Chapter 4वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

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कक्षा — 10 · विषय — अर्थशास्त्र · पृष्ठ — 55 से 73

यह पन्ना किसलिए — किताब के उदाहरण और आँकड़े जहाँ रुकते हैं, उसके आगे का हाल कक्षा तक लाने के लिए: विदेशी निवेश, फोर्ड, विदेश व्यापार, खिलौने, विश्व व्यापार संगठन, सेज़, श्रम क़ानून, छोटे उत्पादक और राजस्थान। हर हिस्से में पहले यह है कि किताब कहाँ रुकती है, फिर आज क्या है (तारीख़ और स्रोत के साथ), और फिर कक्षा में पूछने के सवाल, उनके उत्तर के साथ।

परीक्षा में बच्चे किताब वाले आँकड़े और बातें ही लिखें। यहाँ की नई बातें यह समझाने के लिए हैं कि आज हाल क्या है। आँकड़े बदलते रहते हैं, इसलिए पढ़ाने से पहले स्रोत का लिंक एक बार खोलकर देख लीजिए।

विदेशी निवेश: आज कितना आता है

किताब कहाँ रुकती है। किताब विदेशी निवेश की परिभाषा देती है: बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किया गया निवेश (पृष्ठ 57)। करीब 1991 से विदेश व्यापार और विदेशी निवेश पर से अवरोध काफ़ी हद तक हटाए गए (पृष्ठ 64), और बीते 20 वर्षों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारत में अपना निवेश बढ़ाया है (पृष्ठ 66)। कितना निवेश आया, इसकी रक़म किताब नहीं देती।

आज क्या है

  • 2025-26 में सकल विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI): 96,988 मिलियन अमेरिकी डॉलर, यानी 96.988 अरब डॉलर। इसमें इक्विटी 62,282, दोबारा लगाई गई कमाई (reinvested earnings) 27,780 और अन्य पूँजी 6,926 मिलियन डॉलर है। यह भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के 25 सितंबर 2026 के बुलेटिन का आँकड़ा है; इससे पहले छपे अनुमान इससे थोड़े अलग हैं, इसलिए कक्षा में यही आँकड़ा बताइए। स्रोत: RBI बुलेटिन, 25 सितंबर 2026, तालिका 35 (अंग्रेज़ी में)
  • अप्रैल 2000 से मार्च 2026 तक का कुल सकल FDI: लगभग 1.16 ट्रिलियन डॉलर (एक ट्रिलियन = एक हज़ार अरब)। स्रोत: इन्वेस्ट इंडिया, 10 जुलाई 2026 (अंग्रेज़ी में)
  • 2025-26 में FDI इक्विटी पाने वाला सबसे बड़ा क्षेत्र: कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर और हार्डवेयर, 13.9 अरब डॉलर। स्रोत: इन्वेस्ट इंडिया, 10 जुलाई 2026 (अंग्रेज़ी में)
  • ध्यान रखिए: RBI और इन्वेस्ट इंडिया के आँकड़े अलग स्रोतों के हैं और अलग समय पर छपे हैं। 13.9 अरब को RBI की इक्विटी से भाग देकर प्रतिशत मत निकालिए।

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब के अनुसार निवेश किस आशा से किया जाता है? 2025-26 के FDI में 27,780 मिलियन डॉलर “दोबारा लगाई गई कमाई” है। ये दोनों बातें कैसे जुड़ती हैं?

उत्तर: किताब (पृष्ठ 57) कहती है कि निवेश इस आशा से किया जाता है कि परिसंपत्तियाँ लाभ कमाएँगी। दोबारा लगाई गई कमाई का मतलब है कि भारत में पहले से काम कर रही विदेशी कंपनियों ने अपनी कमाई का हिस्सा यहीं फिर से लगा दिया। कोई कंपनी कमाई वहीं लगाती है जहाँ उसे आगे भी लाभ की आशा हो। यह किताब की पृष्ठ 66 वाली बात से मिलता है कि भारत में निवेश करना बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए लाभप्रद रहा है।

सवाल: 2025-26 में सबसे ज़्यादा FDI इक्विटी कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर और हार्डवेयर में आई। किताब की कौन-सी बातें इससे जोड़ी जा सकती हैं?

