यह पन्ना परीक्षा से पहले दोहराने के लिए है। हर हिस्से की शुरुआत में किताब के पृष्ठ लिखे हैं, ताकि शक हो तो वहीं खोलकर देख लीजिए। पृष्ठ संख्याएँ 2026-27 में छपी किताब की हैं। आँकड़े किताब के हैं।
तारों का मतलब: ★★किताब की प्रश्नावली (प्रश्न 1–13) में सीधे पूछा गया · ★उन उत्तरों में काम आता है · बिना तारे के: पृष्ठभूमि या किताब की गतिविधि।
1. अध्याय एक नज़र में
अध्याय के पहले पन्ने पर अख़बार की कतरनें हैं, जो उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के फ़ैसलों के कुछ समाचारों के नमूने हैं (पृष्ठ 75)। किताब पूछती है: जब किसी को लगे कि उसके साथ गलत हुआ है, तो विक्रेता से ठीक व्यवहार पाने के लिए वह अपने उपभोक्ता अधिकार का प्रयोग कैसे करे? पूरा अध्याय इसी का जवाब है।
अध्याय की कहानी
- चयन (चुनने) का अधिकार
- सूचना का अधिकार
- निवारण का अधिकार
- प्रतिनिधित्व का अधिकार
- सुरक्षा का अधिकार
- उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार
अध्याय की तीन बड़ी बातें:
- अकेला उपभोक्ता कमज़ोर पड़ता है: विक्रेता कम तौलते हैं, बिना बताए शुल्क जोड़ते हैं, मिलावटी या दोषपूर्ण माल बेचते हैं, और बड़ी कंपनियाँ झूठी सूचना फैलाती हैं। इसलिए बाज़ार में भी नियम और विनियम चाहिए।
- आंदोलन से कानून बना: उपभोक्ताओं के असंतोष से उपभोक्ता आंदोलन खड़ा हुआ। उसके दबाव में 1986 में उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम (कोपरा) बना, जिसका 2019 में संशोधन हुआ।
- अधिकार हैं, पर जागरूकता धीमी है: कोपरा उपभोक्ता को छह अधिकार देता है और शिकायत के लिए ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर आयोग बनाता है। फिर भी उपभोक्ता ज्ञान बहुत धीरे फैल रहा है, इसलिए उपभोक्ताओं की सक्रिय भागीदारी ज़रूरी है।
2. ज़रूरी शब्द★
| शब्द | मतलब (हमारे शब्दों में) | पृष्ठ |
|---|---|---|
| उपभोक्ता | जो अपनी ज़रूरत के लिए बाज़ार से वस्तुएँ या सेवाएँ खरीदता है | 76 |
| अनुचित व्यापार | कम तौलना, पहले न बताए गए शुल्क जोड़ना, मिलावटी या दोषपूर्ण वस्तुएँ बेचना जैसे तरीके | 76 |
| उपभोक्ता आंदोलन | उपभोक्ताओं के हितों को अनुचित व्यवसाय से बचाने के लिए ‘सामाजिक बल’ के रूप में खड़ा हुआ संघर्ष | 77 |
| उपभोक्ता इंटरनेशनल | उपभोक्ता कल्याण संगठनों की अंतर्राष्ट्रीय संस्था; 100 से अधिक देशों की 200 संस्थाओं की संरक्षक संस्था | 78 |
| कोपरा (COPRA) | उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986; 2019 में इसका संशोधन हुआ | 78 |
| सुरक्षा का अधिकार | जीवन और संपत्ति के लिए खतरनाक वस्तुओं और सेवाओं से सुरक्षित रहने का अधिकार | 79 |
| सूचना पाने का अधिकार | खरीदी जाने वाली वस्तु या सेवा के बारे में जानकारी पाने का अधिकार | 80 |
| अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) | पैकेट पर छपा मूल्य; इससे अधिक लेने पर कोई भी शिकायत कर सकता है, इससे कम पर मोल-भाव हो सकता है | 80 |
| RTI (सूचना पाने का अधिकार कानून) | सन् 2005 के अक्टूबर में लागू कानून; नागरिक सरकारी विभागों के कामकाज की सूचना माँग सकते हैं | 80 |
| चुनने का अधिकार | कोई वस्तु या सेवा लेते समय चुनाव की आज़ादी; किसी के साथ ज़बरदस्ती दूसरी चीज़ नहीं थोपी जा सकती | 81 |
| क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार | अनुचित सौदेबाज़ी और शोषण से हुई क्षति की मात्रा के आधार पर क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार | 82 |
| क्लास एक्शन सूट | उपभोक्ताओं का एक समूह के रूप में शिकायत दर्ज करना | 82 |
| उपभोक्ता संरक्षण परिषद् | उपभोक्ता आंदोलन से बने स्वयंसेवी संगठन; मुकदमा दर्ज करने में मार्गदर्शन करते हैं और आयोग में उपभोक्ता का प्रतिनिधित्व भी करते हैं | 84 |
| उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग | कोपरा के अंतर्गत ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर बने आयोग, जो उपभोक्ता विवाद निपटाते हैं | 84 |
| प्रतिनिधित्व का अधिकार | कोपरा उपभोक्ता को उपभोक्ता न्यायालय में यह अधिकार देकर समर्थ बनाता है | 84 |
| निवासी कल्याण संघ | आवासीय कॉलोनी की संस्था, जो सदस्यों के साथ हुई अनुचित व्यावसायिक कार्रवाई का मामला देखती है | 84 |
| शब्दचिह्न (लोगो) | आई.एस.आई., एगमार्क, हॉलमार्क जैसे चिह्न, जो अच्छी गुणवत्ता का भरोसा दिलाते हैं | 85 |
| मानकीकरण | वस्तुओं के लिए गुणवत्ता के मानदंड तय करना, ताकि गुणवत्ता पक्की हो | 85–86 |
| उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार | जागरूक उपभोक्ता बनने के लिए ज़रूरी ज्ञान और निपुणता पाने का अधिकार | 84–86 |
| राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस | 24 दिसंबर; 1986 में इसी दिन संसद ने अधिनियम पारित किया था | 86 |
| फूड फोर्टिफिकेशन | खाद्य पदार्थ में मुख्य पोषक तत्वों को मिलाना | 87 |
3. बाज़ार में उपभोक्ता: नियम क्यों चाहिए★★
पृष्ठ 76–77 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 1, 4
“बाज़ार में हमारी भागीदारी उत्पादक और उपभोक्ता दोनों रूपों में होती है।” उपभोक्ता बाज़ार में तब आता है, जब वह अपनी ज़रूरत की वस्तुएँ या सेवाएँ खरीदता है।
नियम दूसरी जगहों पर भी चाहिए: पिछले अध्यायों में आपने पढ़ा कि साहूकार कर्ज़दार को तरह-तरह से बाँधते हैं और स्वप्ना जैसी महिला को कर्ज़ चुकाने के लिए ज़मीन बेचने पर मजबूर कर सकते हैं (अध्याय 3)। असंगठित क्षेत्र के मज़दूर कम वेतन और खराब हालात में काम करते हैं। पर्यावरण की सुरक्षा के लिए भी नियम चाहिए। ठीक इसी तरह:
“बाज़ार में भी उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए नियम एवं विनियमों की आवश्यकता होती है, क्योंकि अकेला उपभोक्ता प्राय: स्वयं को कमजोर स्थिति में पाता है।”
शिकायत होने पर विक्रेता सारी ज़िम्मेदारी खरीदने वाले पर डालने की कोशिश करता है। उसका आम जवाब होता है: “आपने जो खरीदा है अगर वह पसंद नहीं है तो कहीं और जाइए।” मानो बिक्री के बाद उसकी कोई ज़िम्मेदारी ही नहीं रही। उपभोक्ता आंदोलन इसी हालत को बदलने का प्रयास है।
बाज़ार में शोषण कैसे होता है
- उचित वज़न से कम तौलना
- पहले न बताए गए शुल्क जोड़ देना
- मिलावटी या दोषपूर्ण वस्तुएँ बेचना
- मीडिया और दूसरे स्रोतों से गलत सूचना
- झूठे दावे, जैसे शिशुओं का दूध पाउडर
बाज़ार कब ठीक से काम नहीं करता: जब उत्पादक थोड़े और शक्तिशाली हों, और उपभोक्ता कम मात्रा में खरीदते हों और बिखरे हुए हों। ख़ासकर तब, जब उत्पादन बड़ी कंपनियाँ कर रही हों: अधिक पूँजी वाली, शक्तिशाली कंपनियाँ चालाकी से बाज़ार को प्रभावित कर सकती हैं और उपभोक्ताओं को लुभाने के लिए समय-समय पर गलत सूचना देती हैं।
किताब के दो उदाहरण:
| कंपनी | क्या हुआ |
|---|---|
| शिशुओं के दूध का पाउडर | एक कंपनी ने इसे माँ के दूध से बेहतर, सबसे वैज्ञानिक उत्पाद बताकर कई वर्षों तक पूरे विश्व में बेचा। कई वर्षों के लगातार संघर्ष के बाद कंपनी को मानना पड़ा कि वह झूठे दावे कर रही थी। |
| सिगरेट | सिगरेट बनाने वाली कंपनियों से यह मनवाने के लिए कि उनका उत्पाद कैंसर का कारण हो सकता है, न्यायालय में लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। |
किताब का कार्टून (पृष्ठ 76) एक और रूप दिखाता है: लड़के को लगता है कि उसका सामान जानबूझकर ऐसा बनाया गया कि कुछ महीनों में बेकार हो जाए और उसे नया खरीदना पड़े।
किताब का निष्कर्ष: “अत: उपभोक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नियम और विनियमों की आवश्यकता है।”
4. उपभोक्ता आंदोलन: शुरुआत और बढ़त★★
पृष्ठ 77–78 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 2, 5, 11
