कक्षा — 10 · विषय — अर्थशास्त्र (आर्थिक विकास की समझ) · पृष्ठ — 75 से 89
यह पन्ना किसलिए — किताब हाथ में लेकर पढ़ाते समय साथ रखने के लिए। हर कार्ड किताब के कुछ पन्नों का है: उन पन्नों की ज़रूरी पंक्तियाँ, उन्हें कक्षा में कैसे खोलें, और बच्चे कहाँ अटकते हैं। कार्ड के ऊपर लिखा है कि वह पाठ योजना के किस कालांश का है।
किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ हैं (2026-27 में छपी किताब)। जो बात किताब की नहीं, हमारी है, उसके आगे “हमारी ओर से” लिखा है। प्रश्नावली की कुंजी, परिभाषाएँ और आँकड़ों की तालिका शिक्षक संदर्शिका में हैं; यहाँ उनके लिंक हैं।
किताब के साथ, पन्ना-दर-पन्ना
पृष्ठ 75–77 — बाज़ार में उपभोक्ता
कालांश 1 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: शुरुआत · इंटरैक्टिव: 1. बाज़ार में उपभोक्ता
किताब कहाँ से शुरू करती है। अख़बार की कतरनों से (पृष्ठ 75)। ये उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के फ़ैसलों के कुछ समाचारों के नमूने हैं। किताब पूछती है कि जिस उपभोक्ता को लगे कि उसके साथ गलत हुआ है, वह विक्रेता से ठीक व्यवहार पाने के लिए अपने उपभोक्ता अधिकार का प्रयोग कैसे करे। पूरा अध्याय इसी सवाल का जवाब है। इसे चार्ट पेपर पर लिखकर कक्षा में टाँग दीजिए; आख़िरी कालांश में इसी पर लौटना है।
अगले पन्ने पर किताब दो भूमिकाएँ अलग करती है: “बाज़ार में हमारी भागीदारी उत्पादक और उपभोक्ता दोनों रूपों में होती है।” फिर याद दिलाती है कि नियम दूसरी जगहों पर भी चाहिए: साहूकार स्वप्ना जैसी कर्ज़दार को ज़मीन बेचने पर मजबूर कर सकते हैं (अध्याय 3), असंगठित क्षेत्र के मज़दूर कम वेतन और खराब हालात में काम करते हैं, और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए भी नियम चाहिए। उसके बाद अध्याय की पहली बड़ी पंक्ति आती है, जो बच्चे अपनी कॉपी में लिखें: “बाज़ार में भी उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए नियम एवं विनियमों की आवश्यकता होती है, क्योंकि अकेला उपभोक्ता प्राय: स्वयं को कमजोर स्थिति में पाता है।”
शोषण के तरीके किताब ख़ुद गिनाती है: उचित वज़न से कम तौलना, पहले न बताए गए शुल्क जोड़ देना, मिलावटी या दोषपूर्ण वस्तुएँ बेचना। शिकायत करने पर विक्रेता का आम जवाब होता है: “आपने जो खरीदा है अगर वह पसंद नहीं है तो कहीं और जाइए।” बाज़ार तब ठीक से काम नहीं करता, जब उत्पादक थोड़े और शक्तिशाली हों और उपभोक्ता कम मात्रा में खरीदते हों और बिखरे हुए हों। बड़ी कंपनियों के दो उदाहरण हैं: शिशुओं के दूध का पाउडर, जिसे एक कंपनी ने माँ के दूध से बेहतर बताकर कई वर्षों तक पूरे विश्व में बेचा, और सिगरेट, जिसके कैंसर का कारण हो सकने की बात मनवाने के लिए न्यायालय में लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। पृष्ठ 76 का कार्टून एक और रूप दिखाता है: सामान ऐसा बनाना कि कुछ महीनों में बेकार हो जाए। निष्कर्ष पृष्ठ 77 पर: “अत: उपभोक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नियम और विनियमों की आवश्यकता है।”
हमारी ओर से — एक परिवार, दो भूमिकाएँ। बोर्ड को बीच से बाँटिए: उत्पादक और उपभोक्ता। किसी एक बच्चे के परिवार को लीजिए, जैसे खेती करने वाला परिवार। बाकी कक्षा बताए कि यह परिवार बाज़ार में क्या बेचता है (उपज, दूध) और क्या खरीदता है (बीज, साबुन, दवा, बस का टिकट)। बच्चे ख़ुद देख लेंगे कि एक ही परिवार दोनों खानों में है। किताब के निर्देश (पृष्ठ 74) बच्चों को नये उपभोक्ता मानते हैं, जिन्हें “उपभोक्ता के रूप में सावधान और जानकार नागरिक बनना है”; पहले कालांश में उन्हें यही भूमिका दीजिए।
यहीं रुकिए। विक्रेता कहता है, “आपने जो खरीदा है अगर वह पसंद नहीं है तो कहीं और जाइए।” इस जवाब में वह असल में क्या कह रहा है?