उत्तर: किताब पृष्ठ 57 पर कहती है कि भारत में अत्यंत कुशल इंजीनियर मिलते हैं, और पृष्ठ 67 पर बताती है कि वैश्वीकरण से सेवा देने वाली कंपनियों, ख़ासकर सूचना और संचार प्रौद्योगिकी वाली कंपनियों के लिए नये अवसर बने। निवेश का यह आँकड़ा इन्हीं दो बातों के साथ पढ़ाइए; कारण पक्का साबित करने वाला दावा मत कीजिए।

फोर्ड मोटर्स: किताब की कहानी के आगे

किताब कहाँ रुकती है। फोर्ड 1995 में भारत आई और चेन्नई के निकट 1,700 करोड़ रुपए लगाकर महिन्द्रा एंड महिन्द्रा के सहयोग से संयंत्र लगाया (पृष्ठ 59)। उसी बॉक्स की आख़िरी पंक्ति में किताब ख़ुद बता देती है: “वर्तमान वर्षों में फोर्ड कम्पनी ने भारत में बेचने के लिए कारों का उत्पादन बंद कर दिया है लेकिन कारों और कार के इंजनों का लघु स्तर पर निर्यात करती है।” (पृष्ठ 59) इसलिए कारों का उत्पादन बंद होना कक्षा में नई ख़बर की तरह मत बताइए; नई बात उसके बाद की है।

आज क्या है

  • साणंद (गुजरात) का कारख़ाना बिका: 10 जनवरी 2023 को टाटा पैसेंजर इलेक्ट्रिक मोबिलिटी लिमिटेड (TPEML) ने फोर्ड इंडिया के साणंद संयंत्र की ख़रीद पूरी की। इसमें साणंद की संपत्ति और वहाँ का वाहन बनाने का संयंत्र और मशीनें शामिल हैं। कुल रक़म, करों को छोड़कर, 725.7 करोड़ रुपए। स्रोत: टाटा मोटर्स की प्रेस विज्ञप्ति, 10 जनवरी 2023 (अंग्रेज़ी में)
  • चेन्नई का संयंत्र: समझौता हुआ, उत्पादन 2029 से: 13 सितंबर 2024 को फोर्ड ने बताया कि उसने तमिलनाडु सरकार को आशय-पत्र (Letter of Intent) दिया है, जिसमें चेन्नई संयंत्र को निर्यात के लिए निर्माण में लगाने का इरादा जताया गया। स्रोत: फोर्ड, 13 सितंबर 2024 (अंग्रेज़ी में) फिर 31 अक्टूबर 2025 को फोर्ड ने तमिलनाडु सरकार के साथ समझौता-ज्ञापन (MoU) किया: चेन्नई के पास मरैमलै नगर का संयंत्र इंजन बनाने के लिए तैयार होगा, लगभग 37 करोड़ अमेरिकी डॉलर के निवेश से। क्षमता साल में लगभग 2,35,000 इंजन की होगी, उत्पादन 2029 में शुरू होना है, और इंजन विदेश के बाज़ारों के लिए होंगे। स्रोत: Automotive World, 31 अक्टूबर 2025 (अंग्रेज़ी में)

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: साणंद के सौदे में 725.7 करोड़ रुपए देकर संपत्ति, संयंत्र और मशीनें ख़रीदी गईं। किताब की भाषा में इस ख़र्च को क्या कहेंगे?

उत्तर: निवेश। किताब (पृष्ठ 57) भूमि, भवन, मशीन और दूसरे उपकरण जैसी परिसंपत्तियाँ खरीदने में ख़र्च किए गए पैसे को निवेश कहती है। बच्चों का ध्यान इस पर दिलाइए कि यहाँ फोर्ड ने निवेश नहीं किया; फोर्ड का कारख़ाना किसी दूसरी कंपनी ने ख़रीदा।

सवाल: फोर्ड ने चेन्नई के संयंत्र के लिए तमिलनाडु सरकार से समझौता किया है। क्या इसका मतलब है कि वहाँ उत्पादन फिर शुरू हो गया?