शुरुआत क्यों हुई: विक्रेता कई अनुचित व्यावसायिक व्यवहारों में शामिल थे, इसलिए उपभोक्ताओं में असंतोष था। “बाज़ार में उपभोक्ता को शोषण से बचाने के लिए कोई कानूनी व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी।” लंबे समय तक असंतुष्ट उपभोक्ता बस उस ब्रांड या दुकान से खरीदना बंद कर देता था। माना जाता था कि सावधानी बरतना खरीदने वाले की ज़िम्मेदारी है। आंदोलन ने वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता की ज़िम्मेदारी विक्रेताओं पर भी डाल दी।
भारत में उपभोक्ता आंदोलन का जन्म एक ‘सामाजिक बल’ के रूप में हुआ, ताकि उपभोक्ता के हितों को अनैतिक और अनुचित व्यवसाय से बचाया जा सके।
उपभोक्ता आंदोलन: समय के क्रम में
1960 के दशक का कारण, किताब के शब्दों में: “अत्यधिक खाद्य कमी, जमाखोरी, कालाबाजारी, खाद्य पदार्थों एवं खाद्य तेल में मिलावट की वजह से 1960 के दशक में व्यवस्थित रूप में उपभोक्ता आंदोलन का उदय हुआ।”
बढ़त: हाल में भारत में उपभोक्ता दलों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। इन सब प्रयासों से आंदोलन व्यावसायिक कंपनियों और सरकार, दोनों पर दबाव डालने में सफल हुआ कि वे उपभोक्ता हितों के ख़िलाफ़ और अनुचित व्यवसाय शैली को बदलें। नतीजा: 1986 में भारत सरकार ने एक बड़ा कदम उठाया और उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986 बना, जो COPRA (कोपरा) के नाम से प्रसिद्ध है। इस अधिनियम का संशोधन 2019 में हुआ। (पृष्ठ 86 पर इसे उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम भी कहा गया है।)
उपभोक्ता इंटरनेशनल (पृष्ठ 78 का बॉक्स): 1985 में संयुक्त राष्ट्र ने उपभोक्ता सुरक्षा के लिए दिशा–निर्देश अपनाए। ये राष्ट्रों के लिए और ‘उपभोक्ता की वकालत करने वाले समूह’ के लिए एक हथियार थे, ताकि वे अपनी सरकारों पर उपभोक्ता सुरक्षा के लिए दबाव डाल सकें। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर यही उपभोक्ता आंदोलन का आधार बना। आज उपभोक्ता इंटरनेशनल 100 से भी अधिक देशों की 200 संस्थाओं की संरक्षक संस्था है।
5. सुरक्षा का अधिकार★★
पृष्ठ 79 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 9, 12
किताब का उदाहरण: “रेजी का कष्ट”
| क्या | ब्योरा |
|---|---|
| कौन | रेजी मेथ्यू, कक्षा 9 का एक स्वस्थ लड़का |
| कहाँ | केरल का एक निजी चिकित्सालय, जहाँ वह टॉन्सिल निकलवाने के लिए भर्ती हुआ |
| क्या गलत हुआ | ई.एन.टी. सर्जन ने सामान्य बेहोशी की दवा देकर ऑपरेशन किया। अनुचित बेहोशी से रेजी में दिमागी असामान्यता के लक्षण आ गए और वह जीवन भर के लिए अपंग हो गया। |
| दावा | पिता ने सेवा में चिकित्सा की गलती और लापरवाही के लिए राज्य आयोग में 5,00,000 रुपये के मुआवज़े का दावा किया। |
| राज्य आयोग | यह कहकर मामला खारिज किया कि सबूत पर्याप्त नहीं है। |
| राष्ट्रीय आयोग (दिल्ली) | पिता ने यहाँ अपील की। जाँच के बाद आयोग ने अस्पताल को चिकित्सा में लापरवाही का दोषी पाया और हर्जाना देने का निर्देश दिया। |
किताब के इस बॉक्स में इन्हें “राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण समिति” और राष्ट्रीय समिति लिखा है; अध्याय में आगे यही आयोग कहलाते हैं (पृष्ठ 81, 84)।
अधिकार क्या है: कई वस्तुएँ और सेवाएँ जीवन और संपत्ति के लिए खतरनाक हो सकती हैं। उपभोक्ता को इनसे सुरक्षित रहने का अधिकार है, और उत्पादकों के लिए सुरक्षा नियमों और विनियमों का पालन ज़रूरी है।
किताब का उदाहरण: प्रेशर कूकर का सेफ्टी वॉल्व खराब हो तो भयंकर दुर्घटना हो सकती है, इसलिए उसके निर्माता को इसकी उच्च गुणवत्ता पक्की करनी चाहिए।
फिर भी: नियम होने पर भी बाज़ार में निम्न गुणवत्ता वाले उत्पाद मिलते हैं, क्योंकि “इन नियमों का पर्यवेक्षण उचित रूप से नहीं हो रहा है और उपभोक्ता आंदोलन भी बहुत ज्यादा मजबूत नहीं है।”
6. सूचना का अधिकार, MRP और RTI★★
पृष्ठ 80 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 9, 12
पैकेट पर क्या लिखा होता है: वस्तु के अवयव, मूल्य, बैच संख्या, निर्माण की तारीख, खराब होने की अंतिम तिथि और बनाने वाले का पता। दवा पर ‘उचित प्रयोग के बारे में निर्देश’ और उसके दूसरे प्रभावों और खतरों की जानकारी होती है; कपड़ों पर ‘धुलाई संबंधी निर्देश’।
ये नियम क्यों: क्योंकि उपभोक्ता जो वस्तुएँ और सेवाएँ खरीदता है, उनके बारे में उसे सूचना पाने का अधिकार है। जानकारी हो तो वह खराबी पर शिकायत कर सकता है, मुआवज़ा या वस्तु बदलने की माँग कर सकता है।
| हालत | उपभोक्ता क्या कर सकता है |
|---|---|
| वस्तु अंतिम तिथि से पहले ही खराब हो गई | उसे बदलने के लिए कह सकता है |
| अंतिम तिथि छपी ही नहीं | विनिर्माता दुकानदार पर आरोप लगा देगा और ज़िम्मेदारी नहीं मानेगा, इसीलिए तिथि छपना ज़रूरी है |
| अंतिम तिथि निकल चुकी दवाएँ बेची गईं | बेचने वालों के ख़िलाफ़ कार्यवाही हो सकती है |
| छपे मूल्य से अधिक लिया गया | कोई भी विरोध और शिकायत कर सकता है; यह छपा मूल्य अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) है |
ध्यान रखिए: “वस्तुत: उपभोक्ता, विक्रेता से अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) से कम दाम पर वस्तु देने के लिए मोल–भाव कर सकते हैं।”
RTI: सरकार की दी हुई सेवाओं को उपयोगी बनाने के लिए सूचना पाने के अधिकार को बढ़ाया गया है। “सन् 2005 के अक्टूबर में” भारत सरकार ने RTI (राइट टू इनफॉरमेशन) या सूचना पाने का अधिकार कानून लागू किया। यह नागरिकों को सरकारी विभागों के कामकाज की सभी सूचनाएँ पाने का अधिकार पक्का करता है।
किताब का उदाहरण: “इंतज़ार …” इंजीनियरिंग स्नातक अमृता ने एक सरकारी विभाग में नौकरी के लिए सारे प्रमाणपत्र जमा किए और इंटरव्यू दिया, पर कोई रिज़ल्ट नहीं मिला। कर्मचारियों ने भी उसके सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया। तब उसने इस एक्ट के तहत प्रार्थना-पत्र दिया कि उचित समय में परिणाम जानना उसका अधिकार है, ताकि वह अपने भविष्य की योजना बना सके। उसे देरी के कारण बताए गए और नियुक्ति के लिए बुलावे का पत्र भी मिला, क्योंकि उसने इंटरव्यू अच्छा दिया था।
7. चुनने का अधिकार★★
पृष्ठ 81 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 9
किताब का उदाहरण: “पैसे लौटाए गए” (किताब का शीर्षक: चयन के अधिकार का उल्लंघन)
| क्या | ब्योरा |
|---|---|
| कौन | अंसारी नगर की छात्रा अबिरामी |
| क्या हुआ | दिल्ली में व्यावसायिक पाठ्यक्रम के लिए एक कोचिंग संस्थान के दो वर्षीय पाठ्यक्रम में नामांकन कराया और पूरे दो वर्ष के लिए “करीब 61,020 रुपये” जमा किए। पढ़ाई का स्तर ठीक न लगने पर साल के अंत में पाठ्यक्रम छोड़ने का निश्चय किया। एक साल का पैसा माँगा तो मना कर दिया गया। |
| ज़िला आयोग | संस्थान को 28,000 रुपये लौटाने का आदेश दिया, यह कहते हुए कि छात्रा को चुनने का अधिकार है। |
| राज्य आयोग | संस्थान ने अपील की। राज्य आयोग ने ज़िला आयोग का आदेश बनाए रखा, बेकार की अपील के लिए संस्थान पर 25,000 का दंड लगाया, और छात्रा को मुआवज़े और याचिका खर्च के रूप में “7,000 रूपये” देने को कहा। |
| आगे के लिए | राज्य आयोग ने सभी शिक्षा संस्थानों और व्यावसायिक संस्थाओं को विद्यार्थियों से पूरे साल की फ़ीस एडवांस में लेने से मना किया; आदेश का उल्लंघन करने पर दंड शुल्क और जेल भी हो सकती है। |
अधिकार क्या है: कोई भी उपभोक्ता, किसी भी आयु या लिंग का, कोई भी सेवा ले रहा हो, उसे हमेशा चुनने का अधिकार होगा।
किताब के रोज़ के उदाहरण:
- दुकानदार कहे कि दंतमंजन तभी मिलेगा जब साथ में ब्रश भी खरीदेंगे, और आप ब्रश नहीं लेना चाहते, तो आपके चुनने के अधिकार का उल्लंघन हुआ।
- नया गैस कनेक्शन लेते समय डीलर साथ में चूल्हा लेने का दबाव डालता है।
ऐसे में हमें वह खरीदना पड़ता है जिसे खरीदने की हमारी इच्छा नहीं होती, और चुनाव का कोई विकल्प नहीं बचता।
