Chapter 3मुद्रा और साख

Teaching notes30 minSources checked

NCERT, आर्थिक विकास की समझ (कक्षा 10), अध्याय 3

This note is written in Hindi.Read in Hindi →

कक्षा — 10 · विषय — अर्थशास्त्र (आर्थिक विकास की समझ) · पृष्ठ — 39 से 53

यह पन्ना किसलिए — किताब हाथ में लेकर पढ़ाते समय साथ रखने के लिए। हर कार्ड किताब के कुछ पन्नों का है: उन पन्नों की ज़रूरी पंक्तियाँ, उन्हें कक्षा में कैसे खोलें, और बच्चे कहाँ अटकते हैं। कार्ड के ऊपर लिखा है कि वह पाठ योजना के किस कालांश का है।

किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ हैं (2026-27 में छपी किताब)। जो बात किताब की नहीं, हमारी है, उसके आगे “हमारी ओर से” लिखा है। प्रश्नावली की कुंजी, परिभाषाएँ और आँकड़ों की तालिका शिक्षक संदर्शिका में हैं; यहाँ उनके लिंक हैं।

किताब के साथ, पन्ना-दर-पन्ना

पृष्ठ 39–40 — मुद्रा: विनिमय का माध्यम

कालांश 1 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: शुरुआत · इंटरैक्टिव: 1. विनिमय का माध्यम

किताब कहाँ से शुरू करती है। रोज़ के लेन-देन से (पृष्ठ 39)। हमारे बहुत से लेन-देन में वस्तुएँ और सेवाएँ मुद्रा से ख़रीदी-बेची जाती हैं; कुछ में उस समय मुद्रा नहीं दी जाती, बस बाद में भुगतान का वादा होता है। यह दूसरी बात अभी छोटी लगती है, पर अध्याय का पूरा दूसरा हिस्सा, ऋण, इसी से खुलता है। फिर किताब एक जूता निर्माता को लेती है, जो जूते बेचकर गेहूँ ख़रीदना चाहता है।

हमारी ओर से — बिना पैसे का बाज़ार। किताब के चित्र (पृष्ठ 39) की तरह तीन बच्चे सामने बुलाइए: एक जूते वाला, एक गेहूँ वाला, एक मिट्टी के बर्तन वाला। जूते वाला गेहूँ के बदले जूते देना चाहता है; गेहूँ वाले को जूते नहीं, कपड़े चाहिए; और बर्तन वाले को जूते चाहिए, पर उसके पास गेहूँ नहीं। पूछिए: जूते वाले को गेहूँ कैसे मिलेगा? उत्तर इस दिशा में आए: उसे ऐसा किसान खोजना पड़ेगा जो गेहूँ बेचना भी चाहे और बदले में जूते ख़रीदना भी। अब जूते वाले के हाथ में मुद्रा लिखी एक पर्ची दीजिए: वह पहले जूते बेचकर मुद्रा ले, फिर उसी मुद्रा से गेहूँ ख़रीदे। अब उसे बस जूतों का ख़रीदार चाहिए।

यहीं रुकिए। बोर्ड पर शब्द लिखिए: आवश्यकताओं का दोहरा संयोग। जो वस्तु एक व्यक्ति बेचना चाहता है, वही दूसरा ख़रीदना चाहे, और दूसरा जो बेचना चाहता है, वह पहला ख़रीदना चाहे। वस्तु विनिमय प्रणाली में, जहाँ मुद्रा के बिना वस्तुओं का विनिमय होता है, यह संयोग ज़रूरी है; मुद्रा बीच की कड़ी बनकर इसकी ज़रूरत ख़त्म कर देती है, इसलिए उसे विनिमय का माध्यम कहते हैं। पृष्ठ 39 पर यह शब्द मोटे अक्षरों में थोड़ा ग़लत छपा है; कॉपी में पूरा, सही शब्द लिखवाइए।

फिर मुद्रा का बदलता रूप (पृष्ठ 40)।

  • बहुत प्रारंभिक काल से भारतीय अनाज और पशु का मुद्रा के रूप में इस्तेमाल करते थे।
  • इसके बाद, पिछली सदी तक, सोना, चाँदी और ताँबे जैसी धातुओं के सिक्के चले।
  • आज करेंसी, यानी कागज़ के नोट और सिक्के, और बैंकों में माँग जमा।

इसी पन्ने पर सिक्कों की तस्वीरें हैं: प्रारम्भिक आहत सिक्के (लगभग 2500 वर्ष पुराने), गुप्तकालीन सिक्के, तुगलक के सिक्के, अकबर कालीन सोने की मोहर और आधुनिक सिक्का। बच्चों से बस इतना कहलवाइए कि मुद्रा का रूप बदलता रहा, पर काम वही रहा: विनिमय का माध्यम।

यह सवाल पूछिए (हमारी ओर से)। आपके घर में कौन-सा लेन-देन ऐसा होता है, जिसमें उसी समय पैसे नहीं दिए जाते? जैसे दुकान से सामान लेकर महीने के आख़िर में पैसे देना। किताब इसे बाद में भुगतान का वादा कहती है; पृष्ठ 43 पर यही ऋण की परिभाषा बनता है। बच्चे अपने उत्तर कॉपी में लिख लें, कालांश 4 में काम आएँगे।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। मुद्रा को सिर्फ़ नोट और सिक्के समझ लेना। किताब बैंकों में माँग जमा को भी मुद्रा गिनती है (पृष्ठ 40–41); यह अगले कालांश की बात है, अभी बस संकेत दे दीजिए। बाक़ी भूलें संदर्शिका की आठ आम भूलें में हैं।