उत्तर: नहीं। समझौते के अनुसार इंजन का उत्पादन 2029 में शुरू होना है। “समझौता हुआ” और “काम शुरू हुआ” दो अलग बातें हैं; अख़बार पढ़ते समय भी बच्चों को यह फ़र्क़ देखना सिखाइए।

विदेश व्यापार: आज का निर्यात

किताब कहाँ रुकती है। पृष्ठ 59 से 61 पर किताब बताती है कि विदेश व्यापार उत्पादक को अपने देश से बाहर के बाज़ार तक पहुँचने का अवसर देता है, ख़रीदारों के विकल्प बढ़ाता है, और अलग-अलग देशों के बाज़ारों को जोड़ता है। पृष्ठ 67 पर सेवाओं का निर्यात भी है: आँकड़ा प्रविष्टि, लेखाकरण, प्रशासनिक कार्य और इंजीनियरिंग जैसी सेवाएँ भारत जैसे देशों से विकसित देशों को जाती हैं। भारत कुल कितना निर्यात करता है, यह किताब नहीं बताती।

आज क्या है

  • 2025-26 का निर्यात: PIB के अनुसार यह भारत का अब तक का सबसे ऊँचा निर्यात है: 863.1 अरब डॉलर। इसमें वस्तुओं का निर्यात 441.8 अरब डॉलर और सेवाओं का निर्यात 421.3 अरब डॉलर है। स्रोत: PIB, 28 जुलाई 2026 (अंग्रेज़ी में)
  • भारत–ब्रिटेन व्यापार समझौता (CETA): उसी विज्ञप्ति के अनुसार 15 जुलाई 2026 से लागू है। स्रोत: PIB, 28 जुलाई 2026 (अंग्रेज़ी में)

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: 2025-26 में भारत के 863.1 अरब डॉलर के निर्यात में 421.3 अरब डॉलर सेवाओं के थे, यानी आधे से थोड़ा कम। किताब में कौन-सी सेवाएँ भारत से बाहर जाती दिखाई गई हैं?

उत्तर: किताब (पृष्ठ 67) लंदन की कंपनी के लिए पत्रिका छापने और कॉल सेंटर को सूचना और संचार प्रौद्योगिकी वाली कंपनियों के नये अवसरों के उदाहरण बताती है। इसके अलावा आँकड़ा प्रविष्टि (डाटा एन्ट्री), लेखाकरण, प्रशासनिक कार्य और इंजीनियरिंग जैसी सेवाएँ गिनाती है, जो भारत जैसे देशों में सस्ते में उपलब्ध हैं और विकसित देशों को निर्यात की जाती हैं। आज का आँकड़ा दिखाता है कि सेवाओं का यह निर्यात कितना बड़ा हो गया है।

सवाल: 441.8 अरब डॉलर की भारतीय वस्तुएँ दूसरे देशों के बाज़ारों में बिकीं। किताब के अनुसार ऐसे व्यापार से दोनों तरफ़ के बाज़ारों पर क्या असर पड़ता है?

उत्तर: किताब (पृष्ठ 61) के अनुसार वस्तुएँ एक बाज़ार से दूसरे बाज़ार में जाती हैं, बाज़ार में विकल्प बढ़ते हैं, दोनों बाज़ारों में एक ही वस्तु का मूल्य एक समान होने लगता है, और दूर-दूर के उत्पादक एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं। यही बाज़ारों का एकीकरण है।

खिलौने: किताब की कहानी पलट गई

किताब कहाँ रुकती है। पृष्ठ 60 पर चीनी खिलौने सस्ते दाम और नये डिज़ाइनों के कारण भारत में छा जाते हैं; किताब के अनुसार एक वर्ष में ही खिलौने की 70 से 80 प्रतिशत दुकानों में उन्होंने भारतीय खिलौनों की जगह ले ली। भारतीय ख़रीदारों को कम कीमत पर अधिक विकल्प मिले, और भारतीय खिलौना निर्माताओं को हानि हुई, क्योंकि उनके खिलौने कम बिके। कहानी यहीं रुकती है।

आज क्या है

नीचे की सारी बातें एक ही स्रोत से हैं: PIB, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय, 28 जुलाई 2026 (अंग्रेज़ी में)