8. क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार: शिकायत कैसे करें★★
पृष्ठ 82–83 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 9, 13
उपभोक्ताओं को अनुचित सौदेबाज़ी और शोषण के विरुद्ध क्षतिपूर्ति निवारण का अधिकार है: “यदि एक उपभोक्ता को कोई क्षति पहुँचाई जाती है, तो क्षति की मात्रा के आधार पर उसे क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार होता है।” इसके लिए एक आसान और प्रभावी जन-प्रणाली की ज़रूरत है।
उपभोक्ता उपयुक्त उपभोक्ता केन्द्र के सामने अपनी शिकायत ख़ुद दर्ज करा सकता है, वकील के साथ भी और वकील के बिना भी।
किताब का उदाहरण: श्री प्रकाश का मनीऑर्डर। प्रकाश ने बेटी की शादी के लिए अपने गाँव मनीऑर्डर भेजा। बेटी को ज़रूरत के समय पैसे नहीं मिले, महीनों बाद भी नहीं। प्रकाश ने नयी दिल्ली के एक ज़िला स्तर के उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में मुकदमा दर्ज किया। किताब के चित्रों में उनके कदम:
प्रकाश ने न्याय कैसे माँगा
आज शिकायत कैसे: आजकल उपभोक्ता एक व्यक्ति के रूप में या एक समूह के रूप में (जिसे क्लास एक्शन सूट कहते हैं), ख़ुद जाकर या इंटरनेट से शिकायत दर्ज करा सकते हैं, और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से अपने मुकदमों की कार्यवाही करा सकते हैं।
9. प्रतिनिधित्व का अधिकार और त्रिस्तरीय आयोग★★
पृष्ठ 84 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 8, 10, 12, 13
उपभोक्ता संगठन: भारत में उपभोक्ता आंदोलन ने कई संगठन बनवाए, जिन्हें आम तौर पर उपभोक्ता अदालत या उपभोक्ता संरक्षण परिषद् कहते हैं। ये बताते हैं कि उपभोक्ता अदालत में मुकदमा कैसे दर्ज कराएँ, कई बार आयोगों में उपभोक्ता का प्रतिनिधित्व भी करते हैं, और जनता में जागरूकता के लिए सरकार से वित्तीय सहयोग पाते हैं। आवासीय कॉलोनी का ‘निवासी कल्याण संघ’ भी अपने किसी सदस्य के साथ हुई अनुचित व्यावसायिक कार्रवाई का मामला देखता है।
त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र: कोपरा के अंतर्गत उपभोक्ता विवाद निपटाने के लिए ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर एक त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र बना है। किताब के अनुसार:
| स्तर | किताब में नाम | किन दावों के मुकदमे | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| ज़िला | ज़िला स्तर का प्राधिकरण, जिसे उपभोक्ता आयोग विवाद निवारण केन्द्र भी कहते हैं | 1 करोड़ तक | 84 |
| राज्य | राज्य आयोग | 1 करोड़ से 10 करोड़ तक | 84 |
| राष्ट्रीय | राष्ट्रीय आयोग | 10 करोड़ से ऊपर | 84 |
किताब के अनुसार आयोग और अपील
अपील: ज़िला स्तर के आयोग में मुकदमा खारिज हो जाए, तो उपभोक्ता राज्य स्तर के आयोग में और उसके बाद राष्ट्रीय स्तर के आयोग में अपील कर सकता है। रेजी के पिता ने भी राज्य आयोग में मामला खारिज होने पर राष्ट्रीय आयोग में अपील की थी (पृष्ठ 79), और अबिरामी के मामले में संस्थान ने राज्य आयोग में अपील की थी (पृष्ठ 81)।
किताब का निष्कर्ष: “इस प्रकार, अधिनियम ने उपभोक्ता के रूप में उपभोक्ता न्यायालय में प्रतिनिधित्व का अधिकार देकर हमें समर्थ बनाया है।”
10. जागरूक उपभोक्ता और गुणवत्ता के चिह्न★★
पृष्ठ 84–85 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 3, 6, 7, 12, 13
जागरूक उपभोक्ता: खरीदते समय अपने अधिकारों के प्रति सचेत होंगे, तभी अच्छे और बुरे में फ़र्क कर पाएँगे और सबसे अच्छा चुनाव कर पाएँगे। “एक जागरूक उपभोक्ता बनने के लिए निपुणता और ज्ञान प्राप्त करने की जरूरत होती है।” किताब उपभोक्ता के अधिकारों में उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार भी गिनाती है (पृष्ठ 86)।
सरकार की भूमिका: कोपरा ने केंद्र और राज्य सरकारों में उपभोक्ता मामलों के अलग विभाग बनवाने में मुख्य भूमिका निभाई। पृष्ठ 84 और 85 के पोस्टर (जिन पर JAGO GRAHAK JAGO छपा है) जैसे विज्ञापनों से, और टेलीविज़न के विज्ञापनों से, सरकार नागरिकों को कानूनी प्रक्रिया के बारे में बताती है।
शब्दचिह्न (लोगो) और प्रमाण (पृष्ठ 85 का बॉक्स “आई.एस.आई और एगमार्क”):
- आई.एस.आई., एगमार्क, हॉलमार्क जैसे शब्दचिह्न और प्रमाणक चिह्न अच्छी गुणवत्ता का भरोसा दिलाते हैं।
- जाँच करके प्रमाणपत्र देने वाले संगठन, उत्पादक के श्रेष्ठ गुणवत्ता का पालन करने पर ही उसे लोगो लगाने देते हैं।
- ये संगठन बहुत से उत्पादों के लिए गुणवत्ता के मानदंड बनाते हैं, पर “सभी उत्पादकों का इन मानदण्डों का पालन करना जरूरी नहीं होता।”
- जो उत्पाद उपभोक्ता की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर असर डालते हैं या बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होते हैं, उनके लिए प्रमाण लेना अनिवार्य है। किताब के उदाहरण: एल.पी.जी. सिलिंडर, खाने के रंग और उनमें डाली जाने वाली सामग्री, सीमेंट, बोतलबंद पेयजल।
प्रश्नावली (प्रश्न 12, 13) से जुड़े चिह्न:
| चिह्न या संस्था | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| एगमार्क | अनाजों और खाद्य तेल का प्रमाण | 87 |
| भारतीय मानक ब्यूरो | वस्तुओं और सेवाओं के लिए मानक विकसित करने वाली एजेंसी | 87 |
| हॉलमार्क | आभूषणों की गुणवत्ता का प्रमाण (प्रश्न 13 का कथन, जो सही है) | 85, 88 |
| +F (फूड फोर्टिफिकेशन) | खाद्य पदार्थ में मुख्य पोषक तत्वों को मिलाना; पृष्ठ 85 पर इसका लोगो छपा है | 85, 87 |
पृष्ठ 85 की तस्वीरों में बिजली के प्लग और एल.पी.जी. स्टोव की प्लेट पर आई.एस.आई. चिह्न दिखाया गया है।
11. उपभोक्ता आंदोलन को आगे बढ़ाना: प्रगति और कमियाँ★★
पृष्ठ 86–87 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 10, 11, 13
प्रगति:
- 24 दिसंबर को भारत में राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है, क्योंकि 1986 में इसी दिन भारतीय संसद ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया था।
- भारत उन देशों में से एक है, जहाँ उपभोक्ता समस्याओं के निवारण के लिए विशिष्ट न्यायालय हैं।
- आज देश में 2000 से अधिक उपभोक्ता संगठन हैं, पर इनमें से केवल 50–60 ही अपने कामों के लिए पूर्ण संगठित और मान्यता प्राप्त हैं।
- कोपरा का 2019 में संशोधन हुआ, ताकि उपभोक्ता के अधिकार और मज़बूत हों:
- अब इंटरनेट से खरीद भी इसमें शामिल है।
- सेवा में कमी या दोषपूर्ण उत्पाद होने पर सेवा प्रदाता और निर्माता को भी ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा और दंड मिलेगा; जेल भी हो सकती है।
- आयोग के बाहर तटस्थ मध्यस्थ की मदद से विवाद निपटाने को अब आयोग के तीनों स्तरों पर बढ़ावा दिया गया है।
कमियाँ:
- उपभोक्ता निवारण प्रक्रिया “जटिल, खर्चीली और समय साध्य” साबित हो रही है।
- कई बार वकीलों का सहारा लेना पड़ता है, और मुकदमों में काफ़ी समय लगता है।
- ज़्यादातर खरीद के समय रसीद नहीं दी जाती, इसलिए सबूत जुटाना आसान नहीं होता।
- बाज़ार में ज़्यादातर खरीद छोटी फुटकर दुकानों से होती है।
- कोपरा के 35 वर्ष बाद भी भारत में उपभोक्ता ज्ञान बहुत धीरे–धीरे फैल रहा है।
- श्रमिकों की रक्षा के कानून हैं, पर ख़ासकर असंगठित क्षेत्र में वे कमज़ोर हैं; बाज़ारों के कामकाज के नियमों और विनियमों का अक्सर पालन नहीं होता।
आगे का रास्ता: उपभोक्ताओं को अपनी भूमिका और अपना महत्त्व समझना होगा। “यह अक्सर कहा जाता है कि उपभोक्ताओं की सक्रिय भागीदारी से ही उपभोक्ता आंदोलन प्रभावी हो सकता है। इसके लिए स्वैच्छिक प्रयास और सबकी साझेदारी से युक्त संघर्ष की जरूरत है।”
12. आँकड़े और साल एक जगह★
| आँकड़ा या साल | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 1960 के दशक | भारत में उपभोक्ता आंदोलन का व्यवस्थित रूप में उदय | 77 |
