 59), 7. लगभग सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अमेरिका, जापान या यूरोप की हैं (जैसे नोकिया, कोका-कोला, पेप्सी, होन्डा, नाइकी)। क्या आप अनुमान कर सकते हैं कि ऐसा क्यों है?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह अनुमान का प्रश्न है। अध्याय के आधार पर: दूसरे देशों में कारखाने लगाने, स्थानीय कंपनियाँ खरीदने और नवीनतम प्रौद्योगिकी लाने के लिए अपार धन चाहिए, जो विकसित देशों की बड़ी कंपनियों के पास है। ये देश पहले विकसित हुए, इसलिए इनकी कंपनियाँ पहले बड़ी हुईं। विश्व व्यापार संगठन भी विकसित देशों की पहल पर बना, जो मुक्त व्यापार और निवेश के नियम बनाता है।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 61), 1. अतीत में देशों को जोड़ने वाला मुख्य माध्यम क्या था? अब यह अलग कैसे है?
उत्तर देखिए
उत्तर: अतीत में मुख्य माध्यम विदेश व्यापार था; ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी कंपनियाँ व्यापार के लिए ही भारत आईं। अब व्यापार के साथ बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कई देशों में फैला उत्पादन और विदेशी निवेश भी देशों को जोड़ते हैं, और विदेश व्यापार का बड़ा हिस्सा बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में है।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 61), 2. विदेश व्यापार और विदेशी निवेश में अंतर स्पष्ट करें।
उत्तर देखिए
उत्तर: विदेश व्यापार: देशों के बीच वस्तुओं की खरीद-बिक्री; इससे उत्पादक को दूसरे देशों के बाज़ार और ख़रीदार को अधिक विकल्प मिलते हैं। विदेशी निवेश: बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा दूसरे देश में भूमि, भवन, मशीन जैसी परिसंपत्तियों में लगाया गया पैसा, इस आशा से कि ये लाभ कमाएँगी।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 61), 3. हाल के वर्षों में चीन भारत से इस्पात आयात कर रहा है। यह आयात (क) चीन की इस्पात कंपनियों, (ख) भारत की इस्पात कंपनियों और (ग) चीन में इस्पात खरीदने वाले दूसरे उद्योगों को कैसे प्रभावित करेगा?
उत्तर देखिए
उत्तर: (क) चीन की इस्पात कंपनियों को अपने ही बाज़ार में भारतीय इस्पात से प्रतिस्पर्धा करनी होगी; उन्हें कीमत घटानी या गुणवत्ता सुधारनी पड़ेगी, वरना बिक्री घटेगी। (ख) भारत की इस्पात कंपनियों को चीन का बड़ा बाज़ार मिलेगा और उनकी बिक्री बढ़ेगी। (ग) चीन के उद्योगों के पास इस्पात खरीदने के अधिक विकल्प होंगे, और वे सस्ता इस्पात चुनकर अपनी लागत घटा सकेंगे। (चीनी खिलौनों वाला उदाहरण उलटी दिशा में देखिए, पृष्ठ 60।)
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 61), 4. चीन के बाज़ारों में भारत से इस्पात का आयात किस प्रकार दोनों देशों के इस्पात-बाज़ार के एकीकरण में सहायता करेगा?
उत्तर देखिए
उत्तर: भारतीय इस्पात चीन के बाज़ार में बिकेगा, तो वहाँ ख़रीदार दोनों देशों के इस्पात में से चुनेंगे, दोनों देशों के उत्पादक आपस में प्रतिस्पर्धा करेंगे, और दोनों बाज़ारों में इस्पात का मूल्य एक समान होने लगेगा। इस तरह दोनों देशों के इस्पात बाज़ार एक-दूसरे से जुड़ जाएँगे।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 62), 1. वैश्वीकरण प्रक्रिया में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की क्या भूमिका है?