  • आयात पर कर बढ़ा: खिलौनों (HS कोड 9503) पर मूल सीमा-शुल्क (Basic Custom Duty) फ़रवरी 2020 में 20% से बढ़ाकर 60% किया गया, और 2023 में 70%।
  • गुणवत्ता का नियम: खिलौनों के लिए गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) 25 फ़रवरी 2020 को जारी हुआ और 1 जनवरी 2021 से लागू हुआ।
  • गुणवत्ता कितनी सुधरी: 2019 की एक जाँच (Mystery Shopping) में घरेलू बाज़ार के केवल 33% खिलौने BIS मानकों पर ठीक निकले। 2025 के BIS सर्वेक्षण में 95% नमूने मानकों पर खरे उतरे।
  • आयात और निर्यात: आयात 2018-19 में 371.7 मिलियन डॉलर था और 2025-26 में 232.3 मिलियन डॉलर रह गया (37.5% कम)। निर्यात इसी दौरान 203.5 से बढ़कर 384.7 मिलियन डॉलर हुआ (89.1% अधिक)। ये आँकड़े PIB की तालिका के हैं, जिसमें HS कोड 9503, 9504 और 9505 मिलाकर गिने गए हैं (तालिका का स्रोत: Tradestat)।
  • 28 जुलाई 2026 तक: भारत का खिलौना उद्योग शुद्ध निर्यातक (net exporter) बन गया है, यानी खिलौनों का निर्यात आयात से ज़्यादा है। सरकार की अलग से कोई खिलौना नीति अभी नहीं है।

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: खिलौनों पर आयात का कर 20% से बढ़कर 70% हुआ। किताब की भाषा में यह क्या है?

उत्तर: व्यापार अवरोधक। किताब (पृष्ठ 64) आयात पर कर को व्यापार अवरोधक का उदाहरण बताती है; इससे सरकार तय कर सकती है कि कौन-सी वस्तुएँ कितनी मात्रा में आएँ। न्यायसंगत वैश्वीकरण वाले हिस्से में किताब यह भी कहती है कि ज़रूरी हो तो सरकार व्यापार और निवेश अवरोधकों का उपयोग करे (पृष्ठ 70)।

सवाल: आयात 37.5% घटा और निर्यात 89.1% बढ़ा। क्या कह सकते हैं कि यह सब आयात-कर की वजह से हुआ?

उत्तर: अकेले आयात-कर को इसका श्रेय नहीं दे सकते। इसी दौर में गुणवत्ता का नियम भी लागू हुआ और मानक पर खरे खिलौने 33% से 95% तक पहुँचे। जब कई क़दम एक साथ उठे हों, तो एक आँकड़े से किसी एक कारण को साबित नहीं किया जा सकता। “क्या हुआ” और “क्यों हुआ” अलग सवाल हैं।

सवाल: किताब कहती है कि ख़रीदारों को कम कीमत पर अधिक विकल्प मिले (पृष्ठ 60)। 2019 में बाज़ार के केवल 33% खिलौने मानक पर ठीक निकले। क्या सस्ता हमेशा फ़ायदे का सौदा है?

उत्तर: ज़रूरी नहीं। कम दाम ख़रीदार के फ़ायदे की बात है, पर गुणवत्ता भी देखनी होती है, ख़ासकर बच्चों के खिलौनों में। गुणवत्ता नियंत्रण आदेश इसी गुणवत्ता से जुड़ा क़दम है।

विश्व व्यापार संगठन (WTO): आज का हाल

किताब कहाँ रुकती है। पृष्ठ 65 पर विश्व व्यापार संगठन विकसित देशों की पहल पर शुरू होता है; वह अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के नियम तय करता है और देखता है कि उनका पालन हो। किताब के अनुसार विश्व के लगभग 160 देश इसके सदस्य हैं। उसी पृष्ठ पर कृषि व्यापार की बहस है, जिसमें विकासशील देश पूछते हैं कि क्या यह मुक्त और न्यायसंगत व्यापार है।