इसी हिस्से में। पृष्ठ 39 का सवाल और पृष्ठ 40 का कार्यकलाप संदर्शिका के पृष्ठ 39 के सवाल और पृष्ठ 40 के कार्यकलाप में हैं। फ़्लैशकार्ड 1–8; प्रश्न बैंक क1, क2, ख1, घ1।

पृष्ठ 40–42 — मुद्रा के आधुनिक रूप

कालांश 2 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 2. मुद्रा के आधुनिक रूप

किताब कहाँ से शुरू करती है। एक उलझन से (पृष्ठ 40)। आज की मुद्रा सोने, चाँदी या ताँबे की नहीं, और अनाज या पशुओं की तरह रोज़ के काम की चीज़ भी नहीं; उसका अपना कोई इस्तेमाल नहीं। फिर भी उसे विनिमय का माध्यम इसलिए स्वीकार किया जाता है, क्योंकि देश की सरकार उसे प्राधिकृत करती है। भारत में भारतीय रिज़र्व बैंक केंद्रीय सरकार की तरफ़ से करेंसी नोट जारी करता है, और कानून किसी और व्यक्ति या संस्था को मुद्रा जारी करने की इजाज़त नहीं देता। भारत में कोई व्यक्ति कानूनी तौर पर रुपयों में अदायगी को अस्वीकार नहीं कर सकता।

हमारी ओर से — दस रुपये का नोट हाथ में लीजिए। एक नोट कक्षा में घुमाइए और बच्चों से ढूँढ़वाइए कि उस पर किसका नाम छपा है और क्या वचन लिखा है। यही किताब की प्रश्नावली का चौथा प्रश्न है; नोट पर छपा वचन और उसका मतलब संदर्शिका में प्रश्न 4 के उत्तर में है।

बैंकों में जमा (पृष्ठ 40–41)। लोगों को रोज़ के खर्च के लिए थोड़ी ही करेंसी चाहिए। जैसे महीने के आख़िर में वेतन पाने वाले मज़दूरों के पास अतिरिक्त नकद होता है, जिसे वे बैंक में अपने नाम का खाता खोलकर जमा कर देते हैं। बैंक इस पर सूद देता है, पैसा सुरक्षित रहता है, और ज़रूरत पर निकाला जा सकता है। क्योंकि यह जमा माँगने पर निकाला जा सकता है, इसे माँग जमा कहते हैं।

फिर चैक। किताब का उदाहरण: जूता निर्माता एम. सलीम चमड़ा आपूर्तिकर्ता को चैक देता है; आपूर्तिकर्ता उसे अपने बैंक खाते में जमा करता है, और कुछ दिनों में धन एक खाते से दूसरे में चला जाता है। लेन-देन बिना नकद के पूरा हो गया। इसीलिए किताब कहती है कि आधुनिक अर्थव्यवस्था में माँग जमा भी मुद्रा है, और मुद्रा के आधुनिक रूप, करेंसी और जमा, बैंक प्रणाली से बहुत क़रीब से जुड़े हैं।

हमारी ओर से — चैक का खाका। बोर्ड पर एक लंबा आयत बनाइए और उसमें तीन ख़ाली जगहें: किसके खाते से, किसे देना है, कितनी रकम। किताब के पृष्ठ 41 वाले चैक के अंक मत लिखवाइए; बस यह दिखाइए कि चैक बैंक को एक आदेश है।

यहीं रुकिए। पूछिए: चैक मुद्रा है, या माँग जमा? उत्तर: माँग जमा मुद्रा है। चैक तो बैंक को आदेश है कि खाताधारक के खाते से चैक पर लिखे नाम वाले व्यक्ति को एक ख़ास रकम दी जाए (पृष्ठ 41)।

शिक्षकों के लिए निर्देश (पृष्ठ 38)। किताब के शुरू में शिक्षकों के लिए एक पन्ना है: नवंबर 2016 में 500 और 1000 रुपये के नोट अमान्य घोषित किए गए, और लोगों को उनके बदले 500 तथा 2000 रुपये के नए नोट लेने को कहा गया; इसे विमुद्रीकरण कहते हैं। तब से नकद की जगह बैंक जमा के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया: बैंक से बैंक हस्तांतरण, इंटरनेट, मोबाइल फ़ोन, चैक, ए.टी.एम. कार्ड, दुकानों पर पी.ओ.एस. मशीन, और यू.पी.आई. से क्यू.आर. कोड द्वारा भुगतान। यही पन्ना कहता है कि प्लास्टिक कार्ड लेन-देन में काम आते हैं, पर अपने आप में मुद्रा नहीं हैं।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। दो जगह: ए.टी.एम. कार्ड को मुद्रा मान लेना (पृष्ठ 38), और यह सोचना कि कोई भी बैंक अपने नोट छाप सकता है; भारत में केवल भारतीय रिज़र्व बैंक, केंद्रीय सरकार की तरफ़ से, करेंसी नोट जारी करता है।

इसी हिस्से में। पृष्ठ 42 के चैक वाले तीन सवाल संदर्शिका के पृष्ठ 42 के कार्यकलाप में हैं। फ़्लैशकार्ड 9–21; प्रश्न बैंक क3–क6, ख2, ग1, घ2–घ4, ङ1।

पृष्ठ 42 — बैंकों की ऋण संबंधी गतिविधियाँ

कालांश 3 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 3. बैंक क्या करते हैं