नमूना उत्तर — कि बिक्री हो जाने के बाद उसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं रही, और गलती हो तो उसका भार खरीदने वाले पर है। किताब के अनुसार उपभोक्ता आंदोलन इसी हालत को बदलने का प्रयास है।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। अकेला उपभोक्ता कमज़ोर होता है, यह सुनकर बच्चे मान लेते हैं कि केवल ग़रीब या कम पढ़े लोग ठगे जाते हैं। किताब की बात दूसरी है: उपभोक्ता थोड़ा-थोड़ा खरीदता है और बिखरा हुआ है, जबकि उत्पादक थोड़े और शक्तिशाली हैं। दूसरी भूल: यह मानना कि ठगी केवल छोटे दुकानदार करते हैं। किताब के सबसे बड़े उदाहरण बड़ी कंपनियों के हैं।
इसी हिस्से में। मुख्य शब्द · पृष्ठ 77 का कार्यकलाप · फ़्लैशकार्ड 1–9; प्रश्न बैंक क1, घ1, ङ1, च2।
पृष्ठ 77–78 — उपभोक्ता आंदोलन
कालांश 2 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 2. उपभोक्ता आंदोलन
किताब कहाँ से शुरू करती है। असंतोष से (पृष्ठ 77)। विक्रेता कई अनुचित व्यावसायिक व्यवहारों में शामिल थे, और “बाज़ार में उपभोक्ता को शोषण से बचाने के लिए कोई कानूनी व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी।” लंबे समय तक असंतुष्ट उपभोक्ता बस उस ब्रांड या दुकान से खरीदना बंद कर देता था, और सावधानी बरतना खरीदने वाले की ज़िम्मेदारी मानी जाती थी। भारत में उपभोक्ता आंदोलन का जन्म एक ‘सामाजिक बल’ के रूप में हुआ, और उसने वस्तुओं और सेवाओं की गुणवत्ता की ज़िम्मेदारी विक्रेताओं पर भी डाल दी।
कारण किताब के शब्दों में: “अत्यधिक खाद्य कमी, जमाखोरी, कालाबाजारी, खाद्य पदार्थों एवं खाद्य तेल में मिलावट की वजह से 1960 के दशक में व्यवस्थित रूप में उपभोक्ता आंदोलन का उदय हुआ।” 1970 के दशक तक उपभोक्ता संस्थाएँ लेख लिखने और प्रदर्शनी लगाने लगीं, और सड़क यात्री परिवहन और राशन दुकानों पर नज़र रखने के लिए उपभोक्ता दल बने। आंदोलन ने कंपनियों और सरकार, दोनों पर दबाव डाला, और 1986 में उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम बना, जो कोपरा के नाम से प्रसिद्ध है; इसका संशोधन 2019 में हुआ। पृष्ठ 78 के बॉक्स में अंतर्राष्ट्रीय कहानी है: 1985 में संयुक्त राष्ट्र ने उपभोक्ता सुरक्षा के लिए दिशा-निर्देश अपनाए, और आज उपभोक्ता इंटरनेशनल 100 से अधिक देशों की 200 संस्थाओं की संरक्षक संस्था है।
हमारी ओर से — पहले और बाद। बोर्ड पर दो खाने बनाइए: आंदोलन से पहले और आंदोलन के बाद। पहले खाने में किताब की तीन बातें लिखवाइए: कोई कानूनी व्यवस्था नहीं, उपभोक्ता बस दुकान बदल लेता था, सावधानी खरीदने वाले की ज़िम्मेदारी। दूसरा खाना बच्चे भरें। दो साल गड्डमड्ड न हों, इसके लिए एक छोटी याद: 1985 दुनिया की, 1986 भारत की। यानी 1985 में संयुक्त राष्ट्र के दिशा-निर्देश, 1986 में भारत का कानून।
यहीं रुकिए। आंदोलन से पहले कोई दुकानदार ठगता, तो उपभोक्ता क्या करता था? आंदोलन ने इसमें क्या बदला?
नमूना उत्तर — वह बस उस दुकान या ब्रांड से खरीदना बंद कर देता था, क्योंकि शोषण से बचाने की कोई कानूनी व्यवस्था नहीं थी और सावधानी उसी की ज़िम्मेदारी मानी जाती थी। आंदोलन ने गुणवत्ता की ज़िम्मेदारी विक्रेताओं पर भी डाली, और उसके दबाव से 1986 में कोपरा बना।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। यह मान लेना कि उपभोक्ता आंदोलन 1986 में शुरू हुआ। आंदोलन 1960 के दशक में व्यवस्थित रूप में उभरा; 1986 का कानून उसका नतीजा है। उपभोक्ता इंटरनेशनल के आँकड़ों में भी उलझन होती है: “से भी अधिक” देशों के साथ है, संस्थाओं के साथ नहीं। उत्तर में किताब की तरह लिखवाइए: 200 संस्थाएँ, 100 से भी अधिक देश।
इसी हिस्से में। अध्याय के आँकड़े · पृष्ठ 78 का कार्यकलाप · फ़्लैशकार्ड 10–18; प्रश्न बैंक क2, क3, क4, घ2, ङ2, च3।
पृष्ठ 79 — सुरक्षा सबका अधिकार है
कालांश 3 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 3. सुरक्षा का अधिकार
किताब कहाँ से शुरू करती है। रेजी से (पृष्ठ 79)। रेजी मेथ्यू कक्षा 9 का एक स्वस्थ लड़का था, जो टॉन्सिल निकलवाने के लिए केरल के एक निजी चिकित्सालय में भर्ती हुआ। ई.एन.टी. सर्जन ने सामान्य बेहोशी की दवा देकर ऑपरेशन किया। अनुचित बेहोशी से रेजी में दिमागी असामान्यता के लक्षण आ गए और वह जीवन भर के लिए अपंग हो गया। पिता ने सेवा में चिकित्सा की गलती और लापरवाही के लिए राज्य आयोग में 5,00,000 रुपये के मुआवज़े का दावा किया। राज्य आयोग ने यह कहकर मामला खारिज किया कि सबूत पर्याप्त नहीं है। पिता ने दिल्ली के राष्ट्रीय आयोग में अपील की, और जाँच के बाद आयोग ने अस्पताल को चिकित्सा में लापरवाही का दोषी पाया और हर्जाना देने का निर्देश दिया। किताब के इस बॉक्स में इन्हें “राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण समिति” और राष्ट्रीय समिति लिखा है; अध्याय में आगे यही आयोग कहलाते हैं, इसलिए कक्षा में आयोग शब्द ही रखिए।
फिर अधिकार: कई वस्तुएँ और सेवाएँ जीवन और संपत्ति के लिए खतरनाक हो सकती हैं, इसलिए उपभोक्ता को इनसे सुरक्षित रहने का अधिकार है, और उत्पादकों को सुरक्षा के नियम मानने होते हैं। किताब का उदाहरण प्रेशर कूकर का है: सेफ्टी वॉल्व खराब हो तो भयंकर दुर्घटना हो सकती है। नियम होने पर भी निम्न गुणवत्ता का माल क्यों बिकता है, इसका कारण भी यहीं है: “इन नियमों का पर्यवेक्षण उचित रूप से नहीं हो रहा है और उपभोक्ता आंदोलन भी बहुत ज्यादा मजबूत नहीं है।”
रेजी के पिता रुके नहीं
हमारी ओर से — आप पिता होते तो? रेजी की कहानी राज्य आयोग के फ़ैसले तक पढ़कर रुक जाइए। कक्षा से पूछिए: मामला खारिज हो गया, अब पिता क्या करें? कुछ बच्चे कहेंगे कि बात ख़त्म। तब अपील वाला हिस्सा पढ़िए और बोर्ड पर दो सीढ़ियाँ बनाइए, जैसे ऊपर के चित्र में। बात यह बैठनी चाहिए कि एक स्तर पर हारना रास्ते का अंत नहीं है; अपील का पूरा तंत्र पृष्ठ 84 पर आएगा।
यहीं रुकिए। रेजी ने कोई सामान नहीं खरीदा था, अस्पताल में इलाज कराया था। फिर यह उपभोक्ता का मामला कैसे बना?