आज क्या है

  • सदस्य: WTO की वेबसाइट के अनुसार उसके 166 सदस्य हैं, और विश्व व्यापार का 98% इन्हीं के बीच होता है। परीक्षा में किताब वाली संख्या, लगभग 160 देश, ही लिखवाइए। स्रोत: WTO, Who we are (अंग्रेज़ी में)
  • अपील सुनने वाला निकाय ठप: व्यापार-विवादों में अपील सुनने वाला अपीलीय निकाय (Appellate Body) अभी अपीलें नहीं सुन पा रहा, क्योंकि उसकी जगहें ख़ाली हैं। उसके आख़िरी सदस्य का कार्यकाल 30 नवंबर 2020 को पूरा हो गया था। स्रोत: WTO, Appellate Body (अंग्रेज़ी में)
  • 14वाँ मंत्रिस्तरीय सम्मेलन (MC14): 26 से 30 मार्च 2026 तक याउंडे (कैमरून) में हुआ। स्रोत: WTO, MC14 (अंग्रेज़ी में)
  • MC14 का नतीजा: 30 मार्च 2026 को सम्मेलन कुछ फ़ैसलों और इस वादे के साथ ख़त्म हुआ कि बचे हुए बड़े मुद्दों पर काम जिनेवा में जारी रहेगा। ई-कॉमर्स से जुड़े मुद्दों और TRIPS से जुड़े एक मुद्दे पर सम्मेलन के अध्यक्ष ने कहा कि समय कम पड़ गया। मछली पकड़ने के क्षेत्र को मिलने वाली सब्सिडी पर मंत्री बातचीत जारी रखने पर सहमत हुए। स्रोत: WTO समाचार, 30 मार्च 2026 (अंग्रेज़ी में)
  • अगला सम्मेलन (MC15): 5 और 6 अक्टूबर 2026 की जनरल काउंसिल बैठक तक इसकी तारीख़ें तय नहीं हुई थीं। स्रोत: WTO समाचार, जनरल काउंसिल, 5–6 अक्टूबर 2026 (अंग्रेज़ी में)

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब कहती है कि WTO व्यापार के नियम तय करता है और देखता है कि उनका पालन हो। अगर अपील सुनने वाला निकाय 2020 से ख़ाली है, तो इन दोनों में से कौन-सा काम कमज़ोर पड़ता है?

उत्तर: पालन करवाने वाला काम। जब दो सदस्यों में व्यापार को लेकर विवाद होता है और कोई पक्ष अपील करता है, तो अभी उस अपील की सुनवाई ही नहीं हो पा रही। नियम लिख देना एक बात है; उन्हें मनवाने का तंत्र चलना दूसरी।

सवाल: MC14 में कुछ बड़े मुद्दे बिना फ़ैसले के रह गए। किताब का कौन-सा उदाहरण दिखाता है कि सदस्य देशों के हित आपस में टकराते हैं?

उत्तर: कृषि व्यापार वाली बहस (पृष्ठ 65)। अमेरिका के जी.डी.पी. में कृषि का हिस्सा केवल एक प्रतिशत है, फिर भी वहाँ के किसानों को सरकार से बहुत अधिक धन मिलता है। इससे वे अपनी उपज बहुत कम कीमत पर बेच पाते हैं और दूसरे देशों के किसानों पर बुरा असर पड़ता है। विकासशील देश इसे अनुचित मानते हैं। जितने ज़्यादा सदस्य और जितने अलग उनके हित, सहमति उतनी ही कठिन।

विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ): कर की छूट आज

किताब कहाँ रुकती है। पृष्ठ 67 पर किताब बताती है कि विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारें विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज़) बना रही हैं, जिनमें विश्व स्तरीय सुविधाएँ होनी चाहिए, और सेज़ में उत्पादन इकाई लगाने वाली कंपनियों को आरंभिक पाँच वर्षों तक कोई कर नहीं देना पड़ता।