उत्तर देखिए
उत्तर: मुख्य भूमिका। ये उत्पादन के लिए सस्ती जगहें खोजकर कई देशों में उत्पादन फैलाती हैं, विदेशी निवेश करती हैं, और विदेश व्यापार का बड़ा हिस्सा इनके नियंत्रण में है। इनसे दूर-दूर के देशों का उत्पादन और बाज़ार जुड़ते हैं।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 62), 2. वे कौन-से विभिन्न तरीके हैं, जिनके द्वारा देशों को परस्पर संबंधित किया जा सकता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: विदेश व्यापार (वस्तुओं और सेवाओं का आदान-प्रदान), विदेशी निवेश (बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दूसरे देशों में उत्पादन), प्रौद्योगिकी का आदान-प्रदान, और लोगों का आवागमन (बेहतर आय, रोज़गार और शिक्षा के लिए; हालाँकि प्रतिबंधों के कारण यह ज़्यादा नहीं बढ़ा)।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 62), 3. सही विकल्प चुनिए: देशों को जोड़ने से वैश्वीकरण के परिणाम होंगे (क) उत्पादकों के बीच कम प्रतिस्पर्धा (ख) उत्पादकों के बीच अधिक प्रतिस्पर्धा (ग) प्रतिस्पर्धा में परिवर्तन नहीं।
उत्तर देखिए
उत्तर: (ख) उत्पादकों के बीच अधिक प्रतिस्पर्धा होगी। जुड़े हुए बाज़ारों में दूर के देशों के उत्पादक भी आपस में प्रतिस्पर्धा करते हैं।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 63), 1. लंदन की पत्रिका वाले उदाहरण में उत्पादन में प्रौद्योगिकी के प्रयोग वाले शब्द रेखांकित कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: इंटरनेट (पाठ भेजना), दूरसंचार सुविधाएँ (डिज़ाइन के निर्देश), कंप्यूटर (डिज़ाइन तैयार करना), वायुमार्ग (पत्रिकाएँ भेजना), और इंटरनेट (ई-बैंकिंग) से भुगतान।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 63), 2. सूचना प्रौद्योगिकी वैश्वीकरण से कैसे जुड़ी हुई है? क्या सूचना प्रौद्योगिकी के प्रसार के बिना वैश्वीकरण संभव होता?
उत्तर देखिए
उत्तर: सूचना प्रौद्योगिकी से विश्व भर में संपर्क करना, सूचनाएँ तुरंत पाना और दूर के क्षेत्रों से संवाद करना आसान हुआ। इससे बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ कई देशों में फैले उत्पादन को चला पाती हैं, और सेवाएँ (कॉल सेंटर, आँकड़ा प्रविष्टि, लेखाकरण, पत्रिका का डिज़ाइन) दूर के देशों को दी जा सकती हैं। इसके बिना वैश्वीकरण, ख़ासकर सेवाओं का, इस गति और पैमाने पर संभव नहीं होता; इसीलिए किताब प्रौद्योगिकी में तीव्र उन्नति को वैश्वीकरण का मुख्य कारक कहती है।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 64), 1. विदेश व्यापार के उदारीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: सरकार द्वारा विदेश व्यापार पर लगे अवरोध या प्रतिबंध, जैसे आयात पर कर और कोटा, हटाना। इससे व्यवसायी मुक्त रूप से तय कर सकते हैं कि क्या आयात या निर्यात करें, और सरकार पहले से कम नियंत्रण करती है।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 64), 2. चीन के खिलौनों के उदाहरण से समझाइए कि व्यापार अवरोधक के रूप में कोटा का प्रयोग कैसे किया जा सकता है। क्या इसका प्रयोग किया जाना चाहिए?