| 1970 के दशक तक | उपभोक्ता संस्थाएँ बड़े स्तर पर लेख और प्रदर्शनी करने लगीं; उपभोक्ता दल बने | 77 |
| 1985 | संयुक्त राष्ट्र ने उपभोक्ता सुरक्षा के लिए दिशा–निर्देश अपनाए | 78 |
| 100 से अधिक देश, 200 संस्थाएँ | उपभोक्ता इंटरनेशनल इनकी संरक्षक संस्था है | 78 |
| 1986 | उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम (कोपरा) बना | 78, 86 |
| 24 दिसंबर | राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस; 1986 में इसी दिन संसद ने अधिनियम पारित किया | 86 |
| 2019 | कोपरा का संशोधन | 78, 87 |
| सन् 2005 का अक्टूबर | RTI (सूचना पाने का अधिकार) कानून लागू हुआ | 80 |
| 5,00,000 रुपये | रेजी के पिता का मुआवज़े का दावा | 79 |
| करीब 61,020 रुपये | अबिरामी ने दो साल की पढ़ाई के लिए जमा किए | 81 |
| 28,000 रुपये | ज़िला आयोग ने अबिरामी को लौटाने का आदेश दिया | 81 |
| 25,000 | बेकार की अपील के लिए राज्य आयोग ने संस्थान पर दंड लगाया | 81 |
| 7,000 रुपये | राज्य आयोग ने अबिरामी को मुआवज़े और याचिका खर्च के रूप में दिलाए | 81 |
| 1 करोड़ तक | ज़िला आयोग के दावे | 84 |
| 1 करोड़ से 10 करोड़ तक | राज्य आयोग के दावे | 84 |
| 10 करोड़ से ऊपर | राष्ट्रीय आयोग के दावे | 84 |
| 2000 से अधिक; 50–60 | देश के उपभोक्ता संगठन; इनमें पूर्ण संगठित और मान्यता प्राप्त | 86 |
| 6 | पृष्ठ 86 की सूची में कोपरा के अधिकार | 86 |
| 35 वर्ष | कोपरा के इतने साल बाद भी उपभोक्ता ज्ञान बहुत धीरे फैल रहा है | 87 |
13. ये ग़लतियाँ मत कीजिएध्यान
| ग़लती | सही बात | पृष्ठ |
|---|---|---|
| कोपरा सिर्फ़ सामान पर लागू होता है | सेवाओं पर भी: रेजी का मामला अस्पताल की सेवा का था, अबिरामी का कोचिंग का, प्रकाश का मनीऑर्डर का। 2019 के संशोधन में सेवा प्रदाता भी ज़िम्मेदार ठहराया जाता है | 79–82, 87 |
| छोटे नुकसान पर आयोग जाना बेकार है | ज़िला आयोग 1 करोड़ तक के दावे सुनता है; अबिरामी को 28,000 रुपये लौटाने का आदेश ज़िला आयोग से ही मिला | 81, 84 |
| हर शिकायत ज़िला आयोग से ही शुरू होती है | कौन-सा आयोग सुनेगा, यह दावे की रकम पर निर्भर है: 1 करोड़ तक ज़िला, 1 से 10 करोड़ तक राज्य, 10 करोड़ से ऊपर राष्ट्रीय | 84 |
| शिकायत के लिए वकील ज़रूरी है | शिकायत वकील के साथ भी और वकील के बिना भी दर्ज हो सकती है; प्रकाश ने आयोग में ख़ुद बहस की | 82–83 |
| MRP से कम पर मोल-भाव नहीं हो सकता | MRP से अधिक लेना गलत है, पर MRP से कम दाम के लिए मोल-भाव किया जा सकता है | 80 |
| हर वस्तु पर आई.एस.आई. या एगमार्क अनिवार्य है | सभी उत्पादकों के लिए मानदंड मानना ज़रूरी नहीं; सुरक्षा और स्वास्थ्य पर असर डालने वाली या बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाली कुछ वस्तुओं के लिए ही प्रमाण अनिवार्य है | 85 |
| उपभोक्ता संरक्षण परिषद् और उपभोक्ता आयोग एक ही हैं | परिषद् स्वयंसेवी संगठन है, जो सलाह देता है और प्रतिनिधित्व करता है; आयोग कोपरा के तहत बना न्यायिक तंत्र है, जहाँ जज फ़ैसला सुनाते हैं | 83–84 |
| RTI का मतलब पैकेट पर छपी जानकारी है | पैकेट की जानकारी उपभोक्ता के सूचना पाने के अधिकार से जुड़ी है; RTI कानून (अक्टूबर 2005) सरकारी विभागों के कामकाज की सूचना पाने का कानून है | 80 |
| उपभोक्ता आंदोलन 1986 में शुरू हुआ | आंदोलन 1960 के दशक में व्यवस्थित रूप में उभरा; 1986 में उसके दबाव से कानून बना | 77–78 |
14. अपने को जाँचिए: किताब के प्रश्न और उत्तर★★
हर उत्तर पहले ख़ुद सोचिए, फिर खोलकर मिलाइए। प्रश्नावली किताब के पृष्ठ 87–88 पर है।
प्रश्न 1. बाज़ार में नियमों तथा विनियमों की आवश्यकता क्यों पड़ती है? कुछ उदाहरणों के द्वारा समझाएँ।
उत्तर देखिए
उत्तर: बाज़ार में अकेला उपभोक्ता अक्सर कमज़ोर हालत में होता है। शिकायत होने पर विक्रेता सारी ज़िम्मेदारी खरीदने वाले पर डालने की कोशिश करता है। जब उत्पादक थोड़े और शक्तिशाली हों और उपभोक्ता कम मात्रा में खरीदते हों और बिखरे हुए हों, तो बाज़ार ठीक से काम नहीं करता। किताब के उदाहरण:
- दुकानदार उचित वज़न से कम तौलते हैं, व्यापारी पहले न बताए गए शुल्क जोड़ देते हैं, मिलावटी या दोषपूर्ण वस्तुएँ बेची जाती हैं।
- एक कंपनी ने शिशुओं के दूध का पाउडर माँ के दूध से बेहतर बताकर कई वर्षों तक पूरी दुनिया में बेचा; लंबे संघर्ष के बाद उसे मानना पड़ा कि उसके दावे झूठे थे।
- सिगरेट कंपनियों से यह मनवाने के लिए कि उनका उत्पाद कैंसर का कारण हो सकता है, न्यायालय में लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।
इसलिए उपभोक्ताओं की सुरक्षा पक्की करने के लिए नियम और विनियम चाहिए। (पृष्ठ 76–77)
प्रश्न 2. भारत में उपभोक्ता आंदोलन की शुरुआत किन कारणों से हुई? इसके विकास के बारे में पता लगाएँ।
उत्तर देखिए
उत्तर: कारण: विक्रेता कई अनुचित व्यावसायिक व्यवहारों में शामिल थे, जिससे उपभोक्ताओं में असंतोष था, और शोषण से बचाने की कोई कानूनी व्यवस्था नहीं थी। सावधानी की पूरी ज़िम्मेदारी खरीदने वाले पर मानी जाती थी। 1960 के दशक में अत्यधिक खाद्य कमी, जमाखोरी, कालाबाज़ारी और खाद्य पदार्थों व खाद्य तेल में मिलावट ने आंदोलन को व्यवस्थित रूप दिया।
विकास:
- आंदोलन का जन्म एक ‘सामाजिक बल’ के रूप में हुआ।
- 1970 के दशक तक उपभोक्ता संस्थाएँ उपभोक्ता अधिकार पर लेख लिखने और प्रदर्शनी लगाने लगीं, और सड़क यात्री परिवहन व राशन दुकानों पर नज़र रखने के लिए उपभोक्ता दल बने।
- हाल में उपभोक्ता दलों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है।
- आंदोलन ने व्यावसायिक कंपनियों और सरकार, दोनों पर दबाव डाला; नतीजा 1986 में उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम (कोपरा) था, जिसका 2019 में संशोधन हुआ। (पृष्ठ 77–78)
प्रश्न 3. दो उदाहरण देकर उपभोक्ता जागरूकता की ज़रूरत का वर्णन करें।
उत्तर देखिए
उत्तर: खरीदते समय अपने अधिकारों के प्रति सचेत उपभोक्ता ही अच्छे और बुरे में फ़र्क करके सबसे अच्छा चुनाव कर पाता है; इसके लिए निपुणता और ज्ञान चाहिए (पृष्ठ 84)। किताब के दो उदाहरण:
- अमृता (पृष्ठ 80): सरकारी विभाग ने इंटरव्यू का परिणाम नहीं बताया। उसने RTI कानून का प्रयोग करते हुए प्रार्थना-पत्र दिया, तो देरी के कारण भी बताए गए और नियुक्ति का बुलावा भी मिला।
- अबिरामी (पृष्ठ 81): कोचिंग संस्थान ने एक साल की फ़ीस लौटाने से मना किया। उसने ज़िला आयोग में मुकदमा किया और 28,000 रुपये लौटाने का आदेश मिला।
जागरूकता न हो तो लोग ठगे जाने को अपना दुर्भाग्य मानकर चुप रह जाते हैं (पृष्ठ 89, प्रश्नावली का प्रश्न 5)। किताब के अनुसार भारत में उपभोक्ता ज्ञान अब भी बहुत धीरे फैल रहा है (पृष्ठ 87), इसलिए जागरूकता ज़रूरी है।
प्रश्न 4. कुछ ऐसे कारकों की चर्चा करें, जिनसे उपभोक्ताओं का शोषण होता है?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- अकेला और बिखरा हुआ उपभोक्ता: उपभोक्ता कम मात्रा में खरीदते हैं और बिखरे हुए हैं, जबकि उत्पादक थोड़े और शक्तिशाली हैं। (पृष्ठ 76)
- बड़ी कंपनियों की ताक़त: अधिक पूँजी वाली कंपनियाँ बाज़ार को प्रभावित करती हैं और मीडिया व दूसरे स्रोतों से गलत सूचना देती हैं। (पृष्ठ 76)
- अनुचित व्यापार: कम तौलना, बिना बताए शुल्क जोड़ना, मिलावटी या दोषपूर्ण वस्तुएँ बेचना। (पृष्ठ 76)
- कमज़ोर निगरानी: सुरक्षा नियमों का पर्यवेक्षण ठीक से नहीं होता और उपभोक्ता आंदोलन बहुत मज़बूत नहीं है। (पृष्ठ 79)
- सबूत की कमी: ज़्यादातर खरीद के समय रसीद नहीं मिलती, और ज़्यादातर खरीद छोटी फुटकर दुकानों से होती है। (पृष्ठ 86)
- कम जानकारी: उपभोक्ता ज्ञान बहुत धीरे फैल रहा है। (पृष्ठ 87)
प्रश्न 5. उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986 के निर्माण की ज़रूरत क्यों पड़ी?