आज क्या है

  • 31 मार्च 2026 तक: देश में 368 सेज़ अधिसूचित हैं, और 277 सेज़ चालू हैं। 2025-26 में सेज़ से 16,36,192 करोड़ रुपए (185.28 अरब डॉलर) का निर्यात हुआ। सेज़ में रोज़गार: 32,61,147 लोग। स्रोत: सेज़ फ़ैक्ट शीट, 31 मार्च 2026 (अंग्रेज़ी में)
  • क़ानून में छूट कैसी है: आयकर अधिनियम 1961 की धारा 10AA के अनुसार सेज़ की इकाई को निर्यात से हुए लाभ पर पहले पाँच कर-निर्धारण वर्षों तक 100% कटौती मिलती है, अगले पाँच वर्षों तक 50%, और उसके बाद के पाँच वर्षों में 50% तक, पर केवल उतने लाभ पर जो दोबारा निवेश के लिए एक अलग खाते (Re-investment Reserve Account) में रखा जाए। यानी छूट पूरी कमाई पर नहीं, निर्यात से हुए लाभ पर है। स्रोत: आयकर अधिनियम 1961, धारा 10AA (अंग्रेज़ी में)
  • नई इकाइयों के लिए अब नहीं: धारा 10AA की छूट उन्हीं इकाइयों के लिए है जिन्होंने 1 अप्रैल 2006 या उसके बाद और 1 अप्रैल 2021 से पहले शुरू होने वाले कर-निर्धारण वर्षों से जुड़े वर्षों में उत्पादन या सेवा शुरू की। सीधी भाषा में, यह समय-सीमा 2021 से पहले ही पूरी हो चुकी है। आयकर अधिनियम 2025 की धारा 144 भी यह कटौती उन्हीं को देती है जो पुरानी धारा के तहत हक़दार थे, और उतने ही वर्षों तक जितने धारा 10AA में मिलते। यानी नई इकाई को यह छूट नहीं मिलती; पुरानी इकाइयाँ अपने बचे हुए वर्ष ले सकती हैं। स्रोत: धारा 10AA (अंग्रेज़ी में); आयकर अधिनियम 2025, धारा 144 (अंग्रेज़ी में)

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब कहती है कि सेज़ में आरंभिक पाँच वर्षों तक कोई कर नहीं। क़ानून की धारा इससे कैसे अलग है?

उत्तर: धारा 10AA में छूट निर्यात से हुए लाभ पर है: पहले पाँच वर्ष 100%, अगले पाँच वर्ष 50%, और फिर पाँच वर्ष तक दोबारा निवेश के लिए अलग रखे गए लाभ पर 50% तक। और यह छूट अब नई इकाइयों को नहीं मिलती। परीक्षा में किताब वाली बात ही लिखवाइए; यह समझ इसलिए है कि कोई बच्चा पूछे तो आप सही जवाब दे सकें।

सवाल: किताब के अनुसार सेज़ बनाने का मक़सद क्या है, और आज के आँकड़े सेज़ के बारे में क्या बताते हैं?

उत्तर: किताब (पृष्ठ 67) के अनुसार मक़सद विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश के लिए आकर्षित करना है। आज 277 सेज़ चालू हैं; 2025-26 में इनसे 16,36,192 करोड़ रुपए का निर्यात हुआ, और 31 मार्च 2026 तक इनमें 32,61,147 लोग काम कर रहे थे।

श्रम क़ानून: “लचीलेपन” के आगे

किताब कहाँ रुकती है। पृष्ठ 67 पर किताब बताती है कि सरकार ने कंपनियों को अनेक नियमों से छूट लेने की अनुमति दी है; अब कंपनियाँ काम का दबाव अधिक होने पर श्रमिकों को छोटी अवधि के लिए रखती हैं, जिससे श्रम लागत घटती है। पृष्ठ 69 पर सुशीला स्थायी से अस्थायी श्रमिक बन जाती है, और स्थायी श्रमिक के रूप में मिलने वाले स्वास्थ्य बीमा और भविष्य निधि जैसे लाभ उसके हाथ से चले जाते हैं। पृष्ठ 70 पर किताब कहती है कि सरकार श्रमिक क़ानूनों का उचित कार्यान्वयन करे और श्रमिकों को उनके अधिकार मिलें।

आज क्या है

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब (पृष्ठ 67) में “श्रम कानूनों में लचीलापन” किसके फ़ायदे के लिए था?