उत्तर देखिए
उत्तर: कैसे: सरकार तय कर सकती है कि एक वर्ष में चीन से केवल एक सीमित संख्या में खिलौने आयात हों। तब बाकी माँग भारतीय खिलौना-निर्माताओं से पूरी होगी और उन्हें सस्ते चीनी खिलौनों से पूरी मार नहीं पड़ेगी। चाहिए या नहीं (चर्चा): पक्ष में: भारतीय निर्माताओं और उनके श्रमिकों को संरक्षण मिलता है; किताब भी कहती है कि ज़रूरी हो तो सरकार व्यापार अवरोधकों का उपयोग कर सकती है। विपक्ष में: ख़रीदारों को सस्ते और नये डिज़ाइन वाले खिलौनों का विकल्प कम मिलेगा, और प्रतिस्पर्धा न हो तो भारतीय निर्माताओं पर गुणवत्ता सुधारने का दबाव भी कम रहेगा। अपना मत कारण के साथ लिखिए। (पृष्ठ 60, 64, 70)
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 66), 1. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें (विश्व व्यापार संगठन वाला अनुच्छेद, छह खाली स्थान)।
उत्तर देखिए
उत्तर: क्रम से: (1) विकसित देशों की पहल पर शुरू हुआ; (2) ध्येय अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को उदार बनाना है; (3) सभी देशों के लिए अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार से संबंधित नियम बनाता है; (4) देखता है कि इन नियमों का पालन हो; (5) व्यवहार में देशों के बीच व्यापार न्यायसंगत (मुक्त) नहीं है; (6) विकासशील देश, जैसे भारत, व्यापार अवरोधकों को हटाने के लिए विवश हुआ है। (पृष्ठ 65)
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 66), 2. आपके विचार से विभिन्न देशों के बीच अधिकाधिक न्यायसंगत व्यापार के लिए क्या किया जा सकता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: विश्व व्यापार संगठन के नियम विकसित और विकासशील, सब देशों पर बराबर लागू हों; विकसित देश भी अपने अवरोधक घटाएँ और अपने उत्पादकों को ऐसी भारी सहायता न दें जिससे उनकी सस्ती उपज दूसरे देशों के किसानों को नुकसान पहुँचाए; विकासशील देश मिलकर न्यायसंगत नियमों के लिए समझौते करें; और जनता के अभियान ऐसे निर्णयों पर दबाव बनाएँ। (पृष्ठ 65, 70)
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 66), 3. सरकार कभी-कभी कुछ वस्तुओं, जैसे पर्यावरण के अनुकूल वस्तुओं, के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सहायता देती है। यह न्यायसंगत है या नहीं, चर्चा कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह चर्चा का प्रश्न है। न्यायसंगत मानने का तर्क: पर्यावरण की रक्षा से सबका भला होता है, और नई अच्छी वस्तुओं के उत्पादकों को शुरुआत में सहारा चाहिए। अन्यायपूर्ण मानने का तर्क: अगर सहायता इतनी बड़ी हो कि वे वस्तुएँ दूसरे देशों में बहुत सस्ते में बिककर वहाँ के उत्पादकों को नुकसान पहुँचाएँ, तो यह अमेरिकी कृषि सहायता जैसा ही अनुचित असर होगा। संतुलित मत: सहायता तब न्यायसंगत है जब उसका उद्देश्य सचमुच पर्यावरण हो और वह दूसरे देशों के उत्पादकों के विरुद्ध छिपा अवरोधक न बने।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 67), 1. प्रतिस्पर्धा से भारत के लोगों को कैसे लाभ हुआ है?
उत्तर देखिए
उत्तर: उपभोक्ताओं, ख़ासकर शहरों के धनी वर्ग को अधिक विकल्प, उत्कृष्ट गुणवत्ता और कम कीमत मिली, और उनका जीवन स्तर ऊँचा हुआ। शीर्ष भारतीय कंपनियों ने नवीनतम प्रौद्योगिकी अपनाकर अपने मानक ऊँचे किए। बहुराष्ट्रीय कंपनियों वाले उद्योगों में नये रोज़गार बने और स्थानीय आपूर्तिकर्ता समृद्ध हुए। (पृष्ठ 66–67)