किताब कहाँ से शुरू करती है। एक सवाल से: बैंक लोगों की जमा का क्या करते हैं? आजकल भारत में बैंक जमा का “केवल 5 प्रतिशत” हिस्सा नकद के रूप में अपने पास रखते हैं (पृष्ठ 42)। इतना काफ़ी है, क्योंकि किसी एक दिन केवल कुछ जमाकर्ता ही नकद निकालने आते हैं। जमा के बड़े भाग से बैंक ऋण देते हैं, क्योंकि विभिन्न आर्थिक गतिविधियों के लिए ऋण की बहुत माँग रहती है।

हमारी ओर से — सौ रुपये का हिसाब। बोर्ड पर लिखिए: मान लीजिए किसी बैंक में लोगों के कुल 100 रुपये जमा हैं। किताब के हिसाब से बैंक 5 रुपये नकद रखेगा और बाक़ी 95 रुपये से ऋण देगा। फिर बोर्ड पर तीन खाने बनाइए: जमाकर्ता, बैंक, कर्ज़दार; और बच्चों से पूछिए कि पैसा किस खाने से किस खाने में जाता है, और ब्याज किस ओर से किस ओर। फिर किताब का अपना सवाल पूछिए, कि सारे जमाकर्ता एक ही दिन अपना पैसा माँगने आ जाएँ तो क्या होगा; उसका उत्तर संदर्शिका के किताब के अपने सवाल में है।

यहीं रुकिए। पूछिए: बैंक कमाता कैसे है? उत्तर: बैंक जमा पर जितना ब्याज देते हैं, उससे ज़्यादा ऋण पर लेते हैं। कर्ज़दारों से लिए गए और जमाकर्ताओं को दिए गए ब्याज का अंतर बैंकों की आय का प्रमुख स्रोत है (पृष्ठ 42)। अब शब्द दीजिए: बैंक उन लोगों के बीच, जिनके पास अतिरिक्त राशि है (जमाकर्ता), और उन लोगों के बीच, जिन्हें राशि चाहिए (कर्ज़दार), मध्यस्थता करते हैं।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। यह मान लेना कि बैंक जमा का ज़्यादातर पैसा तिजोरी में रखते हैं। जमा का केवल 5 प्रतिशत नकद रहता है; बाक़ी से ऋण दिए जाते हैं।

इसी हिस्से में। यह किताब की प्रश्नावली के तीसरे प्रश्न का आधार है: संदर्शिका के प्रश्न 1 से 4। फ़्लैशकार्ड 22–26; प्रश्न बैंक क7, क8, ख3, ख4, ग2, घ5, घ6, छ6।

पृष्ठ 43–44 — साख की दो विभिन्न स्थितियाँ

कालांश 4 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 4. साख की दो स्थितियाँ

किताब कहाँ से शुरू करती है। ऋण की परिभाषा से (पृष्ठ 43)। ऋण (उधार) एक सहमति है, जिसमें उधार देने वाला कर्ज़दार को धन, वस्तुएँ या सेवाएँ देता है, और बदले में भविष्य में भुगतान का वादा लेता है। कालांश 1 में कॉपी में लिखे उत्तर अब पढ़वाइए: वे सब ऋण ही थे। फिर किताब दो कहानियाँ देती है, सलीम की और स्वप्ना की। दोनों को दो बच्चों से पढ़वाने का तरीका नीचे कक्षा की गतिविधियों में है।

दो कहानियाँ, दो नतीजे। सलीम ने ऋण से अपनी कार्यशील पूँजी की ज़रूरत पूरी की, ऑर्डर समय पर पूरा किया और उधार भी चुका दिया। किताब का निष्कर्ष: “इस प्रकार ऋण एक महत्त्वपूर्ण तथा सकारात्मक भूमिका अदा करता है।” (पृष्ठ 43) स्वप्ना की फसल बर्बाद हुई, कर्ज़ बढ़ता गया और उसे ज़मीन का कुछ हिस्सा बेचना पड़ा। इसे आम भाषा में कर्ज–ज़ाल कहा जाता है: “इस मामले में ऋण कर्जदार को ऐसी परिस्थिति में धकेल देता है, जहाँ से बाहर निकलना काफी कष्टदायक होता है।” (पृष्ठ 44)

गाँव में ऋण क्यों चाहिए (पृष्ठ 44)। ग्रामीण क्षेत्रों में साख की मुख्य माँग फसल उगाने के लिए होती है: बीज, खाद, कीटनाशक दवाएँ, पानी, बिजली, उपकरणों की मरम्मत। इन आगतों की ख़रीद और फसल की बिक्री के बीच कम से कम 3–4 महीने का अंतराल होता है। किसान ऋतु के आरंभ में उधार लेते हैं और फसल के बाद लौटाते हैं; यानी लौटाना फसल की कमाई पर टिका है। स्वप्ना की कहानी इसी जगह टूटती है।

यहीं रुकिए। बोर्ड पर किताब की यह पंक्ति लिखिए: “ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थिति के खतरों और हानि होने पर प्राप्त सहयोग की संभावना पर निर्भर करता है।” (पृष्ठ 44) फिर पूछिए: सलीम और स्वप्ना, दोनों ने ऋण लिया; फ़र्क़ कहाँ पड़ा? उत्तर इस दिशा में आए: सलीम का काम समय पर पूरा हुआ और कमाई बढ़ी; स्वप्ना की फसल महँगी कीटनाशक दवाइयाँ छिड़कने पर भी बर्बाद हो गई, वह साहूकार का कर्ज़ नहीं लौटा पाई और उसे ज़मीन का कुछ हिस्सा बेचना पड़ा।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। ऋण को एक शब्द में अच्छा या बुरा कह देना। किताब का उत्तर है: परिस्थिति पर निर्भर; सलीम को फ़ायदा हुआ, स्वप्ना को नुक़सान।