उत्तर देखिए
उत्तर: पहले बाज़ार में उपभोक्ता को शोषण से बचाने की कोई कानूनी व्यवस्था नहीं थी। असंतुष्ट उपभोक्ता बस उस ब्रांड या दुकान से खरीदना बंद कर देता था, और सावधानी की ज़िम्मेदारी उसी की मानी जाती थी (पृष्ठ 77)। कम तौल, मिलावट, झूठे दावे जैसे शोषण आम थे (पृष्ठ 76–77)। उपभोक्ता आंदोलन ने कंपनियों और सरकार पर दबाव डाला, और 1986 में भारत सरकार ने कोपरा बनाकर बड़ा कदम उठाया (पृष्ठ 78)। इस कानून से उपभोक्ता को अधिकार मिले (पृष्ठ 86) और शिकायत निपटाने के लिए ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर आयोग बने (पृष्ठ 84)।
प्रश्न 6. अपने क्षेत्र के बाज़ार में जाने पर उपभोक्ता के रूप में अपने कुछ कर्त्तव्यों का वर्णन करें।
उत्तर देखिए
उत्तर: अध्याय और पृष्ठ 89 की प्रश्नावली से ये कर्त्तव्य निकलते हैं:
- खरीदने पर रसीद माँगिए और सँभालकर रखिए, क्योंकि बिना रसीद सबूत जुटाना कठिन होता है। (पृष्ठ 86, 89)
- पैकेट पर अवयव, निर्माण की तारीख, अंतिम तिथि और MRP देखिए; MRP से अधिक मत दीजिए। (पृष्ठ 80)
- आई.एस.आई. जैसे गुणवत्ता के चिह्न और समाप्ति तिथि जाँचिए। (पृष्ठ 85, 89)
- गैस सिलेंडर या पुराने अखबार खरीदते-बेचते समय वज़न ख़ुद जाँचिए; बाट की जगह पत्थर से तौलने का विरोध कीजिए। (पृष्ठ 89)
- दाम की तुलना कीजिए और लुभाने वाले प्रस्तावों पर तुरंत मत रीझिए। (पृष्ठ 82, 89)
- ठगे जाने पर चुप मत रहिए; विक्रेता से शिकायत कीजिए और ज़रूरत हो तो उपभोक्ता आयोग जाइए। (पृष्ठ 82, 89)
प्रश्न 7. मान लीजिए, आप शहद की एक बोतल और बिस्कुट का एक पैकेट खरीदते हैं। खरीदते समय आप कौन–सा लोगो या शब्द चिह्न देखेंगे और क्यों?
उत्तर देखिए
उत्तर: बोतल और पैकेट पर गुणवत्ता का प्रमाणक चिह्न देखिए, जैसे खाने की चीज़ों के लिए एगमार्क (किताब इसे अनाजों और खाद्य तेल का प्रमाण कहती है, प्रश्न 12) या आई.एस.आई.। पोषक तत्व मिलाए गए हों, तो +F का चिह्न होता है (पृष्ठ 85, प्रश्न 12)।
क्यों: प्रमाणपत्र देने वाले संगठन उत्पादक को लोगो लगाने की अनुमति तभी देते हैं, जब वह श्रेष्ठ गुणवत्ता का पालन करे; इसलिए ये चिह्न अच्छी गुणवत्ता का भरोसा दिलाते हैं (पृष्ठ 85)। साथ ही पैकेट पर अवयव, निर्माण की तारीख, अंतिम तिथि, MRP और बनाने वाले का पता भी देखिए (पृष्ठ 80)।
प्रश्न 8. भारत में उपभोक्ताओं को समर्थ बनाने के लिए सरकार द्वारा किन कानूनी मानदंडों को लागू करना चाहिए?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब सरकार के ये कानूनी उपाय बताती है; उपभोक्ता तभी समर्थ बनेंगे जब इन्हें ठीक से लागू किया जाए, क्योंकि किताब के अनुसार नियमों का अक्सर पालन नहीं होता (पृष्ठ 79, 87):
- उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986 (कोपरा) और 2019 में उसका संशोधन। (पृष्ठ 78)
- त्रिस्तरीय आयोग: ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर, अपील की सुविधा के साथ; इससे उपभोक्ता न्यायालय में प्रतिनिधित्व का अधिकार मिला। (पृष्ठ 84)
- 2019 का संशोधन: इंटरनेट से खरीद भी शामिल; सेवा प्रदाता और निर्माता ज़िम्मेदार, जेल तक हो सकती है; तटस्थ मध्यस्थ से निपटारे को बढ़ावा। (पृष्ठ 87)
- सूचना के नियम: पैकेट पर अवयव, तिथि, MRP छापना; और सन् 2005 के अक्टूबर से RTI कानून। (पृष्ठ 80)
- अनिवार्य प्रमाण: एल.पी.जी. सिलिंडर, खाद्य रंग, सीमेंट, बोतलबंद पेयजल जैसी वस्तुओं के लिए। (पृष्ठ 85)
- उपभोक्ता मामलों के अलग विभाग केंद्र और राज्यों में, और विज्ञापनों से जागरूकता। (पृष्ठ 85)
- आसान शिकायत: समूह में (क्लास एक्शन सूट), इंटरनेट से, और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई। (पृष्ठ 82)
प्रश्न 9. उपभोक्ताओं के कुछ अधिकारों को बताएँ और प्रत्येक अधिकार पर कुछ पंक्तियाँ लिखें।
उत्तर देखिए
उत्तर: पृष्ठ 86 पर कोपरा के छह अधिकार गिनाए गए हैं:
- सुरक्षा का अधिकार: जीवन और संपत्ति के लिए खतरनाक वस्तुओं और सेवाओं से सुरक्षित रहने का अधिकार। उत्पादकों को सुरक्षा नियम मानने चाहिए, जैसे प्रेशर कूकर का सेफ्टी वॉल्व। उदाहरण: रेजी। (पृष्ठ 79)
- सूचना का अधिकार: वस्तु के अवयव, मूल्य, बैच संख्या, निर्माण और अंतिम तिथि, बनाने वाले का पता जानने का अधिकार; MRP से अधिक लेने पर शिकायत। (पृष्ठ 80)
- चयन (चुनने) का अधिकार: किसी पर बिना चाही वस्तु नहीं थोपी जा सकती, जैसे दंतमंजन के साथ ब्रश या गैस कनेक्शन के साथ चूल्हा। उदाहरण: अबिरामी। (पृष्ठ 81)
- निवारण का अधिकार: अनुचित सौदेबाज़ी और शोषण से हुई क्षति की मात्रा के आधार पर क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार। उदाहरण: प्रकाश। (पृष्ठ 82–83)
- प्रतिनिधित्व का अधिकार: उपभोक्ता न्यायालय में अपनी बात रखने का अधिकार; त्रिस्तरीय आयोग इसी के लिए हैं। (पृष्ठ 84)
- उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार: जागरूक उपभोक्ता बनने के लिए निपुणता और ज्ञान चाहिए; सरकार विज्ञापनों से लोगों को कानूनी प्रक्रिया बताती है। (पृष्ठ 84–85)
प्रश्न 10. उपभोक्ता अपनी एकजुटता का प्रदर्शन कैसे कर सकते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- उपभोक्ता दल और उपभोक्ता संरक्षण परिषद् बनाकर, जो लोगों को मुकदमा दर्ज करने का रास्ता बताते हैं और आयोगों में उनका प्रतिनिधित्व करते हैं। (पृष्ठ 77, 84)
- आवासीय कॉलोनी के ‘निवासी कल्याण संघ’ के ज़रिए, जो सदस्य के साथ हुई अनुचित व्यावसायिक कार्रवाई का मामला उठाता है। (पृष्ठ 84)
- समूह के रूप में शिकायत करके, जिसे क्लास एक्शन सूट कहते हैं। (पृष्ठ 82)
- कंपनियों और सरकार पर मिलकर दबाव डालकर, जैसा आंदोलन ने कोपरा से पहले किया। (पृष्ठ 78)
- सक्रिय भागीदारी से: किताब के अनुसार इसके लिए “स्वैच्छिक प्रयास और सबकी साझेदारी से युक्त संघर्ष की जरूरत है।” (पृष्ठ 87)
प्रश्न 11. भारत में उपभोक्ता आंदोलन की प्रगति की समीक्षा करें।
उत्तर देखिए
उत्तर: प्रगति:
- 1960 के दशक में व्यवस्थित उदय से 1986 में कोपरा तक, और 2019 में उसका संशोधन। (पृष्ठ 77–78, 87)
- 24 दिसंबर राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस; भारत उन देशों में है जहाँ उपभोक्ता समस्याओं के लिए विशिष्ट न्यायालय हैं। (पृष्ठ 86)
- 2000 से अधिक उपभोक्ता संगठन। (पृष्ठ 86)
- इंटरनेट से शिकायत, समूह में शिकायत और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई। (पृष्ठ 82)
कमियाँ:
- इनमें से केवल 50–60 संगठन ही पूर्ण संगठित और मान्यता प्राप्त हैं। (पृष्ठ 86)
- निवारण प्रक्रिया “जटिल, खर्चीली और समय साध्य” है; वकील चाहिए होते हैं, मुकदमे लंबे चलते हैं। (पृष्ठ 86)
- रसीद न मिलने से सबूत जुटाना कठिन है। (पृष्ठ 86)
- कोपरा के 35 वर्ष बाद भी उपभोक्ता ज्ञान धीरे फैल रहा है, और नियमों का अक्सर पालन नहीं होता। (पृष्ठ 87)
प्रश्न 12. निम्नलिखित को सुमेलित करें।
छपी किताब में “विकसित करने वाली एजेंसी” वाली पंक्ति बाएँ खाने में (4) के नीचे छप गई है। यह दाएँ खाने के (च) का हिस्सा है। इसलिए (4) को “ज़िला उपभोक्ता आयोग” और (च) को “वस्तुओं और सेवाओं के लिए मानक विकसित करने वाली एजेंसी” पढ़िए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- (1) एक उत्पाद के घटकों का विवरण → (ङ) सूचना का अधिकार: पैकेट पर अवयवों की जानकारी पाना उपभोक्ता का अधिकार है। (पृष्ठ 80)