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 67), 2. क्या और भारतीय कंपनियों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के रूप में उभरना चाहिए? इससे देश की जनता को क्या लाभ होगा?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह राय का प्रश्न है। एक तर्क: हाँ, क्योंकि बहुराष्ट्रीय बनने वाली कंपनियाँ (जैसे टाटा मोटर्स, इंफोसिस) नवीनतम प्रौद्योगिकी और ऊँचे मानक अपनाती हैं, भारतीय वस्तुएँ और सेवाएँ विश्व के बाज़ारों तक पहुँचाती हैं, और इनके बढ़ने से देश में भी काम के अवसर बन सकते हैं। पर जनता को सच्चा लाभ तभी होगा जब इस बढ़त का हिस्सा श्रमिकों और छोटे उत्पादकों तक भी पहुँचे, यानी वैश्वीकरण न्यायसंगत हो।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 67), 3. सरकारें अधिक विदेशी निवेश आकर्षित करने का प्रयास क्यों करती हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: विदेशी निवेश से नये उद्योग लगते हैं, नये रोज़गार बनते हैं, और उन्हें कच्चा माल देने वाली स्थानीय कंपनियाँ समृद्ध होती हैं। साझेदारी में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अतिरिक्त निवेश के लिए धन और उत्पादन की नवीनतम प्रौद्योगिकी भी लाती हैं। इसीलिए सरकारें विशेष आर्थिक क्षेत्र, कर से छूट और श्रम कानूनों में लचीलापन जैसे कदम उठाती हैं। (पृष्ठ 57, 66–67)
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 67), 4. भारत के कुछ लोगों ने विशेष आर्थिक क्षेत्रों (सेज़) की स्थापना का विरोध किया है। पता कीजिए, ये लोग कौन हैं और ये इसका विरोध क्यों कर रहे हैं।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह आपको पता करना है। अध्याय की बातों से दो संकेत मिलते हैं: (1) सेज़ के लिए बड़े औद्योगिक क्षेत्र बनाए जाते हैं; जिन लोगों की ज़मीन या रोज़ी ऐसे क्षेत्रों में आती है, उनके लिए यह “विकास” नुकसान बन सकता है (अध्याय 1 की बात: एक का विकास दूसरे के लिए विध्वंसक हो सकता है)। (2) विदेशी निवेश के लिए श्रम कानूनों में लचीलापन दिया गया है, जिससे श्रमिकों का रोज़गार सुनिश्चित नहीं रहता, इसलिए श्रमिक भी चिंतित हो सकते हैं। अपने ज़िले या राज्य में कोई सेज़ हो तो अख़बार, शिक्षक या बड़ों से पता कीजिए कि वहाँ किसने विरोध किया और क्यों।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 68), 1. रवि की लघु उत्पादन इकाई बढ़ती प्रतिस्पर्धा से किस प्रकार प्रभावित हुई?
उत्तर देखिए
उत्तर: सन् 2001 में संधारित्रों के आयात से प्रतिबंध हटे। उसके ग्राहक, टेलीविज़न कंपनियाँ, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए संयोजन-कार्य करने लगीं और आधी कीमत वाले आयातित संधारित्र खरीदने लगीं। रवि का उत्पादन वर्ष 2000 के आधे से भी कम रह गया और श्रमिक 20 से घटकर सात रह गए। उसके कई दोस्तों की इकाइयाँ बंद हो गईं।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 68), 2. दूसरे देशों के उत्पादकों की तुलना में उत्पादन लागत अधिक होने के कारण क्या रवि जैसे उत्पादकों को उत्पादन रोक देना चाहिए? आप क्या सोचते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह राय का प्रश्न है; एक तर्कपूर्ण उत्तर: नहीं। लघु और मध्यम उद्योगों में कृषि के बाद सबसे अधिक श्रमिक (11 करोड़) काम करते हैं; इकाइयाँ बंद होंगी तो बहुत लोग बेरोज़गार होंगे। किताब कहती है कि सरकार छोटे उत्पादकों की तब तक मदद कर सकती है जब तक वे प्रतिस्पर्धा के लिए सक्षम न हो जाएँ। बेहतर सुविधाएँ, नई प्रौद्योगिकी और समय पर सस्ता ऋण मिले, तो रवि जैसे उत्पादक अपनी लागत घटाकर टिक सकते हैं। (पृष्ठ 68, 70)
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 68), 3. अध्ययनों के अनुसार लघु उत्पादकों को बेहतर प्रतिस्पर्धा के लिए तीन चीज़ें चाहिए:
- अबेहतर सड़कें, बिजली, पानी, कच्चा माल, विपणन और सूचना तंत्र,
- बप्रौद्योगिकी में सुधार और आधुनिकीकरण,