इसी हिस्से में। पृष्ठ 44 की तुलना वाली तालिका और उसके सवाल संदर्शिका के पृष्ठ 44 के कार्यकलाप में हैं; प्रश्नावली का पहला प्रश्न इसी पर है। फ़्लैशकार्ड 27–36; प्रश्न बैंक क9–क11, ख5, ख6, घ7, ङ2, च3।

पृष्ठ 44–45 — ऋण की शर्तें

कालांश 5 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 5. ऋण की शर्तें

किताब कहाँ से शुरू करती है। हर ऋण समझौते की चार बातों से (पृष्ठ 44–45)। इन्हें मिलाकर ऋण की शर्तें कहते हैं:

  1. ब्याज दर: कर्ज़दार मूल रकम के साथ यह ब्याज चुकाता है।
  2. समर्थक ऋणाधार: कर्ज़दार की कोई संपत्ति, जैसे भूमि, इमारत, गाड़ी, पशु, बैंकों में जमा पूँजी, जो ऋण चुकने तक गारंटी रहती है। कर्ज़दार उधार न लौटा पाए, तो उधारदाता को यह संपत्ति बेचकर भुगतान लेने का अधिकार होता है।
  3. आवश्यक कागज़ात: जैसे नौकरी और वेतन का रिकार्ड।
  4. भुगतान के तरीके: जैसे मेघा की मासिक किश्तें (पृष्ठ 45)।

किताब यह भी कहती है कि ऋण की शर्तें एक ऋण व्यवस्था से दूसरी में बहुत बदल जाती हैं, और उधारदाता और कर्ज़दार की प्रकृति पर भी निर्भर करती हैं।

हमारी ओर से — मेघा की तालिका, बच्चे भरें। पहले पृष्ठ 45 का अनुच्छेद धीरे पढ़िए: मेघा ने घर ख़रीदने के लिए बैंक से 5 लाख रुपये का कर्ज़ लिया; ब्याज 12 प्रतिशत वार्षिक; 10 साल में मासिक किश्तों में लौटाना है; बैंक ने नौकरी और वेतन संबंधी रिकार्ड माँगे, और नए घर के सभी कागज़ अपने पास रख लिए, जो ब्याज समेत कर्ज़ लौटाने पर वापस मिलेंगे। फिर किताब की तालिका बोर्ड पर ख़ाली खानों के साथ बनाइए, और बच्चे अनुच्छेद से एक-एक खाना भरें। भरी हुई तालिका संदर्शिका के पृष्ठ 45 के कार्यकलाप में है।

यहीं रुकिए। पूछिए: उधार देने वाला ऋणाधार क्यों माँगता है? उत्तर: ताकि उसका पैसा डूबे नहीं; कर्ज़दार न लौटाए, तो वह संपत्ति बेचकर भुगतान ले सके। फिर दूसरा सवाल: जिसके पास न ज़मीन है, न मकान, न जमा पूँजी, उसे बैंक से ऋण कैसे मिलेगा? बच्चे इसे कॉपी में लिख लें। उत्तर कालांश 8 में आएगा: स्वयं सहायता समूह, जहाँ बैंक समूह के नाम पर, बिना ऋणाधार के, ऋण देता है (पृष्ठ 51)।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। समर्थक ऋणाधार और आवश्यक कागज़ात को एक ही चीज़ मान लेना। मेघा के ऋण में कागज़ात नौकरी और वेतन का रिकार्ड हैं, जबकि ऋणाधार नए घर के कागज़ हैं।

इसी हिस्से में। प्रश्नावली का सातवाँ प्रश्न इसी पर है: संदर्शिका के प्रश्न 5 से 8। फ़्लैशकार्ड 37–44; प्रश्न बैंक क12, क13, ख7, घ8, छ3।

पृष्ठ 46–47 — विविध प्रकार के साख प्रबंध: एक गाँव का उदाहरण

कालांश 6 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 6. सोनपुर: एक गाँव में साख

किताब कहाँ से शुरू करती है। एक गाँव की बातचीत से (पृष्ठ 46)। रोहित और रंजन ने 15 नवम्बर 2019 को अपने गाँव सोनपुर में लोगों से बात की। गाँव में सिंचाई की सुविधा है और आलू की फसल लगी है। किताब तीन लोगों के कर्ज़ बताती है। श्यामल छोटा किसान है, 1.5 एकड़ ज़मीन वाला; पहले वह गाँव के महाजन से 5 प्रतिशत मासिक पर कर्ज़ लेता था, अब एक कृषि व्यापारी से 3 प्रतिशत मासिक पर। अरुण के पास 7 एकड़ ज़मीन है; उसे बैंक से 8.5 प्रतिशत वार्षिक पर ऋण मिला है, जिसे वह अगले तीन वर्षों में कभी भी लौटा सकता है, और अब वह आलू शीत भंडार गृह में रखकर बैंक से नया ऋण लेना चाहता है। रमा भूमिहीन कृषि मज़दूर है; वह अपने मालिक, एक मध्यवर्गीय भूस्वामी, से 5 प्रतिशत मासिक पर कर्ज़ लेती है और उसके यहाँ काम करके चुकाती है। श्यामल के कर्ज़ की शर्त को खोलकर देखिए:

व्यापारी का कर्ज़: फसल किसके हाथ, मुनाफ़ा किसका

जुताई के समयव्यापारी श्यामल को खेती की आगतें उधार देता है3 प्रतिशत मासिक ब्याज
वादाफसल उसी व्यापारी को बेचनी हैकर्ज़ फसल पर लौटता है
कटाई के समयकीमतें कम होती हैंव्यापारी किसानों से सस्ते में फसल ख़रीदता है
मुनाफ़ाकीमत बढ़ने पर व्यापारी फसल बेचता हैभारी मुनाफ़ा व्यापारी कमाता है
NCERT, पृष्ठ 46