उत्तर: कंपनियों के। किताब के अनुसार इससे कंपनियाँ श्रमिकों को नियमित आधार पर रखने के बजाय छोटी अवधि के लिए रखती हैं और उनकी श्रम लागत घटती है। श्रमिक के लिए इसका नतीजा यह है कि उसका रोज़गार अब सुनिश्चित नहीं रहा (पृष्ठ 69)।

सवाल: सुशीला से स्वास्थ्य बीमा और भविष्य निधि जैसे लाभ छिन गए। 2025 की संहिताओं में गिग और प्लेटफ़ॉर्म श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा के लिए क्या रखा गया है?

उत्तर: एग्रीगेटर कंपनियाँ सालाना कारोबार का 1% से 2% के बीच का हिस्सा (श्रमिकों को किए गए भुगतान के 5% तक) सामाजिक सुरक्षा कोष में देंगी, और श्रमिक ई-श्रम पोर्टल पर ख़ुद पंजीकरण कर सकते हैं। यह किताब की उस बात से जुड़ता है कि सरकार श्रमिक क़ानूनों का उचित कार्यान्वयन करे (पृष्ठ 70)। पर क़ानून में लिखा होना और हर श्रमिक तक लाभ पहुँचना दो अलग बातें हैं।

छोटे उत्पादक: किताब के “11 करोड़” के आगे

किताब कहाँ रुकती है। पृष्ठ 68 पर रवि की संधारित्र बनाने वाली छोटी कंपनी आयात की प्रतिस्पर्धा में सिकुड़ जाती है; बैटरी, संधारित्र, प्लास्टिक, खिलौने, टायर, डेयरी उत्पाद और खाद्य तेल के छोटे उत्पादकों पर मार पड़ती है। किताब बताती है कि कृषि के बाद सबसे अधिक श्रमिक (11 करोड़) लघु और मध्यम उद्योगों में काम करते हैं।

आज क्या है

  • PIB की अगस्त 2026 की फ़ैक्टशीट के अनुसार: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के हवाले से, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) देश के जी.डी.पी. का 31.1%, विनिर्माण उत्पादन का 35.4% और निर्यात का 48.58% देते हैं। अगस्त 2026 तक 9.16 करोड़ MSME उद्यम (Udyam) प्लेटफ़ॉर्म पर पंजीकृत हैं, और इनमें 40 करोड़ से अधिक लोगों को रोज़गार बताया गया है। स्रोत: PIB फ़ैक्टशीट, अगस्त 2026 (अंग्रेज़ी में)
  • ध्यान रखिए: ये गिनतियाँ उद्यम प्लेटफ़ॉर्म पर हुए पंजीकरणों पर टिकी हैं। किताब का 11 करोड़ लघु और मध्यम उद्योगों के श्रमिकों की एक अलग और पुरानी गिनती है। दोनों अलग तरीक़ों से बनी हैं, इसलिए इन्हें घटाकर “इतने बढ़े” मत कहिए।

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब में छोटे उत्पादक प्रतिस्पर्धा में हारते दिखते हैं (पृष्ठ 68), और आज MSME देश के निर्यात का 48.58% देते हैं। क्या ये दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं?

उत्तर: हाँ। किताब का अपना निष्कर्ष यही है कि उत्पादकों और श्रमिकों पर वैश्वीकरण का असर एक समान नहीं पड़ा (पृष्ठ 66–67)। कुछ छोटे उत्पादक प्रतिस्पर्धा में बंद हुए, तो कई बाहर के बाज़ार तक भी पहुँचे। किताब यह भी कहती है कि सरकार छोटे उत्पादकों की तब तक मदद करे, जब तक वे प्रतिस्पर्धा के लिए सक्षम न हो जाएँ (पृष्ठ 70)।

सवाल: किताब के 11 करोड़ और आज के “40 करोड़ से अधिक” को घटाकर क्या नए रोज़गार की गिनती निकाल सकते हैं?