नमूना उत्तर — उपभोक्ता वस्तुएँ ही नहीं, सेवाएँ भी खरीदता है। अस्पताल ने इलाज की सेवा दी, और उस सेवा में चिकित्सा की गलती और लापरवाही हुई, जिससे रेजी की सुरक्षा टूटी। इसीलिए आयोग ने अस्पताल को दोषी पाया। प्रश्नावली का प्रश्न 13 (क) यही बात पूछता है।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। 5,00,000 रुपये को वह रकम मान लेना जो रेजी को मिली। यह पिता का दावा था; किताब हर्जाने का निर्देश बताती है, उसकी रकम नहीं। उत्तर में कोई रकम मत जुड़वाइए।
इसी हिस्से में। पृष्ठ 79 का कार्यकलाप · फ़्लैशकार्ड 19–24; प्रश्न बैंक क5, क6, घ3, ङ3।
पृष्ठ 80–81 — वस्तुओं और सेवाओं के बारे में जानकारी
कालांश 4 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 4. सूचना का अधिकार
किताब कहाँ से शुरू करती है। पैकेट से (पृष्ठ 80)। पैकेट पर वस्तु के अवयव, मूल्य, बैच संख्या, निर्माण की तारीख, खराब होने की अंतिम तिथि और बनाने वाले का पता लिखा होता है। दवा पर ‘उचित प्रयोग के बारे में निर्देश’ और उसके दूसरे प्रभावों और खतरों की जानकारी होती है, कपड़ों पर ‘धुलाई संबंधी निर्देश’। किताब पूछती है कि बनाने वाले को ये जानकारियाँ देनी ही क्यों पड़ती हैं, और जवाब देती है: क्योंकि उपभोक्ता को सूचना पाने का अधिकार है। वस्तु अंतिम तिथि से पहले खराब हो जाए, तो वह उसे बदलने को कह सकता है; अंतिम तिथि निकल चुकी दवाएँ बेचने वालों के ख़िलाफ़ कार्यवाही हो सकती है; और छपे मूल्य से अधिक लिया जाए, तो कोई भी विरोध और शिकायत कर सकता है। यही छपा मूल्य अधिकतम खुदरा मूल्य है। किताब यह भी कहती है कि इससे कम दाम के लिए उपभोक्ता मोल-भाव कर सकते हैं।
फिर किताब यही अधिकार सरकार की सेवाओं तक ले जाती है: “सन् 2005 के अक्टूबर में” भारत सरकार ने सूचना पाने का अधिकार कानून लागू किया, जो नागरिकों को सरकारी विभागों के कामकाज की सभी सूचनाएँ पाने का अधिकार देता है। उदाहरण अमृता का है, जो इंजीनियरिंग स्नातक है। उसने एक सरकारी विभाग में नौकरी के लिए प्रमाणपत्र जमा किए और इंटरव्यू दिया, पर कोई परिणाम नहीं मिला, और कर्मचारियों ने जवाब देने से भी मना कर दिया। उसने इस कानून के तहत प्रार्थना-पत्र दिया, तो देरी के कारण भी बताए गए और नियुक्ति के लिए बुलावे का पत्र भी मिला।
हमारी ओर से — कौन-सी सूचना, किससे? बोर्ड पर दो खाने बनाइए: पैकेट पर: कंपनी और दुकान से और सूचना पाने का अधिकार कानून: सरकारी विभाग से। फिर चार बातें एक-एक करके बोलिए और बच्चे खाना चुनें: दवा की अंतिम तिथि, अमृता के इंटरव्यू का परिणाम, बिस्कुट का अधिकतम खुदरा मूल्य, गली की सड़क का काम कब होगा। बाद में पृष्ठ 81 का कार्यकलाप भी यही दूसरी बात पूछता है। पैकेटों वाला काम नीचे पृष्ठ 81 की गतिविधि में है।
यहीं रुकिए। अगर पैकेट पर खराब होने की अंतिम तिथि छपी ही न हो, तो नुकसान किसका है?
नमूना उत्तर — उपभोक्ता का। किताब कहती है कि तब विनिर्माता दुकानदार पर आरोप लगा देगा और ज़िम्मेदारी नहीं मानेगा। तिथि छपी हो, तो उपभोक्ता शिकायत कर सकता है और वस्तु बदलने या मुआवज़े की माँग कर सकता है।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। दो जगह। पहली, पैकेट की जानकारी (उपभोक्ता का सूचना पाने का अधिकार) और सूचना पाने का अधिकार कानून (सरकारी विभागों के कामकाज की सूचना) को एक मान लेना। दूसरी, अधिकतम खुदरा मूल्य को तय दाम समझना। उससे अधिक लेना गलत है, पर उससे कम के लिए मोल-भाव हो सकता है।
इसी हिस्से में। पृष्ठ 81 का कार्यकलाप · फ़्लैशकार्ड 25–32; प्रश्न बैंक क7, क8, घ4, घ5।
पृष्ठ 81 — चयन के अधिकार का उल्लंघन
कालांश 5 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 5. चयन का अधिकार
किताब कहाँ से शुरू करती है। अबिरामी से (पृष्ठ 81)। अंसारी नगर की छात्रा अबिरामी ने दिल्ली में व्यावसायिक पाठ्यक्रम के लिए एक क्षेत्रीय कोचिंग संस्थान के दो वर्षीय पाठ्यक्रम में नामांकन कराया और पूरे दो वर्ष के लिए “करीब 61,020 रुपये” जमा किए। पढ़ाई का स्तर ठीक न लगने पर उसने साल के अंत में पाठ्यक्रम छोड़ने का निश्चय किया, पर एक साल का पैसा माँगने पर मना कर दिया गया। ज़िला आयोग ने संस्थान को 28,000 रुपये लौटाने का आदेश दिया, यह कहते हुए कि छात्रा को चुनने का अधिकार है। संस्थान ने राज्य आयोग में अपील की। राज्य आयोग ने ज़िला आयोग का आदेश बनाए रखा, बेकार की अपील के लिए संस्थान पर 25,000 का दंड लगाया, और छात्रा को मुआवज़े और याचिका खर्च के रूप में “7,000 रूपये” देने को कहा। आगे के लिए उसने सभी शिक्षा संस्थानों और व्यावसायिक संस्थाओं को पूरे साल की फ़ीस एडवांस में लेने से मना किया।
फिर किताब पूछती है कि इस घटना से हम क्या समझते हैं, और जवाब देती है: कोई भी उपभोक्ता, किसी भी आयु या लिंग का, कोई भी सेवा ले रहा हो, उसे हमेशा चुनने का अधिकार होगा। रोज़ के दो उदाहरण: दुकानदार कहे कि दंतमंजन तभी मिलेगा जब साथ में ब्रश भी खरीदेंगे, या गैस कनेक्शन देते समय डीलर साथ में चूल्हा लेने का दबाव डाले।
अबिरामी का मामला, तीन फ़ैसले
हमारी ओर से — दुकान का एक दृश्य। दो बच्चे आगे बुलाइए: एक दुकानदार, एक ग्राहक। दुकानदार कहे कि दंतमंजन ब्रश के बिना नहीं मिलेगा। ग्राहक मना करे। कक्षा बताए कि कौन-सा अधिकार टूटा, और ग्राहक दुकानदार से किन शब्दों में बात करे। फिर वही दृश्य गैस कनेक्शन और चूल्हे के साथ। दृश्य में दुकानदार को बुरा आदमी मत बनाइए; बात उसके तरीके की है, उसकी नहीं।
यहीं रुकिए। ज़िला आयोग ने अबिरामी के पक्ष में फ़ैसला दे ही दिया था। फिर राज्य आयोग ने संस्थान पर 25,000 का दंड क्यों लगाया?