हमारी ओर से। श्यामल के कर्ज़ की कीमत सिर्फ़ 3 प्रतिशत मासिक ब्याज नहीं; फसल उसी व्यापारी को बेचने का वादा भी उसी कर्ज़ का हिस्सा है।

रमा। साल में कई महीने उसके पास काम नहीं होता, इसलिए रोज़ के खर्च, बीमारी और समारोह के लिए भी कर्ज़ लेना पड़ता है। पुराना कर्ज़ चुकने से पहले नया लेना पड़ता है, और अभी 5,000 रुपये बाकी हैं। भूस्वामी अच्छा व्यवहार नहीं करता, फिर भी वह उसके लिए काम करती रहती है, ताकि ज़रूरत पर ऋण मिल सके; सोनपुर में भूमिहीन लोगों के लिए ऋण का एकमात्र स्रोत भूस्वामी-नियोक्ता ही है।

सहकारी समिति (पृष्ठ 47)। बैंकों के अलावा गाँवों में सस्ते ऋण का दूसरा स्रोत सहकारी समितियाँ हैं। सोनपुर के पास के एक गाँव की कृषक सहकारी समिति के 2300 किसान सदस्य हैं। समिति सदस्यों से जमा लेती है, उसी जमा को ऋणाधार मानकर बैंक से बड़ा ऋण लेती है, और उससे सदस्यों को कर्ज़ देती है।

यहीं रुकिए। पूछिए: श्यामल का 3 प्रतिशत, अरुण के 8.5 प्रतिशत से कम है या ज़्यादा? बहुत-से बच्चे कहेंगे कम। फिर किताब का अपना हिसाब याद दिलाइए: महाजन का 5 प्रतिशत मासिक, साल भर में 60 प्रतिशत वार्षिक बनता है (पृष्ठ 46)। हमारी ओर से: इसी तरह, मान लीजिए, व्यापारी का 3 प्रतिशत मासिक बारह महीनों में मोटे तौर पर 36 प्रतिशत बनेगा; यानी अरुण के 8.5 प्रतिशत वार्षिक से कई गुना। मासिक और वार्षिक दर की सीधी तुलना मत करने दीजिए।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। ऊपर वाली, मासिक और वार्षिक दर की भूल; और रमा के मालिक से लिए कर्ज़ को औपचारिक मान लेना, क्योंकि वह उसका नियोक्ता है। मालिक से लिया ऋण अनौपचारिक है (पृष्ठ 48)।

इसी हिस्से में। पृष्ठ 47 के सातों सवाल संदर्शिका के पृष्ठ 47 के कार्यकलाप में हैं। फ़्लैशकार्ड 45–54; प्रश्न बैंक क14, क15, ख8, घ9, ङ6, छ4।

पृष्ठ 48–50 — औपचारिक और अनौपचारिक साख

कालांश 7 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 7. औपचारिक और अनौपचारिक साख

किताब कहाँ से शुरू करती है। ऋण के स्रोतों के दो वर्गों से (पृष्ठ 48)। औपचारिक: बैंक और सहकारी समितियाँ। अनौपचारिक: साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार, दोस्त इत्यादि। भारतीय रिज़र्व बैंक औपचारिक स्रोतों पर नज़र रखता है: बैंक अपनी जमा का न्यूनतम नकद हिस्सा सचमुच रख रहे हैं या नहीं; वे सिर्फ़ लाभ कमाने वाले व्यवसायियों और व्यापारियों को नहीं, छोटे किसानों, छोटे उद्योगों और छोटे कर्ज़दारों को भी ऋण दे रहे हैं या नहीं; और बैंकों को समय-समय पर बताना पड़ता है कि वे कितना ऋण, किनको, और किस ब्याज दर पर दे रहे हैं। इसके उलट: “अनौपचारिक क्षेत्रक में ऋणदाताओं की गतिविधियों की देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं है।” (पृष्ठ 48)

आलेख 1 पढ़ना। पृष्ठ 48 का आलेख, “ग्रामीण भारत में ऋण के स्रोत, 2019”, सात टुकड़ों में बँटा है। बच्चों से पहले हर टुकड़ा औपचारिक या अनौपचारिक वर्ग में रखवाइए, फिर जोड़ करवाइए: औपचारिक 51 + 10 + 5 = 66 प्रतिशत, अनौपचारिक 1 + 23 + 7 + 3 = 34 प्रतिशत। जोड़ के बाद बोर्ड पर यह खाका बनाइए; यही मान संदर्शिका के तथ्य एक नज़र में में भी हैं।

आलेख 1 के सात टुकड़े, दो वर्गों में

औपचारिक, कुल 66 प्रतिशतव्यावसायिक बैंक 51 · सहकारी समितियाँ/बैंक 10 · अन्य औपचारिक एजेंसियाँ 5
अनौपचारिक, कुल 34 प्रतिशतसाहूकार 23 · रिश्तेदार एवं मित्र 7 · अन्य अनौपचारिक एजेंसियाँ 3 · जमींदार 1
सबसे बड़े स्रोतपहले व्यावसायिक बैंकउसके बाद साहूकार
NCERT, पृष्ठ 48

पृष्ठ 49 के पाठ में “केवल 50 प्रतिशत” छपा है, जो आलेख 1 के जोड़ (51 + 10 + 5 = 66) से मेल नहीं खाता; बच्चों को आलेख 1 के मान, 66 और 34, ही बताइए।