उत्तर: नहीं। किताब का आँकड़ा लघु और मध्यम उद्योगों के श्रमिकों का है; आज का आँकड़ा उद्यम प्लेटफ़ॉर्म पर पंजीकृत इकाइयों में बताए गए रोज़गार का है। दोनों अलग समय पर, अलग तरीक़े से बने हैं। बच्चों में यही आदत डालिए: दो आँकड़ों की तुलना से पहले पूछिए कि दोनों किसे और कैसे गिनते हैं।

राजस्थान की कड़ी: नीमराना, घीलोठ और जयपुर

किताब कहाँ रुकती है। किताब के उदाहरण लुधियाना, चेन्नई, होसुर और दिल्ली जैसी जगहों के हैं (पृष्ठ 58 से 69)। पर बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ जगह कैसे चुनती हैं (पृष्ठ 56–57) और सरकारें विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए क्या क़दम उठाती हैं (पृष्ठ 67), यह राजस्थान में भी दिखता है।

आज क्या है

  • नीमराना का जापानी ज़ोन: RIICO ने नीमराना औद्योगिक क्षेत्र में जापानी ज़ोन बनाया है। राजस्थान आर्थिक समीक्षा 2022-23 के अनुसार उस समय ज़ोन में 46 इकाइयाँ चालू थीं और इनमें 6,473.52 करोड़ रुपए का निवेश हुआ था। ये आँकड़े 2022-23 के हैं; आज की संख्या इससे अलग हो सकती है। स्रोत: राजस्थान आर्थिक समीक्षा 2022-23, पृष्ठ 81–82 (अंग्रेज़ी में)
  • घीलोठ में दूसरा जापानी ज़ोन: उसी समीक्षा के अनुसार घीलोठ औद्योगिक क्षेत्र में लगभग 534 एकड़ में एक और जापानी ज़ोन बनाया गया है। स्रोत: राजस्थान आर्थिक समीक्षा 2022-23 (अंग्रेज़ी में)
  • “पहले” होने का दावा: राज्य सरकार की निवेश-पुस्तिका (Rising Rajasthan) नीमराना और घीलोठ के जापानी ज़ोन को भारत के पहले देश-विशिष्ट (country-specific) ज़ोन बताती है। स्रोत: Rising Rajasthan निवेश-पुस्तिका (अंग्रेज़ी में)
  • राजस्थान के चालू सेज़, 31 मार्च 2026 तक: तीन। जयपुर सेज़ (RIICO) के सेज़-I और सेज़-II, सीतापुर (Sitapur), जयपुर, रत्न और आभूषण के लिए; और महिन्द्रा वर्ल्ड सिटी (जयपुर), गाँव कालवाड़ा (Kalwara), सांगानेर, कई तरह के उत्पादों के लिए (multi-product)। नीमराना का नाम चालू सेज़ की इस सूची में नहीं है; वह RIICO का औद्योगिक क्षेत्र है। स्रोत: चालू सेज़ की सूची, 277 सेज़ (अंग्रेज़ी में)

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब के अनुसार बहुराष्ट्रीय कंपनी उत्पादन के लिए जगह कैसे चुनती है? RIICO ने एक ज़ोन ख़ास तौर पर जापानी कंपनियों के लिए क्यों बनाया होगा?

उत्तर: किताब (पृष्ठ 56–57) के अनुसार कंपनी वह जगह चुनती है जो बाज़ार के नज़दीक हो, जहाँ कम लागत पर कुशल और अकुशल श्रम मिले, उत्पादन के दूसरे कारक उपलब्ध हों और सरकारी नीतियाँ उसके हितों का ध्यान रखें। एक देश की कंपनियों के लिए अलग ज़ोन बनाना इसी आख़िरी बात का एक रूप है। किताब (पृष्ठ 67) भी बताती है कि केन्द्र और राज्य सरकारें विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने के लिए क़दम उठा रही हैं। किताब का उदाहरण सेज़ है; नीमराना का जापानी ज़ोन सेज़ नहीं है (अगला सवाल देखिए), पर वह भी इसी तरह का एक क़दम माना जा सकता है।

सवाल: क्या नीमराना सेज़ है?

उत्तर: नहीं। 31 मार्च 2026 की चालू सेज़ की सूची में राजस्थान के तीन सेज़ हैं: जयपुर सेज़ के दो (रत्न और आभूषण) और महिन्द्रा वर्ल्ड सिटी, जयपुर। नीमराना RIICO का औद्योगिक क्षेत्र है, जिसमें जापानी ज़ोन है। सेज़ और औद्योगिक क्षेत्र को एक मत मानिए।