नमूना उत्तर — दंड बेकार की अपील के लिए था। ज़िला आयोग का फ़ैसला ठीक था, फिर भी संस्थान ने राज्य आयोग में अपील की। राज्य आयोग ने आदेश बनाए रखा, और छात्रा को मुआवज़े और याचिका खर्च के रूप में 7,000 रुपये देने को भी कहा।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। यह मानना कि चुनने का अधिकार केवल सामान खरीदते समय होता है। अबिरामी का मामला कोचिंग की सेवा का है। दूसरी भूल: रकमों का जोड़-घटाना करवाना। किताब यह नहीं बताती कि 28,000 कैसे निकला, और न ही सारी रकमों का जोड़ देती है; उत्तर में रकमें वैसी ही लिखवाइए जैसी छपी हैं।
इसी हिस्से में। अध्याय के आँकड़े · फ़्लैशकार्ड 33–38; प्रश्न बैंक क9, क10, घ6, ङ4, छ1।
पृष्ठ 82–83 — न्याय पाने के लिए कहाँ जाना चाहिए
कालांश 6 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 6. न्याय कहाँ मिले
किताब कहाँ से शुरू करती है। क्षतिपूर्ति निवारण के अधिकार से (पृष्ठ 82): “यदि एक उपभोक्ता को कोई क्षति पहुँचाई जाती है, तो क्षति की मात्रा के आधार पर उसे क्षतिपूर्ति पाने का अधिकार होता है।” इसके लिए एक आसान और प्रभावी जन-प्रणाली चाहिए। उपभोक्ता अपनी शिकायत ख़ुद दर्ज करा सकता है, वकील के साथ भी और वकील के बिना भी। इसी पन्ने पर लुभाने वाले विज्ञापनों का कार्यकलाप है।
फिर प्रकाश की कहानी, चित्रों में। प्रकाश ने बेटी की शादी के लिए अपने गाँव मनीऑर्डर भेजा। बेटी को ज़रूरत के समय पैसे नहीं मिले, महीनों बाद भी नहीं। उन्होंने डाकघर में पूछताछ की, संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो क्षेत्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद् में सलाह ली, और फिर नयी दिल्ली के एक ज़िला स्तर के उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में मुकदमा दर्ज किया। सुनवाई में उन्होंने ख़ुद बहस की; जज ने दस्तावेज़ जाँचे, दोनों पक्षों को सुना और आयोग का फ़ैसला सुनाया। आख़िर में किताब आज के रास्ते बताती है: शिकायत एक व्यक्ति के रूप में या समूह के रूप में (जिसे क्लास एक्शन सूट कहते हैं), ख़ुद जाकर या इंटरनेट से, और मुकदमे की कार्यवाही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से भी।
हमारी ओर से — नौ चित्र, नौ बच्चे। प्रोजेक्टर की ज़रूरत नहीं। किताब के नौ चित्रों की बात नौ पर्चियों पर लिखिए, एक पर्ची एक चित्र की। नौ बच्चों को पर्चियाँ उल्टे क्रम में दीजिए। वे आपस में सही क्रम में खड़े हों और हर बच्चा अपने चित्र की बात एक वाक्य में बोले, जैसे: मैं प्रकाश हूँ, मैं डाकघर गया…। बाकी कक्षा क्रम जाँचे। ध्यान रखिए कि किताब का पाठ इस मामले में कोई रकम नहीं बताता और फ़ैसले के बारे में बस इतना कहता है कि जज ने आयोग का फ़ैसला सुनाया। चित्र के फ़ॉर्म पर हाथ से लिखी बातों पर कोई सवाल मत बनाइए। आज शिकायत कहाँ और कैसे दर्ज होती है, फ़ोन से भी, यह अतिरिक्त सामग्री में है।
यहीं रुकिए। प्रकाश सीधे आयोग क्यों नहीं गए? पहले डाकघर और परिषद् क्यों?