अनौपचारिक ऋण महँगा क्यों (पृष्ठ 49)। ज़्यादातर अनौपचारिक ऋणदाता कहीं अधिक ब्याज लेते हैं; आय का बड़ा हिस्सा ऋण चुकाने में चला जाता है (श्यामल की तरह); कभी चुकाने की रकम आय से भी ज़्यादा हो जाती है और व्यक्ति ऋण–जाल में फँसता है (रमा की तरह); और जो कर्ज़ लेकर अपना उद्यम शुरू करना चाहते हैं, वे ऊँची लागत देखकर पीछे हट सकते हैं। किताब के शब्दों में: “सस्ता और सामर्थ्य के अनुकूल कर्ज़ देश के विकास के लिए अति आवश्यक है।” (पृष्ठ 49)

फिर आलेख 2 (पृष्ठ 49)। यह शहर के परिवारों का है: किसके कुल ऋण का कितना हिस्सा कहाँ से आता है। गरीब परिवारों के ऋण में औपचारिक हिस्सा 46 प्रतिशत और अनौपचारिक 54 प्रतिशत है; कम संपत्ति वालों में 62 और 38; समृद्ध परिवारों में 73 और 27; अमीर परिवारों में 83 और 17। बच्चों से पूछिए: परिवार जितना अमीर, ऋण में औपचारिक हिस्सा उतना बड़ा या उतना छोटा? उत्तर: उतना बड़ा। यानी सस्ता औपचारिक ऋण ज़्यादातर अमीर परिवारों तक पहुँचता है, और गरीब परिवार महँगे अनौपचारिक ऋण पर निर्भर हैं।

किताब के दो निष्कर्ष (पृष्ठ 49–50)। पहला, बैंकों और सहकारी समितियों को अपनी गतिविधियाँ, ख़ासकर गाँवों में, बढ़ानी चाहिए, ताकि अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भरता घटे। दूसरा, औपचारिक ऋण का अधिक समान वितरण ज़रूरी है, ताकि गरीब परिवार भी सस्ते ऋण का फ़ायदा उठा सकें।

यहीं रुकिए। पूछिए: कोई रिश्तेदार बिना ब्याज के उधार दे, तो वह औपचारिक हुआ या अनौपचारिक? उत्तर: अनौपचारिक। वर्ग ब्याज की दर से नहीं, स्रोत से तय होता है; बैंक और सहकारी समितियाँ औपचारिक हैं, रिश्तेदार और दोस्त अनौपचारिक (पृष्ठ 48)।

हमारी ओर से — घर का कर्ज़ कक्षा में नहीं। किसी बच्चे से उसके घर के कर्ज़ के बारे में मत पूछिए, और किसी परिवार का नाम लेकर उदाहरण मत बनवाइए। सोनपुर के लोग और आलेख ही उदाहरण हैं।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। सहकारी समितियों को अनौपचारिक मान लेना, और यह सोचना कि भारतीय रिज़र्व बैंक साहूकारों पर भी नज़र रखता है। वह औपचारिक स्रोतों पर नज़र रखता है; अनौपचारिक ऋणदाताओं की देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं।

इसी हिस्से में। पृष्ठ 50 के चार सवाल संदर्शिका के पृष्ठ 50 के कार्यकलाप में हैं, और पृष्ठ 48 के चित्र और आलेख के सवाल किताब के अपने सवाल में। प्रश्नावली के पाँचवें और आठवें प्रश्न इसी पर हैं। फ़्लैशकार्ड 55–69; प्रश्न बैंक क16–क18, ख10, ग3–ग5, ङ3–ङ5, च4, च5, छ1, छ2।

पृष्ठ 50–52 — निर्धनों के स्वयं सहायता समूह

कालांश 8 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 8. स्वयं सहायता समूह

किताब कहाँ से शुरू करती है। समस्या से (पृष्ठ 50–51)। भारत के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक नहीं हैं। जहाँ हैं, वहाँ भी बैंक से कर्ज़ लेना मुश्किल है, क्योंकि ऋणाधार और विशेष कागज़ात चाहिए। ऋणाधार का न होना गरीबों के बैंक से ऋण न ले पाने का एक प्रमुख कारण है। साहूकार उन्हें निजी तौर पर जानते हैं और अक्सर बिना ऋणाधार भी ऋण दे देते हैं, पर ब्याज बहुत ऊँचा रखते हैं, लेन-देन की लिखा-पढ़ी पूरी नहीं करते और गरीब कर्ज़दारों को तंग करते हैं। कालांश 5 में कॉपी में लिखा सवाल अब खोलिए।

समूह कैसे चलता है (पृष्ठ 51)। 15–20 पड़ोसी, ख़ासकर गरीब महिलाएँ, नियमित मिलकर बचत करते हैं; प्रति व्यक्ति बचत 25 रुपए से 100 रुपए या अधिक हो सकती है। सदस्य इसी बचत से समूह से छोटे कर्ज़ लेते हैं। एक या दो वर्ष नियमित बचत के बाद समूह बैंक से ऋण के योग्य हो जाता है; ऋण समूह के नाम पर मिलता है, बिना ऋणाधार के। बचत और ऋण के ज़्यादातर ज़रूरी फ़ैसले, जैसे ऋण का लक्ष्य, रकम, ब्याज दर और लौटाने की अवधि, सदस्य ख़ुद लेते हैं।