- सउचित ब्याज दर पर समय पर साख। इन पर चार प्रश्न।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- ये कैसे मदद करेंगी: (अ) अच्छी सड़कें, बिजली, पानी और कच्चा माल मिलने से उत्पादन और ढुलाई की लागत घटेगी, और विपणन व सूचना तंत्र से माल सही बाज़ार तक पहुँचेगा। (ब) नई प्रौद्योगिकी से गुणवत्ता सुधरेगी और प्रति इकाई लागत घटेगी। (स) उचित ब्याज पर समय से ऋण मिले तो मशीनें और कच्चा माल ख़रीदना आसान होगा।
- क्या बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ इनमें निवेश करेंगी: शायद नहीं। वे वहाँ निवेश करती हैं जहाँ उन्हें लाभ हो, जैसे शहरी इलाकों के सेलफोन, मोटर गाड़ी, ठंडे पेय और बैंकिंग जैसे क्षेत्र, जिनके ख़रीदार संपन्न हैं। छोटे उत्पादकों के लिए सड़क-बिजली बनाना उनका काम नहीं, और छोटे उत्पादक अक्सर उनके प्रतिस्पर्धी भी होते हैं।
- क्या सरकार की भूमिका है: हाँ। सड़कें, बिजली, पानी जैसी सुविधाएँ सबके लिए होती हैं और इन्हें सरकार ही अच्छी तरह दे सकती है। किताब कहती है कि सरकार की नीतियाँ सभी लोगों के हितों की रक्षा करें और वह छोटे उत्पादकों की तब तक मदद करे जब तक वे सक्षम न हो जाएँ।
- एक उपाय (सुझाव): छोटे उद्योगों वाले शहरों में ऐसे औद्योगिक क्षेत्र बनें जहाँ छोटे उत्पादकों को बिजली, पानी और सड़क मिलें; बैंक उन्हें उचित ब्याज पर समय से ऋण दें; और नई मशीनों के उपयोग का प्रशिक्षण दिया जाए। (पृष्ठ 66, 68, 70)
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 70), 1. वस्त्र उद्योग के श्रमिकों, भारतीय निर्यातकों और विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धा ने किस प्रकार प्रभावित किया है?
उत्तर देखिए
उत्तर: विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ: सबसे सस्ता माल पाकर अधिक लाभ कमा रही हैं। भारतीय निर्यातक: बड़े ऑर्डर पाने के लिए लागत घटाने की कड़ी कोशिश करते हैं; कच्चे माल की लागत नहीं घटती, इसलिए श्रम-लागत घटाते हैं। श्रमिक: स्थायी के बजाय अस्थायी रोज़गार, बहुत लंबे कार्य-घंटे, रात में काम, कम मज़दूरी, और लाभ में न्यायसंगत हिस्सा नहीं। (पृष्ठ 69)
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 70), 2. वैश्वीकरण से मिले लाभों में श्रमिकों को न्यायसंगत हिस्सा मिल सके, इसके लिए (क) सरकार, (ख) निर्यातक फैक्ट्रियों के नियोक्ता, (ग) बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और (घ) श्रमिक क्या कर सकते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: (क) सरकार: श्रमिक कानूनों का उचित कार्यान्वयन कराए और श्रमिकों को उनके अधिकार दिलाए (किताब, पृष्ठ 70)। (ख) निर्यातक फैक्ट्रियों के नियोक्ता: लागत घटाने का सारा बोझ मज़दूरी पर न डालें; जहाँ हो सके स्थायी रोज़गार, उचित मज़दूरी और अतिरिक्त समय के काम का पूरा भुगतान दें। (ग) बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ: निर्यातकों को ऐसी कीमत दें जिसमें उचित मज़दूरी संभव हो, और देखें कि उनका माल बनाने वाली फैक्ट्रियाँ श्रम कानूनों का पालन करें। (घ) श्रमिक: अपने अधिकार जानें और संगठित होकर आवाज़ उठाएँ; किताब बताती है कि जनसंगठन बड़े निर्णयों को भी प्रभावित कर सकते हैं (पृष्ठ 70)।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 70), 3. भारत में बहस है कि क्या कंपनियों को रोज़गार नीतियों में लचीलापन अपनाना चाहिए। इस अध्याय के आधार पर नियोक्ताओं और श्रमिकों के पक्ष संक्षेप में लिखिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: नियोक्ताओं का पक्ष: प्रतिस्पर्धा बहुत है और विदेशी ख़रीदार सबसे सस्ता माल चाहते हैं; कच्चे माल की लागत नहीं घटती, इसलिए श्रम लागत घटानी पड़ती है। काम का दबाव हो तभी श्रमिक रखने से लागत कम रहती है, और विदेशी निवेश आकर्षित होता है; विदेशी कंपनियाँ और अधिक लचीलापन माँगती हैं। श्रमिकों का पक्ष: लचीलेपन का मतलब है कि रोज़गार सुनिश्चित नहीं रहता। सुशीला जैसे श्रमिकों से स्वास्थ्य बीमा, भविष्य निधि और दुगुनी ओवरटाइम मज़दूरी छिन गई; कमाई आधी से भी कम हुई और काम के घंटे लंबे हो गए। वैश्वीकरण के लाभ में उन्हें न्यायसंगत हिस्सा नहीं मिला। (पृष्ठ 67, 69–70)