नमूना उत्तर — पहले उन्होंने डाकघर में पूछा, जहाँ से सेवा ली थी, ताकि बात वहीं सुलझ जाए। संतोषजनक जवाब न मिलने पर परिषद् से सलाह ली कि मुकदमा कैसे दर्ज हो। फिर आयोग गए। प्रश्नावली का प्रश्न 13 (ग) इसी बात पर है: शोषण लगते ही ज़िला आयोग में मुकदमा करना ज़रूरी नहीं।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। यह मानना कि आयोग में वकील ज़रूरी है। किताब साफ़ कहती है कि वकील के साथ भी और बिना भी, और प्रकाश ने ख़ुद बहस की। “क्लास एक्शन सूट” में “क्लास” का मतलब कक्षा नहीं, उपभोक्ताओं का समूह है।
इसी हिस्से में। पृष्ठ 82 का कार्यकलाप · फ़्लैशकार्ड 39–44; प्रश्न बैंक क11, क12, क13, घ7, ङ5, छ5।
पृष्ठ 84 — प्रतिनिधित्व का अधिकार और त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र
कालांश 7 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 7. तीन स्तर के आयोग
किताब कहाँ से शुरू करती है। संगठनों से (पृष्ठ 84)। भारत में उपभोक्ता आंदोलन ने कई संगठन बनवाए, जिन्हें आम तौर पर उपभोक्ता अदालत या उपभोक्ता संरक्षण परिषद् कहते हैं। ये बताते हैं कि उपभोक्ता अदालत में मुकदमा कैसे दर्ज कराएँ, कई बार आयोगों में उपभोक्ता का प्रतिनिधित्व करते हैं, और जागरूकता के लिए सरकार से वित्तीय सहयोग पाते हैं। आवासीय कॉलोनी का ‘निवासी कल्याण संघ’ भी अपने किसी सदस्य के साथ हुई अनुचित व्यावसायिक कार्रवाई का मामला देखता है।
फिर कोपरा का तंत्र: उपभोक्ता विवाद निपटाने के लिए ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर त्रिस्तरीय न्यायिक तंत्र। किताब के अनुसार ज़िला स्तर 1 करोड़ तक के दावे, राज्य आयोग 1 करोड़ से 10 करोड़ तक, और राष्ट्रीय आयोग 10 करोड़ से ऊपर के दावे देखता है। ज़िला आयोग में मामला खारिज हो, तो उपभोक्ता राज्य आयोग में और फिर राष्ट्रीय आयोग में अपील कर सकता है। निष्कर्ष: “इस प्रकार, अधिनियम ने उपभोक्ता के रूप में उपभोक्ता न्यायालय में प्रतिनिधित्व का अधिकार देकर हमें समर्थ बनाया है।”
परिषद् और आयोग: दो अलग जगहें
- मुकदमा दर्ज करने का रास्ता बताती है
- कई बार आयोग में उपभोक्ता का प्रतिनिधित्व
- जागरूकता के लिए सरकार से वित्तीय सहयोग
- ज़िला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर
- यहाँ मुकदमा दर्ज होता है
- जज दस्तावेज़ जाँचकर फ़ैसला सुनाते हैं
हमारी ओर से — एक, दस, ऊपर। बोर्ड पर तीन सीढ़ियाँ बनाइए: नीचे ज़िला: 1 करोड़ तक, बीच में राज्य: 1 से 10 करोड़, ऊपर राष्ट्रीय: 10 करोड़ से ऊपर। याद रखने के लिए तीन शब्द: एक, दस, ऊपर। फिर बच्चों से पूछिए कि कुछ हज़ार रुपये की खराब घड़ी का मामला किस सीढ़ी पर जाएगा, और किसी कंपनी पर दस करोड़ से ज़्यादा का दावा किस पर। परीक्षा के उत्तर में किताब की सीमाएँ ही लिखवाइए; आज के नियम क्या कहते हैं, यह अतिरिक्त सामग्री में है।
यहीं रुकिए। ज़िला आयोग ने किसी का मामला खारिज कर दिया। क्या उसका रास्ता बंद हो गया?
नमूना उत्तर — नहीं। वह राज्य आयोग में और उसके बाद राष्ट्रीय आयोग में अपील कर सकता है। रेजी के पिता ने भी राज्य आयोग में मामला खारिज होने पर राष्ट्रीय आयोग में अपील की थी, और वहाँ से उन्हें न्याय मिला।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। परिषद् और आयोग को एक मान लेना; ऊपर का चित्र यही अंतर दिखाता है, और पृष्ठ 86 का कार्यकलाप यही पूछता है। दूसरी भूल: यह मानना कि हर शिकायत ज़िला आयोग से ही शुरू होती है। कौन-सा आयोग सुनेगा, यह दावे की रकम पर निर्भर है।
इसी हिस्से में। पृष्ठ 84 का कार्यकलाप · फ़्लैशकार्ड 45–52; प्रश्न बैंक क14, क15, घ8, ङ6, च5, छ2।
पृष्ठ 84–86 — जागरूक उपभोक्ता बनने के लिए आवश्यक बातें
कालांश 8 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 8. जागरूक उपभोक्ता
किताब कहाँ से शुरू करती है। सचेत उपभोक्ता से (पृष्ठ 84)। जो खरीदते समय अपने अधिकारों के प्रति सचेत है, वही अच्छे और बुरे में फ़र्क करके सबसे अच्छा चुनाव कर पाता है, और “एक जागरूक उपभोक्ता बनने के लिए निपुणता और ज्ञान प्राप्त करने की जरूरत होती है।” कोपरा ने केंद्र और राज्य सरकारों में उपभोक्ता मामलों के अलग विभाग बनवाने में मुख्य भूमिका निभाई। पृष्ठ 84 और 85 के सरकारी पोस्टर जैसे विज्ञापनों से, और टेलीविज़न के विज्ञापनों से, सरकार नागरिकों को कानूनी प्रक्रिया के बारे में बताती है।
पृष्ठ 85 के बॉक्स में गुणवत्ता के चिह्न हैं: आई.एस.आई., एगमार्क, हॉलमार्क जैसे शब्दचिह्न अच्छी गुणवत्ता का भरोसा दिलाते हैं, और प्रमाणपत्र देने वाले संगठन उत्पादक को लोगो लगाने तभी देते हैं जब वह श्रेष्ठ गुणवत्ता का पालन करे। पर “सभी उत्पादकों का इन मानदण्डों का पालन करना जरूरी नहीं होता।” जो वस्तुएँ उपभोक्ता की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर असर डालती हैं या बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होती हैं, उनके लिए प्रमाण अनिवार्य है: एल.पी.जी. सिलिंडर, खाने के रंग और उनमें डाली जाने वाली सामग्री, सीमेंट, बोतलबंद पेयजल। बॉक्स के पास फोर्टिफिकेशन का लोगो छपा है; प्रश्न 12 के अनुसार फूड फोर्टिफिकेशन का मतलब है खाद्य पदार्थ में मुख्य पोषक तत्वों को मिलाना। पृष्ठ 86 पर कोपरा के छह अधिकारों की सूची है, जिसमें उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार भी है।
हमारी ओर से — घर में चिह्नों की खोज। इसे घर का काम बनाइए। हर बच्चा घर की पाँच चीज़ें देखे, जैसे बिजली का प्लग, गैस का चूल्हा, तेल या घी का पैकेट, पानी की बोतल, और कॉपी में लिखे कि किस पर कौन-सा चिह्न है। अगले दिन बोर्ड पर तीन खाने: आई.एस.आई., एगमार्क, कोई चिह्न नहीं। तीसरा खाना सबसे लंबा होगा। वहीं से किताब की वह पंक्ति पढ़िए कि सब उत्पादकों के लिए मानदंड मानना ज़रूरी नहीं। पोस्टर दिखाते समय एक सावधानी: उन पर छपे हेल्पलाइन के घंटे और वेबसाइट को आज की जानकारी मानकर मत पढ़ाइए; फ़ोन से शिकायत का आज का रास्ता अतिरिक्त सामग्री में है।
यहीं रुकिए। अगर आई.एस.आई. चिह्न गुणवत्ता पक्की करता है, तो बाज़ार में इतनी चीज़ें बिना चिह्न के क्यों मिलती हैं?