हमारी ओर से — समूह की एक बैठक। आठ-दस बच्चे एक समूह बनें। उनके सामने किताब के बताए कामों की पर्चियाँ रखिए: गिरवी ज़मीन छुड़ाना, बीज, खाद, सिलाई की मशीन, हथकरघा, पशु। समूह बात करके तय करे कि इस बार ऋण किस काम के लिए दिया जाए और किसे। बाक़ी कक्षा देखे कि फ़ैसला किसने लिया: बैंक ने नहीं, सदस्यों ने। फिर पूछिए: अगर एक सदस्य ऋण न लौटाए, तो क्या होगा? किताब का उत्तर: बाक़ी सदस्य इसे गंभीरता से लेते हैं, क्योंकि ज़िम्मेदारी पूरे समूह की है।

यहीं रुकिए। पूछिए: बैंक बिना ऋणाधार के समूह को ऋण क्यों दे देता है? उत्तर: लौटाने की ज़िम्मेदारी समूह की है, और कोई सदस्य ऋण न लौटाए, तो बाक़ी सदस्य इसे गंभीरता से लेते हैं; इसी कारण बैंक बिना ऋणाधार के भी संगठित गरीब महिलाओं को ऋण देने को तैयार हो जाते हैं (पृष्ठ 51)।

ग्रामीण बैंक (पृष्ठ 52)। बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक ने गरीबों की ऋण ज़रूरतें उचित ब्याज दरों पर पूरी करने में बड़ी सफलता पाई है; 2018 में यह बांग्लादेश के 81,600 गाँवों में फैला था, और इससे ऋण लेने वाली ज़्यादातर महिलाएँ गरीब तबके से हैं। इसके संस्थापक प्रो. मोहम्मद युनूस को 2006 में शांति का नोबेल पुरस्कार मिला। बॉक्स में बैंक की शुरुआत का साल और सदस्यों की संख्या हिंदी और अंग्रेज़ी संस्करण में अलग छपे हैं; इन दोनों पर सवाल मत बनाइए। युनूस की पंक्ति बच्चों को सुनाइए: “अगर गरीब लोगों को सही और उचित शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराया जा सकता है, तो लाखों छोटे लोग अपनी लाखों छोटी–छोटी गतिविधियों के ज़रिए विकास का सबसे बड़ा चमत्कार कर सकते हैं।” (पृष्ठ 52)

बच्चे यहाँ अटकते हैं। यह मान लेना कि बैंक हर सदस्य के नाम पर ऋण देता है, या फ़ैसले बैंक लेता है। ऋण समूह के नाम पर मिलता है, और फ़ैसले सदस्य लेते हैं।

इसी हिस्से में। प्रश्नावली का छठा प्रश्न और तेरहवें का (क) इसी पर हैं: संदर्शिका के प्रश्न 5 से 8 और प्रश्न 12 और 13। फ़्लैशकार्ड 70–80; प्रश्न बैंक क19, क20, ख9, ग6, घ10, ङ7, ङ8, च6, छ5।

पृष्ठ 52 — सारांश और समापन

कालांश 9 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 9. सार

किताब का सारांश। किताब अध्याय को इस क्रम में समेटती है (पृष्ठ 52): मुद्रा के आधुनिक रूप और बैंक प्रणाली से उनका रिश्ता; जमाकर्ता बैंकों में धन रखते हैं और कर्ज़दार बैंकों से ऋण लेते हैं; आर्थिक गतिविधियों के लिए ऋण चाहिए, जिसका असर अच्छा भी हो सकता है और कुछ परिस्थितियों में कर्ज़दार की हालत बदतर भी कर सकता है; ऋण औपचारिक और अनौपचारिक स्रोतों से मिलता है, और दोनों की शर्तों में बहुत फ़र्क़ हो सकता है; आज अमीर परिवार औपचारिक स्रोतों से ऋण लेते हैं, जबकि गरीब अब भी अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर हैं। आख़िर में किताब दो कदम ज़रूरी बताती है: औपचारिक क्षेत्र के कुल ऋण बढ़ें, और उनमें गरीबों का हिस्सा बढ़े।

हमारी ओर से — तीन सवाल, बच्चे बोलें। बोर्ड पर लिखिए: मुद्रा क्या काम करती है? ऋण कब मदद करता है और कब फँसाता है? सस्ता ऋण किसे मिलता है, और गरीबों तक कैसे पहुँचे? हर सवाल के आगे बच्चे किताब का एक उदाहरण बोलें: पहले के आगे जूते और गेहूँ; दूसरे के आगे सलीम और स्वप्ना; तीसरे के आगे आलेख 2 और स्वयं सहायता समूह। फिर कालांश 5 और 8 वाला सवाल दोहराइए, कि जिसके पास ऋणाधार नहीं, उसे ऋण कैसे मिले; अब हर बच्चे के पास उत्तर होना चाहिए।

इसी हिस्से में। समय कम पड़े, तो संदर्शिका की छह बातें जो हर बच्चे तक पहुँचें देखिए।

कक्षा की गतिविधियाँ

पृष्ठ 43 की गतिविधि — सलीम और स्वप्ना, दो आवाज़ों में

कालांश 4 · पाठ योजना में यह कालांश

किताब के पृष्ठ 43 पर दो कहानियाँ हैं। सलीम जूते बनाता है। त्यौहार के मौसम में शहर के एक बड़े व्यापारी से 3000 जोड़ी जूतों का ऑर्डर आता है, जो एक महीने में पूरा करना है। इसके लिए उसे अतिरिक्त मज़दूर रखने और कच्चा माल ख़रीदने के लिए पैसा चाहिए। पहले, वह चमड़ा व्यापारी से चमड़ा अभी लेकर भुगतान बाद में करने का वादा करता है; दूसरे, बड़े व्यापारी से 1000 जूतों के लिए अग्रिम भुगतान के रूप में नकद लेता है। ऑर्डर समय पर पूरा होता है, कमाई बढ़ती है, और वह उधार भी चुका देता है। स्वप्ना छोटी किसान है और 3 एकड़ में मूँगफली उगाती है। खेती के खर्च के लिए वह साहूकार से ऋण लेती है, इस उम्मीद में कि फसल तैयार होने पर चुका देगी। महँगी कीटनाशक दवाइयाँ छिड़कने पर भी फसल बर्बाद हो जाती है। कर्ज़ नहीं चुकता और साल भर में बड़ी रकम बन जाता है; अगले साल फसल सामान्य रहती है, पर इतनी कमाई नहीं होती कि कर्ज़ चुके। आख़िर उसे ज़मीन का कुछ हिस्सा बेचना पड़ता है।