अतिरिक्त परियोजना/कार्यकलाप (पृष्ठ 73)
- ब्रांड जाँच: रोज़ इस्तेमाल होने वाले कुछ ब्रांडेड उत्पाद लीजिए (साबुन, टूथपेस्ट, कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएँ आदि)। पैकेट या लेबल पर बनाने वाली कंपनी का नाम देखिए और पता कीजिए कि उनमें से कौन-कौन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बनाए हैं। एक सूची बनाइए: उत्पाद, कंपनी, बहुराष्ट्रीय है या नहीं।
- एक उद्योग का अध्ययन: अपनी पसंद का कोई भारतीय उद्योग या सेवा चुनिए। लोगों से बातचीत, अख़बार और पत्रिकाओं की कतरनें, किताबें, दूरदर्शन और इंटरनेट से जानकारी और फोटो जुटाइए। इन बिंदुओं पर लिखिए: (क) उद्योग के विभिन्न उत्पादक या कंपनियाँ; (ख) क्या उत्पाद दूसरे देशों को निर्यात होता है; (ग) क्या उत्पादकों में बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हैं; (घ) उद्योग में प्रतिस्पर्धा; (ङ) काम की परिस्थितियाँ; (च) बीते पंद्रह वर्षों में कोई बड़ा बदलाव; (छ) उद्योग में काम करने वाले लोगों की समस्याएँ।
ये परियोजनाएँ आपको अपने आसपास से करनी हैं; इनके नतीजे हर जगह अलग होंगे।
झटपट दोहराइए
1. बहुराष्ट्रीय कंपनी किसे कहते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: जो कंपनी एक से अधिक देशों में उत्पादन पर नियंत्रण अथवा स्वामित्व रखती है। (पृष्ठ 56)
2. विदेशी निवेश क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किया गया निवेश। (पृष्ठ 57)
3. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के निवेश का सबसे आम रास्ता क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: स्थानीय कंपनियों को खरीदना और फिर उत्पादन फैलाना; जैसे कारगिल ने परख फूड्स को खरीदा। (पृष्ठ 58)
4. फोर्ड मोटर्स भारत कब आई और उसने कितना निवेश किया?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1995 में; चेन्नई के निकट 1,700 करोड़ रुपए। (पृष्ठ 59)
5. वैश्वीकरण की प्रक्रिया को तेज़ करने वाला मुख्य कारक कौन-सा है?
उत्तर देखिए
उत्तर: प्रौद्योगिकी में तीव्र उन्नति। (पृष्ठ 62)
6. कोटा क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: आयात होने वाली वस्तुओं की संख्या पर सरकार की लगाई सीमा; यह एक व्यापार अवरोधक है। (पृष्ठ 64)
7. भारत में नीतियों में दूरगामी परिवर्तन कब से हुए?
उत्तर देखिए
उत्तर: करीब सन् 1991 के प्रारंभ से। (पृष्ठ 64)
8. विश्व व्यापार संगठन का ध्येय क्या है, और इसके कितने सदस्य हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को उदार बनाना; किताब के अनुसार लगभग 160 देश सदस्य हैं। (पृष्ठ 65)
9. विशेष आर्थिक क्षेत्र में कंपनियों को कितने वर्ष कर नहीं देना पड़ता?
उत्तर देखिए
उत्तर: आरंभिक पाँच वर्षों तक। (पृष्ठ 67)
10. रवि क्या बनाता था, और कहाँ?
उत्तर देखिए
उत्तर: संधारित्र; तमिलनाडु के होसुर में। (पृष्ठ 68)
11. लघु और मध्यम उद्योगों में कितने श्रमिक काम करते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: 11 करोड़; कृषि के बाद सबसे अधिक। (पृष्ठ 68)
12. न्यायसंगत वैश्वीकरण क्या करेगा?
उत्तर देखिए
उत्तर: सभी के लिए अवसर देगा और वैश्वीकरण के लाभों में सबकी बेहतर हिस्सेदारी सुनिश्चित करेगा। (पृष्ठ 70)