नमूना उत्तर — क्योंकि सब उत्पादकों के लिए इन मानदंडों का पालन ज़रूरी नहीं है। प्रमाण केवल उन वस्तुओं के लिए अनिवार्य है जो सुरक्षा और स्वास्थ्य पर असर डालती हैं या बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होती हैं, जैसे एल.पी.जी. सिलिंडर, खाने के रंग, सीमेंट और बोतलबंद पेयजल।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। चिह्नों को आपस में मिला देना। प्रश्नावली के हिसाब से एगमार्क अनाजों और खाद्य तेल का प्रमाण है (प्रश्न 12), हॉलमार्क आभूषणों का (प्रश्न 13), और फोर्टिफिकेशन का लोगो बताता है कि भोजन में मुख्य पोषक तत्व मिलाए गए हैं। कक्षा में इतना ही बताइए।
इसी हिस्से में। पृष्ठ 86 का कार्यकलाप · फ़्लैशकार्ड 53–63; प्रश्न बैंक क16, घ9, घ10, च1, च6।
पृष्ठ 86–87 — उपभोक्ता आंदोलन को आगे बढ़ाने के संबंध में
कालांश 9 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 9. आंदोलन आगे कैसे बढ़े
किताब कहाँ से शुरू करती है। एक तारीख से (पृष्ठ 86)। 24 दिसंबर को भारत में राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है, क्योंकि 1986 में इसी दिन संसद ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित किया था। भारत उन देशों में से एक है जहाँ उपभोक्ता समस्याओं के निवारण के लिए विशिष्ट न्यायालय हैं। देश में 2000 से अधिक उपभोक्ता संगठन हैं, पर इनमें से केवल 50–60 ही पूर्ण संगठित और मान्यता प्राप्त हैं। फिर कमियाँ: निवारण प्रक्रिया “जटिल, खर्चीली और समय साध्य” साबित हो रही है, कई बार वकील चाहिए होते हैं, मुकदमे लंबे चलते हैं, ज़्यादातर खरीद के समय रसीद नहीं दी जाती, और ज़्यादातर खरीद छोटी फुटकर दुकानों से होती है।
पृष्ठ 87 पर 2019 का संशोधन है: इंटरनेट से खरीद भी शामिल हुई; सेवा में कमी या दोषपूर्ण उत्पाद पर सेवा प्रदाता और निर्माता भी ज़िम्मेदार होंगे और जेल तक हो सकती है; और आयोग के बाहर तटस्थ मध्यस्थ से विवाद निपटाने को तीनों स्तरों पर बढ़ावा मिला। फिर भी, किताब के शब्दों में, “कोपरा के अधिनियम के 35 वर्ष बाद भी” उपभोक्ता ज्ञान बहुत धीरे फैल रहा है (1986 से 2019 तक 33 वर्ष होते हैं; 35 वर्ष 2021 तक की गिनती है), और “श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए कानूनों के लागू होने के बावजूद, खास तौर से असंगठित क्षेत्र में ये कमजोर हैं।” अध्याय की आख़िरी बात: “यह अक्सर कहा जाता है कि उपभोक्ताओं की सक्रिय भागीदारी से ही उपभोक्ता आंदोलन प्रभावी हो सकता है। इसके लिए स्वैच्छिक प्रयास और सबकी साझेदारी से युक्त संघर्ष की जरूरत है।”
हमारी ओर से — रसीद का लिफ़ाफ़ा। आज से हर बच्चा एक लिफ़ाफ़ा रखे। घर के लिए जो भी खरीदा जाए, उसकी रसीद माँगे और लिफ़ाफ़े में रखे। दो हफ़्ते बाद कक्षा में गिनिए: कितनी बार रसीद मिली, कितनी बार माँगने पर मिली, कितनी बार नहीं मिली। किताब की “रसीद नहीं दी जाती” वाली बात बच्चे अपने आँकड़ों से देख लेंगे। साथ में चार्ट पेपर पर दो खाने बनाइए, क्या मिला और क्या बाकी है, और पृष्ठ 86–87 से भरवाइए; यही चार्ट अगले कालांश में काम आएगा। एक बात साफ़ रखिए: किताब छोटी दुकानों की बात सबूत की कठिनाई के लिए करती है, दुकानदार पर शक करने के लिए नहीं। मोहल्ले का दुकानदार भी किसी और दुकान पर उपभोक्ता है।
यहीं रुकिए। रसीद न मिलना उपभोक्ता के लिए इतनी बड़ी बात क्यों है?
नमूना उत्तर — शिकायत में सबूत चाहिए। किताब कहती है कि ज़्यादातर खरीद के समय रसीद नहीं दी जाती, इसलिए सबूत जुटाना आसान नहीं होता। अरिता के मामले में भी आयोग ने पहले बिल और वारंटी माँगे थे (पृष्ठ 84)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। 2000 से अधिक संगठनों की बात पढ़कर बच्चे मान लेते हैं कि आंदोलन बहुत मज़बूत है। उसी वाक्य का दूसरा हिस्सा पढ़वाइए: केवल 50–60 ही पूर्ण संगठित और मान्यता प्राप्त हैं। दूसरी उलझन नाम की: पृष्ठ 78 का “उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम” और पृष्ठ 86 का “उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम” एक ही कानून है, यानी कोपरा।
इसी हिस्से में। अध्याय का तर्क · फ़्लैशकार्ड 64–72; प्रश्न बैंक क17, क18, क20, ङ7, च4, छ3, छ4।
पृष्ठ 87–89 — प्रश्नावली, परियोजना और समापन
कालांश 10 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: सार · इंटरैक्टिव: अभ्यास · इंटरैक्टिव: परियोजना
किताब कहाँ से शुरू करती है। प्रश्नावली से (पृष्ठ 87)। पृष्ठ 87–88 पर 13 प्रश्न हैं, पृष्ठ 88 पर अतिरिक्त परियोजनाएँ, और पृष्ठ 89 पर 17 प्रश्नों की एक प्रश्नावली, जिससे पता चलता है कि कोई उपभोक्ता के रूप में कितना जागरूक है; यह परियोजना के सर्वेक्षण में काम आती है। परियोजनाओं में एक नारा भी है: “सतर्क उपभोक्ता ही सुरक्षित उपभोक्ता है।”
हमारी ओर से — पहले सवाल पर लौटिए। पहले कालांश में टाँगा चार्ट पेपर उतारिए: जिस उपभोक्ता के साथ गलत हुआ, वह अपने अधिकार का प्रयोग कैसे करे? बच्चे अध्याय से जवाब को कदमों में बनाएँ: अपने छह अधिकार जानिए; पैकेट, चिह्न और अधिकतम खुदरा मूल्य देखिए; रसीद रखिए; पहले विक्रेता से शिकायत कीजिए; ज़रूरत हो तो परिषद् से सलाह लीजिए; दावे की रकम के हिसाब से सही आयोग में जाइए; हारें तो अपील कीजिए। ऊपर किताब का नारा लिख दीजिए। पिछले कालांश का क्या मिला, क्या बाकी है वाला चार्ट इसके पास टाँगिए।
यहीं रुकिए। इस अध्याय को एक वाक्य में कहना हो, तो क्या कहेंगे?