हमारी ओर से। दो बच्चे सामने आएँ: एक सलीम बनकर, एक स्वप्ना बनकर, और अपनी कहानी अपनी ज़ुबान में बोलें, जैसे इस बार त्यौहार पर मुझे तीन हज़ार जोड़ी का ऑर्डर मिला…। बाक़ी कक्षा कॉपी में चार कॉलम बनाए और सुनते हुए भरे: ऋण किसलिए, किससे, क्या हुआ, नतीजा। फिर पूछिए: स्वप्ना के साथ ऐसा न होता, अगर उसके पास क्या होता? उत्तर की दिशा किताब की पंक्ति देती है: ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थिति के खतरों और हानि होने पर प्राप्त सहयोग की संभावना पर निर्भर करता है (पृष्ठ 44)। आख़िर में दोनों कॉलमों के ऊपर बच्चे लिखें: सकारात्मक भूमिका, और कर्ज–ज़ाल।

पृष्ठ 46 की गतिविधि — सोनपुर की चौपाल

कालांश 6 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 6. सोनपुर: एक गाँव में साख

किताब के पृष्ठ 46–47 पर सोनपुर के लोगों से बातचीत है, जिसका सार ऊपर सोनपुर वाले कार्ड में है: श्यामल, अरुण, रमा, और पास के गाँव की कृषक सहकारी समिति।

हमारी ओर से। चार बच्चे श्यामल, अरुण, रमा और समिति के एक सदस्य बनें; दो बच्चे रोहित और रंजन बनकर हर एक से वही चार सवाल पूछें: ऋण किससे लिया, ब्याज कितना, कैसे लौटाते हैं, और कोई दूसरी शर्त। उत्तर किताब के पन्नों से ही आएँ। बाक़ी कक्षा बोर्ड की तालिका भरे; यही पृष्ठ 47 के कार्यकलाप का तीसरा सवाल है, जिसकी भरी हुई तालिका संदर्शिका के पृष्ठ 47 के कार्यकलाप में है। आख़िर में पूछिए: गाँव में सबसे सस्ता और आसान ऋण किसे मिला, और बाक़ी को क्यों नहीं? उत्तर: अरुण को, बैंक से; बैंक समर्थक ऋणाधार माँगते हैं, जो हर किसी के पास नहीं होता। तालिका चार्ट पेपर पर भी उतार लीजिए; कालांश 7 में आलेख 1 के साथ काम आएगी।

पृष्ठ 53 की गतिविधि — शहर के आठ लोग और बैंक का कर्ज़

कालांश 9 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: परियोजना

किताब के पृष्ठ 53 पर अतिरिक्त परियोजना है। तालिका में शहर के आठ लोगों के व्यवसाय हैं: निर्माण मज़दूर, कंप्यूटर शिक्षित स्नातक छात्र, सरकारी सेवा में नियोजित व्यक्ति, दिल्ली में प्रवासी मज़दूर, घरेलू नौकरानी, छोटा व्यापारी, ऑटो रिक्सा चालक, और बंद फैक्ट्री का मज़दूर। बच्चों को भरना है कि इन्हें किन कामों के लिए ऋण चाहिए हो सकता है; फिर इन्हें दो वर्गों में बाँटना है: जिन्हें बैंक से कर्ज़ मिल सकता है, और जिन्हें नहीं; और बताना है कि बाँटने में किन बातों को देखा।

हमारी ओर से। चार्ट पेपर पर चार कॉलम बनाइए: व्यवसाय, ऋण किसलिए, बैंक से मिलेगा या नहीं, क्यों। आठ व्यवसाय आठ समूहों में बाँट दीजिए। किताब बस पूछती है कि बाँटने के लिए किन कारकों का उपयोग किया (पृष्ठ 53)। आख़िरी कॉलम के लिए ये तीन कसौटियाँ काम आएँगी: नियमित आय और उसके कागज़ हैं या नहीं (मेघा, पृष्ठ 45); ऋणाधार के लिए कोई संपत्ति है या नहीं (पृष्ठ 44); और आय पक्की है या अनिश्चित। जिन्हें बैंक से ऋण न मिले, उनके लिए पूछिए कि वे कहाँ जाएँगे: अनौपचारिक स्रोत, या स्वयं सहायता समूह। नमूने की पंक्तियाँ संदर्शिका के पृष्ठ 53 के कार्यकलाप में हैं। काम लिखिए, किसी का नाम नहीं।

पृष्ठ 52–53 — प्रश्नावली

कालांश 9 · कालांश 9 का कार्ड · इंटरैक्टिव: अभ्यास

इनके उत्तर यहाँ दोहराए नहीं गए, ताकि दो पन्नों में दो अलग उत्तर न हों। सब शिक्षक संदर्शिका में हैं:

अभ्यास के लिए बच्चों को प्रश्न बैंक, फ़्लैशकार्ड और क्विज़ दीजिए।