- (2) एगमार्क → (ग) अनाजों और खाद्य तेल का प्रमाण: एगमार्क गुणवत्ता का प्रमाणक चिह्न है। (पृष्ठ 85)
- (3) स्कूटर में खराब इंजन के कारण हुई दुर्घटना → (क) सुरक्षा का अधिकार: खतरनाक वस्तुओं से सुरक्षित रहने का अधिकार। (पृष्ठ 79)
- (4) ज़िला उपभोक्ता आयोग → (ख) उपभोक्ता मामलों में संबंध: यह ज़िला स्तर पर उपभोक्ता विवाद सुनता है। (पृष्ठ 84)
- (5) फूड फोर्टिफिकेशन → (छ) खाद्य पदार्थ में मुख्य पोषक तत्वों को मिलाना: पृष्ठ 85 पर इसका +F लोगो छपा है। (पृष्ठ 85)
- (6) उपभोक्ता इंटरनेशनल → (घ) उपभोक्ता कल्याण संगठनों की अंतर्राष्ट्रीय संस्था: 100 से अधिक देशों की 200 संस्थाओं की संरक्षक संस्था। (पृष्ठ 78)
- (7) भारतीय मानक ब्यूरो → (च) वस्तुओं और सेवाओं के लिए मानक विकसित करने वाली एजेंसी। (पृष्ठ 85, 87)
प्रश्न 13. सही या गलत बताएँ।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- (क) कोपरा केवल सामानों पर लागू होता है। गलत: यह सेवाओं पर भी लागू है: रेजी का मामला अस्पताल की सेवा का (पृष्ठ 79), अबिरामी का कोचिंग का (पृष्ठ 81), प्रकाश का मनीऑर्डर का था (पृष्ठ 82); 2019 के संशोधन में सेवा प्रदाता भी ज़िम्मेदार है (पृष्ठ 87)।
- (ख) भारत विश्व के उन देशों में से एक है, जिसके पास उपभोक्ताओं की समस्याओं के निवारण के लिए विशिष्ट प्राधिकरण हैं। सही: भारत उन देशों में से एक है जहाँ उपभोक्ता समस्याओं के निवारण के लिए विशिष्ट न्यायालय हैं। (पृष्ठ 86)
- (ग) जब उपभोक्ता को ऐसा लगे कि उसका शोषण हुआ है, तो उसे ज़िला उपभोक्ता आयोग में निश्चित रूप से मुकदमा दायर करना चाहिए। गलत: उपभोक्ता पहले विक्रेता से शिकायत कर सकता है और उपभोक्ता संरक्षण परिषद् से सलाह ले सकता है, जैसा प्रकाश ने किया (पृष्ठ 82–83)। कौन-सा आयोग सुनेगा, यह दावे की रकम पर निर्भर है; 1 करोड़ से ऊपर का दावा ज़िला आयोग में नहीं जाता (पृष्ठ 84)।
- (घ) जब अधिक मूल्य का नुकसान हो, तभी उपभोक्ता आयोग में जाना लाभप्रद होता है। गलत: ज़िला आयोग 1 करोड़ तक के दावे सुनता है (पृष्ठ 84); अबिरामी को कोचिंग फ़ीस के मामले में 28,000 रुपये लौटाने का आदेश मिला (पृष्ठ 81)।
- (ड.) हॉलमार्क, आभूषणों की गुणवत्ता बनाए रखनेवाला प्रमाण है। सही: पृष्ठ 85 हॉलमार्क को उन चिह्नों में गिनता है, जो अच्छी गुणवत्ता का भरोसा दिलाते हैं। हॉलमार्क सोने-चाँदी के गहनों पर लगता है।
- (च) उपभोक्ता समस्याओं के निवारण की प्रक्रिया अत्यंत सरल और शीघ्र होती है। गलत: किताब के अनुसार यह प्रक्रिया “जटिल, खर्चीली और समय साध्य” साबित हो रही है। (पृष्ठ 86)
- (छ) उपभोक्ता को मुआवजा पाने का अधिकार है, जो क्षति की मात्रा पर निर्भर करती है। सही: क्षति की मात्रा के आधार पर क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार है। (पृष्ठ 82)
किताब की गतिविधियाँ
ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर अध्याय समझने में मदद करती हैं।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 77), 1. बाज़ार में लोगों का शोषण किन-किन तरीकों से हो सकता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: कम तौलना; पहले न बताए गए शुल्क जोड़ना; मिलावटी या दोषपूर्ण वस्तुएँ बेचना (पृष्ठ 76); बड़ी कंपनियों का मीडिया से गलत सूचना देना और झूठे दावे करना, जैसे शिशुओं का दूध पाउडर (पृष्ठ 76–77); सामान ऐसा बनाना कि जल्दी बेकार हो जाए (पृष्ठ 76 का कार्टून)।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 77), 2. अपने अनुभव से कोई उदाहरण लीजिए, जहाँ आपको लगा हो कि बाज़ार में ‘धोखा’ दिया जा रहा था, और कक्षा में चर्चा कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: हर किसी का अनुभव अलग होगा। किताब से मिलते-जुलते उदाहरण: पैकेट पर छपे मूल्य से अधिक लेना (पृष्ठ 81), सब्ज़ी वाले का बाट की जगह पत्थर से तौलना (पृष्ठ 89), दंतमंजन के साथ ज़बरदस्ती ब्रश बेचना (पृष्ठ 81)। चर्चा में यह भी देखिए कि आपके पास रसीद थी या नहीं, और आपने शिकायत की या नहीं।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 77), 3. आपकी राय में उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए सरकार की क्या भूमिका होनी चाहिए?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब में सरकार की भूमिका: उपभोक्ता की सुरक्षा के लिए नियम और विनियम बनाना (पृष्ठ 77); कोपरा जैसा कानून (पृष्ठ 78); शिकायत के लिए त्रिस्तरीय आयोग (पृष्ठ 84); उपभोक्ता मामलों के अलग विभाग और विज्ञापनों से जागरूकता (पृष्ठ 85); कुछ वस्तुओं के लिए प्रमाण अनिवार्य करना (पृष्ठ 85)। साथ ही नियमों का ठीक पर्यवेक्षण, क्योंकि किताब कहती है कि उसकी कमी से निम्न गुणवत्ता के उत्पाद बिकते हैं (पृष्ठ 79)।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 78), 1. उपभोक्ता दल कौन-कौन से उपाय अपना सकते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: उपभोक्ता अधिकार पर लेख लिखना और प्रदर्शनी लगाना; सड़क यात्री परिवहन और राशन दुकानों पर नज़र रखना (पृष्ठ 77); कंपनियों और सरकार पर दबाव डालना (पृष्ठ 78); लोगों को मुकदमा दर्ज करने का रास्ता बताना, आयोग में उनका प्रतिनिधित्व करना, और जागरूकता फैलाना (पृष्ठ 84)।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 78), 2. नियम और कानून होने पर भी उनका पालन क्यों नहीं होता?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब के कारण: नियमों का पर्यवेक्षण ठीक से नहीं होता और उपभोक्ता आंदोलन बहुत मज़बूत नहीं है (पृष्ठ 79); शिकायत की प्रक्रिया जटिल, खर्चीली और लंबी है, रसीद नहीं मिलती, और ज़्यादातर खरीद छोटी दुकानों से होती है (पृष्ठ 86); उपभोक्ता ज्ञान धीरे फैल रहा है (पृष्ठ 87)।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 79), 1. इन उत्पादों और सेवाओं में उत्पादकों को किन सुरक्षा नियमों का पालन करना चाहिए: (क) एल.पी.जी. सिलेंडर (ख) सिनेमा थिएटर (ग) सर्कस (घ) दवाइयाँ (च) खाद्य तेल (छ) विवाह पंडाल (ज) एक बहुमंजिली इमारत?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब से जुड़ी बातें:
- (क) एल.पी.जी. सिलेंडर: इसके लिए प्रमाण लेना अनिवार्य है; उपभोक्ता को इसका वज़न भी जाँचना चाहिए। (पृष्ठ 85, 89)
- (घ) दवाइयाँ: उचित प्रयोग के निर्देश, दूसरे प्रभावों और खतरों की जानकारी, और अंतिम तिथि छपी हो; अंतिम तिथि निकल चुकी दवाएँ बेचने वालों के खिलाफ़ कार्यवाही की जा सकती है। (पृष्ठ 80)
- (च) खाद्य तेल: मिलावट न हो; एगमार्क अनाजों और खाद्य तेल का प्रमाण है। (पृष्ठ 77, 87)