नमूना उत्तर — बाज़ार में अकेला उपभोक्ता कमज़ोर है, इसलिए आंदोलन से कानून बना और अधिकार मिले, पर ये अधिकार तभी काम आते हैं जब उपभोक्ता ख़ुद जागरूक और सक्रिय हो।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। प्रश्न 12 में। छपी किताब में “विकसित करने वाली एजेंसी” वाली पंक्ति बाएँ खाने में (4) के नीचे छप गई है; यह दाएँ खाने के (च) का हिस्सा है। बच्चों से कहिए कि (4) को “ज़िला उपभोक्ता आयोग” और (च) को “वस्तुओं और सेवाओं के लिए मानक विकसित करने वाली एजेंसी” पढ़ें। प्रश्न 11 जैसे समीक्षा वाले प्रश्नों में बच्चे केवल प्रगति लिखकर रुक जाते हैं; उत्तर में कमियाँ भी चाहिए।
इसी हिस्से में। किताब की पंक्तियाँ · समय कम हो तो · प्रश्न बैंक क19, ङ8 और क्विज़।
कक्षा की गतिविधियाँ
पृष्ठ 79 की गतिविधि — सात जगहों के सुरक्षा नियम
कालांश 3 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 3. सुरक्षा का अधिकार
किताब की बात पहले बच्चों को दीजिए: किताब सात चीज़ें और जगहें गिनाती है, (क) एल.पी.जी. सिलेंडर (ख) सिनेमा थिएटर (ग) सर्कस (घ) दवाइयाँ (च) खाद्य तेल (छ) विवाह पंडाल (ज) एक बहुमंजिली इमारत, और पूछती है कि इनके उत्पादकों को किन सुरक्षा नियमों का पालन करना चाहिए। सूची में (ङ) नहीं छपा है; अक्षर किताब वाले ही रखिए, ताकि बच्चे मिलान कर सकें। किताब का अपना संकेत प्रेशर कूकर का सेफ्टी वॉल्व है: एक हिस्से की खराबी भयंकर दुर्घटना बन सकती है।
हमारी ओर से। सात समूह बनाइए और हर समूह को एक अक्षर दीजिए। हर समूह दो बातें लिखे: किस चीज़ की खराबी से खतरा है, और उत्पादक या मालिक को कौन-सा नियम मानना चाहिए। तीन के संकेत किताब में ही हैं: एल.पी.जी. सिलिंडर के लिए प्रमाण अनिवार्य है (पृष्ठ 85), दवा पर उचित प्रयोग के निर्देश और अंतिम तिथि छपी होनी चाहिए (पृष्ठ 80), और खाद्य तेल में मिलावट नहीं होनी चाहिए। सिनेमा, सर्कस, पंडाल और बहुमंजिली इमारत के लिए किताब में कोई तय उत्तर नहीं है; वहाँ बच्चे आग, बिजली और भीड़ से बचाव के बारे में सोचें। हर समूह के उत्तर में यह ज़रूर हो कि ज़िम्मेदारी किसकी है।
पृष्ठ 81 की गतिविधि — खाली पैकेटों की जाँच
कालांश 4 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 4. सूचना का अधिकार
किताब की बात पहले बच्चों को दीजिए: पृष्ठ 80 की सूची, यानी अवयव, मूल्य, बैच संख्या, निर्माण की तारीख, अंतिम तिथि और बनाने वाले का पता। किताब का कार्यकलाप कहता है कि कुछ डिब्बाबंद वस्तुओं के पैकेट लेकर उन पर दी गई जानकारी जाँचिए, वह कैसे उपयोगी है, और कौन-सी जानकारी और होनी चाहिए।
हमारी ओर से। एक दिन पहले हर बच्चे से घर का एक खाली पैकेट या रैपर मँगवाइए, जैसे बिस्कुट, साबुन या नमक का। बोर्ड पर किताब की सूची से छह खाने बनाइए। हर समूह अपने पैकेटों पर देखे और खानों में निशान लगाए। फिर दो सवाल: किस पैकेट पर कुछ छूटा था? और अगर दुकानदार अधिकतम खुदरा मूल्य से ज़्यादा माँगे, तो आप क्या करेंगे? किताब के अनुसार इससे ज़्यादा लेने पर कोई भी शिकायत कर सकता है, और इससे कम पर मोल-भाव हो सकता है। पैकेट सँभालकर रखिए; आठवें कालांश में इन्हीं पर गुणवत्ता के चिह्न खोजने हैं।
पृष्ठ 82 की गतिविधि — विज्ञापनों की परख
कालांश 6 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 6. न्याय कहाँ मिले
किताब की बात पहले बच्चों को दीजिए: पृष्ठ 82 पर लुभाने वाले प्रस्ताव हैं: 500 ग्राम पर 15 ग्राम अतिरिक्त, अखबार के ग्राहक बनने पर साल के अंत में उपहार, खुरचकर 10 लाख तक का इनाम, 500 ग्राम ग्लूकोज़ के डिब्बे में चॉकलेट, पैकेट में सोने का सिक्का, और 2000 रुपये तक के जूते पर 500 रुपये तक का जोड़ी मुफ़्त। किताब पूछती है कि क्या इनमें कोई विज्ञापन सचमुच उपभोक्ताओं को लाभ पहुँचाता है।
हमारी ओर से। बोर्ड पर तीन सवाल लिखिए, जो हर प्रस्ताव पर पूछने हैं: क्या दाम वही है? क्या इनाम पक्का है या किस्मत पर? क्या “मुफ़्त” चीज़ की कीमत पहले से दाम में जुड़ी हो सकती है? समूहों को एक-एक प्रस्ताव दीजिए। जो प्रस्ताव नापा जा सके, जैसे 15 ग्राम अतिरिक्त, उसे बच्चे अलग पहचानें; इनाम और सिक्के वाले प्रस्ताव किस्मत पर टिके हैं। अंत में पृष्ठ 89 की प्रश्नावली का वह प्रश्न पढ़िए जिसमें आकर्षक प्रस्तावों पर बेहिचक दौड़ पड़ने को जागरूकता की कमी माना गया है। घर से अख़बार के विज्ञापन लाने को भी कह सकते हैं।
पृष्ठ 84 की गतिविधि — अरिता के कदम सही क्रम में
कालांश 7 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 7. तीन स्तर के आयोग
किताब की बात पहले बच्चों को दीजिए: अरिता ने एक दीवार घड़ी खरीदी, जो दोषयुक्त निकली। किताब उसके आठ कदम अक्षरों (क) से (ज) के साथ उलट-पुलट क्रम में देती है, और कहती है कि इन्हें सही क्रम में रखिए। इस सूची में (ङ) की जगह “(ड.)” छपा है; बच्चे वही अक्षर लिखें।
हमारी ओर से। आठ कदम आठ पर्चियों पर लिखिए और आठ बच्चों को दीजिए। वे सही क्रम में खड़े हों: (छ) घड़ी खरीदी → (ग) लगा कि घड़ी दोषयुक्त है → (ड.) शाखा कार्यालय में डीलर के ख़िलाफ़ शिकायत, कोई असर नहीं → (ख) पेशेवर व्यक्ति से मिली → (क) ज़िला आयोग में मुकदमा → (च) आयोग ने बिल और वारंटी माँगे → (घ) आयोग की कार्यवाही में भाग लिया → (ज) आयोग ने नई घड़ी देने का आदेश दिया। फिर पूछिए कि किस कदम पर रसीद काम आई, और अरिता के कदम प्रकाश के कदमों से कैसे मिलते हैं: दोनों पहले सेवा देने वाले के पास गए, फिर सलाह ली, फिर आयोग। कोई बच्चा (ख) को (ड.) से पहले रखे, या (च) और (घ) अदल-बदल दे, तो उसका कारण सुनिए।
पृष्ठ 86 की गतिविधि — छह अधिकार, छह खाने
कालांश 8 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 8. जागरूक उपभोक्ता
किताब की बात पहले बच्चों को दीजिए: पृष्ठ 86 पर कोपरा के छह अधिकार हैं, (क) चयन (ख) सूचना (ग) निवारण (घ) प्रतिनिधित्व (च) सुरक्षा (छ) उपभोक्ता शिक्षा। साथ में छह मामले हैं: लता को नए आयरन-प्रेस से बिजली का झटका; जॉन का टेलीफ़ोन सेवा पर मुकदमा; मित्र की समाप्ति तारीख निकली दवा; इकबाल का आवरण की जानकारी जाँचना; केबल ऑपरेटर का कोई विकल्प न होना; खराब कैमरे की मुख्य कार्यालय में शिकायत। किताब कहती है कि हर मामले को सही अधिकार के खाने में रखिए।
हमारी ओर से। चार्ट पेपर पर छह खाने बनाइए। बच्चे मामलों के नाम खानों में लिखें। जॉन और मित्र वाले मामले दो खानों में जा सकते हैं; कारण के साथ दिया गया हर उत्तर ठीक मानिए। कुंजी शिक्षक संदर्शिका के पृष्ठ 86 के कार्यकलाप में है। छह अधिकार याद रखने के लिए अध्याय के क्रम में एक छोटी याद: सु-सू-च-नि-प्र-शि, यानी सुरक्षा (पृष्ठ 79), सूचना (80), चयन (81), निवारण (82), प्रतिनिधित्व (84), शिक्षा (84–86)। ध्यान रखिए कि पृष्ठ 86 की सूची का क्रम दूसरा है; मिलान में किताब के अक्षर ही चलेंगे।
पृष्ठ 88 की गतिविधि — शिकायत-पत्र और सर्वेक्षण
कालांश 10 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: परियोजना
किताब की दूसरी परियोजना: श्रीमती कृष्णा ने 6 महीने की वारंटी वाला रंगीन टी.वी. खरीदा, जो तीन महीने बाद बंद हो गया। दुकान ने इंजीनियर भेजा, फिर भी वह बार-बार खराब होता रहा, और दुकानदार ने शिकायतों का जवाब नहीं दिया। बच्चों को उनके लिए अपने क्षेत्र के उपभोक्ता आयोग को पत्र लिखना है। छठी परियोजना पृष्ठ 89 की प्रश्नावली से सर्वेक्षण की है।
हमारी ओर से। पत्र का ढाँचा बोर्ड पर बनाइए: सेवा में, विषय, क्या खरीदा और कब, क्या हुआ, क्या माँगते हैं, और साथ में लगे काग़ज़ (बिल, वारंटी कार्ड, शिकायतों का ब्योरा)। पूरा नमूना पत्र रिवीजन नोट्स में है। बच्चों से पूछिए कि पत्र किस आयोग को जाएगा: टी.वी. का दावा 1 करोड़ से बहुत कम है, इसलिए ज़िला आयोग को। सर्वेक्षण के लिए हर बच्चा घर के दो बड़ों से पृष्ठ 89 की प्रश्नावली भरवाए। नतीजा निकालते समय याद रखिए कि प्रश्न 5, 12, 13, 15 और 16 उल्टे गिने जाते हैं; पूरा तरीका शिक्षक संदर्शिका में है। ये दोनों काम समूहों में दो हफ़्ते के लिए दीजिए।
पृष्ठ 87–88 — प्रश्नावली
कालांश 10 · कालांश 10 का कार्ड · इंटरैक्टिव: अभ्यास
इनके नमूना उत्तर शिक्षक संदर्शिका में हैं:
- प्रश्न 1 से 4: उत्तर के मुख्य बिंदु
- प्रश्न 5 से 8: उत्तर के मुख्य बिंदु
- प्रश्न 9 से 11: उत्तर के मुख्य बिंदु
- प्रश्न 12 और 13: कुंजी और कारण
- पृष्ठ 88 की परियोजनाएँ: पोस्टर, शिकायत-पत्र और सर्वेक्षण
- पृष्ठ 89 की प्रश्नावली: प्रश्नावली और उसकी टिप्पणी
- अध्याय के बीच के कार्यकलाप, पृष्ठ 77 से 86: प्रश्नावली के उत्तर
अभ्यास के लिए बच्चों को प्रश्न बैंक, फ़्लैशकार्ड और क्विज़ दीजिए।