(ख), (ग), (छ), (ज) में एक साथ बहुत लोग होते हैं। कक्षा में चर्चा कीजिए कि आग, बिजली और भीड़ से बचाव के लिए वहाँ क्या इंतज़ाम होने चाहिए, और प्रेशर कूकर के सेफ्टी वॉल्व की तरह (पृष्ठ 79) किस हिस्से की खराबी दुर्घटना बन सकती है।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 79), 2. आसपास किसी दुर्घटना या लापरवाही का पता कीजिए, जिसके लिए आपको उत्पादक ज़िम्मेदार लगे, और उस पर चर्चा कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: उदाहरण आपके आसपास से आएगा। उसे रेजी के मामले (पृष्ठ 79) की तरह परखिए: गलती किसकी थी, कौन-सा अधिकार टूटा (सुरक्षा का), और पीड़ित किस आयोग में जा सकता था (दावे की रकम के हिसाब से, पृष्ठ 84)।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 81), 1. कभी पैकेट पर छपे मूल्य से अधिक और कभी कम दाम क्यों लिया जाता है? क्या उपभोक्ता समूह इसमें कुछ कर सकते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: छपा मूल्य अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) है। अधिक दाम तब लिया जाता है जब विक्रेता शोषण करे और खरीदार जागरूक न हो; यह गलत है और कोई भी इसका विरोध और शिकायत कर सकता है। कम दाम इसलिए हो सकता है क्योंकि MRP से कम पर मोल-भाव किया जा सकता है (पृष्ठ 80)। उपभोक्ता समूह लोगों को जागरूक कर सकते हैं और शिकायत दर्ज कराने में मदद कर सकते हैं (पृष्ठ 84)।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 81), 2. कुछ डिब्बाबंद वस्तुओं के पैकेट लेकर उन पर दी गई जानकारी जाँचिए। वे कैसे उपयोगी हैं, और कौन-सी जानकारी और होनी चाहिए?
उत्तर देखिए
उत्तर: पैकेट पर अवयव, मूल्य, बैच संख्या, निर्माण की तारीख, अंतिम तिथि और बनाने वाले का पता देखिए (पृष्ठ 80)। ये उपयोगी हैं, क्योंकि इनसे खराब या पुरानी वस्तु पहचानी जा सकती है, वस्तु बदलने या मुआवज़े की माँग की जा सकती है, और MRP से अधिक देने से बचा जा सकता है। कौन-सी जानकारी कम है, यह अपने पैकेटों को देखकर लिखिए।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 81), 3. खराब सड़क, दूषित पानी और स्वास्थ्य सुविधाओं की शिकायतें कोई नहीं सुनता; अब RTI कानून आपको प्रश्न पूछने का अधिकार देता है। क्या आप इससे सहमत हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: हाँ। सन् 2005 के अक्टूबर में लागू RTI कानून नागरिकों को सरकारी विभागों के कामकाज की सभी सूचनाएँ पाने का अधिकार देता है। अमृता ने इसी कानून से अपने परिणाम की देरी का कारण जाना और नियुक्ति का बुलावा पाया (पृष्ठ 80)। इसी तरह सड़क या पानी के काम के बारे में भी सूचना माँगी जा सकती है।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 82). किताब के इन विज्ञापनों में से कौन-सा सचमुच उपभोक्ता को लाभ पहुँचाता है: 500 ग्राम पर 15 ग्राम अतिरिक्त, अखबार के ग्राहक बनने पर साल के अंत में उपहार, खुरचकर 10 लाख तक का इनाम, ग्लूकोज़ के डिब्बे में चॉकलेट, पैकेट में सोने का सिक्का, 2000 रुपये तक के जूते पर 500 रुपये तक का जोड़ी मुफ़्त?
उत्तर देखिए
उत्तर: ये विज्ञापन लुभाने के लिए हैं। हर एक के बारे में पूछिए: क्या दाम वही है, क्या इनाम पक्का है या किस्मत पर है, और क्या “मुफ़्त” चीज़ की कीमत पहले ही दाम में जुड़ी है? 500 ग्राम पर 15 ग्राम अतिरिक्त का लाभ नापा जा सकता है, अगर दाम न बढ़ा हो; इनाम और सिक्के वाले प्रस्ताव किस्मत पर टिके हैं। पृष्ठ 89 की प्रश्नावली में आकर्षक प्रस्तावों पर बेहिचक प्रतिक्रिया करना जागरूकता की कमी माना गया है।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 84). अरिता के मामले के कदमों को सही क्रम में रखिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: सही क्रम: (छ) दीवार घड़ी खरीदी → (ग) लगा कि घड़ी दोषयुक्त है → (ड.) शाखा कार्यालय में डीलर के ख़िलाफ़ शिकायत, कोई असर नहीं → (ख) शिकायत के लिए पेशेवर व्यक्ति से मिली → (क) ज़िला आयोग में मुकदमा दायर किया → (च) आयोग ने पहले बिल और वारंटी माँगे → (घ) आयोग की कार्यवाही में भाग लिया → (ज) कुछ महीनों में आयोग ने नई घड़ी देने का आदेश दिया। (पृष्ठ 84)
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 86), 1. इस अध्याय के पोस्टर और कार्टून देखकर किसी एक वस्तु पर उपभोक्ता की नज़र से पोस्टर बनाइए।
उत्तर देखिए
उत्तर: एक वस्तु चुनिए, जैसे प्रेशर कूकर या दवा, और पोस्टर में उसकी सुरक्षा, पैकेट की जानकारी, MRP, गुणवत्ता का चिह्न और शिकायत का रास्ता दिखाइए (पृष्ठ 79–85)। पृष्ठ 84 और 85 के सरकारी पोस्टर नमूने का काम करेंगे।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 86), 2. अपने क्षेत्र के सबसे नज़दीकी उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का पता कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह आपके ज़िले पर निर्भर है। किताब के अनुसार ज़िला स्तर का आयोग 1 करोड़ तक के दावे सुनता है (पृष्ठ 84)। उसका पता लिखकर कक्षा में साझा कीजिए।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 86), 3. उपभोक्ता संरक्षण परिषद् और उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में क्या अंतर है?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- उपभोक्ता संरक्षण परिषद्: उपभोक्ता आंदोलन से बना स्वयंसेवी संगठन। सलाह देता है कि मुकदमा कैसे दर्ज करें, कई बार आयोग में उपभोक्ता का प्रतिनिधित्व करता है, जागरूकता के लिए सरकार से वित्तीय सहयोग पाता है। प्रकाश यहाँ सलाह लेने गए थे। (पृष्ठ 83–84)
- उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग: कोपरा के तहत बना त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र (ज़िला, राज्य, राष्ट्रीय)। यहाँ मुकदमा दर्ज होता है, जज दस्तावेज़ जाँचते हैं, दोनों पक्षों को सुनते हैं और फ़ैसला सुनाते हैं। (पृष्ठ 83–84)
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 86), 4. कोपरा के छह अधिकार (क) चयन (ख) सूचना (ग) निवारण (घ) प्रतिनिधित्व (च) सुरक्षा (छ) उपभोक्ता शिक्षा हैं। इन मामलों को सही अधिकार के खाने में रखिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- (क) लता को नए आयरन-प्रेस से बिजली का झटका लगा और उसने तुरंत दुकानदार से शिकायत की: सुरक्षा का अधिकार।
- (ख) जॉन ने टेलीफ़ोन सेवाओं से असंतुष्ट होकर ज़िला स्तर के उपभोक्ता फोरम में मुकदमा किया: प्रतिनिधित्व का अधिकार (उपभोक्ता न्यायालय में अपनी बात रखना); यह निवारण से भी जुड़ता है।
- (ग) आपके मित्र ने समाप्ति तारीख निकल चुकी दवा खरीदी, और आप उसे शिकायत करने की सलाह दे रहे हैं: उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार (आप मित्र को उसका अधिकार बता रहे हैं); शिकायत के कारण यह निवारण से भी जुड़ता है।
- (घ) इकबाल खरीदने से पहले आवरण पर दी गई सारी जानकारी जाँचता है: सूचना का अधिकार।
- (च) आप केबल ऑपरेटर की सेवा से असंतुष्ट हैं, पर कोई विकल्प नहीं है: चयन का अधिकार।
- (छ) दुकानदार ने खराब कैमरा दिया और आप मुख्य कार्यालय में दृढ़ता से शिकायत करते हैं: निवारण का अधिकार।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 86), 5. अगर मानकीकरण गुणवत्ता पक्की करता है, तो बाज़ार में बहुत-सी वस्तुएँ बिना आई.एस.आई. या एगमार्क के क्यों मिलती हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: क्योंकि सभी उत्पादकों के लिए इन मानदंडों का पालन ज़रूरी नहीं है। प्रमाण केवल उन वस्तुओं के लिए अनिवार्य है जो उपभोक्ता की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर असर डालती हैं या बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होती हैं, जैसे एल.पी.जी. सिलिंडर, खाद्य रंग, सीमेंट, बोतलबंद पेयजल (पृष्ठ 85)। बाकी वस्तुओं के लिए यह ज़रूरी नहीं है।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 86), 6. हॉलमार्क या आई.एस.ओ. प्रमाणन देने वालों के बारे में जानकारी इकट्ठा कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: अपने आसपास के सुनार या दुकानदार से पूछिए कि उनके सामान पर कौन-सा चिह्न है और वह किस संस्था से मिला। पृष्ठ 85 बताता है कि ऐसे संगठन जाँच करके प्रमाणपत्र देते हैं और उत्पादक को लोगो तभी लगाने देते हैं, जब वह श्रेष्ठ गुणवत्ता का पालन करे।
अतिरिक्त परियोजना/कार्यकलाप (पृष्ठ 88)
- उपभोक्ता जागरूकता सप्ताह का पोस्टर: उपभोक्ता जागरूकता फोरम के सचिव के रूप में सभी उपभोक्ता अधिकारों वाला पोस्टर बनाइए। पृष्ठ 84 और 85 के विज्ञापनों से विचार लीजिए, और अंग्रेज़ी शिक्षक की मदद लीजिए।
- श्रीमती कृष्णा का शिकायत-पत्र: उन्होंने 6 महीने की वारंटी वाला रंगीन टी.वी. खरीदा; तीन महीने बाद वह बंद हो गया; दुकान के भेजे इंजीनियर के बाद भी बार-बार खराब होता रहा, और दुकानदार ने शिकायतों का जवाब नहीं दिया। उनके लिए अपने क्षेत्र के उपभोक्ता आयोग को पत्र लिखिए। नीचे एक नमूना है; कोष्ठक में अपनी बातें भरिए।
- उपभोक्ता क्लब: विद्यालय में उपभोक्ता क्लब बनाइए और उपभोक्ता जागरूकता कार्यशाला का अभ्यास कीजिए, जिसमें विद्यालय के पास की किताब की दुकानों, भोजनालयों और दुकानों के मुद्दे हों।
- नारों वाले विज्ञापन: किताब के नारे, जैसे “सतर्क उपभोक्ता ही सुरक्षित उपभोक्ता है।”, लेकर विज्ञापन बनाइए; “उठो, जागो और तब तक मत रुको” वाला नारा अपने शब्दों में पूरा कीजिए।
- साक्षात्कार: आसपास के चार-पाँच लोगों से पूछिए कि वे कैसे शोषण का शिकार हुए, और उनके अनुभव इकट्ठा कीजिए।
- सर्वेक्षण: पृष्ठ 89 की प्रश्नावली बाँटकर पता कीजिए कि आपके क्षेत्र के लोग उपभोक्ता के रूप में कितने जागरूक हैं (नीचे देखिए)।
परियोजना 2 का नमूना पत्र:
सेवा में, ज़िला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, [ज़िले का नाम]
विषय: खराब रंगीन टेलीविज़न के बारे में शिकायत
महोदय,
मैं, श्रीमती कृष्णा, [पता] की निवासी हूँ। मैंने [दुकान का नाम और पता] से [तारीख] को 6 महीने की वारंटी वाला एक रंगीन टेलीविज़न [कीमत] में खरीदा था।
तीन महीने बाद टी.वी. ने काम करना बंद कर दिया। शिकायत करने पर दुकानदार ने एक इंजीनियर भेजा, पर टी.वी. बार-बार खराब होता रहा। इसके बाद दुकानदार ने मेरी शिकायतों का कोई जवाब नहीं दिया।
टी.वी. वारंटी की अवधि में ही खराब हुआ है। यह दोषपूर्ण वस्तु और सेवा में कमी का मामला है। निवेदन है कि दुकानदार को टी.वी. बदलने या उसकी कीमत लौटाने, और मुझे हुई परेशानी का हर्जाना देने का आदेश दिया जाए।
साथ में: 1. खरीद का बिल 2. वारंटी कार्ड 3. शिकायतों का ब्योरा (तारीख सहित)
भवदीया, श्रीमती कृष्णा [पता, फ़ोन, तारीख]
पत्र में बिल और वारंटी ज़रूर लगाइए: अरिता के मामले में भी आयोग ने सबसे पहले यही माँगे थे (पृष्ठ 84)। टी.वी. का दावा 1 करोड़ से बहुत कम है, इसलिए पत्र ज़िला आयोग को जाएगा (पृष्ठ 84)।
ये परियोजनाएँ आपको अपने आसपास से करनी हैं; इनके नतीजे हर जगह अलग होंगे।
पृष्ठ 89 की प्रश्नावली: आप कितने जागरूक उपभोक्ता हैं?
यह प्रश्नावली परियोजना 6 के सर्वेक्षण के लिए है। इसमें 17 प्रश्न हैं, जैसे रसीद माँगना और रखना, शिकायत करना, आई.एस.आई. चिह्न और समाप्ति तिथि जाँचना, वज़न जाँचना, ब्रांड और दाम की तुलना, आकर्षक प्रस्ताव, और ऑटो में मीटर से चलने की माँग। हर प्रश्न पर एक खाने में निशान लगाना है: हमेशा (क), कभी–कभी (ख) या कभी नहीं (ग)।
नतीजा कैसे निकालें (किताब की टिप्पणी):
- प्रश्न 5, 12, 13, 15 और 16 पर ‘ग’ और बाकी सब पर ‘क’: उपभोक्ता के रूप में पूरी तरह जागरूक।
- प्रश्न 5, 12, 13, 15 और 16 पर ‘क’ और बाकी सब पर ‘ग’: जागरूक होने की ज़रूरत है।
- सभी प्रश्नों पर ‘ख’: आंशिक रूप से जागरूक।
ये पाँच प्रश्न उल्टे क्यों गिने जाते हैं? क्योंकि ये लापरवाही की आदतें हैं: ठगे जाने को अपना दुर्भाग्य मान लेना (5), ऊँची कीमत को ऊँची गुणवत्ता मान लेना (12), आकर्षक प्रस्तावों पर बेहिचक दौड़ पड़ना (13), नियमित दुकानदार पर आँख मूँदकर भरोसा (15), और वज़न की शंका के बिना होम डिलिवरी को मान लेना (16)।
झटपट दोहराइए
1. भारत में उपभोक्ता आंदोलन व्यवस्थित रूप में कब उभरा?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1960 के दशक में। (पृष्ठ 77)
2. संयुक्त राष्ट्र ने उपभोक्ता सुरक्षा के दिशा–निर्देश कब अपनाए?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1985 में। (पृष्ठ 78)
3. कोपरा का पूरा नाम क्या है, और उसका संशोधन कब हुआ?
उत्तर देखिए
उत्तर: उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986; संशोधन 2019 में। (पृष्ठ 78)
4. राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस कब मनाया जाता है, और क्यों?
उत्तर देखिए
उत्तर: 24 दिसंबर को, क्योंकि 1986 में इसी दिन संसद ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया था। (पृष्ठ 86)
5. RTI कानून कब लागू हुआ?
उत्तर देखिए
उत्तर: सन् 2005 के अक्टूबर में। (पृष्ठ 80)
6. ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय आयोग किन दावों के मुकदमे देखते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: ज़िला 1 करोड़ तक, राज्य 1 करोड़ से 10 करोड़ तक, राष्ट्रीय 10 करोड़ से ऊपर। (पृष्ठ 84)
7. उपभोक्ताओं का एक समूह के रूप में शिकायत करना क्या कहलाता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: क्लास एक्शन सूट। (पृष्ठ 82)
8. रेजी, अमृता और अबिरामी के मामले किन अधिकारों के उदाहरण हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: रेजी: सुरक्षा का अधिकार (पृष्ठ 79); अमृता: सूचना पाने का अधिकार, RTI (पृष्ठ 80); अबिरामी: चुनने का अधिकार (पृष्ठ 81)।
9. उपभोक्ता इंटरनेशनल क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: उपभोक्ता कल्याण संगठनों की अंतर्राष्ट्रीय संस्था; 100 से अधिक देशों की 200 संस्थाओं की संरक्षक संस्था। (पृष्ठ 78)
10. देश में कितने उपभोक्ता संगठन हैं, और कितने पूर्ण संगठित और मान्यता प्राप्त?
उत्तर देखिए
उत्तर: 2000 से अधिक; इनमें केवल 50–60। (पृष्ठ 86)
11. किन वस्तुओं के उत्पादकों के लिए प्रमाण लेना अनिवार्य है?
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उत्तर: जो सुरक्षा और स्वास्थ्य पर असर डालती हैं या बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होती हैं, जैसे एल.पी.जी. सिलिंडर, खाद्य रंग और उनमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री, सीमेंट, बोतलबंद पेयजल। (पृष्ठ 85)
12. 2019 के संशोधन में क्या नया जुड़ा?
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उत्तर: इंटरनेट से खरीद शामिल हुई; सेवा प्रदाता और निर्माता ज़िम्मेदार ठहराए जाएँगे, जेल तक हो सकती है; आयोग के बाहर तटस्थ मध्यस्थ से निपटारे को तीनों स्तरों पर बढ़ावा मिला। (पृष्ठ 87)
13. शिकायत दर्ज कराने के लिए क्या वकील ज़रूरी है?
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उत्तर: नहीं। उपभोक्ता वकील के साथ भी और वकील के बिना भी शिकायत दर्ज करा सकता है। (पृष्ठ 82)